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एकादशी महात्मय

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राधे राधे आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“हरे-कृष्णा, हरे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा, हरे-हरे,

हरे-रामा, हरे-रामा, रामा-रामा हरे-हरे,...........  

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “एकादशी महात्मय”, तो सबसे पहले ये जानना है कि एकादशी क्या है? और ये किसका व्रत है ? एक मास में दो पक्ष होते है, एक ‘कृष्ण पक्ष’, दूसरा ‘शुक्ल पक्ष’ दोनों मे एक-एक एकादशी होती है। हमारे हिदूं कलेन्डर में देखें तो उसमें तिथियाँ होती है. तो जो ग्यारहवीं तिथि होती है उसको एकादशी कहते है । एक महीने में दो पक्ष होते है हर पंद्रह दिन में एक अमावस्या और अगले में एक पूर्णिमा होती है । और दो एकादशी होती है। एक महीनें में इस तरह एक साल में चौबीस एकादशी होती है। और हर दो साल के बाद तीसरी साल में जब मास बढता है तो बारह की जगह तेरह महीने होते है । तो उसमें हिन्दू वर्ष के अनुसार के एक मास बढ जाता है । उसे पुरूषोत्तम मास कहते है उस साल में दो एकादशी और बढ जाती है, तो छब्बीस हो जाती है। तो जिस साल पुरूषोत्तम मास होता है तो उसमें दो एकादशी बढ जाती है 

 

तो ये हमें पता है कि ग्यारवां दिन एकादशी होता है । तो अब हमें ये जानना है कि ये व्रत किसका है और क्यों रखते है । ये जो एकादशी का व्रत अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है. ये तीन दिन का होता है, दशमी, एकादशी और उसके बाद द्वादशी होती है । तो शास्त्रों में बताया गया कि दसवी के दिन एक समय दिन में भोजन करना चाहिए, रात में आहार को त्याग देना चाहिए और सकंल्प करना चाहिए कि आज से मै अन्न को त्यागता हूँ । ऐसा मन में संकल्प करना है.

 

अगले दिन एकादशी में बह्रम महूर्त में उठकर भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करना है कि मै आज आपका व्रत कर रहा हूँ । ‘उप’ का मतलब है विशेष, वास का मतलब है ‘रहना’ तो उपवास का मतलब विशेष रूप से पास में रहना. तो एकादशी विष्णु जी भगवान कृष्ण जी का व्रत है । तो हमें उस दिन ये संकल्प करना है कि भगवान आज हम आपके पास रहेगें यहीं व्रत है चाहे किसी भी देवता का हो उपवास का मतलब हम भगवान का भजन पूजन करें तो फिर द्वादशी को हम पारण करते है मतलब उस दिन हम व्रत को खोलते है उस दिन अन्न खाया जाता है । अन्न खाकर ही व्रत तोडा जाता है तभी व्रत पूरा होता है । तो एकादशी व्रत कहाँ से शुरू हुआ तो एक कथा आती है

 

एकादशी की उत्पत्ति कथा -

 एक दानव था जिसका नाम मुर था वो बहुत ही शक्तिशाली था लोगों को परेशान करता था. उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया तो उसकी लडाई देवताओं से हुई तो वो हार गए और भाग गए.

 

तो इन्द्र बह्रमा जी के पास गए और बोले - कि ये राक्षस तो हम सें नहीं हार रहा है । आप बताओ कि क्या करें.

 

तो ब्रह्मा जी बोले - कि विष्णु जी के पास जाओ तो सभी लोग बैकुण्ठ गए और सारी बात कही फिर  विष्णु जी देवताओं के साथ उसे दैत्य से युद्ध करने चले गए, तो दोनों में बहुत भंयकर युद्ध हुआ और एक हजार वर्ष तक युद्ध चला. न वो हारे और न वो जीता, तो भगवान थक कर वहाँ से बद्रीनाथ चले गए और एक गुफा में जाकर सो गए. पर वो मुर नामक दैत्य था वो भगवान का पीछा करते-करते उस गुफा में जा घुसा.

