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स्तुति-निंदा

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आइए  आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें,सब मेरे साथ गाईये .

“जय राधा रसिक बिहारी, बोलो श्री राधा रसिक बिहारी, जय राधा-राधा-राधा .....”

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है-  “स्तुति और निंदा” आज के समय में हर व्यक्ति स्तुति और निंदा में ही लगा है । तो ये बुहत महत्वपूर्ण है शब्द है । और ये बहुत सारी चीजों के मायने बदल सकते है. आज कल तो लोगों ने धर्म में भी ये चीज नहीं छोडी. हर व्यक्ति को दूसरी के निंदा और खुद की स्तुति करवाना अच्छा लगता है । प्रेम से कहिए श्री राधे. यह आदत स्वभाव बनता जा रहा है हमारा जिसने हमारी प्रशंसा कर दी. तो वो हमारी नजर में बहुत अच्छा है । और जिसने हमारी निंदा कर दी वो तो हमारा दुश्मन है ।  तो ये स्तुति और निंदा का फेर बडा उलझाने वाला है तों हम ये देखना है कि वास्तव में स्तुति और निंदा करने लायक कौन है .हमें किसी की स्तुति करना है क्योंकि व्यक्ति अगर कोई भी काम करता है तो वो चाहता है कि व्यक्ति मेरी स्तुति करे और जिस किसी ने हमारे मन के अनूकूल काम नहीं किया, तो हम उसकी निंदा करने लगते है । तो इस निंदा को छोटा नहीं समझना चाहिए. बहुत भयानक है .

शास्त्रों में तो ये भी कहा गया दुनिया में सबसे बडा दोष क्या है तो संतो ने कहा कि सबसे बडा दोष है  निंदा करना, दूसरों के अवगुण देखना है । किसी के प्रति निंदा वो नहीं है अगर हम किसी के बारे में कुछ कह नहीं रहे पर हमारे मन में गलत विचार आ रहे है उसके लिए तो यकीन मानना कि वो निंदा की शुरूआत है । वो हमारे अंदर घर बना रही है । क्योंकि पहले विचार आता है और फिर वो धीरे धीरे आदत और फिर स्वभाव बन जाता है । आदत तो छूट सकती है व्यक्ति की ,पर जब वो स्वभाव बन जाए तो व्यक्ति लाख कोशिश कर ले तो वो नहीं छूट सकती, चाहे व्यक्ति लाख कोशिश करे ले ।

प्रसंग १- क्योंकि एक समय था जब मन में विचार आया था वो तभी हटा देता तो ठीक था । जैसे एक बच्चा था तो वो जब स्कूल में था तो उसने एक पेंसिल चुराई. और अपनी माँ से कहा कि मै आज ये पेंसिल चुराई तो उसकी माँ ने उसे कहा - कि तुमने आज बहुत अच्छा काम किया तो फिर अगली बार उसने और चोरी की तो उसकी माँ ने उसका हर बार प्रोत्साहन किया. तो वो बढते-बढते एक डाकू बन गया. और डकैती करने लगा. देखिये एक पेंसिल चुराई थी और करते करते इतना बड़ा डकैत बन गया.

तो एक दिन उसने राजा के यहाँ डाका डाला क्योंकि ये उसका स्वभाव बन गया और उसको सजा मिली कि इसे बीच चैराहे पर फाँसी दो तो राजा भी वहाँ गया और बोला कि इसने पहले भी बहुत सी जगह चोरी की होगी. तभी तो महल में डाका डालने कि हिम्मत की. तो जब उसको फासी होंने लगी तो वहाँ बडी अच्छी बात हुई वहाँ उसके परिवार वाले नगर के लोग भी थे तो उससे पूछाँ कि तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है ? तो उसने कहा - कि मुझे अपनी माँ से मिलना है । तो राजा ने उसकी माँ को बुलाया तो उसने कहा कि मुझे माँ के कान में कुछ कहना है तो उसके हाथ तो बधें थे तो जब वो माँ के पास गया तो उसने जाकर कान में काटा तो वो चीख पडी.


