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सबसे सुखी कौन है

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवान नाम का कीर्तन करेंगे ।

“कृष्ण गोविदं-गोविंद, गोपाला नंदलाल, कृष्ण गोविदं गोपाला नंदलाल......”

श्री राधारानी बाके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “सबसे सुखी कौन” तो अगर हम संसार की दृष्टिी से देंखे तो जीवन को सुख और दूख दो रूपों में बाँटा गया है । हर व्यक्ति का जीवन इनसे भरा है कभी सुख है तो कभी  दुख. लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिी में सुख-दुख की कोई जगह नहीं. क्योंकि वहाँ ये है ही नहीं, इससे बढकर तीसरी चीज है वो है “आनंद” तो ये सुख-दुख संसार में है । बात ये है कि सबसे सुखी कौन है.

प्रसंग १- एक प्रसंग है कि एक संत थे वो एक राजा की सभा में बैठे थे तो उसमें सब लोग थे तो एक व्यक्ति ने उनसे प्रष्न किेया कि स्वामी जी सबसे सुखी कौंन है. तो स्वामी जी ने कहा - कि मै तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूगाँ, पर पहले मेरे सवाल का जवाब दो.

तो संत ने राजा से कहा - कि आपकी क्या चाहत है. तो राजा ने कहा - कि भगवान की दया से मेरे पास सबकुछ है । किसी चीज की कमी नहीं है, धन-दौलत है, बस राज्य कों चलाने वाला एक पुत्र चाहिए तो फिर संत ने वहीं बैठे धनी से कहा - कि तुम क्या चाहते हो? तो वो बोला-  कि मै इस नगर का सबसे धनवान व्यक्ति बनना चाहता हूँ. तो ऐसे संत ने सबसे पूछाँ और अंत में एक व्यक्ति से कहा - कि तुम क्या चाहते हो ? तो बोला - कि मुझे कोई चाहत नहीं है । मुझे कुछ नहीं चाहिए. 

आप तो बस कृपा करो कि मेरी कोई चाहत ही न रहे. तो संत उस व्यक्ति से बोले - कि अब तुम समझ गए कि सबसे सुखी कौन है  तो सबसे सुखी वो व्यक्ति है जिसकी चाहते खत्म हो गई है । क्योंकि व्यक्ति के पास सारे सुख होते हुए चाहत खत्म नहीं हुई तो कैसा सुखी और अगर अभाव होते हुए भी उसकी कोई चाहत नही तो वो सुखी है किसी चीज की चाहत नहीं है ।

जैसे मान लो दो व्यक्ति है सडक पर जा रहे है दोनों के कपडा फटे है, पैरों में जूते नहीं है, खाने को नहीं है, पर दोंनों में अंतर है-  एक अभाव ग्रस्त है - कि उसके पास रोटी, कपडा, मकान, नहीं है. तो वो दूखी है.

दूसरा वैारागी है - उसकी कोई चाहत नहीं है इसलिए वो सुखी है क्योंकि उसके मन में कोई भाव नहीं चाहत नहीं है । अब वो बहुत सुखी है. दोंनो है एक जैसे, पर एक सुखी है क्योकि उसके मन में कोई चाह नहीं है । दुनिया की कोई चीज नहीं है धन दौलत, उस वैरागी व्यक्ति को सुखी नहीं कर सकती.  और अभावग्रस्त को सुखी नहीं कर सकती क्योकि उसके पास कुछ भी आ जाये उसे सदा चाहत बनी रहेगी. उसको कुछ भी मिलेगा जो उसके पास अभी नहीं है पर ये सब मिलने के बाद उसकी और चाहतें हो जाएगीं तो दुनिया की कोई भी वस्तु उस चाहत वाले व्यक्ति की चाह पूरी नहीं कर सकती है ।  उसे सुख कोई नहीं दे सकता है ।  जबकि दोंनो एक से हाल में है ।वो कहते है -  “वाह वाह रे मौज फकीरा दी “ फकीर हर हाल  में मस्त रहता है । उसकी चाहते खत्म हो जाती है । दुनिया का हर काम हर व्यक्ति सुख के लिए करता है । कि मै ये करूगाँ तो इससे मुझे सुख मिलेगा तो वो जो इच्छा है  जिसका मतलब खुषी को पाना है पर सबसे पहले वो उस खुषी को ही मार देती है । मान लो वो इच्छा पूरी हो गई तो उससे दूसरी इच्छा शुरू हो जाती है तो व्यक्ति इस सुख और दुख में घिरा रहता है । हमोर अंदर लालच है् और अंदर इतनी इच्छाएँ है कि जिसका कोई हिसाब नहीं है ।

