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उपहार

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“जय राधे-कृष्ण गोविंद, गोपाल राधे राधे, गोपाल राधे-राधे, नन्द लाल राधे-राधे.....”

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “उपहार” उपहार वो है जो हम किसी को कोई खास कार्यक्रम पर देते है या कोई हमें देता है ।जो छोटी सी जो वस्तु दी जाती है तो वो उपहार है । ये तो इसकी साधारण परिभाषा है । उपहार का नाम आते ही हमारे मन में तरह तरह के चित्र दिखने लगते है । हम बहुत सारी चीजें लोगों को देते है हम उपहार में कई कीमती चीजें भी देती है । लेकिन उपहार जो उपहार हमारे घर या अलमारी की शोभा बढाए वो असल में उपहार नहीं है । उसका हमारे जीवन में क्या उपयोग ? उपहार वास्तव में वो जो हम किीस को दे और उसका वो अपने जीवन में उपयोग करें वो ही सही उपहार है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

और क्या हमनें कभी सोचा कि हमें किसी को क्या उपहार दे रहे है क्या वो उसके जीवन में उपयोगी है । या हमें किसी ने दिया तो हमारे घर की चार दिन की शोभा बढ गई उसके बाद उसको कोई मतलब नही तो वास्तव में हमनें ना तो सही उपहार लिया और ना ही लिया हम देखते है । कि हमें लोग कितने महॅगें उपहार देते है । लोग फूल देते है उपहार में पर थोडी देर बाद वो कचरा में दिखाई देता है । तो हमें सही उपहार किसने दिया? और क्या दिया? तो हमारा जीवन ही सबसे बडा और सही उपहार है । और ये हमें उस परमात्मा ने दिया है । क्योंकि ये जीवन हमें उपहार में मिला है । और परमात्मा ने ये उपहार सभी को दिया है । लेकिन जिन्हें उपहार सम्हालना नहीं आता वो उसकों कचरा बना देते है । तो हमें ये जीवन सम्हालना नहीं आता और हम इसे कचरा बना लेते है ।

 

तो अगर हमनें ये जीवन व्यर्थ उपयोग रहित बना लिया तो याद रखना कि उस परमात्मा के दिए उपहार की तौहीन होगी । देखो जब उपहार शब्द आता है तो उसमें दो ही चीजें आती है एक तो लेना आता है या देना तो हम किसी को उपहार दे तो कोई ऐसी चीज ना दे जो उसकी अलमारी की शोभा बढाए अगर हमें देना है । तो हम उसकों भगवान का नाम दें । संसार का दिया हुआ उपहार तो खत्म हो जाएगा पर हम जो भगवान का नाम देगे । तो वो नाम जीते जी भी और मरने के बाद भी रहेगा.

 

लोग कहते कि अभी क्या समय है भगवान का नाम लेने का. अभी तो जवान है बुढापे में लेगे तो उम्र बीत जाने के बाद भगवान का नाम याद नहीं आता तो हमें बताना है लोगों को कि भगवान का नाम क्यों लेना है । उसका क्या महत्व है वहीं हमारे साथ जाना है । ये शरीर तो नश्वर है ये हमारे साथ नहीं जाएगा हमारे साथ हमारे कर्म,  भगवान का नाम जाता है । तो हमें लेना है तो भगवान का नाम ही लेना है । भगवान ने ये शरीर उपहार में दिया है और अगर व्यक्ति मासं खाकर शराब पीकर इस शरीर को बर्बाद कर रहे है । जो भगवान ने दिया है । हम उस उपहार की तौहीन कर रहे है । अगर हमें सम्हालना आता उसके उपहार को तो हम उसको शराब पीकर खराब नहीं करते । जिस तरह हमें अपना जीवन कीमती है । उसी तरह भगवान ने जानवरों को भी जीवन दिया है। तो उन्हें भी वो प्रिय है । जब हम अपना जीवन नष्ट करना नहीं चाहते है । तो दूसरों को क्यों मारते है । अगर हम अपना जीवन नष्ट नहीं कर सकते तो दूसरों का भी बर्बाद करने का कोई  अधिकार नहीं है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

तो हमें जीवन को नष्ट नहीं करना है ना ही दूसरों का और खुद का भी नहीं हमें भगवान इतनी अच्छी कुदरत दी है । खाने को चीजें भी दी है । हम अगर खुद का उपहार नहीं सम्हाल पा रहे है  तो दूसरों का भी नष्ट करने का अधिकार नहीं है । अगर लोग जीवन में अच्छा काम करते है । तो लोग करने नहीं देते । स्वयं भी नहीं करते और दूसरे को भी नहीं करने देते.

