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लेन-देन

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलो के लिए बड़े प्रेम और भाव से भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

“हे गोपाल, राधा-कृष्ण, गोविदं-गोविदं...”

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों मे केाटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “लेन-देन”,  लेन-देन हम सबको मालूम है लेना और देना ये जो दुनिया है इसमें लेन-देन का फेर है । भगवान ने ये जो दुनिया बनाई उसमें कोई भी हमेशा के लिए नहीं है । हम सब मुसाफिर है । पर हम सब कुछ अपना मानकर चलते है और बस यहीं सोच हमें नीचे गिरा देती है । जब हम सोचते है कि हमें यहीं रहना है । तो लेने-देने की अहम की भावना व्यक्ति में आ जाती है । और इसमें ही हम गडबडी कर देते है । परमात्मा ने इस संसार  में हर जीव को भेजा है ।

एक होता है रहना, और एक होता है जीना. तो जीता तो हर केाई है जानवर भी जीते है । जीवन तो हर कोई जी लेता है पर जीने के तरीका हर कोई नहीं जानता मनुष्य को इतने प्रणियों में भगवान ने बुद्वि क्यों दी तो ये हमारे लिए गर्व की बात है तो हम दूसरो से श्रेष्ठ है । तो हमें इस धरती से क्या लेके और क्या देके जाना है । इस पर हमें विचार करना है ।

मनुष्य जब लेने और देने की बात आती है । तो लेने की सूची तो बहुत लंबी है पर देने की तो बहुत छोटी है । तो इसमें बडा भ्रम है । पर थोडा-सा हम इसके उदाहरण देखेगे संत और महापुरूष हमें क्या देके गए, उनके जीवन में हमें झाकना है । क्योंकि अगर हम आए और यू ही जी के चले गए तो हम में और आम प्रणियों में केाई फर्क नहीं है । एक चिडिया भी जीती है दिन भर दाना चुनती है और बच्चों को देती है ,दोनों पति पत्नी दिन भर मेहनत करते है और शाम को और घौसले में सो जाते है.यदि हमभी ऐसा ही कर रहे है तो हम भी बस जी ही रहे है तो हमें जीना नहीं है विशेष रूप से जीना है तो लेन देन का बडा खेल है । तो जब हम लेन-देन की बात करें तो हमें संतो का जीवन देखना है ।

प्रसंग १- स्वामी रामतीर्थ के जीवन का प्रसंग है । वो बहुत गरीब थे तो दो वक्त के खाने के पैसे नहीं थे तो वो या तो पढ सकते या खा सकते थे तो वो रोज एक दूध वाले के यहाँ दूध पीने जाते थे वहीं उनका भोजन था । तो पढते-पढते एक समय उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे, कि वो दूध भी पी सकें तो उन्हेंने बंद कर दिया दूध पीना,

तो एक दिन वो दुकानदार इनसे कहता है कि आपने बंद कर दिया दूध पीना, तो स्वामी जी कहते है - कि मेरे पास पैसे नहीं है । और मै उधार दूध पीता नहीं हूँ । तो दुकानदार बोला - कि आप बिना पैसे के दूध पिया करो और जब आप की नौकरी लग जाए तब दे देना. तो उन्हेंने उसके यहाँ एक माह दूध पीया अब आगें उनकी एक अच्छी जगह उनकी नौकरी लगी. तो उन्हेाने पहला वेतन जो मिला वो उस दूध वाले को भेज दिए और अगले महीने फिर भेजे तो वो दुकानदार सोचता है कि ये तो पैसे दे चुके है दूध के. पर हर माह ये पैसे क्यों भेजते है ।

तो स्वामी रामतीर्थ के पास गया ओर उसने कहा - कि आप पैसे अब क्यो भेजते हो तो स्वामी जी बोले - कि देखो एक व्यक्ति जब केाई किसी से लेता है और उसको चुकाता नहीं है । तो वो “राक्षस” है । और एक वो है जो जिनसे लेते है उनका चुका देते है । और हिसाब किताब बराबर कर देते है । तो वो “इंसान” है जो हिसाब की बात करें । तीसरे वो है । जो दे दे और उसके बाद विचार करे कि मै दे रहा हॅ, ये विचार जिसके मन मं आए वो “देवता” है । और देन के बाद जो विचार ना करे, वो उससे भी बढे होते है और उससे भी बढे वो है जो देते-देते जाए और देखे ना कि कितना दिया. मै बस दिए चला जाए और सोंचू भी न.  