जब हमनें केाई चीज देखी तो मन ने उसको पाने की इच्छा की. फिर जब मन ने पाने की इच्छा की तो उसके पीछे हमारे विचार जुड गए सब वहीं जाने लगे हमारे विचार और इच्छा पूरी नहीं हुई तो दुखी कर देगी और पुरी हो गई तो तुरत दूसरी आ गई . जैसे व्यक्ति के पास एक नई कार है पर उसके बाद उसे उससे अच्छी दूसरी कार लेने की इच्छा होने लगती है । फिर वो और बडी गाडी लेने लगता है । उसके बाद उसे लगेगा कि दो तीन ले लेगा. ये लालच है ।

प्रसंग 2- जैसे एक राजा था उसके राज्य में किसान था तो उसको दरबार में बुलाया और कहा - कि तुम्हें क्या चाहिए तो वो किसान बोला –मुझे जमींन चाहिये .राजा बोला -  कि कल सूर्योदय से जितनी जमीन तुम अपने पैरों से नाप लोगे वो तुम्हारी हो जाएगी. पर तुम्हें सूर्यस्त तक वापिस आना होगा तो वो किसान बडा खुष. वो सोचने लगा अब तो मै बहुत धनवान हो जाऊँगा .

अब जैसे ही अगले दिन सूर्य निकला तो उसे चलना शुरू किया.  वो सोचने लगा - कि मै तो बहुत चल सकता हूँ पर अगर मै दौडूँ तो और ज्यादा जमीन मिलेगी. तो वो बहुत दौडा और खुष हुआ कि मेरी तो बहुत जमीन हो गई पर जब उसको याद आया कि सूर्यस्त होनें के पहले मुझे वापस पहुँचना है तो उसने फिर दौडना शुरू किया. और वो एक जगह गिरा और मर गया. तो ये लालच है. वो चाहता तो थोडी सी जमीन ले लेता और उससे फिर और भी ले सकता था तो ये हमारे साथ भी है । हमारी चाहते भी खत्म नहीं होती है तो सबसे सुखी वो है जिसकी चाहते खत्म हो जाती है

एक व्यक्ति इतना अधीर हो जाता है कि उसे अपनी चाहतों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है  और वो ये भूल जाता कि जिसकी वो चाहत कर रहा है वो नश्वर है उसको मिटना है एक दिन जब हम इस दुनिया से जाएगे तो वो यहीं रह जाएगी. अगर हमें सुख ही पाना है तों क्यों ना भगवान को पाने में अपनी मेहनत लगाए अपनी चाहतों को लगाँए.

जिस दिन संसार की जगह परमात्मा की चाह करेगे उसी दिन वो सुख प्राप्त कर लेगा तो चाहत को मत मारो उसका रूख बदल दो. उससे ही सारी चीजें बदल जाएगीं प्रेम से कहिए श्री राधे.

प्रसंग 3- जब भगवान राम को वनवास होता है तो भगवान राम कुटिया में रहते है तो वो फूल चुनने जाती है । तो एक सोने का मृग देखती है । और कहती है कि प्रभु मुझे चाहिए तो लक्ष्मण जी कहते है कि ये तो किसी राक्षस की माया है क्योंकि सोने का मृग तो कभी होता ही नहीं. पर सीता जी नहीं मानती वो राम जी से कहती है कि आप जाओ और मुझे लाकर दो बातों में समय बर्बाद मत करो. और राम जी वो मृग लेने को जाते है तो वो उसको मार देते है क्योंकि वो माया थी और जब लौटते है तो सीता जी भी नहीं मिलती है.

