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इच्छा-शक्ति

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलो के लिए बड़े प्रेम और भाव से भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

“कृष्ण राधे की जय, राधे कृष्णा की जय,वंशी वाले कन्हईया कि जय-जय-जय..”  

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “इच्छा शक्तिी” इस संसार में केाई भी चीज पाने के लिए हम देखते है अलग-अलग स्थितियाँ होंती है । अगर व्यक्ति को काम करना है तो उसके लिए पैसा योग्यता जरूरी है । तो ये संसार परिस्थ्तियों से बधाँ है । संसार में व्यक्ति को कुछ भी पाना है । तो उसके लिए उसे कुछ ना कुछ चाहिए होगा. लेकिन परमात्मा की प्रप्तिी के लिए किसी योग्यता परिस्थ्तिी की जरूरत नहीं होती क्योंकि परमात्मा के लिए ये नहीं कहना पडता कि ये योग्यता हो, या पैसा हो,

तो कहने का तात्पर्य संसार में और परमात्मा में यहीं अतंर है जो संसार में हमें चीजें पानी है । तो उसमें योग्यता परिस्थ्तिी से गुजरना होगा पर परमात्मा के लिए तो ये कुछ नहीं है । वहाँ सारी चीजें समान है किसी व्यक्ति में कोई भेद नहीं है । इसमें कोई पांबदी नियम नहीं है । और परमात्मा की प्रप्तिी के लिए एक ही चीज है वो है “इच्छा“ व्यक्ति के अन्दर अगर इच्छा ही है । तो वो परमात्मा को प्राप्त कर लेगा उसके पास कुछ भी ना हो, पैसा ना हो, ज्ञान ना हो, बस उसके पास इच्छा हो. और जब वो गहरी होती जाती है । तो वो जुनून बन जाती है । एक होती है इच्छा और जब वो गहरी हो जाती है तो वो इच्छा शक्तिी बन जाती है तो प्रबल इच्छा शक्तिी तो ऐसे ही परमात्मा है इसमें केवल इच्छा की जरूरत होती है ।  और जब वो प्रबल हो जाए तो हमें परमात्मा की प्रप्तिी हो जाती है ।

प्रसंग १- एक संत थे एक बार एक व्यक्ति उनसे मिलने को आया और बोला कि आपकेा परमात्मा की प्रप्तिी हो गई तो वो कहते है-  कि हाँ ! तो वो कहता कि मुझे कैसे होगी. तो संत कहते है कि तुम्हें मेरे साथ चलना होगा. तो वो व्यक्ति केा लेकर तालाब में गए और बोले - कि इसमे उतरना होगा और जब वो उस तालाब में गया तो संत ने उसे डुबाए रखा थोडी देर तो जब वो व्यक्ति तडपने लगा तो संत ने उसे बाहर निकाल दिया और बोले - कि अब बताओ कि जब तुम पानी के अंदर थे तो तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज की जरूरत थी. तो वो बोला - कि हवा की. अगर कुछ देर में अंदर और रहता तो मर जाता वो संत कहते है - कि जो तुम्हें जिंदा रहने के लिए हवा की जरूरत तुम्हें पडी थी. वैसी ही तडपडाहट तुम्हें थी,जीवित रहने के लिए जो तुम्हे जो तडपफाड़ाहट थी . वैसी ही इच्छा परमात्मा केा पाने के लिए करना है । और उसी का नाम प्रबल इच्छा शक्तिी है जिसके पाए बिना हम रह ना सके. हम आध्यात्म के पथ पर तो चलने लगते है । पर हम अपने अंदर प्रबल इच्छा शक्तिी नहीं ला पाते । जैसे संत ने समझाया कि तडप होनी चाहिए इस संसार में कोई योगय है, अयोग्य है, केाई धनवान है, केाई निर्धन है. पर परमात्मा को प्राप्त करने के लिए ये सबसे चीजें जरूरी नहीं है. उसके लिए तो इच्छा शक्तिी ही काफी है ।

व्यक्ति के मन मे यहीं बात रहती है कि परिस्थ्तिी बदल जाए, मै बस ठीक हो जाऊ शरीर से, बस फिर बैठके परमात्मा का भजन ही तो करना है. पर वास्तव में हमें पर परिस्थ्तिी बदलने की जरूरत नहीं है हर हाल में परमात्मा को भजना है । हर परिस्थ्तिी को अनूकूल मानना एक आत्म विष्वास है और वो इच्छा शक्तिी है ।