 

प्रसंग १ . - जैसे एक व्यक्ति समुद्र के किनारे था तो वो देखता कि समुद्र में लहरें आती और चली जाती और वो बहुत सारी छोटी मछलिया किनारे पर आ जाती तो वो उनको उठाकर वापिस समुद्र में डाल देता ताकि वो किनारे पर बिना पानी के मर ना जाए तो एक व्यक्ति ये सब देख रहा था तो उसने पूछा कि तुम ये क्या कर रहे हो ?

 

तो उस व्यक्ति ने कहा - कि मै इन मछलियों को वापिस पानी में डाल रहा हू. क्योंकि ये पानी के बिना नहीं रह सकती है । तो वो व्यक्ति हसॅने लगा. - कि ये समुद्र की लहरें तो बहुत दूर तक है और किनारे भी बहुत लबें है तुम कहाँ तक करोगे समुद्र का किनारा तो कहाँ कहाँ तक फैला है.  

 

तो वो कहता है कि मुझे मालूम है कि मै पूरे किनारे कि मछलियों को वापस समुद्र में न डाल पाउ  सबकी जान तो नहीं बचा सकता हूँ पर जितनी मछलियों की बचा सकता हूँ । बचाउगाँ? ये जीवन उस परमात्मा का दिया उपहार है ।

 

तो ये हम पर निर्भर करता है कि हम इस दुनिया में फर्क लाना चाहते है कि नहीं हर व्यक्ति ये सोचता कि मै अकेला ही क्या कर सकता हॅू । मेरे करने से क्या होगा ?तो ये जो समुद्र है वो बॅूद-बूँद भरने से ही भरा है । तो वो पहली बूँद भरने वाले हम क्यों ना बने । और अगर कोई दूसरा करता है तो हम उससे कहते है कि तुम्हारे करने से क्या होगा उसको प्रोत्साहित नहीं करते है ।कहने का अर्थ है कि हमें अपना उपहार तो सम्हालना ही है और दूसरों का भी ।

 

प्रसंग ३-  एक व्यापारी था उसकी दुकान थी तों उसने वृद्वावस्था में अपने बेटे को बुलाया और कहा कि बेटा मेने अपना ये व्यापार बडी सफलता से चलाया है । मुझे कभी हानि नहीं हुई मै ने हर चीज को सकारात्म रूप में लिया जो भी उस भगवान ने दी तो मेरी अब उम्र हो गयी है तो अब तुम व्यापार च्लाओ और मेरी चार बातें सुनो पहली जब तुम उन पर चलोगे तो कभी घाटा नहीं लगेगा ?

 

तुम जब भी दूकान जाओ व्यापार करने, तो छाया में जाओ और छाया में ही वापिस आना. दूसरी चीज बताई कि हमेशा मीठा ही खाना और कभी किसी देखो को कुछ दो तो वापिस मत लेना. ये बातें उसने अपने बेटे को बताई । और समय आने पर उसके पिता की मृत्यु हो गई  तो उसके बेटे घर से दुकान तक चददर लगावा दी क्योंकि पिता ने कहा था कि छाया में आना जाना फिर उसके पिता ने कहा था कि मीठा खाना तो उसने बहुत ज्यादा मीठा खाना शुरू कर दिया. तीसरी बात जो वस्तु दो वो कभी वापिस मत लेना तो उसकी दुकान से जो उधार ले जाता वो उससे वापिस नहीं लेता.

 

तो परिणाम क्या हुआ मीठा खाने वो बीमार हो गया, छाया में जाने से उसको कभी धूप नहीं मिलती और उधार देने से उसकी दुकान खाली हो गई. और एक समय ऐसा आया कि वो रोड पर आ गया और बीमार भी हो गया अब तो वो अपना सिर पकड कर बैठ गया कि ये पिताजी ने क्या उपहार दिया तो वहीं एक फकीर था उसने उस व्यापारी की सारी बात सुनी और कहा कि तुमने अपने पिता के उपहार का सही तरीके से उपयोग करते तो आज तुम आसमान की उचाँईया पर होते सारी चीजें तुम्हारें पास होती

 

पहली बात जो तुम्होर पिता ने कही कि छाया में जाना और आना - इसका मतलब कि तुम सूर्योंदय के पहले जाना और सूर्यअस्त के बाद आना.  दूसरी बात कि मीठा ही खाना  - उसका मतलब कि तुम अपने ग्राहको से सदा मीठा बोलना. और तीसरी बात का मतलब है - कि तुम किसी केा उधार दो तो कोई चीज गिरवी रख लेना ताँकि तुम्हें माँगने ना जाने पडे उसके घर पर तो वो खुद ही आएगा ये तीन उपहार मिले थे.तब उस व्यक्ति को पता चला कि मेरे पिता मुझे कितनी बडी चीज देकर गए तो हम अगर उपहार का सही उपयोग नहीं कर पा रहे है तो ये हमारी गलती है कि हम उसके किस नजर से देख रहे है ।

