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हर चीज अनमोल है

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“जय राधे-राधे-राधे, जय गिरिधर गोपाला, जय श्यामा-श्यामा-श्यामा, जय-जय नन्दलाला”........ 

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “हर चीज अनमोल है” इस संसार में अगर हम देखें तो कोई भी चीज बेकार नहीं है । जिस परमात्मा ने ये दुनिया बनाई है उसने कोई भी चीज बेकार नहीं बनाई है । हर चीज सोच समझ कर बनाई है । हर चीज अनमोल है । हमारे द्वारा बनाई चीज बेकार व्यर्थ हो सकती है । पर उस परमात्मा की बनाई कोई भी चीज व्यर्थ नहीं हो सकती है । इसलिए दुनिया में अनमोल है । फर्क है तो हमारी नजरों का, हम अपने कारनामों से हर चीज को व्यर्थ बना देते है । वरना सब  अनमोल है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग १.- एक बार एक गुरू थे. उनका एक आश्रम था, तो वो उनको शिक्षा देते थे तो एक बार एक शिष्य की शिक्षा पूरी हो गई तो वो जाने लगा.

तो उसने कहा - कि गुरूदेव आप गुरू दक्षिणा माँग लीजिए.

तो गुरू ने कहा - बेटा इसकी जरूरत नहीं है. मुझे नहीं चाहिए.

तो वो कहता है - कि नहीं आपने शिक्षा दी है तो कुछ लेना ही होगा.

तो गुरू कहते है - कि ठीक है जो तुम्हारे काम की चीज न हो, बेकार हो, तुम वो दे दो.

अब वो बोला - कि ठीक है गुरूदेव! तो वो गया और मिटटी ले आया. और देने लगा कि ये मेरे कोई काम की नही तो जैसे ही वो देने लगा तो उसमें से आवाज आई कि मै व्यर्थ नहीं हूँ अगर मै ना होती तो तुम जीवित भी ना होते. कैसे? वो पूछता है ।

तो वो कहती है - कि जो तुम अनाज खाते हो वो मुझसे ही तो पैदा होते है, ये जो पेड पौधे है जिनसे तुम सांस लेते हो ये मेरे ही उपर तो है । हवा चलती है । अगर मै ना होती तो अनाज न होता और तुम क्या खाते जीवित कैसे रहते है । तो मै व्यर्थ नहीं हूँ.

 

तो वो समझ गया कि ये तो मै गलत चीज दे रहा था तो वो फिर से गया और पत्थर उठा लाया और गुरू देव को देना लगा तो उस पत्थर से आवाज आई - कि मै कैसे व्यर्थ हूँ? अगर मै ना होता तो तुम रहते कहाँ? क्योंकि पत्थर से ही तो घर, मकान बनते है । अब उसको लगा कि ये भी सही है ये भी व्यर्थ नहीं है ।

 

फिर वो गया और गंदगी उठा लाया और देना लगा तो वो गंदगी बोली - कि देखो मै जब सडती गलती हूँ तो वो खाद बनती है और जब वो मिटटी में मिलती है । तो उससे ही अनाज पैदा होता है । तो मे व्यर्थ कैसे हो सकती हू ।

 

अब ऐसा करते-करते बहुत देर हो गई तो उसके गुरू ने उसको समझाया - कि बेटा इस दुनिया में हर चीज अनमोल है । ये तो हमारी नजरों को खेल है । तो हमे हर चीज व्यर्थ लगती है । क्योंकि हमें उसे जमाना नहीं आता, किसी चीज को जमाना प्रबंधन आता ही नहीं हमें, और अगर वो आता तो हम कहते ही नहीं कि दुनिया की कोई चीज बेकार है हमारे काम की नहीं है 


हम देखते है हमारे घर में कचरा, कबाड़ होता है, वो रिसाइकल होकर फिर काम का बन जाता है,हमें वह व्यर्थ लगती है पर दूसरे कि काम की चीज है. तो वो भी काम का है । कहने का अभिप्राय ये है कि हमे जो चीज व्यर्थ लगती है उसी से वो दूसरे को काम की निकलती है । अगर कहीं सगीत चल रहा है कोई वादय यंत्र बज रहा है और हमे संगीत नहीं आता है तो वो हमारे लिए सिर्फ एक शोर है और कुछ नहीं क्योंकि हम संगीत के बारे में कुछ नहीं जानते है । पर वो एक संगीतकार के लिए संगीत वादय यंत्र कितनी कमाल की चीज है । उसका पूरा जीवन है वो संगीत.

 

कहीं बिखरे हुए रंग है बहुत सारे तो वो हमारे लिए गंदगी है । कुछ भी नहीं है पर वहीं एक पेंटर और चित्रकार के लिए कमाल है । वो उनसे चित्रकारी कर सकता है । वो हमारे लिए व्यर्थ हो सकता है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग २.- जैसे हम सब को मालूम है समुद्र मंथन हुआ था. दानवों और दैत्यों के बीच, तो भगवान ने कहा था कि इसमें बहुत अनमोल चीजें है पर ये मंथन एक के बस का नहीं है इसे सबको मिलकर करना है । दोनों मिलकर करो मंथन. दोनों राजी हुए कि जो भी निकलेगा आधा-आधा बाँट लेगें.

 

तो सबसे पहले विष निकला तो देवता और दानव कहते है कि ये हमारे काम का नहीं है व्यर्थ है हमारे लिए. लेकिन जब वो विष किसी के काम नहीं आया तो भगवान शिव ने कहा - कि मै इस विष का पान मै करूगाँ. इस संसार में कुछ भी व्यर्थ नहीं है । तो जो विष निकला उसे भगवान शिवजी ने पी लिया.

