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कण कण में भगवान

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें ।

“गोविंद के गुण गाईये गोपाल के गुण गाईये....”

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है - “कण कण में भगवान” तो ये जो दुनिया है वो भगवान का घर है जैसे एक मकडी होती है वो जहाँ भी रहती है । वहाँ जाल बनाती है । और एक समय के बाद खुद ही उसको खा लेती है । भगवान भी ऐसा ही करते है भगवान ही संसार को बनाते है और प्रलय करके उसाके समेट लेते है । वे हर जगह समाए हुए है । क्योंकि जब उन्होंने दुनिया बनाई है तो वो इससे बाहर क्यों रहेंगे वो तो हर कण में है बस हम उन्हें देखते कैसे है । हमनें अपनी आँखों में मोह की कपट की पटटी बाँध रखी है । जिससे वो हमें दिखाई नहीं देते है । हमें वो मोह की पटटी केा हटाना है । जब तक हम उस अंहकार को नहीं हटाएगें. तब तक वो हमें दिखाई नहीं देगें वो तो कण कण में है ।


प्रसंग १-
  एक राजा था उसका प्रश्न था कि भगवान कहा है जो ये बताएगा उसे ईनाम मिलेगा तो अगले दिन सारे  विद्वान आए उसके दरबार में पर कोई भी भगवान से नहीं मिला पाया. राजा को फिर एक दिन एक गरीब किसान आया जो बहुत बडा भक्त था भगवान का. वो आया और बोला कि राजा मै बताऊगाँ कि भगवान कहा है । पर मै जैसा बोलता हूँ आपको वैसा करना होगा.


तो वो कहता कि दूध का कटोरा लाओ फिर किसान राजा से कहता है - कि बताशा लाओ इस दूध को मीठा करना है । अब राजा ने अपने दासों से कहा जाओ बताशा लाओ फिर किसान ने उस बताशे को दूध में अच्छे से मिला दिया. और उसके बाद राजा को दूध पिलाया ओर उसके पहले भी पिलाया था तो राजा ने जब पहले पिया था तो वो कहता है कि पहले मीठा नहीं था और जब दूसरी बार पिया तो ये मीठा था. तो वो किसान कहता है कि राजा तुम ये बताशा बाहर निकालो तो राजा कहता कि ऐसा नहीं होता है वो तो उसमं घुल गया अब नहीं निकलेगा तो ऐसे ही भगवान है वो भी इस प्रकृति में समाए है अब तुम्हें कैसे पता चला कि दूध मीठा है । तुमने अनुभव किया तो भगवान भी खुद ही अपनी अनूभूति कराएगे । राजा तुम बता नहीं सकते कि ये मिठास है बस अनुभव कर सकते हो कि ये मिठास है । ऐसे ही भगवान है । जो उनको जानने का प्रयत्न करेगा उसी को उनकी अनूभूति होगी पर जो जानने  का प्रयत्न नहीं करेगा उसको कैसे पता चलेगा कि भगवान है । और देखने वाले चाहे आखे खुली हो या बंद हो वो तो देख लेते है ।

सूरदास जी तो जन्म से अंधे थे । पर जब वो भजन करते थे तो कृष्ण उनके सामने आकर बैठा करते थे वो आख ना होने पर पर भी बता देते थे कि आज भगवान ने कैसा श्रृगांर किया है । रोज यहीं नियम था उनका वो रोज मंदिर जाकर बताते थे कि आज भगवान ने केसे कपडे पहने है । तो लोगों को लगता था कि ये झूठ बोलते है । कि ये अंधे है । तो एक बार लोंगो ने पट खोले और भगवान का श्रृगांर नहीं किया और इनसे पूछाँ कि आज बताओ कि भगवान ने कैसा श्रृंगार किया है । तो वो कहते है कि आज तो भगवान ने कुछ पहना ही नही तो लोग कहते है । कि इनको कैसे पता चला.

प्रसंग 2- तो कहने का मतलब कि भगवान को देखने के लिए शरीर की आखें नहीं मन की आखे जरूरी है । जैसे प्रसंग २- कि एक बार का प्रसंग है कि एक भक्त थे एकनाथ जी तो गंगाजल भर कर काँवरियों के साथ रामेश्वरम जा रहे थे । तो रास्ते में एक व्यक्ति के पास एक गधा था तो वो थककर गिर गया और बीमार पड गया तो उस व्यक्ति ने सोचा कि अब ये मेरे किस काम का तो वो उसका तडपता छोड के आगे चला गया तो उस रास्ते मे से इनकी भक्त मंडली जा रही थी और गंगाजल भरकर ला रहे थे तो लोगों ने कहा कि ये गधा पडा है । लोग सहानभूति दिखाते पर कोई रूकता नहीं जब एकनाथ जी निकले तो उस गधे का सिर अपनी गोदी पर रखा और अपने काँवर से गंगाजल निकाल के उस गधे को पिलाने लगे तो इनके साथ वाले  कहने लगे कि उतनी दूर से भरकर ला रहे थे और रामेश्वरम तो बस आने ही वाला था और इन्हेंने गंगाजल इसे पिला दिया पर उन्हेंने किसी की ना सुनी और उसे पिला दिया और जब वो पीके उठा.

