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उपासना

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“राधे-गोंविद, भजो, राधे-गोंविदा, श्री राधे-गोविंदा भजो, राधे गोविंदा ......”

 

श्री युगल चरणों में कोटि कोटि वंदन है

आज का हमारा सतसंग का विषय है “उपासना” जब कोई व्यक्ति किसी को देखता है तो उसको उसके अवगुण या तो गुण दिखाई देते है । दोनों चीजों से बडी एक चीज है भगवान की माया में आकर व्यक्ति ये दोनों चीज  देखता है या तो वो गुण देखता है  या फिर अवगुण, पर ये जो गुण और अवगुण के परमाणु होते है वो बहुत सूक्ष्म होते है । जब हम किसी की प्रशसा करते है तो वो गुण रूपी परमाणु हमारे अंदर प्रवेश कर जाते है । और जब हम किसी की बुराई करते है तो वो निंदा के परमाणु हमारे अंदर प्रवेश कर जाते है । और जिस व्यक्ति की हम प्रशसा कर रहे है तो उसके जो गुण है वो हमारे अंदर आ जाते है । और जिसकी भी बुराई कर रहे है उसके अवगुण  हमारे अंदर आ जाते है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का तात्पर्य है कि हमें अपने गुणो को लाना है तो दूसरे के सदगुणों को अपने अंदर लाना है । और इसके लिए बहुत सरल तरीका है कि उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का बखान करें ।

 

प्रसंग १.- जैसे तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में हनुमान जी के यश का बखान किया है । जैसे पहली पंक्तिी में “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर” पहली लाइन में गुण शब्द आया. मतलब वो क्या है ज्ञान और गुणों के सागर है तो पूरे हनुमान चालीसा में हनुमान जी के गुणों का गान किया है. तो किसी के सदगुण को अपने अंदर लाने का तरीका है उसके सदगुणों का बखान करना. कई लोग हनुमान चालीसा का पाठ करते है क्योकि हनुमान जी “बल, बुद्धि, विघा देहु मोह, हरहु क्लेश विकार” तो ये सब के दाता है . बल तो है ही बुद्धि विघा है हनुमान जी मे, और इन तीनों का जब संग्रह हो जाता है । व्यक्ति विकास की ओर बढ जाता है । तो हमें व्यक्ति के गुणों का यशगान करना है । और यशगान करने से सीधी चीज वो हमारे अंदर उतर रही है जिसका हम यशगान कर रहे है ।

 

और यशगान एक तरह की उपासना ही है । क्योंकि जो उपासना है उसका मतलब क्या है उप मतलब “विशेष” और आसन मतलब “बैठना” विशेष रूप से बैठना. किसी के पास विशेष रूप से बैठना ही उपासना है. पूजा करते वक्त हम अगर मन से वहाँ नहीं बैठे तो ये हमारी उपासना नहीं हुई क्योंकि शरीर से तो वहाँ  बैठे है । भगवान के पास है पर हमारा मन वहाँ नहीं है पर मन का बैठना ही सही उपासना है  प्रेम से कहिए श्री राधे

 

व्यक्ति चारों धाम की यात्रा तो कर आता है पर अपने मन की यात्रा कभी नहीं करता मन तो खूब यात्रा करता है. पर हम मन की यात्रा कभी देखते ही नहीं कि वो कहाँ जा रहे है ।  हम शरीर से तो उपासना में बैठे है पर मन से नहीं है । तो वो भगवान की उपासना नही है ।

 

प्रसंग २- एक पति पत्निी थे तो दोनों झगडते रहते थे पति भगवान की पूजा किया करता था हमेशा मंदिर जाता था । और पत्निी से भी कहता था कि तुम भी पूजा करो और मंदिर जाया करो हमेशा  लडती रहती हो । उसको पर समझ में नहीं आता क्योंकि उसकी अपनी धारणा थी । तो एक दिन एक व्यक्ति आया उनके घर और उसने पूछा - कि आपके पति कहाँ है? तो वो बोली कि वो बाजार गए है । और एक दुकानदार के यहाँ झगडा कर रहे है ।

 