 

तो भगवान तो गहरी नींद में सो गए थे तो उस मुर नामक दैत्य ने सोते हुए भगवान पर प्रहार किया कि मै इनको सोते में मार दूँ । जैसे उसने भगवान पर प्रहार किया, तो उनके शरीर से एक देवी प्रकट हुई । और उसने उस मुर नामक दैत्य से युद्ध किया और अपने अस्त्र-शस्त्र से उसका वध कर दिया. थोडी देर बाद जब विष्णु भगवान की नींद खुली तो उन्होंनें देखा कि मुर नामक दैत्य मरा पडा है । और वो कन्या खडीं थी,

 

तो भगवान ने पूछा - कि हे देवी आप कौन है? और ये दैत्य कैसे मरा ?तो उसने पूरी कथा बताई कि भगवान मै आपके शरीर से ही उत्पन्न हुई  हूँ । और ये मुर नामक दैत्य को मैने ही मारा है.

 

तो भगवान ने कहा - कि इस दैत्य से देवता हार गए थे और मै भी युद्ध करते-करते थक गया था इसने सब लोकों को इसने जीत लिया था,इसे मरकर तुमने सबको सुखी किया है .तो तुम मुझसे वर मागों तो उन्हेांनें कहा - कि प्रभु आप प्रसन्न है मुझ पर तो ऐसा कर दीजिए कि जो मेरा व्रत करे उसके सारे पापों को आप नष्ट कर दे , तो भगवान ने कहा - कि देवी तुम एकादशी के दिन प्रकट हुई हो तो मै तुम्हारा नाम एकादशी रखता हूँ.  तुममें और मुझमें कोई फर्क नहीं है । तुम मेरे शरीर से ही प्रकट हुई हो तो जो ये व्रत करेगा मै उस पर अतिप्रसन्न रहुंगा उसके सारे पापों को हर लूगाँ । तब से एकादशी शुरू हो गई 

 

इस व्रत का बहुत महत्व है इसे करने की एक आदत सी बना लेनी चाहिए जब हम कहते है बार-बार एकादशी एकादशी तो अपने आप एक शब्द सुनाई देता है ‘एक आदत सी’ ये शब्द आने लगते है मुहॅ से तो इस एकादशी व्रत को करने का स्वभाव बना लेना चाहिए जो भगवान का भक्त है उसकी एकादशी में श्रद्धा होनी चाहिए.

 

शास्त्रों में कहा गया है - कि एक जो भक्त है उसकी कुछ विशेष चीजों में श्रद्धा होनी चाहिए. तभी वो वास्तव में वैष्णव है- पहला उसे ‘तुलसी’ में निष्ठा होनी चाहिए, दुसरा उसे ‘एकादशी’ व्रत करना चाहिए, तीसरा ‘बाह्रमण’ का सम्मान उसका आदर करना चाहिए. चौथा ‘गौ’ में उसकी निष्ठा होनी चाहिए. तो जो भगवान का भक्त है । उसकी इन चारों चीजों मे निष्ठा होनी चाहिए और इनको भगवान अपना भी इष्ट मानते है । भगवान कहते है कि ये मुझसे प्रकट हुए है बाह्रमण गौ तो ये मेरे भी पूज्य है । हम सब जानते है कि भगवान ने गौ की पूजा की है तो जिसकी इन सब चीजों में निष्ठा है । वास्तव मे वहीं वैष्णव है । चैतन्य महाप्रभु ने भी यहीं कहा है ।

 

एकादशी महातम्य की कथा -

जितने भी राजा भक्त हुए सभी ने ये व्रत किया और बडी महिमा है इस व्रत की. जैसे एक राजा थे भगवान राम के वंशज थे राजा ‘अमरीष’ वो निर्जला एकादशी व्रत रहते थे । अर्थात पानी की एक बूंद भी नहीं पीते थे, उनकी एकादशी में बड़ी निष्ठा थी. तो द्वादशी के दिन पानी पीकर व्रत खोला जाता है वरना व्रत खंडित हो जाता है ।

 

एक बार राजा ने एकादशी का व्रत रखा अगले दिन द्वादशी के दिन आया अब राजा ने सोचा पारण कर लू अब जैसे ही करने लगे तो तभी दुर्वासा ऋषि आ गए और बोले कि राजा में आज आपके यहाँ भोजन करूँगा . और इतना बोलकर वो नदी में स्नान करनें चले गए.