तो सब लोग ने कहा - कि इसने क्या किया? तो राजा ने कहा - कि ये क्या किया तुमने ? तो वो व्यक्ति बोला - कि देखो राजा आज अगर मै इतना बडा डाकू बना हूँ । तो मेरी माँ के कारण मै तो कच्ची मिटटी का घडा था आकार देने वाली तो मेरी माँ थी जैसे कुम्हार मिटटी केा आकर देता है तो उस वक्त उसको कुछ भी बना सकता है । पर बनने के बाद उसमें वो कुछ भी नहीं कर सकते. तो वो व्यक्ति बोला - जब मै छांटा था तब मेरी माँ ने मुझे चोरी करने से नहीं रोका ओर मै जब बडा गया तो ये चोरी करना मेरा स्वभाव बन गया अगर छोटे में मेरी माँ मुझे अच्छे संस्कार देती तो मै आज चोर नहीं बनता । तो राजा ने उसे मुक्त कर दिया.

तो कहने का मतलब कि ऐसे ही हमारा मन है । जैसे ही इसमें विचार उठता है और तभी हमनें नहीं रोका तो वो विचार आगे जाकर हमारी मेमोरी में स्टोर हो जाएगा. और फिर वो आगें जाकर मन का संस्कार बन जाएगा, मन में किसी के लिए बुरा विचार उठा, निंदा आई, तो हमें उसे तभी खत्म् कर देना तो ये मत समझना कि निंदा चलती रहेगी तो निंदा व्यक्ति का विनाश कर देगी । हमोर सामने बहुत उदाहरण है । 

प्रसंग २ - महाभारत में दुर्योधन क्या कर रहा था उसने बचपन से पांडवों के प्रति निंदा रखी और उसके बडे होने पर वो उसका स्वभाव बन गया था । और अंत हम सबको मालूम है उसके स्वभाव ने , उसकी निंदा ने उसका सर्वनाश हो गया. अंत में कौरव का पूरा वंश नष्ट हो गया . सौ पूत्र ही मर गए थे.

निंदा अपने साथ ईष्र्या और जलन भी साथ लाती है । निंदा और आलोचना में फर्क है . आलोचना में कहीं ना कहीं व्यक्ति को जगाने की चाह होती है कि ये वयक्ति जाग जाए. ये निंदा नहीं होती जब दो व्यक्तियों के अहंकार टकराते है कि मै अच्छा हूँ ये बुरा तो वो ही निंदा है । हमें इससे बचना है ।

और स्तुति करनी है तो सिर्फ भगवान की, आजकल तो हमारा काम जिस व्यक्ति से चल रहा है हम उसका गुणगान करने लगते है । हमें कही अपना काम बनाना है तो व्यक्ति वहाँ स्तुति शुरू कर देता है कहीं किसी पर कोई व्यक्ति है बड़े पद पर , उससे काम है तो उसकी स्तुति करने लगते है. यकींन मानना स्तुति करनी है तो केवल बाँके बिहारी ही करो. क्योकि स्वार्थ जहाँ है वहीं प्रशंसा है. और जहाँ स्वार्थ खत्म, वहीं से प्रशंसा खत्म, जहाँ से निंदा शुरू हो जाती है । और जहाँ निंदा शुरू वही से सर्वनाश शुरू.

प्रसंग ३ - रामायण में भगवान राम का जब राजतिलक होना था तो उसी रात को मंथरा कैकयी को भडकाती है और राम की निंदा करने लगती है । और निंदा के कारण जो कैकयी भरत से ज्यादा राम को चाहती थी अगर भरत खेल रहे होते थे तो उनको गोदी में ना खिलाकर राम को खिलाती थी. राम भरत से ज्यादा प्रिय, तो वो कैकयी निंदा की वजह से राम से दूर हो गई. निंदा हमें भगवान से दूर कर देती है और मथंरा ने कहा - कि राम के तिलक के बाद तुम दासी और कौशल्या राज माता बन जाएगी, और जब तुम दासी बन जाओगी और भरत भी. तो ऐसा भडकाया.

