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भजन की महिमा

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे.

हें भजो, गोंविद गोपाल गिरधारी, हें भजो माधव मुकुंद मुरारी....

 

आज कें हमारे सतसंग का विषय है “भजन की महिमा” अपने इष्ट को भजना उन्हें याद करना ये भजन है। भजन का मतलब सीधा सा है कि हम अपने भगवान को कितना याद कर रहे है, और कैसे यादी कर रहे है, क्यांकि जो उनको याद करने का ढंग है वो ही भजन है, सिर्फ मंदिर में या पूजा मे बैठकर माला जपने का नाम भजन नहीं है, भजन का मतलब हम जिसे भज रहे है । वो हमारे स्मरण में है या कि नही, चाहे आखॅं खुली हो या बंद, उसका सुमरन हमारे दिल मे होना चाहिए, हमारी हर सांस में उसका नाम होना चाहिए वो भजन है । सिर्फ हाथ में माला ही लेना भजन नहीं है, और भजना ही हमें है ।

 

प्रसंग १. - सबसे अच्छा उदाहरण माता यशोदा का भजन है । भागवत में एक प्रसंग आता है । जब भगवान कृष्ण छोटे थे, तो यशोदा के मन मे विचार आया, कि इतने बडें मेरे लाला हो गए आज तक मैने उनको कभी माखन नहीं खिलाया, वो तो राजरानी थी उनके घर में सारे नौकर चाकर थे, तो सुबह उन्होंनें नहाया, दही मथनें बैठ गई, उनके मन में ये विचार आया कि कहीं मेरे लाला उठ न जाये, उनके उठने से पहले माखन निकालना है. और अब तक जो लीलाये भगवान नें की हैं । उनके पद बना के वो गा रही है और  हाथ से दही मंथन किए जा रही है। अब आखे तो बंद है, और गा रही है पूरा शरीर उनका पसीने लतपत हो गया है । उनका मन भी भगवान मे लगा है, मुख से भी गा रही है । और दही भी भगवान के लिए मथ रही है.  

 

अर्थात कर्म तीन तरह के होते है-  मन सा वाचा सा कर्मणा, अर्थात “मन वचन और कर्म” जो हम मन से करते है, वाणी से करते है और जो क्रियात्मक रूप से करते है। जैसे यशोदा तीनों से भगवान में लगी थी, तो भगवान जो अब तक सो रहे थे, उन्होने देखा कि यशोदा जी भजन मे लगी है, तो जहाँ यशोदा जी दही मथ रही थी, वहा जाकर खडे हो गए, और मथानी पकड ली. तो यशोदा जी ने देखा कि भगवान कृष्ण खडे है. मानों वो एक भक्त से कह रहे है कि साधना पूरी हो गई जिसने मुझे इन तीनों मन वचन कर्म से भज लिया उसको फिर मेरे पास आनें की जरूरत नहीं है. मै स्वयं ही उसके पास चला जाता हूँ.  

 

इस लीला से ये शिक्षा दे रहे है, भगवान वो मथानी पकड के खडे हो गए मंथन बंद करवा दिया अब आगें साधना करने की जरूरत नहीं है.

 

कहने का तात्पर्य जब तक हम तीनो से नहीं लगेगे तक तक वह भजन नहीं कहलायेगा, हमारा शरीर तो मंदिर में बैठ सकता पर मन कहीं और होता है । हम हाथ मे माला लिए होते है पर मन बाजार मे होता है । हम जहाँ  मन से है वो भजन है जहा शरीर से है वो नहीं है, भजन मन हमारा कहा ये देखना है जहा मन है हम उसी का भजन कर रहे है । हम किस का भजन कर रहे है ये हमें सोचना है ।भजन भीड़ का नहीं होता . कीर्तन चार लोग बैठ कर कर सकते है पर भजन तो एंकात में होता है व्यक्ति को एंकात में बैठकर देखना है कि हमें क्या याद आ रहा है, अगर उसे संसार के काम याद आ रहे तो वो संसार का भजन कर रहा है । अगर कोई कामना हमारे दिल में चल रही है तो वास्तव में हम उस कामना का भजन कर रहें है । और हम जिसका भजन कर रहे है उसी के जैसे हो जाते है ।

