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चरित्र

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से आईये, हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें.

 

“ राधे-गोपाला, गिरधर-गोपाला, गेापी-गोपाला, प्यारो , नंदलाला...... “ 

 

आज के हमारे सतसंग का विषय है “चरित्र” , इसका अर्थ हम सरल शब्दों में समझना चाहे तो इसका सीधा सा अर्थ गुण से है । गुणों से ही चरित्र का निर्माण होता है । हम देखते है इस दुनिया में यश कीर्ति या जो नाम पाने की ख्वाहिश है. वो चाहे कोई छोटा हो, या बडा हो, गरीब हो, अमीर हो, सबकी ख्वाहिश हैयश हो, कि वो नाम कमाए अब इन सबको पाने के लिए लोग अलग अलग रास्ते अपनाते है कुछ लोग तो बदनामी से भी नाम कमाते है । पंरतु इस जीवन में नाम वहीं है जो सतगुणों से कमाया जाए, यू तो नाम कमाना कोई बडी बात नहीं है. पर हमारा तरीका क्या है ये मायने रखता है । नाम ख्याति, यश हमने कैसे कमाया, ये मायने रखता है । व्यक्ति तरीका जरूर गलत अपना लेता पर बाद में उसकी कीमत भी चुकाता है । नाम वहीं है जब तक हम जिए उसके जीते जी और व्यक्ति जब मर जाता है । उसके बाद भी वो लोगों के दिलों में याद बनकर जिन्दा रहे. नाम तो वही है.

 

रावण ने भी ख्याति और यश कमाया, और भगवान राम को भी सब जानते है और रावण को भी, पर  दोनों में अंतर है, राम के पास नाम है, और रावण के पास भी, रावण ने बदनामी से कमाया जो किसी काम का नहीं, रावण का नाम कोई अच्छे शब्दों में नहीं लेता. बुराई का नाम रावण है । दशहरा पर हम सब उसे जलाते है । बुराई का प्रतीक माना गया क्यों? क्योकि उसने सदगुण की जगह, दुर्गण अपना लिए और जिसने दुर्गण अपना लिए उसका चरित्र निर्माण नहीं हो सकता क्योंकि चरित्र का मतलब ही सदगुण से ही व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है ।

 

कुछ लोग भगवान राम को आम व्यक्ति ही मानते है । अगर वो आम व्यक्ति भी थे, तो आम से वो खास कैसे हुए, अपने सदगुणों के कारण, उनमें सदगुण भरे हुए थे, और वो उनके गुण से ही खास बनें. तुलसी दास ने “रामचरित्रमानस” में क्येां, “चरित्र” शब्द लिखा, क्योकि कि उन्हीं का चरित्र होता है जिनके पास सदगुण होता है । हर व्यक्ति के नाम के साथ चरित्र नही जोडा जाता. कुछ व्यक्तियों के साथ ही चरित्र शव्द जोड़ा जाता है.कहते है न “भक्त चरित्र” , तो जो भगवान राम थे उन्होंने ने जन-जन का भरोसा कैसे कमाया था अपने आचरण से, गुणों से, भगवान राम में सोलह गुण थे. शांत स्वभाव के धनी  थे, तभी वो आज भी पूजे जाते है ।

 

अगर हम उनका जीवन देखें तो आम व्यक्ति की तरह ही उन्होंने  अपना जीवन बिताया उन्होंने  कोई चमत्कार नहीं दिखाया. अपने धर्म पर वो चले, अपने आचरण से उन्होंने अपने “रूप से” मिथला को जीता, “बल से” लंका को जीता, “शील स्वभाव से” अयोध्या के लोगों को जीता. एक होता है चरण और एक होता है-आचरण, हम चरण किसके कहते है - भगवान के चरण हम भगवान के कहते है राम के चरण, गिरिधर गोपाल के चरण,  में आम व्यक्ति के लिए चरण शब्द उपयोग नहीं करते है । संत महापुरूष या भगवान के श्री चरण हम सब के तो पैर होते है । जैसे चरित्र शब्द कुछ खास व्यक्ति के लिए आता है वेसे ही चरण शब्द कुछ खास लोंगो के लिए ही आता है । क्योंकि उनका आचरण और जिसका आचरण सही होता है । वहीं चरित्र शब्द का अधिकारी होता है

 

प्रसंग १. - एक व्यक्ति था वो दयानंद जी का शिष्य था. एक समय उनका स्वर्गवास हो गया, तो वो बहुत विख्यात थे, सब उन्हें सब जानते थे उन शिष्यों में बडा था, स्वभाव में उन्हीं की तरह था, उनके आश्रम में एक बार एक व्यक्ति आया और कहने लगा - कि स्वामी दयानंद जी इतने महान थे कि उनका तो चरित्र लिखा जाना चाहिए आप कुछ लिखिए उनका तो पूरा एक ग्रंथ बन जाएगा.

 

तो वो शिष्य कहता है-  कि हाँ मैने लिखना तो शुरू कर दिया है और मै कोशिश कर रहा हूँ. तो वो व्यक्ति कहता है कि आप जो लिख रहे है ये कब तक पूरा हो जाएगा? कब इसका प्रकाशन होगा? ताकि हम लोग पढ सकें, तो वो शिष्य कहता है कि मै उनका चरित्र किसी कागज पर नहीं लिख रहा हूँ. आप ये मत समझना कि मै कागज पर  लिख रहा हूँ । मै अपने जीवन में लिख रहा हूँ ,और उनका चरित्र उतारना भी शुरू कर दिया है ।मै अपने अंदर, अपने जीवन में उनका चरित्र लिख रहा हॅू । क्योकि वो किसी कागज पर तो लिखा ही जाएगा, वो हम सबके जीवन में हो, तब तो हम उनके जैसे बन पायेगे.  उनका चरित्र ही तो हमें बता रहा है कि हमें उनकी राह पर चलना है उन्होंने अपना चरित्र निमार्ण कैसे किया. अपने गुणों से, सदगुणों सें, क्योकि गुणों के बिना चरित्र का कोई अर्थ नहीं है । तो चरित्र होता है हमारे व्यवहार से, आचरण से, जैसा हमारा आचरण होगा, वैसे ही हम बन जाएगें. आचरण और सदगुण ये दो चीजें अहम भूमिका निभाती है ।