तो कहने का मतलब ये है कि हम थोडी सी भी चीज देते है तो उसका गुणगान करते है व्यक्ति अगर मंदिर में जाकर थोडा-सा भी दान करते है । तो सबको बताते है पत्थर पर लिखवा देते है । यदि एक पंखा भी दान करते है तो उस पंखे पर लिखवा देते है कि हमने दिया. हम हिसाब किताब बता देते है.हम पाँच रुपये का चंदा भी देते है तो चंदे की भी पर्ची भी कटवाते है

तो ये देना तो है । एक होता है “दान” और एक होता है “उदारता”, तो दान का मतलब दिखाना लेकिन उदारता वो है जो रामतीर्थ जी ने की व्यक्ति दिए जा रहा है बस यहीं फर्क है दान में और उदारता में उदार व्यक्ति मिलना बडा कठिन है । हम स्कूल में एक गोला होता है । उसमें एक सेन्टर पाइंट होता है और उससे एक परीधि होती है । संसार को और हम अपने को केन्द्र में रखते है कि लेना है और भगवान को परीधि में रखते है । पर करना उलटा चाहिए हमें, क्योंकि मुख्य तो कैन्द्र ही है वो तो परमात्मा है ।प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग २-
एक भिखारी रोज भीख मागॅने जाता था और रोज अपनी झोली में कुछ दाने जौ के डाल लेता था क्योंकि उसकी मान्यता थी कि झोली खाली ना हो दूसरा मतलब ये है कि लोग झोली भरी देखेंग तो लोग को लगेगा कि लोग इसे दान देते है तो बस देंगे, तो एक बार वो घर से निकला तो वो सोचने लगा कि आज बहुत दान मिल जाए तो वो देखता है कि सामने से राजा की सवारी आ रही है तो वो उस गली में गया.और खड़ा हो गया. अब राजा स्वयं उनके पास आया तो राजा उठ के खडा हुआ अपने रथ से और फकीर के सामने खडा हुआ तो वो राजा से भिक्षा मागने लगा, पर राजा उसके सामने मखमल की झोली फेलाकर उससे ही  मागने लगा. तो वो समझ ही नहीं पाया. कयोंकि उसने अपने जीवन मं कुछ दिया ही नहीं जीवन में, तो उसने अपने झोली में से एक जौ का दाना राजा कि झोली में डाल दिया जबकि उसके पास दो मुट्ठी जौ थी पर दिया सिर्फ दो जौ का दाना.  राजा खुशी-खुशी चला गया. अब वह भिखारी जब वो घर गया तो उसने देखा कि उसकी झोली में से दो दाने सोने के है.


तो वो सोचने लगा - कि जो मैने राजा को दो दाने दिए थे ये वहीं है. काश मैने सारे दाने दे दिए होते तो सारे दाने सोने के मिल जाते तो बहुत पछताया उसे दान की महिमा का पता चल गया.  

कहने का मतलब ये है कि हमें लगता है कि लेने में ही सबकुछ है देने मे नहीं  जो दे रहे है वो हमारे पास कई गुना होकर लौटता है । पर हम सोचते है कि हम रूप्या क्यों दान करें हमं कोशिश करें कि हम दे. हमेशा, क्योंकि देने वाला हमेशा बडा होता है और लेने वाला हमेशा छोटा जो लेता हैऔर हम जो लेते है उसे एक दिन उसे चुकाना पडता है किसी ना किसी रूप में. हम कहीं भी रहें. इसलिए दिल खोल कर के दें.

और जो परमात्मा है वो तो सबको देता ही है । “बेशवब देने वाले ने सबकुछ दिया फिर सदाॅ लगाने से क्या फायदा” वो तो सबको देता है बिना कारण.  हमे ये अनमोल जीवन दिया, खाने-पीने को दे दिया, हम तो उसका शुक्रिया भी नहीं कहते है । हम लेने के मामले में कितने बडे, देने के मामले मं कितने छोटे है ।

प्रसंग ३- एक बार एक व्यक्ति सोया और उसने सपने में उसने देखा कि वो स्वर्ग मे है और परी उसके पास है । एक परी उसेएक कमरे में ले गई  तो वो उसको एक काउंटर के पास लेकर गई तो वहा कई परिया है । वो ये देखती है । कि किसने भगवान केा अर्जी दी है वो सब हिसाब रखती है । जो भी जो कुछ भी प्रार्थना करता है उसे लिया जाता है और फिर पूरा करके नीचे भेज दिया जाता है फिर वो आगे गया, तो वहा दूसरा काउंटर मिला पारी बोली यहाँ भी परियां बहुत काम कर रही थी, पारी कहती है कि यहाँ उस अर्जी केा पूरा करके नीचे भेजती क्योंकि लोगों ने बहुत माग रखा है तो उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ कि इतनी परीया है. सब काम पर लगी है फिर भी काम खत्म नहीं होता.