 

क्यों कहा गया कि भगवान का भजन करो. एक भ्रंगी नाम का क्रीडा होता है । अगर वो एक डाल पर बैठा है उसका चितंन कर रहा है तो उसी की तरह हरा हो जाता है । उसके पास ये शक्ति है कि वो जो सोचता है उसी की तरह हो जाता है । बस इसी तरह हम भी जिसका भजन कर रहे है उसी की तरह हो जाएगें, तो भजनें के लायक वो परमात्मा है क्योकि वो ही एक पूर्ण है बाकिॅ सब में कुछ न कुछ कमिया है । अगर हमें भजन करना है तो उस परमात्मा का करना है, तो जो पूर्ण है वहीं हमें पूर्ण बना सकते है.

 

प्रसंग २. - हम देखते है कि संतो में एक तेज होता है वो कहा से आता है । उनके पास जाने से हीं शाति मिल जाती है क्योंकि उनके भजन की शक्ति ही उनमें आ जाती है । भजन में वो ताकत  है कि वो दुनिया को हिला सकता है. ध्रुव जी जब पाच वर्ष के थे वो हमें क्या सिखा रहे है जब उनकी विमाता ने कहा कि तुम्हें  पिता की गोद में बैठना है तो मरना होगा, तो वो अपनी माता के पास गए, तो उनकी माता ने कहा कि -वो सही कह रही है । ये सब छोडों और जाओं भगवान का भजन करो उनकी गोद में बैठो । तो उन्हेांने तप किया और छ महीनों में भगवान को पा लिया. हर माह में वो एक-एक चीज छोडतें चले गए थे. पहले महीने में फल खाना बंद कर दिया, तो दुसरे में पानी, फिर पत्ते खाने लगे, और फिर अंत मै सांस लेना बंद कर दिया, तो जो उनके ह्रदय मै भगवान का स्मरण चल रहा था, तो भगवान ने सांस लेना बंद कर दिया, और भगवान ने साँस लेना बंद किया तो भगवान के अंदर स्थित ब्राह्माण के जीवो कि साँस रुक गई,और धुव्र जी ऐसे चमक रहे है जैसे करोडों सूर्य एक साथ चमक रहे हो, तो ये क्या है ये भजन की ताकत है. एक पाचॅ वर्ष का बालक हमें बता रहा है ।

 

लोग कहते है कि भजन की एक उम्र होती है तो ये क्यों धुव्र जी ने हमें बताया कि भजन की कोई उम्र नहीं है । ये भजन की ही शक्ति है कि पाच साल की आयु जहा व्यक्ति को ज्ञान भी नहीं होता खेलने कूदॅने की उम्र में उन्होंने भगवान को पा लिया,

 

प्रसंग ३.- प्रहलाद जी को देखिए आप हिरण्यकष्यपु उनके पिता ने क्या नहीं किया, कि उनका भजन बंद हो जाए पर्वत से नीचें फेंक दिया, पर वो किसी भी मुसीबत से नहीं डरें, उनका निरंतर भजन चलता रहा और भजन से हिरण्यकष्यपु हार गया, पर प्रहलाद नहीं हारे ,वो मौत के पास जाकर भी आ गए, आम आदमी क्या आ सकता नहीं, प्रहलाद जी क्यों आ गए, ये भजन की ताकत हैं. पर कैसा भजन जो हर पल सांसों मै चल रहा है। एक पल के लिए भी भगवान का स्मरण नहीं टूटता है । उनका तो वो हमें सिखा रहे है हमें तो डूबना होगा, हमें सिर्फ भजन ही नहीं करना भगवान का साथ साथ उनका काम भी करना है ।

 

प्रसंग ४.  - रामायण का प्रसंग है जब हनुमान जी लंका जाते है सीता जी की खोज में तो वो पहले पूरी लंका में घूमते है कि सीता माता कहा है. जब वो पूरी लंका देखते है । तब उनको हर जगह अनाचार ही दिखाई देती पर एक जगह उनको पवित्र दिखाई देती है जब वो देखते है वहा तुलसी का पौधा लगा है और बाहर भगवान का नाम लिखा है । तो कहते है कि ये कौन है लंका में, जो राम का भजन कर रहे है तब अंदर जाकर देखा वे और कोई नहीं रावण के छोटे भाई बिभीषण थे. उन्होंने कहा कि आप भगवान का भजन कर रहे हो, वो तो ठीक है पर इसे काम नहीं चलेगा.