 

उस समुद्र मंथन की तरह भी ये संसार है हम निकालते है लेकिन देवता और दानव की तरह हम भी सोच लेते है. कि ये तो हमारे काम का ही नहीं. बस हमें ये ही नहीं करना है ।

 

प्रसंग ३.- एक बार एक व्यक्ति बडे सरल, स्वभाव का था. रोज वो दुकान लगाता रोज बहुत सारे लोग आते और उससे सामान खरीदते उसकी एक बात थी कि वो कभी किसी से कुछ कहता नहीं था. कई लोग उसे खोटे सिक्के दे देते थे, पर वो बिना कुछ कहे उन्हें रख लेता था, कई लोग दाम भी नहीं चुकाते थे. पर वो उनसे भी कुछ नहीं कहता था लोग उसे जानकर खोटे सिक्के देते और कुछ तो दाम भी नहीं चुकाते थे पर वो कुछ नहीं कहता सिर्फ धन्यवाद बोल देता था.

 

लोग दूर-दूर से आते थे उसकी दुकान से सामान ले जाते थे. तो ऐसा करते-करते उसकी उम्र बीत गई और जब उसका अंतिम समय बीत गया तो उसने कहा - कि हे परमात्मा! मैने अपने जीवन में हर तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए है, तो मै भी खोटा सिक्का हूँ । मैंने कभी तुम्हारे लोगो का फैसला नहीं किया, तुम भी मेरा फैसला मत करना, मुझे परखना मत , मै खोटा सिक्का हूँ मुझे रख लो तो परमात्मा सोचते है कि ये तो सही कह रहा है. इसने कभी भी सिक्का लेने से मना नहीं किया तो भगवान भी अपनी बाँहें फैला कर उसका स्वागत करते है ।

 

कहने का मतलब ये है कि उस ईश्वर ने हर चीज बडे प्यार से बनाई है । उसकी बनाई हुई चीज में न तो खोट है । और ना ही कमी, कमी है तो हमारे नजरिए में, हम अपने तरीको से अपने जीवन को भी व्यर्थ बना लेते है । और दूसरे का जीवन तो हम व्यर्थ ही समझते है । मांस खाने वाले तो यहीं समझते कि ये जानवर तो मेरे खाने के लिए ही है ।इसकी जिंदगी तो व्यर्थ है ।

 

प्रसंग ३. - एक सामंत सेठ था, जब उसने सारा व्यापार कर लिया तो उसके मन में आया कि अब मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना चाहिए. तो उसने सबको अपने यहाँ बुलाया. नगर के सारे लोगों को खाना खिलाया और उसने बकरे के बच्चें मेमनें का मांस और मछलियाँ लोगों को परोसा. सबने खाया, भोजन खत्म हो चुका तो सेठ ने कहा - आप सब का धन्यवाद जो यहाँ आए. और उस परमात्मा का भी जिसने इतनी अच्छी मछलियाँ, मेमनें का मांस दिया. सब लोग ने हाँ में हाँ मिलाई.

 

तो एक लडका उठा और बोला - कि आप गलत कह रहे हो कि ये जो मांस उसने हमें खाने को दिया.नहीं  ये चीज हमारे खाने के लिए नहीं है । अगर आप उसका मांस खा रहे हो तो उसके मरने के जिम्मेदार भी आप हो. आप किसी को जिदंगी दे नहीं सकते , तो लेने का क्या हक है, ये तो परमात्मा काम है पर वो तभी मारता है जब व्यक्ति का समय आ जाता है । तो ये हमारे खाने के लिए नहीं है उसने हमारे खाने के लिए दूसरी चीजें बनाई ,अगर हम हरी भरी चीजें छोडकर मांस खाए. तो वो उसका जीवन हमारे लिए व्यर्थ हो सकता है । परमात्मा की बनाई हर चीज प्राणी सब अनमोल है । अपना जीवन तो अनमोल हमारे लिए अनमोल है ।

 

इसी तरह हर प्राणी के लिए उसका जीवन अनमोल है जैसा हमारा हमें तो कहने का अभिप्राय ये है कि दूसरों के जीवन को उतना ही अनमोल समझना है जितना हमारा इस संसार मे कुछ भी चीज व्यर्थ नहीं है ।

 

प्रसंग ४. - एक संत को चोट लग गई तो उनके घाव पर कीडे हो गए तो जब वो चलते तो वो कीडे गिर जाते तो वो उठाकर उसे अपने घाव पर रख देते थे । जब लोगों ने पूछा - कि आप ऐसा क्यों करते है । तो वो बोले - कि जब ये शरीर मिटटी में मिलना है । तो हमे इसे व्यर्थ क्यो जाने दें अगर ये किसी के काम आ जाए. ये शरीर किसी के काम में आ जाए तो ये मेरा शरीर इन कीडों के काम आ जाए तो ऐसे संत भी हुए है । हर चीज में वो सकारात्मक नजरिया देखते है । हमारा शरीर किसी के काम आ गया तो ये व्यर्थ नहीं है । परमात्मा की बनाई कोई भी चीज व्यर्थ नहीं है । प्रकृति से उस परमात्मा को हम कैसे निकालते है । ये तो हुई संसार की बात, अब आध्यात्म में हम देखें इसी संसार में उस परमात्मा केा निकालें जब उस आध्यात्मिक दृष्टिी से देखेंगे, तो वास्तव में हर चीज अनमोल लगेगी.  दुनिया में कोई भी चीज व्यर्थ नहीं लगेगी . प्रेम से कहिए श्री राधे

 

"राधे-राधे"


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