 

इधर द्वादशी  निकलने में दो घड़ी शेष रह गई थी, तो राजा को चिंता हुई कि अगर मै कुछ खाया नही तो व्रत खंडित हो जाएगा और वो संकल्प कर चुके थे कि जब तक दुर्वासा ऋषि को भोजन नहीं करा देगें तब तक कुछ नहीं सकते है । बड़ी द्विधा में पड़ गए. तो उन्होंने एक पुजारी जी से पूछा - कि क्या करें तो वो बोले - कि तुम भगवान का चरणामृत पी लो इससे व्रत भी खडिंत नहीं होगा और आपका संकल्प भी नहीं टूटेगा. अब जैसे ही राजा ने वो चरणामृत पिया तभी दुर्वासा जी आ गए और राजा पर क्रोध करने लगे और राजा को श्राप देने लगे कि तुमने मेरा अपमान किया है । मुझे वचन देकर स्वयं जल पी लिया और जैसे ही उन्हेांने हाथ में जल लिया और श्राप देने लगे.

 

तभी सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया और ऋषि के पीछे लग गया, और बहुत तेज आग निकल रही थी उस चक्र में से, अब ऋषि डर कर भागे तो वो बह्रमा जी शिव जी सब के पास गए तीनो लोको में भागे पर सबने उनकी मदद करने से मना कर दिया अंत में विष्णु जी के पास गए कि आपका चक्र है आप तो मेरी रक्षा कीजिये भगवान ने कहा - कि ये मेरा चक्र है । पर मै और मेरा सुदर्शन चक्र, दोनों, अपने भक्त के अधीन है. क्योकि राजा की  एकादशी में बड़ी निष्ठा है जो व्रत रखता है तो में और मेरे सारे आयुध उसी रक्षा में सदा लगे रहते है, आप की रक्षा तो केवल राजा ही कर सकते है

 

तो ऋषि राजा अमरीष के पास गए तक राजा ने उनको उठाया और चक्र से विनती की तब चक्र शांत होकर वापस चला गया. फिर राजा ने कहा आपको मेरे कारण बहुत कष्ट हुआ क्षमा मागी फिर भोजन करवाए तो ये एकादशी व्रत का महत्व है कि वो चक्र उनकी हमेशा रक्षा करता था । चाहता तो एक पल में ही दुर्वाशा ऋषि को मर सकता था पर मारा नहीं क्योकि राजा की एकादशी का व्रत में निष्ठा थी उसकी ख्याति जगत में बताने के लिए लीला रची. निष्ठा हो तो राजा अमरीष की तरह हो, तो चौबीस घंटे वो सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा करता था केवल उनकी एकादशी के व्रत में निष्ठा के कारण. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

ये तो मैने एक राजा की कथा सुनाई ऐसे कई राजा हुए एक राजा नहुष थे उनके जीवन का प्रसगं है एक समय ऐसा आया था कि उनका एक ही पुत्र था, या तो वो उसे चुने या एकादशी का व्रत को चुने तो जब ऐसी घडी आई तो उन्हेानें कहा - कि बेटे का सिर कट जाए पर मै एकादशी का व्रत नहीं छोडूगा, तो वो इकलौता पुत्र था ऐसे निष्ठावान राजा हुए जिन्हेांनें व्रत में सब कुछ त्याग दिया जब ऐसी निष्ठा किसी की होती है तो वो भगवान भी उसके दास हो जाते है ।

 

