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अनुकूलता-प्रतिकूलता

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आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये रोज की तरह हम दो मिनिट का भगवन नाम का संर्कीतन करें। बड़े भाव से बड़े प्रेम से सब मेरे साथ गाईये।

"मेरे प्यारे को नाम श्री राधे श्री राधे मेरी लाडो को नाम श्री राधे ".........

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।


आज के हमारे सतसंग का विषय है – “प्रतिकूलता-अनूकूलता” हर चीज के दो पहलू होते है अनूकूलता प्रतिकूलता, सुख है, तो दुख खुशी है तो दुख. दिन हो तो रात संसार की द्रष्टि से भी दो चीजें है अनकूलता और प्रतिकूलता. आध्यात्मिक द्रष्टि से है कभी सारी चीजें व्यक्ति के अनूकूल चलती है जैसा वो चाहता है वैसा ही होता है । जीवन में वो पल भी आते है जब सारी चीजें उसके विपरीत होती है उसका कोई काम नहीं होता है । जैसा हम चाहते है, पर अगर हम आध्यात्म में केवल दो परिस्थ्तिया ही नहीं होती है क्योकि आध्यात्म का मतलब क्या ? “ईष्वर की प्राप्ति” इसमें न अनूकूलता और प्रतिकूलता. वहा प्रतिकूलता अनूकूलता दोनों भजन में सहायक है । संसार में हर प्रकार की परिस्थ्तिी है व्यक्ति पर वो भारी पडती है एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हम हालात से नहीं, हालात हम से है. व्यक्ति हालात को बदलता है न कि हालात व्यक्ति को ।


प्रसंग १- 
इसे हम ऐसे समझ सकते है कि एक बार का प्रसंग है कि  एक व्यक्ति था उसके पास एक गधा था तो जब वो जाने लगा तो रास्ते में एक गढढा आया, तो उसके गधे ने उसे नहीं देखा और वो सीधा जाकर गढढें में गिरा. जैसे ही उस व्यक्ति ने झक कर देखा तो गड्डा  ज्यादा गहरा था,गधा तो चिल्लाने लगा. जब उस व्यक्ति ने उसे देखा तो वो बहुत गहरा था जब उसमें अपने घर में देखा तो जानवर बधें थे उसके घर में. तो रो रहा था कि कोई उसे बचा ले पर कोई उसकी मदद नहीं कर रहा फिर उसने सोचा कि मै इसे नहीं निकाल पर रहा हूँ.

तो उसने सोचा कि मै इस गढढें को बंद कर दू ताकि कोई और जानवर इसमें न गिरें अब उस व्यक्ति ने अपने एक दोस्त को बुलाया और दोनों ने उस गढढें को मिटटी से भरना षुरू किया वो गधा चिल्लाए जा रहा था जब उसने देखा कि ये गढढा बंद कर रहा तो वो और चिल्लाया थोडी देर बाद वो चुप हो गया और .उसने एक तरकीब लगायी और जो मिटटी गिरती उसको झडा कर वो उस मिटटी पर खडा हो जाता वो बार-बार ऐसा ही करता व्यक्ति मिटटी फेंकता और थोडी देर बाद उसने देख की गधे की आवाज नहीं आ रही उसने झककर देखा तो गधा मिट्टी को झडा कर ऊपर खड़ा है .थोड़ी देर बाद कि गधा बाहर आ गया है ।  वो गढढा भी भर गया और वो गधा भी बाहर आ गया और भाग गया ।

प्रेम से कहिए श्री राधे

कहने का मतलब कि वो गधा चाहता तो वहीं दब के मर जाता ये सोचता कि परिस्थ्तिी तो मेरे विपरीत हो गई मेरे पास मरनें के अलावा केा रास्ता नहीं है । उस व्यक्ति ने भी यहीं सेाच लिया यही हमारे साथ होता है कि हम परिस्थ्तिी में दबते चले जाते है तो हमें क्या करना है। गधे की तरह हमें प्रतिकूलता की मिट्टी को हटाना है और उपर आना है । क्योकि प्रतिकूलता की मिट्टी तो हमेशा गिरेगी पर हमें उससे ऊपर आने का प्रयास करना है क्योकि ये संसार है यहाँ हर काम हमारे मन का नहीं होगा .प्रतिकूलता की मिटटी केा हटा के और अगर ये परिस्थ्तिी को नही हटा पाते तो ये मान के चलना कि हमें सच्चें साधक नहीं है.


ये तो संसार के व्यक्ति के लिए है,इक भोगी की नजर में परिथितियां सुखदाई दुखदायी है लेकिन एक योगी की नजर में दो परिस्थिति है ही नहीं, क्योकि व्यक्ति अनुकूलता में उतनी उन्नति नहीं कर पाते जितनी उन्नति व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में कर पाता है. इसे हम ऐसे समझ सकते है जैसे



जैसे दो बच्चे है । दोनों छोटे छोटे है एक के मा बाप दादी दादा सब है है । उसका पूरा परिवार है और दूसरे के माता-पिता, दादा-दादी बचपन में ही खत्म हो गए. तो कौन ज्यादा उन्नति करेगा? जो प्रतिकूल परिस्थितियों में पला बढा?या  वो जो हालात से लडकर आगें बढा है । प्रतिकूल परिस्थितियों में जितनी उन्नतिकर पता है अनुकूल परिस्थितियों में नहीं कर पता .



