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आश्रय

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राधे राधे आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ भगवन नाम का कीर्तन करें.

 

“राधा स्नेह बिहारी नन्द लाल मेरो प्यारो मोहन श्री राधा कुंज बिहारी नन्द लाल मेरो प्यारो मोहन” .....

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “आश्रय” , जीवन में हर व्यक्ति को किसी न किसी के आश्रय की जरूरत पडती है । ये मनुष्य का स्वभाव है । आश्रय का मतलब है हम किसी के उपर निर्भर है । हर व्यक्ति का आश्रय लेना एक स्वभाव है तो आश्रय एक स्वभाव है । आश्रय एक आधार है. व्यक्ति को किसी के सहारे, आधार की आवश्यकता है । पर आश्रय लेने से पहले हमें ये देखना है कि हम किन चीजों का आश्रय लिए है । और हमें किसका आश्रय लेना है ।  क्योकि ये बहुत जरूरी है । व्यक्ति धन का आश्रय लेता है । परिवार का आश्रय लेता है । व्यक्ति बल, बुद्धि, का भी आश्रय लेता है । पर ये कभी टिकते नहीं है । प्रेम से कहिए श्री राधे और जब ये आश्रय टूटते है तो सिवाय दुख के हाथ में कुछ नहीं आता है । हमें अगर इसे समझना चाहे

 

प्रसंग १. - तो एक महाभारत में जब दुशासन द्रोपदी को जब भरी सभा में लाता है । तो हमारे शास्त्रों ने हमें हर चीज की शिक्षा दी है । हम सब ने रामायण और महाभारत सुनी है । वो हमें क्या समझाना चाह रहे है ये मायने रखता है । तो जब द्रोपदी जी सभा में आती है तो दीन अवस्था में थी, कोई उनका सहारा नहीं है । आश्रय नहीं है । उनको एक आधार की जरूरत थी कि कोई तो सहारा मिल जाए तो वो सबसे पहले धृतराष्ट के पास गई जो सिहांसन पर बैठे थे कि आप तो राजा है, ये पूरा हस्तिनापुर आपके हाथ के नीचे है । आप जो कहोगे वो ही इस सभा में और हस्तिनापुर में भी वही होगा. पर वो उनकी मदद नहीं कर पाए,

 

फिर वो वहाँ से चली गई उनको आश्रय नहीं मिला फिर वो एक-एक करके सबके पास गई, भीषम पितामह, द्रोणाचार्य जी विदुर जी, सबके पास वो गई पर किसी के मुहॅ से कोई भी शब्द नहीं निकला उसको सहारा और शरण नहीं मिली. वहाँ उसके अपने बैठे हुए थे उसके अपने पति भी उसकी मदद नहीं कर पाए क्योंकि वो सब दुर्योधन के दास हो गए इस प्रसंग से क्या सिखा रही है द्रोपदी सहारा सबके पास होता है पर उनको जब सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत पडी तो किसी ने नहीं दिया पाच-पाच बलशाली पति थे, उनके भीम जैसे बलशाली को देखे, अर्जुन जैसा धनुरधर जिसकी बराबरी दुनिया में कोई नहीं कर सकता. पर उस समय वो भी उनके काम में नहीं आए. और जहाँ से उनका आश्रय छूटता गया वहाँ से उनको दुख ही मिला कि क्योकि ये संसार में किसका आश्रय ले ले.

 

जब सारे रास्ते बंद हो गए तो सबका आश्रय छोडकर वे अपने ही शरीर का आश्रय लेती है अपनी साडी के छोर को अपने मुख में दबा लेती है कि मेरा शरीर मेरा साथ देगा आश्रय देगा. दुशासन साडी खीचंता है ।तो शरीर भी साथ नहीं देता. दात से पल्लू छुट जाता है, जब सारे आश्रय टूट जाते है तो अंत में वो आख बंद करके भगवान को याद करती है और वो एक पल की भी देर नहीं लगाते है, क्योकि भगवान द्रोपदी को शिक्षा दे रहे है कि तुम जब-जब इस संसार का आश्रय लोगी तुम्हे सिवाय दुःख के कुछ नहीं मिलेगा भगवान बता रहे है कि जब तक ये आश्रय टिके है तब तक तो ठीक है जब छूटे तुम दुखी हो जाओगी. और जब भगवान कि शरण ली उसी समय सारी समस्या हल हो गई क्योकि सबसे बड़े आश्रय के पास गई .