उसने दशरथ की भी निंदा शुरू कर दी.कि दशरथ ने बड़ा अन्याय किया है तुम्हारे साथ, तो निंदा के परमाणु हमारे अंदर प्रवेश कर जाते है निंदा स्पर्श से भी आती है मंथरा ने जब कैकयी को स्पर्श किया तो वो निंदा के परमाणु कैकयी के अंदर चले गए. तो हम सब को पता है कि उसने क्या करवा दिया. एक ही पल में सारे नजारे बदल दिए. जो राम राजा बनने वाले थे उनको वनवास जाना पडा राजा दशरथ जो राम को चाहतं थे वो स्वर्गवासी हो गए. निंदा ने कितनी बर्बादी की तो ऐसे ही शकुनि ने हमेशा दुर्योधन से पांडवो की निंदा की और उसका परिणाम क्या हुआ महाभारत. और कैकयी को मंथरा ने भडकाया राम को वनवास हुआ तो निंदा हमें भगवान से दूर कर देती है अगर हमें भगवान से जुडे रहना है तो निंदा को त्यागना होगा । दो दो इतने बड़े उदाहरण हमारे साथ है. प्रेम से कहिए श्री राधे


निंदा में शब्दों का बडा हेर फेर है आजकल कहाँ नहीं है निंदा. तो लोगों का क्या मानना है धर्म के बारें में, कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है और दूसरे का धर्म निकृष्ट है . तो ये हम धर्म का नाम लेकर एक दूसरे के निंदा ही तो कर रहे है । अगर देखे तो धर्म तो एक ही है . भगवान को भजना उसकी प्राप्तिी इसके अलावा कोई दूसरा धर्म नहीं है. तो लोग आध्यात्म में होते हुए भी धर्म के नाम पर लडते है बडा आश्चर्य है ।  जिसको पाना है उसी के नाम पर दंगे होते है हम ये भूल जाते जिसको हंमे प्राप्त करना है उस उदेश्य को ही भूल जाते है. कि हमारा धम्र श्रेष्ठ है कि उसका इसी में रहते है यहीं राजनीति में है । अपना पक्ष सही है दूसरे का गलत है राजनीति बुरी नहीं है इसे बुरा बनाया है लोगों की स्तुति और निंदा ने इन चीजों कों दो भागों में किसने बाँटा हमनें, ईश्वर ने ये दुनिया बनाई इसमें सारी चीजें अच्छी बनाई इंसान बनाए. उससे भी यही आशा करता है कि हम एक होकर रहे । पर हम तो बॅटना अच्छा लगता है.  

प्रसंग ४ -  एक देश था वो मुस्लिम देश था तो वहाँ ईसाई आकर रहने लगे वहाँ के लोग विरोध में खडे हो गए तो वहाँ के प्रमुख थे उन्हेंने कहा - कि ये देश कोई एक व्यक्ति के लिए तो है नही, वो तो सबके लिए है. तो उसने उनको वहाँ रहने के लिए व्यवसाय करने के लिए जगह दी, और उनको चर्च बनाने के लिए भी जगह दी. तो ऐसे लोग भी है जो हमारे धर्म की इतनी इज्जत करते है । तो वो उन प्रमुख से बेाले - कि आप हमारे चर्च में अपनी नमाज अता कीजिए. हमें ये नहीं है कि हमारे चर्च में आप नमाज अता नहीं कर सकते. धर्म तो बस एक है चाहे गीता का पाठ कर लो या कुरान पढ़ लो. नंदिया अलग है पर जाना तो एक ही जगह है । तो वो प्रमुख बोला - कि मुझे कोई आपत्तिी नहीं है, पर लोग भडकेगे और कहेंगे कि यहाँ नमाज होती है तो चर्च मिटाकर मस्जिद बनाओ । और मै ये नहीं चाहता कि चर्च मिटे तो कितने अच्छं विचार उस व्यक्ति के है. कि वो सब धर्मों को मानता है वही सबसे बड़ा भक्त है जो खुदा, ईशु, सबको मानना है । हमने उसे क्यों स्तुति और निंदा में बाँट दिया .प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग ५ -
चैतन्य महाप्रभु कहते थे अपने शिष्यों से कि हमें भगवत धर्म का प्रचार तो करना है पर किसी के प्रति हमारे मुहॅ से निंदा नहीं निकलनी चाहिए. निंदा कब हमारें अंदर आकर हमें बाँट देंगी पता नहीं चलेगा. व्यक्ति तो एक जगह बैठा रहेगा पर उसके अंदर चल रही वो निंदा विचार वो पता नहीं कहा से कहा उसको ले जाए. जिसके प्रति उसके मन में निंदा उसे वो हिंसात्मक होकर मार डालता है तो ये निंदा से आती है ये प्रवृत्तिी.