तो वो व्यक्ति बोला - कि आपको कैसे पता कि वो झगडा कर रहे है । तो वो बोली कि मुझे पता है । अब उसका पति तो अंदर पूजा कर रहा था ।

 

तो उसको गुस्सा आया और वो उठकर आया और बोला कि- तुम झूठ क्यों कह रही हो कि मै झगडा कर रहा हूँ मै तो यहाँ पूजा कर रहा हूँ । तो वो बडी अच्छी बात कहती है कि ये जो मेरे पति है कल एक जूते की दुकान पर जूते देख्कर आए और रात में यही कहकर सोये, कि मै सुबह वो जूते खरीदूगाँ ।

 

अब पूजा में तो ये बैठे थे पर मुझे मालूम है इनका मन कही और होगा. उस जूते की दुकान पर और पैसे को लेकर उससे झगडा कर रहे होंगे । उसने कहाँ होगा कि मै इतने में दूगाँ । तो मैने कहाँ गलत कहा शरीर से अगर ये पूजा में बैठे है तो ये उपासना नहीं है. उपासना वो है । हम मन से भगवान के पास बैठे चाहे शरीर से कही भी बैठे रहे. पर हमेशा उलटा होता है शरीर पूजा में रहता है । पर मन कहीं ना कहीं घूमता रहता है । झगडा करता रहता हैं. शरीर चाहे बाजार में हो दुकान पर हो, पर मन हमेशा  भगवान के पास रहना चाहिए वहीं वास्तव में सही उपासना है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३- हम पूजा तो करते हे पर वहाँ बैठते नहीं है । एक खुदा के बंदे थे उनका नाम था हाजी मोहम्मद वो अपने जीवन में साठ बार हज की यात्रा कर चुके थे. ओर वो पाँचों वक्त की नमाज भी अता करते थे तो एक बार उनको रात में स्वप्न आया , उन्होंने देखा कि वे स्वर्ग और नर्क के रास्ते में खड़े है ओर स्वर्ग और नरक के बीच में यमराज खडे थे, जो स्वर्ग या नरक में भेज रहे थे वो सबको उनके कर्मों के हिसाब से स्वर्ग और नर्क में भेज रहा था अब उनकी बारी भी आई तो वहाँ एक दूत था उसने पूछा कि - तुम कहाँ जाओगे तो हाजी मोहम्मद ने कहा – मै तो स्वर्ग जाना चाहता हूँ,

 

दूत ने कहा – आप बताये कि आपने ऐसे कौन से कर्म किये है जिससे आप ऐसा कह रहे हो. हाजी मोहम्मद ने कहा -कि मैने अपने जीवन में साठ बार हज की यात्रा की है मुझे तो स्वर्ग जाना है.

 

तो दूत ने कहा –तुमने हज यात्रा तो कि पर जब तुम्हारे पास जब कोई आता था या तुम किसी से मिलते थे तो तुम बडे अभिमान और घंमड के साथ कहते थे कि मै हाजी हूँ और साठ बार हज जा चुका हूँ । तो ऐसा कहने से तुम्हारा पूरा हज यात्रा का पुण्य खत्म हो चुका है ओर कोई पुण्य हो तो बताओ.

 

तो हाजी बोला कि - मै पाच वक्त की नमाज अता की है  । तो दूत बोला-  कि एक बार तुमसे मिलने कुछ लो आए थे तो तुमने रोज की नमाज से ज्यादा वक्त लगाया था उनको दिखाने के लिए तुमने ऐसा किया तो वो पुण्य भी खत्म हो गया जो हाजी ने इतना सुना तो पैर के नीचे से जमीन खिसक गई और जब उसकी नींद खुली. तो उसने दूत का धन्यवाद किया कि उसने उसे सही ज्ञान दे दिया कि मैने उपासना शरीर से ही की मन से तो की ही नहीं उपासना तो वो चीज है. जिसमें व्यक्ति डूब जाए तो उसे खुद का भी होश ना रहे । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

और अगर शरीर से हम भगवान के पास है पर मन में द्वंद चल रहा है बाजार में लड रहे है । तो खुद से हर व्यक्ति ये प्रशन पूछे कि भगवान के पास बैठने पर हम कहाँ है । मन कहाँ है हम तो आत्मा है । और अगर मन संसार में है , तो हम भगवान की नहीं संसार की उपासना कर रहे है । क्योंकि उस समय हमारा मन संसार के पास है ।