 

क्योंकि अगर भक्ति कैद में है, और तो भजन काम का नहीं, राम नाम के साथ, राम का काम करो रामचरित मानस तुलसीदास जी ने लिखी उन्होंने ही हनुमान चालीसा लिखी उस में एक चौपाई है-

 

“तुम्हरो मंत्र विभीषण माना लंकेश्वर भए, सब जग जाना”

 

तो कौन सा मंत्र माना उन्होंने, कि लंकेश्वर हो गए, हनुमान जी ने यहीं कहा कि भगवान के भजन के साथ उनका काम भी करना है, घर मे बैठकर हम भजन तो कर सकते है ।हम सबको भजन से कैसे जोड़ सकते है, पर उनका काम क्या है, धर्म पर चलना, धर्म का साथ देना, उनके नाम का प्रचार करना, भजन करके तो हम सिर्फ अपना भला करेंगे, लेकिन वो भजन हम चार लोगों तक कैसे पहुचाए, यहीं उन्होंनें कहा कि भक्ति कैद में है इसे छुडाओ, तो विभीषण नें वहीं किया.

 

भक्ति को छुडानें के लिए भाई को त्यागा और भगवान राम की शरण में चले गए और फिर वो आगे चलकर लंका के राजा हुए। 

 

कहने का तात्पर्य भजन तो करना ही है । चैतन्य महाप्रभु अकेले ही भजन कर सकते थे, वो तो राधा जी का अवतार माने जाते है, पर उन्होंनें ऐसा नहीं किया, जैसे उन्होंने संन्यास लिया उनसे लोग जुडते गए और हरे कृष्ण का मंत्र उन्होंने दिया, जो करोडो लोग आज भज रहे है ।

 

हमें सबको बताना है कि भजन में बडी शक्ति है, हमनें ध्रुव और प्रहलाद जी को देखा, भगवान ने कहा है काम करते जाओ और नाम लेते जाओ.

 

प्रसंग ५. - कर्माबाई जी जब भजन करती थी तो कैसे ? काम करते-करते करती थी एक बार उनके भजन करते करते कंडे चोरी हो गए उन्होंने लोगों से कहा कि मेरे कंडे कोई ले गया वो कहती है कोई मेरी मदद करो लोग कहते है चलो हम देखते है घर-घर जाती है वो, और कंडो को कान से लगाती है तो सब लोग आश्चर्य में पड गए कि ये क्या कर रही है । हर बार कान से लगाती और कहती ये मेरे कंडे नहीं है   लोगों को समझ में नहीं आता कि वो कर क्या रही हैं । फिर वो एक घर में पहुची और कंडे को कान से लगाया और कहा कि - यहीं मेरे कंडे है तब लोगों ने पूछा कि आपको कैसे पता कि ये आपके कंडे है इन पर कोई नाम तो लिखा नहीं फिर वो कहती है । कि जब मै काम करती हॅ तब भगवान का स्मरण करती हू, जब कंडे थापती हॅू, तो मेरे कंडो से भगवन नाम की ध्वनि नाम निकलती है,और कान से लगाकर देख रही हूँ कि कंडो से वो ध्वनि निकल रही है कि नहीं. मै इसलिए कान से लगा कर देख रही थी । प्रेम से कहिए जय श्री राधे

 

ये प्रसंग हमें बता रहा है कि भजन की महिमा तो देखो, शक्ति देखो, कि एक निर्जीव चीज में से भी भगवन नाम की ध्वनी निकल रही है । ये कोई साधारण चीज नहीं है भगवान का भजन वो आपको दुनिया की हर चीज दिला सकती है । पर सबसे बडी बात ये है कि जब व्यक्ति का भजन सच्चा हो जाता है तो सबसे पहले वो संसार की आसक्ति ही मिटा देता है और उसे अपने भगवान के सिवा कुछ नहीं दिखा तो हमें भजन कैसा करना है । तो भजन क्या है

 

“राम-नाम सब कोई कहे, ठग ठाकुर और चोर, बिना प्रेत रीझे नहीं नागर नंद किशोर.”