*

तो हमें उस परमात्मा का आश्रय लेना है न कि संसार का जिस तरह हम जब हम नीद से जागते है तो एक दम ताजा रहते है कहते है कि थकान उतर गई, तो ये शक्ति हमें कहाँ से मिली उस समय हमनें किसका आश्रय लिया क्या हमनें संसार का आश्रय लिया था नहीं, उस वक्त हम नींद में थे तो सोचो जब हम उस सर्वशक्ति मान का सहारा लेगें तो वो तो अपार शक्तिमान है । वो क्या नहीं कर सकते उसका आश्रय लेने से हमें कितना चैन और शांति मिलेगी फिर हम क्यों संसार का आश्रय ले इन सब से तो हमें काम निकालना है । धन के बिना दुनिया में काम नहीं चलता धर्म भी करोगे तो उसके लिए भी धन की आवश्यकता है, पर हमें उस पर आश्रित नहीं रहना. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

आध्यात्म में तो जो शरणागति है आश्रय बहुत महत्वपूर्ण है भगवान भी यहीं बताते है । कि जब तक तुम संसार का आश्रय नहीं छोडोगे तब तक हम नहीं मिलेगें, भगवान द्रोपदी की मदद करने तब तब नहीं आए जब तक वो संसार से मदद मांगती रही, और जब उसने भगवान का आश्रय लिया तो वो एक पल मे आ गए तो हमें आश्रय लेना है तो किसका एक परमात्मा का और दूसरे जो परमात्मा पर आश्रित है । तो कौन है परमात्मा पर आश्रित ? उनके संत और महापुरूष, तो हमें उन व्यक्तियों का भी आश्रय लेना है जो परमात्मा पर आश्रित है । क्योकिं  भक्त के पैर जिसने पकड लिए वो समझ लो भगवान तक पहुच गया.

 

हम सतसंग में जाते है तो ये एक आश्रय है हम दिन भर काम करते है । वो कितना भी काम कर ले दिन भर में , पर शाम होते ही उसको घर की याद क्यों आ जाती है । क्योकि घर एक आश्रय है जहाँ पर वो दिन भर की थकान मिटाता है । जहाँ वो सुख और चैन से आराम करेगा तो वो आश्रय है । तो तब हम इस शरीर की थकान मिटाने के लिए घर का सहारा लेते है, तो ये मन भी थका है इसमें दिन भर पता नहीं कौन-कौन से विचार चलते रहते है । इन विचारों से शांति हमें कब मिलेगी जब हम सतसंग का आश्रय लेगें । सतसंग में क्या है? भक्त और भगवान की चर्चा है । और भगवन नाम है उनके नाम में तो वो शक्ति है जो खुद  परमात्मा में नहीं है ।

 

हमें भगवान और भक्तों का आश्रय लेना है मन का आश्रय लेना बहुत जरूरी है । हम तो एक जगह बैठे रहते है पर ये मन पता नहीं कहाँ घुमता रहता है किसका आश्रय लेता है । और जहाँ-जहाँ ये मन जाता है वहाँ से क्या लाता है सिर्फ दुख, चिंता, क्यों? क्योंकि वो सही आश्रय में लगा ही नहीं. अगर होता तो हमे शांति मिलती, देखो हम एक जगह रहते है पर मन दस जगह जा कर हमें सकारात्मक से हमें नकारात्मक की ओर ले जाता है । तो हमें मन की थकान मिटाने के लिए सतसंग का आश्रय लेंना जरूरी है । ओर संतो के पास तो भगवान की है ।

 

प्रसंग २ - एक बार का प्रसंग है एक व्यक्ति भगवान का भक्त था तो वो पैदल तीर्थयात्रा करने के लिए गया तो एक गांव से निकला तो वो आराम करने के लिए एक पैर के नीचे बैठ गया. तो उसने देखा कि बहुत सारे लोग कहीं जा रहे है । उसने पूछा कि आप लोग कहाँ जा रहे हो? तो उन्हेांनें कहा कि वहाँ एक पहाडी है उसमें एक संत रहते है । वो साल में एक ही बार निकलते है तो वो जिसको छू लेते है उसके सारे रोग चिंताए मिट जाती है । सब लोग अपनी समस्याए उनके पास रखते है और हाथ रखकर ठीक कर देते है तो साल में हम लोंगों को एक ही दिन मिला तो व्यक्ति सोचता है कि हम भी जाकर देखें कि कौन से ऐसे महात्मा है तो समस्याए, रोग, हल कर देते है ।

 

तो वो भी पहाडी पर जाता है तो कुछ समय बाद वो संत निकलते है और जिन को रोग थे उनको एक एक करके स्पर्श करते है और  उन सब के रोग ठीक जाते है । वो व्यक्ति दूर खडा ये देखता है । तो सब लोगों के रोग दूर हो गए और सब गाव चले गए और जब संत अंदर गुफा में जानें लगें तो वो व्यक्ति संत के पैर पकड लेता है । और कहता है कि मुझे कुछ पूछना है आपसे,

 

वो बोले - कि क्या ? तो वो बोला - कि मुझे ज्ञान दीजिए मै आपकी शरण मे आया हूँ,

 

तो संत ने कहा - कि मेरा पल्ला छोडो ,वो परमात्मा देख रहा है कि तुमने मेरा आश्रय छोडकर किसी और का आश्रय ले लिया है । इतना कहकर वो अंदर चले गए अब उस व्यक्ति को समझ में नहीं आया कि वो क्या कह रहे थे. संत ने कहा था कि मेरा पल्ला छोडो वो परमात्मा देख रहा है ।कि तुमने उसका आश्रय छोडकर किसी व्यक्ति का आश्रय ले लिया है ।

 