तो इससे राम जी हमें क्या सिखा रहे है । सीता जी क्या है हम सब जीव है । और सोने का मृग संसार की माया है उसी को पाने की चाह करते है ये सब झूठ है संत हमें ये बताते भी है चेतना भी देते है जैसे लक्ष्मण जी बताते है . पर हमें तो सोने के मृग के सामने कुछ भी दिखाई नहीं देता हमें तो बस वो ही चाहिए. और हम उस चाहत के पीछे भगवान को दौडा देते है कि बस प्रभु तुम तो हमें वो ला दो अब भगवान भी भक्त के अधीन रहते है ।  तो भगवान उस इच्छा को तो मार देते है और सीता जी ने भगवान को खो दिया और दुख हाथ लगा, रावण उठा के ले गया. ये रावण कौन है? ये हमारे अंदर का लालच है, हम मंदिर जाते है तो भगवान ये चीज भी हो जाए, इच्छाए करने लगते है तो हम सीता जी की तरह कर रहे है तो वो इच्छा भगवान को हमसे दूर ले जाती है तो सुखी व्प्यक्ति हो वो है जिसने इच्छाओं केा खत्म कर दिया ।

प्रसंग 4- एक पति पत्निी उनकी चालीसवीं साल गिरह थी दोंनो एक दूसरे से प्रेम बहुत करते थे तो उस रात को परी उनके सपने में आई और बोली कि तम्हारी क्या इच्छा है तुम दोनों का प्रेम निस्वार्थ है । तो पत्निी बोली-  कि मुझे तो अच्छी जगह घूमने जाना है । और उस फरिश्ते ने पति से पूछा - कि तुम क्या चाहते हो. तो वो बोला - कि मुझे अपनी उम्र से तीस साल छोटी पत्निी चाहिए. अब जब उसने ये कहा - तो उस फरिश्ते ने उसको नब्बे साल का कर दिया और उसकी पत्निी साठ साल की थी तो ज्यादा पाने की लालच में उसकी आयु तीस साल और बढ गई. अब पत्निी तुमसे तीस साल छोटी हो गई हमें जितना मिलता है हम उससे और अच्दा पाना चाहते है । ओर इस चक्कर मे जो मिला है वो भी हाथ से चला जाता है.  

भगवान से सबको सबकुछ दिया पर अभाव तो हमारे मन का है. संतो ने कहा है - कि “मन के हारे हार है और मन के जीते जीत,” “कबीरा मन मरकट भया, नेक न कबहू ठहराए, राम-नाम बंधे बिना, जित भाबे तित जाए, ये मन बंदर के जैसा है जैसे बंदर उछल कूँद करता है जब तक उसको किसी से रस्सी ना बाँध लिया जाए. उसी तरह जब तक मन को राम नाम रूपी रस्सी से नहीं बाध्गें तब तक ये संसार में भटकता रहेगा. मन राम नाम से स्थिर हो जाएगा. और ये मन ही सबकुछ कराता है व्यक्ति तो एक ही जगह बैठा रहता है और मन जगात में भटकता रहता है .

तो हमें आसक्तिी से दूर रहना है तो आसक्तिी क्या है?जब हम किसी वस्तु से लगाव करने लगते है तो ये ज्यादा बुरा है तो जो “आ सक्तिी है” वो “जा भी तो सक्तिी” है । तो हमें मन को बाँधना है ये इतना आसान नहीं है तो इसको हमें संसार से हटाना है क्योंकि इस संसार में हम भाग रहे है सुख की चाह में  हमें दूसरों से ज्यादा पैसा कमाना है अगर प्रतिस्पर्धा करना है हमें यदि बराबरी ही करनी है,तो भक्तों की, इबादत की, करना है क्योंकि वो ही सुखी है । तो जो राम नाम से हम बाध्गे मन को तो ये चाहते भगवत इच्छाएँ मे बदल जाएगीं संसार की चाहत तुच्छ और भगवान की चाहत असीम है. तो उससे जुडकर हम ज्ष्यादा सुखी होंगें और हमारे साथ क्या जाना है इस संसार का साथ या परमात्मा का साथ यं हमें सोचना है ये भेद करना हमनें सीख लिया तो हमारा दुख चला जाएगा क्योंकि आध्यात्म में आनंद होता है सुख नहीं क्योंकि सुख का तो उलटा दुख है पर आनंद का विपरीत कुछ नहीं है  आनंद वो परमात्मा है और जिस दिन हमनें उसको पा लिया उसी  दिन हम सुखी हो जाएगें

                                                                   “राधे-राधें”  

 

Comments
2018-11-17 13:16:09 By Manoj Kumar

Nice work man

2018-08-23 06:35:23 By Vishnu saini

Radhey Radhey Radhey

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