 

जीवन परमात्मा का दिया सबसे बडा उपहार है और अगर हम इसे बुरे कामों में शराब पीकर, मासं खाकर बर्बाद कर रहे है, तो यकीन मानना कि हमें उसके उपहार का सही उपयोग करना नहीं आया अगर अपने जीते जी हमने कोई अच्छा काम नहीं किया तो हम बर्बाद कर है । उपहार अगह हमें उपहार देना है तो भगवान का नाम दो जो उसके काम आएगा उसको कोई अच्छी किताब दो क्योंकि वो उसको पढेगा ओर वो खुद का भला करेगा अरैर दूसरों का भी.  भारत में गीता, रामायण ,ऐसे उपहार हमारे संत देकर गए जिसमें करोडों का ज्ञान है । जो अनमोल है.

 

लोग हजारों की किताब खरीदते है । और रामायण के बारे में कहते कि हमें सब कुछ मालूम है उसके बारें तो ये बोलते है किे रामायण पढने से तो व्यक्ति सन्यासी बन जाता है । तो ये हमारी गलत धारणा है । अगह हमनें आज नहीं पढा तो हम कभी नहीं पढेंगे उसको अगर एक व्यक्ति भी पढता है । और पढकर दूसरों को देता है । तो यकीन मानों हम संतो के दिए उपहार का सदुपयोग कर रहे है । अगर हमें किसी को कुछ देना है  तो गीता रामायण जैसे ग्रथं दें. भगवान का नाम दें

 

अगर हम शांति से बैठे तो जीवन में कुछ भी हमारे साथ नहीं जाता है ये शरीर भी यहीं रह जाता है  भगवन नाम ही हमेशा रहेगा हमारे कर्म ही हमारे काम में आएगं ।

 

प्रसंग ४- . एक व्यक्ति था वो ब्राहमण था तो वो एक गाँव से होकर जा रहा था. वो उॅट पर सवार था  तो उसने देखा कि एक घर में शादी हो रही है तो वो वहाँ चला गया ये सोच कर कि मुझे दक्षिणा मिलेगी तो वो वहाँ गया और उॅट को बाहर बाँध दिया. और अन्दर चला गया . तो वहाँ पर जितने भी ब्राहमण थे सबको एक रूपए दक्षिणा में मिला और सभी दक्षिणा लेके घर चले गए. तो वो वयक्ति बडा खुश हुआ कि चलो एक रूपए मिला और जैस ही वो बाहर आया तो उसने देखा कि उॅट को कोई चोर ले गया तो व्यक्ति सोचने लगा कि मैने थोडा पाने की खातिर अपने चार सौ रूपए के उॅट को खो दिया और हाथ में एक रूपया आया.तो मैंने कम पाने के चक्कर में बहुत कुछ गवा देते है.  

 

तो ऐसा ही हम कर रहे है । थोडा पाने की खातिर में ज्यादा खो देते है ये संसार क्या है ? थोड़े से पाने का नाम ही तो संसार है ? उस व्यक्ति कि तरह  शादी की तरह और हम यहाँ पाते भी है । पर अपनी कीमती चीज खो देते है । वो कीमती चीज क्या है ?वो है  भगवान का नाम और ये समय, जो भगवान ने उपहार स्वरूप दिया है  हम संसार में इतना खो जाते है कि समय केा भूल जाते है । और याद रखना कि “मृत्यु और समय” किसी का इंतजार नहीं करते है ये कब आ जाए क्योंकि कोई भी व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि मेरी मृत्यु कब आएगी और समय किसी के वश में नहीं.

 

कब किसकी मृत्यु आ जाए केाई नहीं बता सकता अगर हमनें समय रहते भगवान के दिए हुए उपहार का उपयोग नहीं किया तो ये मान लेना कि हम उसे कचरा कर रहे है । जैसे फूल कुछ समय तक तो शोभा बढाते है पर कुछ समय के बाद वो कचरे की शोभा बढाते है । इसलिए ये बडी समझने वाली बात है कि हम किसी को क्या उपहार दे रहे है और क्या ले रहे है । क्योंकि इस दुनिया में आए है कुछ अच्छा ही देकर जाए वो सब के लिए उपहार है. 

 

“राधे-राधे”


 

 

 

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