जब उसे बात समझ में आई कि संत कह रहे है कि मै तो उनका एक छोटा सा बंदा हूँ , तुम मेरा आश्रय क्यों ले रहे हो, तुम उसका आश्रय लो, जब मै परमात्मा से जुडा तो मेरे अंदर इतनी शक्ति आ गई । कि मै जिसे छू लू उसका रोग दूर हो जाता है तो जब उसके बंदे में इतनी शक्ति है तो उस परमात्मा में कितनी शक्ति नहीं होगी. सोचो, तो वो व्यक्ति कहता है कि भगवान में समझ गया कि मुझे आपका आश्रय लेना है उस भक्त के पास जो शक्ति है वो आपके आश्रय लेने की वजह से है । संत परमात्मा के ही स्मरण में रहते थे, तो उसके आश्रय में वो शक्ति है तो पूर्ण समपर्ण आवश्यक है । व्यक्ति चाहता है संसार मे भी रहे और भगवान भी मदद करें दोनों एक साथ चाहिये . हम तप करते है पूजा करते है, पर संसार का आश्रय नहीं छोड पाते है ।

 

प्रसंग ३ .- एक बार दो चींटी थी. तो दोनेां एक दूसरे से मिलने जाती है तो पूछती है कि क्या हाल है तो पहले वाली कहती है  कि मै तो खुश हूँ । दूसरी कहती है - कि मुझे तो कुछ भी अच्छा खाने को नहीं मिलता तो वो पहली कहती है - कि तू मेरे साथ चल मै जहाँ रहती हूँ । तो दूसरे दिन वो चींटी उसके साथ जाती है तो वो उसको लेकर एक शक्कर के पहाड़ के पास ले जाती है.

 

और  पहले वाली चींटी कहती है कि हमें इसी पहाड़ पर चढना फिर हमें बहुत खानें को मिलेगा तो वो दोनों चलना शुरू करती है तो वो पहले वाली चींटी पूछती है दूसरी से, कि तुम्हें यहाँ अच्छा लग रहा है यहा कितनी मिठास है। तो दूसरी कहती है कि कहाँ है मिठास?

 

तो दूसरी कहती है - कि हम शक्कर के ढेरी पर है ओर तुम्हें मिठास नहीं लगती है, तो वो उसके पास जाती है और देखती है कि उस चीटीं के मुहॅ पर नमक का टुकडा लगा होता है । तो वो कहती है कि तुम ये अपने साथ क्या लेकर आई हो? तो वो कहती है - कि मै अपने साथ खाना लेकर आई हूँ। तो वो कहती है कि जब तुम शक्कर की पहाड़ पर चल रही हो तो इस नमक की क्या जरूरत और अगर तुम्हें ये मिठास को पाना है तो, ये नमक की डली छोडनी पडेगी.

 

तो दूसरी चींटी उसको छोड देती है । और फिर चलने लगती है तो पहली चींटी पूछती है कि अब तुम्हें मिठास आ रही है तो वो कहती कि तुम मुझे बहुत अच्छी जगह लेकर आई हो अगर मै नमक को अपने मुहॅ में दबाए होती तो मै तो जान ही नहीं पाती कि मिठास क्या होती है । दोनों आनंद से उसको मिठास को लेते है ।

 

कहने का मतलब है कि अगर हमें आध्यात्म मे जाना है । तो इस संसार का जो आश्रय रूपी खारा  नमक है उसको यहीं छोडना है । तभी हम आध्यात्म की मिठास को पा सकते है । उस में इतनी मिठास है कि हमें इस संसार के खारे आश्रय की जरूरत नहीं है । हम उस चींटी की तरह इस आश्रय को पकड कर चलते है । और उसी की तरह हमारा हाल होता है । तो जब हम संसार की नमक की डली को लेकर चलेंगे तब तक हमें आध्यात्म की अनूभूति और हम तृप्त नहीं हो पाएगें, हम भूखें के भूखें ही रहेंगे. हमें वो मिठास कब मिलेगी जब हम संसार का आश्रय रूपी नमक छोड देगें । अगर हमे उस पथ पर जाना है तो इस संसार को यहीं छोडना है ।

 

क्योंकि जब हम छोटा आश्रय छोडेगें और उस परमात्मा का आश्रय लेंगे तभी बात बनेगी हमें काम सब से लेना है । हमें अपना मन किसी में नहीं लगाना, आश्रय नहीं लेना क्योकि जब ये आश्रय टूटेगा उसी दिन हम बिखर जाएगें और ये याद रखना कि परमात्मा का आश्रय कभी न छूटेगा .जब तक जीवित है  और मरने के बाद भी वो आश्रय हमारे साथ चलेगा. हम किसी को पकडते और छोडते है तो हमारी पकड तो कमजोर है । पर जब वो परमात्मा जब किसी को पकड़ता है तो फिर कभी नहीं छोडता, दुनिया का आश्रय छूट जाएगा पर वो परमात्मा कभी साथ नहीं छोडता है । तो हम क्यों इन छोटे आश्रयों में पडे रहे उस परमात्मा का आश्रय ले और काम करते रहे है ।

                                               

“राधे-राधे” 

 

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