हर एकादशी की एक अलग कथा है । सभी तो हम नहीं कह सकते है । एक कथा ‘मोहनी एकादशी’ की आती है । राजा मुचकंद थे उनकी भी निष्ठा एकादशी में थी. और उसको देखकर राज्य का हर व्यक्ति एकादशी का व्रत करता था, मुचंकुद राजा के राज्य में पशु, पक्षी, गाय, घोडे, सभी व्रत करते है । एकादशी का जो व्रत करते है । यमराज भी उसके घर नहीं जाते है । तो उनके राज्य में कोई यमलोक नहीं गया कोई जानवर भी मरता तो वो सीधे बैकुण्ठ जाता था । तो जानवर भी व्रत करते थे उनकी  आठ वर्ष की बेटी थी वो भी अपने पिता की निष्ठा देखकर व्रत को करने लगी. जब उसका विवाह हुआ तो उसका पति भी व्रत करने लगा.

 

एक समय चन्द्र भागा और उसका पति अपने पिता राजा मुचकुंद के राज्य में थे. एकादशी आई राजा ने दशमी के दिन ही सबकेा बता देते थे कि कल कोई खाना ना खाए एकादशी का व्रत है. तो चंद्रभागा  का पति बड़ा कमजोर था, वो अन्न के बिना रह नहीं सकता था. तो उसने अपने पति से कहा - कि तुम किसी दूसरे राज्य में चले जाओ,यहाँ रहोगे तो व्रत करना पड़ेगा और व्रत आप नहीं कर पाओगे.  क्योकि तुम बिना अन्न के रह नहीं सकते हो.

 

तो उसके पति ने कहा - कि चाहे कुछ हो जाए, मै तो व्रत करूगा . अगले दिन उसनें एकादशी का व्रत  किया चूकि वो कमाजोर था तो व्रत करते करते उसकी मृत्यु हो गई तो वो मर के देवलोक गया और उसे एक विशाल जो देवताओं को भी दुर्लभ है । पदवी प्राप्त हुई. तो उस व्रत के कारण उसे देवलोक की प्राप्ति हुई तो कहने का मतलब है कि ये व्रत बडा विलक्षण है ।

 

और पद्रंह दिन में एक बार आता है तो सबको करना चाहिए तो इसमें अपना ही नहीं दूसरों का भी भला का सकते है । मोहनी एकादशी की कथा आती है उसमें एक राजा थे उनके पिता नरक में थे जब नारद जी को ये बात पता लगी तो वो पृथ्वी लोक गए और

राजा से बोले - कि राजा तुम्हारे पिता नरक में है और वो चाहते है कि तुम उन्हें नरक से बाहर निकालो. तो राजा ने पूछा- कि कैसे? तो नारद जी ने कहा-  कि तुम एकादशी का व्रत करो, और मन में संकल्प करो कि मेरे एकादशी व्रत का जो भी फल हो वो मेरे पिता को मिले. तो तुम्हारे पिता की सदगति हो जाएगी.

 

तो राजा ने एकादशी का व्रत किया और अपने पिता को दिया और जैसे ही राजा ने संकल्प करके जल छोड़ा तो एक पल भी नहीं लगा और उनके पिता उस नरक से निकलकर वो भगवान के लोक चले गए. हम खुद तो करें ही बाकि सब लोग भी करें तो अच्छा है । कहने का मतलब इस व्रत की अपार महिमा है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

आज आमलकी की एकादशी है । आज के दिन आवलें के वृक्ष की उत्पत्तिी हुई थी, और आवलें का फल भगवान के मुहॅ से उत्पन्न हुआ था. भगवान के थूक से एक गोल बिंदू आवला बना और ये फल भगवान को बहुत प्रिय है । और इसको खाने मात्र से तीन गुना शुभ फल प्राप्त होता है । और इसके ध्यान  मात्र से यज्ञों का फल मिलता है ।तो जो एकादशी का व्रत है वो पापों का नाश करने वाला है । इससे बडे बडे पाप पल में ही खत्म कर देता है । तो ये व्रत सबको करना चाहिए ।

 

“राधे-राधे”


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