तो उसकी आखों मे साक्षात रामेश्वरम प्रकट हो गए और बोले धन्य हो भक्त एकनाथ तुम तो बुहत महान हो तुमने इस गधे के रूप में भी मुझे पहचान लिया । ये है एक भक्त कि नजर.भगवान किस रूप में आ जाये.कहाँ आ जाये.  

प्रसंग ३ - एक बार एक गाँव में पानी बरसा तो वहाँ बाढ आ गई तो सारे लोग जाने लगे तो एक व्यक्ति भगवान को बहुत मानता था कि मै नहीं जाउगाँ । मेरे भगवान पर मुझे भरोसा है वो आएगे तो  कुछ देर बाद कुछ लोग गाडी लेकर आए पर उस वयक्थ्ति ने चलने से मना कर दिया फिर कुछ देर बाद और पानी बढा तो कुछ लोग नाव लेकर आए, और उस व्यक्ति से कहा - कि तुम चलो पर उसने फिर मना कर दिया फिर वो व्यक्ति अपने मकान की सबसे उॅची मंजिल पर आ गया क्योंकि पानी पूरा भर चुका था तभी हवाई जहाज से कुछ लोग उसको लेने आए बोले कि भाई चलो पर वो नहीं मना. और साथ में नहीं गया ओर कुछ देर के बार पानी इतना बढ गया कि वो व्यक्ति डूब कर मर गया. तो जब वो उपर भगवान के पास गया और उसने कहा-  कि प्रभु सब लोग मुझे लेने आए पर मै नहीं गया क्योंकि मुझे  आप पर भरोसा था कि आप बचाने आआोगे पर आप क्यों नहीं आए आपने बचाया नहीं मुझे? तो भगवान कहते है - कि मै कितनी बार आया था पहले गाडी लेकर, फिर नाव लेकर फिर हवाई जहाज लेकर, पर तुम तो खुद ही नहीं माने तो ये तुम्हारी गलती है ।

तो भगवान किस रूप मे आएगे ये हमें नहीं मालूम तो भक्त कि एक बात गलत है वो है “दुराग्रह” इसका मतलब कि हम जैसा चाहते है भगवान को वैसा ही बनाना भक्तिी में दुरागृह नहीं होता है । आग्रह होना चाहिए, निवेदन होना चाहिए. इसलिए हमें ये ध्यान रखना है कि भतिी मे आग्रह हो.

प्रसंग ४- एक बार एक संत ने अपनी कुटिया में रोटी बनाई और एक कुत्ता आ गया तो वो रोटी ले गया तो वो उसके पीछे धी लेकर भागे कि इसमें धी लगा लो और फिर खाओ उन संत को कुत्ते में भगवान ही नजर आते है । कि प्रभु इसमें धी लगा लो तो भगवान साक्षात नहीं आते पर ना जाने कितने रूपों में आकर हमे दर्शन दे जाते है । क्योंकि हमने अंहकार कपट का पर्दा डाल रखा है । और जब हम इसको हटादेंगे वो बाकि बिहारी हमारे सामने होंगें ।

एक बार एक व्यक्ति ने बडे भाव से भगवान की तस्वीर बनाई और बोला कि भगवान आप मुझसे बात करो और रोन लगा. तभी बुलबुल चहकी पर उसने ध्यान नहीं दिया. फिर उसको गुस्सा आया और बोला कि भगवान मुझसे बात करो - तभी आकाश में बादल उमडने लगे, तो भी उसने ध्यान नहीं दिया. फिर गला फाड के कहा-  कि भगवान मेरे सामने आओ - तो बादल में छिपा वो सूरज सामने आया. पर उस व्यक्ति ने ध्यान नहीं दिया. फिर वो व्यक्ति चिल्लाकर बोला-  कि प्रभु कोई चमत्कार दिखाओ - तो तभी पास में एक बच्चे ने जन्म लिया तो उसके रोने की आवाज आने लगी पर उस व्यक्ति ने ध्यान नही दिया. अब तो वो कहने लगा - कि भगवान मेरा स्पर्श करो-  तो एक तितली आई और उसके हाथ पर बैठ गई तो उसने भगा दिया.

फिर वो बैठ गया. तो भगवान ने उसको हर बार दर्शन दिए पर समझ ही नहीं पाया. तो हमें दुराग्रह नहीं करना है । चीरहरण में भगवान ने क्यों गोपियों के वस्त्र उठाए और उपर चढ गए अगर हम आध्यात्म में दृष्टिी से देंखे तो गोपी रूपी भक्त जब यमुना जी में जाता है । तो कपट रूपी वस्त्र किनारे में ही छोड जाता है । भगवान उनको उठा लेते है । क्योंकि जब ये यमंना से बाहर निकलेगा तो ये फिर कपट रूपी कपडे पहन ना ले तो ये कपट ही पर्दा है । भक्त और भगवान के बीच तो अगर हम नहीं हटाते तो भगवान इसे खुद ही हटा लेते है । वो तो हर जगह है । चाहे कोई भी प्राणी हो। 


“राधे-राधे”  

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