 

तो हमें जानना है कि हम कहाँ है क्योंकि व्यक्ति को अपने किए हुए कर्मों पुण्यों का अहंकार हो जाता है कि मै ने ये दान किया, पर मन में जो अंहकार दिखावे का भाव आ गया वो उपासना नहीं है । हम कहते है कि जब हम व्रत रखते है तो कहते है कि आज हमारा उपवास है तो इसका मतलब क्या है वो खास दिन जब हम खास तौर पर भगवान के पास बैठेंगे । पर हमने इसका मतलब तो खाने से लगा लिया. कि आज हम ये नहीं खाएगें, वो खाएगें, ये नमक नहीं खाएगें. हम उससे अपने उपवास को जोड लेते है । व्रत का मतलब है एक संकल्प हमने लिया है कि हम आज विशेष रूप से भगवान के पास बैठेंगे पर इसके अलावा हम जमाने भर के काम करते है । हम मंदिर भी जाते है, पूजा भी करते है । पर हम शरीर से करते है, ये सब तो हमें मन से उनको भजना है उपवास में अगर हमनें उपवास किया और हमारा मन संसार में ही लगा है । तो वो हमारा उपवास गया. ओर अगर एक बार हमने पूरे मन से वचन से, कर्म से भगवान का नाम ले लिया तो वो हमारी उपासना व्रत हो गया उपासना जो है वो अंतर  गहराई का मामला है  जब हम अंदर उतरेंगे तो हमें उपासना का मतलब पता चलेगा ।

 

प्रसंग ४ - एक बार नरसी मेहता जी ने सात दिन तक उपवास किया बिना अन्न जल के तो भगवान शिव  ने उन्हें दर्षन दिए और कहा – मागों! क्या चाहिए तो नरसी जी बोले - कि प्रभु आपको जो अच्छा लगे वो मुझे दे दीजिए. शंकर जी कहते है - कि मुझे कृष्ण प्रिय है.

 

नरसी जी ने कहा - कि मुझे वो ही दे दीजिए तो वो नरसी जी को लेकर भगवान कृष्ण की रासलीला में ले गए तो नरसी जी देखते है कि वहाँ गोंपियॅा है, राधा जी है, और कृष्ण जी, तो जब लीला शुरू हुई तो भगवान ने उनके हाथ में एक दीपक दिया और जो रासलीला शुरू हुई तो वो इतना डूब गए कि उन्हें होश ही नहीं है कि उनके हाथ में दीपक है । वो इतना गर्म हो गया कि उसकी लौ से उनका हाथ जल गया उन्हें होश ही नहीं है. तो जब रास खत्म हुआ तो राधा जी ने देखा कि ये जो भक्त है इनका तो हाथ जल बया तो वो दौड कर आई और वो दीपक हटाया और कहा कि-  आपको पता नहीं चला कि आपका हाथ जब रहा है तो नरसी जी बोले - कि प्रभु की जहाँ भक्तिी और रासलीला हो वहाँ शरीर का होश कहाँ रहता है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

उपासना का मतलब है कि मन हमारे इष्ट चाहे वो कोई भी हो क्योंकि शक्तिी तो सभी एक है । सब रास्ते अलग है चाहे कृष्ण को भजो, चाहे राम को, पर मन से क्योंकि मन से ही सारी चीजे है । अगर ये मन नहीं लगा तो समझना सारी चीजें बेकार है जो हमनें शरीर से पूजा की वो तो कर्मकांड बन गया वो भक्तिी नहीं हुई । वो पूजा नहीं है । वो तो कर्म है जैसे हम नहाते है, खाना खाते है, तो पूजा आदत का नाम नहीं स्वभाव का नाम है । और जब पूजा स्वभाव बन जाएगी. सच्चे अर्थों में हम भगवान की उपसना करेंगे अपने अंदर उतर कर तो देखो कि क्या है उपासना तो हमें शरीर से नहीं करना है मन से करना है ।

 

“राधे राधे”


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