प्रसंग २ - अगह हम धुव्र जी के प्रसंग को देखे तो उनके पिता उत्तानपाद की दो रानियाँ थी सुनीति और सुरूचि तो जब वो अपने पिता के पास गए. तो उनकी गोद में उनका सौतेला भाई बैठा था तो जब धुव्र जी पिता की गोद में बैठनें की जिद करने लगे.



तो विमाता ने मना कर दिया ओर कहा -
कि जाओ ! भगवान की आराधना करो और जब वो प्रसन्न हो जाए तो उनसे मृत्यु माँगना और फिर मेरी कोख से जन्म लेना, तब तुम पिता की गोद में बैठने के अधिकारी होगे.



तो धुव्र जी अपनी माता के पास गए. और उनकी माता ने कहा-  कि बेटा तुम्हारी विमाता ने सही कहा तुम वन में जाकर भगवान की सेवा करो और उनकी गोद में बैठना धुव्र जी पाँच वर्ष के थे. उस वक्त और उन्हेांनें प्रतिकूल परिस्थितियों में भगवान को प्राप्त किया. यदि हम प्रह्लाद जी को देखे तो उनके पिता ने क्या नहीं किया. जहर देकर मरना चाहा, सारी प्रतिकूल परिस्थिति थी पहाड़ कि चोटी से फेका पर उनके साथ कौन सी अनुकूल परस्थितियाँ थी.क्योकि उन्होंने ये देखा ही नहीं कि परस्थिति कैसी है. सच्चा साधक जीवन की हर परिस्थ्तिी केा भगवान की इच्छा मानकर उसका आनंद ले.



प्रसंग ३- जैसे माँ अपने बच्चे के हाथ से चाँकू छीन लेती है । तो बच्चा रोने लगता है । पर माँ उसे वो नहीं देती है । क्योंकि वो जानती है । कि ये थोडी देर रोएगा पर ये उसकी भलाई के लिए ही वो कर रही है ।बच्चे को अच्छा बुरा नहीं पता ये माँ को पता है इसी तरह भगवान है हमें तो बुरी चीज भी अच्छी लगाती है हम नहीं जानते कि क्या अच्छा बुरा है. ऐसे ही भगवान जीवन में प्रतिकूल परिस्थिती लाते है । जिससे साधक अपने जीवन में सही रास्ते पर आ जाए तो भगवान साधक की भलाई केलिए करते है ।


प्रसंग ४  - जैसे माँ होती हे वो अपने बेटे का प्यार भी करती और उसे ताडना भी देती है एक मा के तीन बेटे है एक को वो लडडू खाने को देती है, एक को खाना और एक को सिर्फ दाल का पानी. अब अगर जिसको दाल का पानी मिला तो वो बच्चा सोचे कि मा उसके साथ भेद भाव कर रही है तो एक को लडडू को. तो मा की द्रष्टि में भेद नहीं होता उसकी नजर में सारे एक है पर वो अगर ऐसा कर रही है तो क्यों जो दाल का पानी दे रही है वो बीमार है । वो लडडू देगी तो और बीमार हो जाएगा जिसे खाना दे रही है उसे इसलिए नहीं दे रही है कि वो बीमार हो जाएगा तीसरा तो लडडू खा रहा है वो एकदम स्वस्थ है। तो किसका ज्यादा ध्यान रखेगी? उसका जिसका जिसे वो दाल का पानी दे रही है ।क्योकि वो बीमार है.


ऐसा ही हमारे साथ है व्यक्ति को लगता जरूर है कि परिस्थ्तिया हमेषा हमारे विपरीत रहती है एक बात याद रखना कि वो भगवान हमेषा हमारे साथ है क्योकि उसी बच्चे का ध्यान मा ज्यादा रखती है जो बच्चा बीमारे है. इसी तरह प्रतिकूल परिस्थ्तिी में भगवान हमेंषा हमारे साथ है । क्योकि उसे पता है .ये दुखी है और प्रतिकूल परिस्थ्तिी का फायदा ये है कि अगर अनूकूल परिस्थितियां होगी तो व्यक्ति को सारे ऐषो आराम रहेगे और वो राग में फसॅ जाएगा. और जब वो प्रतिकूल में नहीं फसेगा.