प्रसंग २-  सुदामा जी का अगर जीवन हम देखें तो उनके पास ना तो धन था, ना कपडे, और ना ही दो वक्त खाना, तो उनकी क्या परिस्थ्तिी थी? कुछ भी नहीं थी?  फिर भी परमात्मा केा पाया उन्हेंने, तो वो हमें बता रहे है कि परिस्थ्तिी मायने नहीं रखती हर परिस्थ्तिी केा अपने पक्ष में ही समझा. जब उनके घर में खाना नहीं बना तो उनको पत्निी कहती है - कि भगवान ने आज हमें खाना भी नहीं दिया तो वो ठीक है पर हमारे बच्चों केा देते, पर सुदामा जी भगवान से शिकायत नहीं करते थे. वो कहते थे कि भगवान की बडी कृपा है कि लोगो के यहाँ महीने में दो एकादषी पर हमारे यहाँ तो रोज एकादषी होती है । वो कभी हार नहीं मानते थे परिस्थ्तिी से प्र्रेम से कहिए श्री राधे.

तो हर परिस्थ्तिी को अनूकूल मानकर चलना ये प्रबल इच्छा आत्म विष्वास जगता है । जैसे चील होता है । तो जब आँधी आती है । तो उसको पता चल जाता कि हवा के रूख से, कि आधी आने वाली है तो वो पहाड की चोटी पर जाकर बैठ जाता है पंख फैलाकर और जो हवा आने वाली है ।उसकेा वो पंखो में भर लेता है और जब आँधी आती है । तो वो उस आँधी के उपर उडता रहता है । आँधी उसका कुछ नहीं बिगाड पाती है । क्योंकि उस चील ने उस आँधी की हवा का ही उपयोग किया है. उसको अपेन पंखो में भर लिया है । और आँधी से उपर उठ गया है ।

तो हमारी आधी ये परिस्थ्तिया है हम इन में उलझ जाते है । हमें उस परिस्थ्तिी से उपर उडना है । तो केसे? परिस्थिति तो, हर एक जीवन में अच्छा बुरा समय रहता है । वो चील अगर ये सोचता कि उसे आँधी में बेठे रहना है । तो आँधी तो उसके तबाह कर देगी पर वो जानता है कि हम आधी को रोक नहीं सकते पर उससे उपर कैसे उडे ये बात मुख्य है । आँधी तो निश्चित है आएगी ही स्वाभाविक है.संसार में हर एक चीज की आधी आती है तो हम उससे उपर जब उडेंगे जब हम अपना मन और विष्वास परमात्मा में लगाऐगें । उपर उडने की शक्तिी चील को हवा से मिली और हमें वो शक्तिी परमात्मा से मिलेगी और परमात्मा से बडी शक्तिी कोई नही है । तो संसार में हमें कैसे सामना करना है तो जब हम अपना मन परमात्मा में लगा देंगे तो हम मन से आगें बढेगे तो परमात्मा तो अपनी शक्तिी से आगें बढेगा. प्रेम से कहिए श्री राधे

तो केाई भी परिस्थ्तिी ऐसी नहीं है जिससे हम पार ना पा सकें । जैसे हनुमान जी के लिए पक्तिीं है “दुर्गम काज जगते के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते” हनुमान चालीसा की हर लाइन कुछ ना कुछ संदेष देती है । जितने भी जगत के दुर्गम काज है वो तुम्हारी कृपा से हो जाते है । और इसमें एक शब्द आया है अनूग्रह तो अनु मतलब बाद में और ग्रह मतलब पकडना. हम कहते है, कि आजकल वो ग्रह हमें पकडे हुआ है । तो गृह का मतलब पकडना तो जब राम जी की हनुमान जी से पहली भेंट हुई तो वो बाह्रमण बनकर जाते है और परीक्षा लेते है कि वो कौन है? और जब वो उनकेा पहचान जाते है कि ये तो मेरे प्रभु राम और लक्ष्मण है । तो वो कहते राम जी से कि उस पहाड पर सुग्रीव रहते है आप मेरे साथ उनके पास चलिए तो राम जी कहते है कि हम उस पहाडी पर कैसे जाएगे? तो हनुमान जी कहते है-  कि आप मेरे कंधे पर बैठ जाइए तो दोनों भाई जब हनुमान जी के कंधे पर बैठकर जाने लगते है तो वो गिरने लगते है । तो हनुमान जी कहते है कि प्रभु आप मुझे पकड लीजिए.