स्तुति तो शब्द ही बडा प्यारा है । बुराई हमें अपने अंदर ढूढनीं है. एक दोहा है-  निंदक नियरे राखिए आँगन कुटि छबाए, बिन पानी बिन साबुन ,निर्मल करे सुभाय” ये जो निंदा करने वाले है उनको तो अपने आगॅन में रखना चाहिए क्योंकि जब हम कपउे को धोते है तो हमें साबुन की पानी की जरूरत पढती है । निंदक जो हमारे मन की बुराई हे वो उसाके बिना साबुन के साफ कर देते है । अगर केाई निंदा कर रहा है तो वो बुराई हमारे अंदर है और अगर है तो वो हमें खत्म करनी है और उसके बाद हम उस धुले हुए कपउे की तरह है जिसमें केाई दाग नहीं है । कपडे मे तो सोडा लगा पर उस निंदा करने वाले ने तो कुछ भी नहीं लगाया. तो वो निंदा करने वाले उन स्तुति करने वालेों से तो अच्छे है जो हमारी प्रशंसा करते है और हम अंहकार हो जाता है कि हम अच्छे है तो वो सुतति कोई काम की नहीं है। 
हनंमान जी ने रामायण में कितने काम किए और जब राम जी उनकी प्रशसा करते थे तो उनकी नजरें नीचें झूक जाती थी कि प्रभु मैने कुछ भी नहीं किया करने वाले तो आप है. दास क्या कर सकता है? मै तो सिर्फ माध्यम हूँ, करने वाले तो आप ही हो. तो जो प्रशसा और स्तुति सुनकर अंहकार में ना आएँ वो ही सतुति के लायक है । और अगर अंहकार आयेगा तो फिर निंदा शुरू हो जाएगी.

प्रसंग ६  - एक बार का प्रसंग है । भगवान हस्तिनापुर आकर दुर्योधन से मिलते है । और कहते कि तुम मेरा काम करो कि अपने राज्य मे जाओ और कोई अच्छा व्यक्ति जो सज्जन हो उसको ढूढॅकर लाओ तो दुर्योधन शाम को आते है । पर उनको केाई भी अच्छा व्यक्ति नहीं मिलता वासुदेव से कहते है कि मेने जितने व्यक्ति देखे सब में कोई ना कोई बुराई थी तो मुझे कोई अच्छा व्यक्ति नहीं मिला. 


फिर भगवान ने अजुर्न से कहा - कि तुम जाओ और कोई ऐसा व्यक्ति ढूढ कर लाओ जिसमें बुराई हो तो वो गए पूरे शहर में शाम को लौटे तो वासुदेव से बोले-  कि मै जहा भी गया जितने व्यक्तियों से भी मिला हॅ मुझे किसी में कोई बुराई नहीं दिखी केाई नहीं मिला,मै तो जिस जिस के पास गया मुझे तो  लगता है कि मुझसे बुरा कोई है ही नहीं .कहने का मतलब जिसका जैसा नजरिया उसको सब वैसा ही दिखता है । दुर्योधन में तो अवगुण भरे ही है इसलिए वह सब में वही दिखता था .  तो सबको बुरा ही समझता है । वो विचार उसकी आदत बन चुके थे और वो उसका संस्कार बन गए थे यहाँ तक कि भगवान मै भी बुराई दिखायी देती थी. तो हमें निंदा को अपना स्वभाव आदत नहीं बनाना

क्योंकि ये संसार है मन में आए, मन चंचल है हर कहीं जाता है बुरे विचार भी आते है तो हमे उसको स्थाई नहीं बनने देना जब वो कच्चा घडा है तभी सुधार कर लेना है क्योंकि पकनें के बाद वो नही सुध्रेगा. फिर टूट जाएगा तो ये वाणी बुहत महत्वपूर्ण है और ये निंदा और स्तुति भी हम इससे क्या बोल रहे है ये हमें ध्यान रखना है यहीं हमारा जीवन बनाती है.  तो बोलने से पहले तौलना है और पहले विचार करना है क्योंकि व्यक्ति वहीं बोलता है । जो उसके मन में चल रहा है अगर उसके मन में निंदा चल रही है है । तो वो निंदा के अलाव कुछ नहीं देगा और प्रशंसा प्रेम चल रहा है तो वो दूसरों को भी यहीं देगा. प्रेम से कहिए श्री राधे.


“जय जय श्री राधे”
 

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