व्यक्ति कब संसार में फसा रहता है जब वो ऐषो आराम में रहता है परंतु प्रतिकूल में वो अपने आप में  वैराग्य मे आ जाता है सब कुछ छोड के उसे लाना नहीं पडता वैराग्य को उसे वो मेहनत करनी ही नहीं जो एक रागी व्यक्ति को करनी है ।



प्रेम से कहिए श्री राधे जिसके जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां आई वो उनको समझ ले ठीक से तो वो स्थितियां ही उसकी उन्नति का कारण बनती है. प्रहलाद जी हो, ध्रुव हो, पांडव थे उनके जीवन में सारी प्रतिकूल परिस्थितियां थी. पर अंत में उनकी विजय हुई आपने महाभारत में देखा है श्री कृष्ण हमेषा उनके साथ रहे. उन्हे बारह वर्ष का वनवास हुआ तो भगवान ने उनका साथ नहीं छोड़ा. क्योकि वो प्रतिकूल परिस्थ्तिी में थे. इन्हें सबसे जयादा जरुरत मेरी है.

 

प्रसंग ५ - एक भक्त था भगवान का वो भगवान से कहता कि मुझे आपकी अनूभूति चाहिए जीवन में पता करना है कि आप मेरे साथ हो. कुछ ऐसा करो कि मुझे अनुभूति हो.


तो भगवान कहते -
कि तुम जब सैर करने सुबह जाओगे समुद्र के पास तो तुम्हें चार पैर दिखाई देगें, वो जो दो पैर दिखेंगे वो मेरे है तो वो व्यक्ति सैर में जाता है तो उसे रेत पर दो अपने और दो पैर और दिखाई देते है । वो समझ जाता है कि ये भगवान के पैरो के निषान है.



फिर कुछ समय बाद उस व्यक्ति को व्यापार मे धाटा लगता है तो उसके सारे संबंधी उसका साथ छोड देते है । ये संसार का नियम है कि जब तक व्यक्ति के प्रतिकूल सारी चीजें हो तब सभी साथ देते है पर वो कहते है कि “अँधेरे  मे तो परछाई भी साथ छोड देते है” । ऐसे ही सबने उसका साथ छोड दिया. पर वो जब सुबह सैर पर गया तो उसको दो पैरो के निषान दिखें तों उसको बडा आष्चर्य हुआ कि तेरा समय बदल गया, संसार के लोगो ने साथ छोडा, समझ मे आया. पर क्या भगवान भी संसार के लोगों जैसे हो गए? भगवान नें भी साथ छोड दिया. पर वो चला गया रोज उसको चार पैर की जगह दो दिखाई देने लगें.



समय बदला उसके पास धीरे-धीरे पैसा आना षुरू हो गया. वो जैसा बडा व्यापारी था वैसा बन गया जब वो सैर पर गया तो फिर उसको चार पैर दिखने तो उससे रहा नहीं गया उसने पूछा भगवान जब मेरे पास कुछ नहीं था तो आप भी संसार के लोगों की तरह मुझे छोड के चले गए थे. और आज पैसा आ गया तो आप भी वापिस आ गए. पर आपने ऐसा क्यो किया ?


तब भगवान ने कहा - कि तुमने ये कैसे सोच लिया कि जब तुम्हारी विपरीत परिस्थितियां थी तब मैने तुम्हारा साथ छोड दिया. उस समय जो तुम्हें दो पैरो के निषान दिखतें थें वो मेंरे थे तुम्हारें पैरों नहीं.


तो फिर उसने कहा - कि मेरे पैरों के निषान कहा गए ?



तब भगवान ने कहा - कि मै तुम्हें गोद में लिए था जब तुम्हारा समय सही नहीं था । वो तुम्हारें पैर नहीं थें मै तुम्हें गोद में लिए था और आज जब तुम्हारा अच्छा समय वापिस आ गया है तब मुझे लगा कि तुम फिर से चलनें के लायक हो गए हो. तो मै साथ-साथ चलने लगा तुम्हारे इसलिए तुम्हें चार पैर दिखाई देनें लगें । मैने तुम्हें अपनी गोद से उतारा फिर चार पैर हो गए दो मेरे और दो तुम्हारें तब उस भक्त के आखॅ में आसू आ गए वो कहने लगा कि मुझे माफ कर दो. मै समझ ही नहीं पाया.



तो अगर उसकी परिस्थितियां नहीं आती तो भगवान उसे गोद में नहीं उठाते ? भगवान उसकी सबसे ज्यादा ख्याल रखते है । जो विपरीत परिस्थ्तिी में है तो कौन सी परिस्थ्तिी ज्यादा अच्छी है ? जिसमें हम भेागों में डूबें रहें है वो ज्यादा अच्छी है या वो परिस्थ्तिी जिसमे भगवान हमारें साथ है. अनूकूल परिस्थ्तिी हमे भेागी, रोगी, विलासी बनाते है । प्रतिकूल में व्यक्ति भगवान के पास चला जाता है सब कुछ छोड देता है. वो एक भक्त की नजर मे क्या अनूकूल और क्या प्रतिकूल परिस्थितियां ?उसकी नजर मे एक ही लक्ष्य है भगवान की प्राप्ति वो उसी को मानता है ।


"राधे-राधे"

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