तो राम जी उन्हें पकड लेते है तो वो नहीं गिरते है । तो यहाँ कहने का अभिप्राय क्या है कि सुगत अनुग्रह तुम्हरे तेते, तो यहाँ हनुमान जी पहले भगवान राम के चरण पकड लेते है । फिर आप हमें पकड लेना, तो जब हम अपनी शक्तिी से उनको पकडेगें और उसके बाद भगवान जब अपनी शक्तिी से हमको पकडेंगे तो वो किसी को छोडते नहीं कि तो हनुमान जी को पता है। कि भगवान  भक्त को नहीं छोडते तो ये अनुगृह भक्त और भगवान के बीच की वार्ता है । ये अनुग्रह ही इच्छा शक्तिी है । तो हम परमात्मा को पाने की इच्छा तो रखते है । पर हम जब प्रबल इच्छा जगाऐंगे तब वो अनुग्रहीत होंगे तो हम इच्छा से बढें तो फिर वो बढेंगें हमारी ओर , तो हमें अपनी इच्छा को इच्छा शक्तिी करनी होगी तो भगवान आध्यात्म में भी जब मिलेंगे जब हम इच्छा को प्रबल करेंगे.

प्रसंग ३- जो बुद्व थे जब वो सत्य की खोज करने के लिए निकले तो उनको पेड के नीचे. उनको बहुत दिन हो गए तप करते-करते पर जब उनकेा बहुत दिन हो गए. और उनको सत्य का ज्ञान नहीं हुआ तो वो घर जाने लगे तो वन से जाते उन्हेाने देखा कि एक समुद्र है और गिलहरी उसमें अपनी पूँछ डालती है और फिर जमीन पर रख देती वो बार-बार यहीं कर रही थी तो वो उसके पास जाकर बोले - कि तुम ये क्या कर रही हो ? तो कहती है - कि मै इस समुद्र को सुखा रही हूँ । इस समुद्र से बहुत सारे जंतु उस पार नहीं जा पाते . जब ये सूख जाएगा उसमें से रास्ता निकल आएगा तो सारे जंतु उस पार चले जाएगे तो बुद्व हसॅने लगते है-  कि तुम इतनी सी गिलहरी हो ये काम कब तक कर पाओगी ? तो वो कहती है - कि मै कोषिष कर रही हूँ पर एक ना एक दिन, ये समुद्र जरूर सूखेगा तो उसकी इस बात से बुद्व को एक प्रेरणा मिली औेर उनका जीवन बदल गया. जब ये गिलहरी इस असंभव से काम को करने में लगी है जो ये कभी नहीं कर पाएगी. क्योंकि इसके अंदर इच्छाष्क्तिी जाग गई है । अगर उसके पास इच्छा हेती तो वो थोडी देर बाद छोड देती. उस काम को. पर वो उसे प्रबल कर फिर काम करने लगी तो बुद्व ये देखकर घर ना जाकर फिर वन को गए और सात दिन में उनकेा भगवत ज्ञान की प्रप्तिी हो गई

वो अपनी प्रबलइच्छा शक्तिी के कारण ही परमात्मा केा जान पाए तो ये इच्छा शक्तिी का परिणाम है । अगर व्यक्ति सोचे तो पायेगा कि इस संसार की हर चीज नाषवान है, हर व्यक्ति मरेगा, शरीर भी मिट जाएगा, पैसे भी खत्म हो जाएगें, संसार ही खत्म होना है ।पर परमात्मा ही हमेषा रहेगा. बाँके बिहारी जी को देखो कल भी जब हमने देखा था तब वे वही बाँके थे और आज भी है और हमेषा रहेंगे. वो शाष्वत है उनका कभी नाष नहीं होगा. वो हमेषा रहेंगे तो हमें उसकी इच्छा करनी है. परमात्मा के लिए प्रबल इच्छाष्क्तिी करनी है ।

                                                                          “राधे-राधे”  

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