तो वो और आगे गया तो उसने देखा कि एक काउंटर खाली था उसमें परिया नहीं थी बस एक परी बैठकर सो रही थी उसने पूछा कि यहा पर एक परी है और वह भी सो रही है काम नहीं कर रही है ।

तो परी बोली - कि पहले काउंटर मे लोग भगवान से मागते है तो हम उसको रिसीव करते है । और दूसरे काउंटर मे हम उनकेा पूरा करने भेजते है. और तीसरे मे लोग थैक्सं कहते है धन्यवाद कहते है  और यहा पर बहुत कम लोग के थेक्सं आते है तो इस परी को बुहत आराम है ।  तो वो व्यक्ति कहता है कि ऐसा क्यों तो वो परी कहती है कि भगवान सबकी कामनाये पूरी करते है । पर बदले मे लेाग प्रभु आपकेा धन्यवाद. ये कोई नहीं कहता है । ऐसा केाई पत्र नहीं तो वो पूछता है कि कौन सी दुआए. तेा परी कहती कि जब तुम्हारे पास रहने को घर है, अच्छा खाना है, छत है, पैसा है, यही तो उसका उपहार है । पर बदले मे धन्यवाद कोई नहीं बोलता. “मागने वाले खाली हाथ ना लौटे कितनी मिली खैरात न पूछो, उसकी कृपा तो उसकी कृपा है, उसकी कृपा की बात ना पूछो” वो तो देता गया उदार है हमेंशा देता गया पर हम कितने छोंटे है देने मे हम छोटे बन जाते है । हमनें दिया तो गुणगान करने लगे.

प्रसंग ४- एक बच्चा अपनी माँ के साथ एक दुकान पर गया तो उसकी मा कुछ खरीदने लगी तो दुकानदार ने उस बच्चे को बरनी दी मिठाई की. और बोला कि ले लो कुछ तो, वो मना करने लगा - उसने कुछ नहीं लिया तो उस दुकानदार ने उसकी माँ से कहा - कि आप बोलो तो ले लेगा तो उसकी मा ने कहा - पर उस बच्चे ने नहीं ली तो उस दुकानदार अपने हाथ मिठाई निकालकर दी तो उस बच्चे ने ले ली. तो जब वो घर गया तो उसकी मा ने पूछा - कि बेटा जब वो तुम्हें दे रहा था और मैने कहा था तो क्यो नहीं ली. और बाद मे क्यों ले ली तो वो बच्चा कहता है-  कि मा अगर मै मिठाई लेता तो मेंरे हाथ छोटे है तो कम आती पर दुकानदार के हाथ बढे थे तो बहुत सी मिठाई आई. और मेंरे दोनो हाथ भर गए मिठाई से, और मैने ले ली.

तो कहने का मतलब वो बच्चा जानता है कि जब केाई बडा देगा तो वो अपने अनुसार देगा तो जब परमात्मा से हम मागेगें तो वो हमे हमारे अनुसार देगा और जब वो हमे देगा अपनी इच्छा से, हमें से कई गुना ज्यादा देगा । बिना मागे वो हमें देगा.

वो कहते है-  “कि जब भी नजर तेरी रहमत पर जाती है जिदंगी कितनी खुशहाल नजर आती है । बेशबब दिए जाता मुझे मेरा सावॅरा हाथ उठते भी नहीं और दुआ कबूल हो जाती है”.

उसे तो सब मालूम है हमारे मन में कामना है । तो वो पूरी कर देते है देने वालों में दधीची ऋषि को देखे वृत्तासुर को मारने के लिए जब देवताओ ने उनसे उनकी शरीर की अस्थिी मागी तो उन्हेाने अपना शरीर त्याग दे दिया.  महाभारत में कर्ण केा मालूम था कि कवच और कुडंल इन्द्र ले जाएगे पर उनको दे दिए वो तो दानवीर कर्ण थे ये नहीं साचा कि इसको देने के बाद मै मर जाऊँगा तो दानवीर वो है जो देने के बाद सोचते नहीं है अपने जीवन में कर्ण ने कभी किसी से कुछ नहीं मागा उन्हेाने सीखा ही नही मांगना.

तो दुनिया मे हम देखे कि हम क्या दे के जा रहे हम किसी भी प्राणी को थोडा-सा भी कुछ देंके जाए तो वो बहुत है । और लेने की बारी आए तो देखे कि हमें आशीर्वाद दुआये ही हमें लेनी है । वो कहते है कि कफन मे जेब नहीं होती वरना वहा भी रख लेता एक से एक राजा अकेले ही गए. उनके खजाने यहीं रह गए तो ये हमं देखना है कि हम क्या ले गए इस दुनिया से ।

                                                            “राधे-राधे”   

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