 

राम नाम तो सब लेते है पर अगर नाम प्रहलाद जी जैसा, कर्माबाई जी जैसा लें तो भगवान से मिलने से कोई नहीं रोक सकता है ।  लोग कहते है भजते है पर अनूभूति नहीं होती है पहले मापो तो कैसा भज रहे हो तो भगवान कोई आसमान मै नहीं बैठे है, वो तो हमारे जैसा बनने को तैयार है । भगवान ने गोकुल मै जन्म लिया, क्योंकि गोपिया चाहती थी वहा बैठकर सबकुछ कर सकते थे.पर गोपियों ने कहा भगवान वहाँ बैठकर माखन नहीं चुरा सकते , क्यों आए. क्योकि ये भजन की शक्ति है जो हर पल चलता रहता है वो सिर्फ द्वापरयुग में ही नहीं आए थे, वो आज भी है.

 

प्रसंग ६. - सूरदास जी तो जन्म से अंधे थे पर भजन की महिमा तो देखो जब वो भजन करते थे तो बाल कृष्ण उनके सामने बैठकर उनका भजन सुनते थे । हम आखे से देखकर भी भगवान को देख नहीं पाते और सूरदास जी अंधे होकर भी देख लेते थे,

 

एक बार वो भजन कर रहे थे तो वो भावराग में खो गए जिसमें कृष्णजी, राधा जी के साथ नृत्य कर रहे थे और तभी राधा जी की एक पायल गिर गई तो सूरदास जी ने वो पायल उठा ली तो भगवान कृष्ण ने कहा कि सूरदास जी जब राधा जी अपनी पायल मागने आए, तो आप उनके पैर पकड लेना तो राधा जी जब पायल मागॅने आई, तो सूरदास जी ने पैर पकड लिए और कहा जब तक आप दोनों हमें दर्शन नहीं दोगें, मै पैर नहीं छोंडूगा, तो दोनो ने उन्हें दर्शन दिए और मन की आखें तो थी ही उनके पास उन्हें दृष्टि भी प्रदान की. और जब वो दर्शन देकर जाने लगी,

 

तो सूरदास जी ने कहा-  कि ये आखें तो ले जाओ. तब राधा जी ने कहा - कि आप  जन्म से अंधे हो अब आप को दुनिया नहीं देखनी, तो उन्हेांने कहा मैने आपको देख लिया अब मुझे कुछ नहीं देखना

 

कहने का तात्पर्य ये है कि हम आखो भी नहीं देख पा रहे और उन्होने अंधे होकर भी देख लिया जिसके भजन में जैसी ताकत होगी. बाके बिहारी वैसे ही प्रकट होगें, भजन की उम्र नहीं होती है तो जिसने बचपन में, जवानी मे भजन नहीं किया, वो कहे कि मै बुढापे में भजन करूगा.

 

तो भगवान भी कहते है कि जैसे तुम मुझे ये अपने जीवन का बचा हुआ समय दे रहे हो, वो भी अपने साथ वैसे ही करेगे. क्येांकि जो भक्त भगवान को जैसे भजता है भगवान भी उसको वैसा ही देते है और जब व्यक्ति का बुरा होता है तो भगवान को कोसता है । वो ये भूल जाता है, कि क्या हमनें भगवान का भजन किया था, पहले खुद से ही प्रश्न कर लो क्योकि जब तक वो व्यक्ति ये नहीं करेगा वेा बाके बिहारी कैसे आएगें । हरिदास जी थे जिन्होंने अपनी संगीत साधना से भगवान को प्रकट कर लिया था कैसे प्रकट कर लिया उनके भजन में शक्ति थी जैसे उन्होने वो राग गाया, और भगवान राधा जी के साथ प्रकट हो गए, तो हमें देखना है भजन में बहुत शक्ति है ।भजन को साधारण न समझें.

 

“राधे राधे”


Comments
2011-11-27 20:49:31 By Guru Ak Dubey

अति....सुन्दर ...........राधे राधे

2011-07-16 23:06:46 By Rajender Kumar Mehra

bahut sundar radhe radhe

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