 

प्रसंग २. - रामायण का प्रसंग है जब भगवान राम शिक्षा पूरी करके आए तो एक बार विश्वामित्र महल में आये. विश्वामित्र जी ने कहा - कि राजा दशरथ! राक्षस हमें परेशान कर रहे है, तो आप कुछ समय के लिए हमें अपने पुत्र दे दीजिए, राम और लक्ष्मण. फिर उनको लेकर वो वन को गए, कि राम ये राक्षस हमें परेशान करते है । और उन्हे मारकर राम जी ने उनका यज्ञ पूरा करवाया.

 

इसके बाद अहिल्या का प्रसंग आता है । जब रास्ते से भगवान राम लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र जा रहे थे. तो एक उजडा हुआ आश्रम था, और एक तुलसी का पौधा देखा, तो उन्होंने पूछा - कि गुरूजी ये पौधा यहाँ क्या कर रहा है ।तो उन्होंने कहा कि राम यहाँ कोई है जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है. तुम आगें चलों मै तुम्हें सब बताता हूँ, ये गौतम ऋषि का आश्रम है, उनकी पत्नी अहिल्या थी, एक बार इन्द्र यहाँ आया था और उसके छल के कारण उन्होंने अपनी पत्निी को श्राप दिया, और वे पत्थर बन गई, और  वो आज भी पत्थर की है । तुम इसे स्पर्श करो, तो राम उसे पैर से छूते है, और वो अपने रूप में आ जाती है.

 

यहाँ राम ये बता रहे है कि पवित्र आचरण के छूने से जड भी चेतन हो जाता है । वो मरे को भी जिंदा कर सकता है । तो राम जी का आचरण इतना पवित्र था कि जड अहिल्या भी चेतन अवस्था में आ गई. व्यक्ति का आचरण अगर पवित्र है तो उसके छूने मात्र से जड भी चेतन हो जाता है । इस कहानी से भगवान राम हमें बता रहे कि आचरण इतना पवित्र रखो कि हम मरे हुए को जीवित कर सके. एक जड को चेतन कर सकें.

राम जी तो इतने महान थे कि वो रावण को भी क्षमा करने को तैयार थे. क्योकि क्षमावान होना भी एक गुण है ।जब भगवान ने अहिल्या का उद्धार किया, तब विश्वामित्र जी कहते है -  कि जब गौतम ऋषि ने अपनी पत्निी को श्राप दिया-  कि जाओ तुम पत्थर की हो जाओ! तो “किसी पर आरोप लगा कर सजा देना तो आसान है, हर कोई कर सकता है, पर जो गिरे हुए को उठा लेता है, ऐसे लोग बिरले ही होते है” तुम उनमें से एक हो. वास्तव में भगवान राम भगवान पहले इंसान ही थे, बाद में भगवान अपने गुणों के कारण भगवान बनें. लोग उन्हें पूजनें लगें.

 

तो कहने का अभिप्राय है कि चरित्र निर्माण व्यक्ति को हर जगह काम में आता है । व्यक्ति चाहे अध्यात्म में हो, संसार में हो, या अपने काम में हो, अगर उसमें थोडे से भी सदगुण हो, तो आम से संत बन जाता है और ये सदगुण ही व्यक्ति को उपर उठाते है । हम कहते है कि राम चरित्र मानस भक्त चरित्र तो इसमें ये चरित्र शब्द क्यों आया उनके पास वो सदगुण है ओर जब ये सदगुण आ जाते है तो व्यक्ति भगवान की ओर बढने लगता है । भगवान राम ने कभी कोई ज्यादा बात नहीं की, कोई शिक्षा नहीं दी, कृष्ण ने गीता उपदेश दिया पर दोनों की अपनी अलग भूमिका है. भगवान कृष्ण ने कहा -कि गीता को सुनो और इस पर चलो. पर राम जी ने अपने जीवन से सिखाया कि जो मै कर रहा हूँ . वो करो इसलिए वो कभी नहीं बोले क्योकि उनका जीवन ही शिक्षाप्रद है. वो भगवान थे फिर भी उन्होंने कितने दुख उठाए.

 

लोग कहते है वो इंसान होते, तो हमार दुख जानते है तो राम अवतार में उन्होंने ये सिद्ध किया है पर, अपने आचरण को कभी नहीं छोडा, वाणी जिससे उन्होंने परशुराम को जीत लिया था. सीता जी के स्वयंबर में धनुष तोडा था, धनुष परशुराम जी का था, तो वो क्रोध में आ गए, सब ने उन्हें शांत करने की कोशिश की. लक्ष्मण जी से तो उनका युद्ध शुरू होने वाला था, वे बोल पडे, राम जी ने उन्हें अपने शील स्वभाव से जीता. वो चाहते तो युद्ध कर सकते थे, वो तो त्रिलोक को जीतने वाले है पर हर जगह युद्ध नहीं शील स्वभाव चरित्र ही काम में आता है । हर जगह क्रोध काम में नहीं आता. जो बात क्रोध से नहीं बनती है वो प्रेम और शांति से बनती है. ये बात राम जी सिखा रहे है ।

 

भगवान कृष्ण महा भारत में अंत में शांतिदूत बन के गए थे, क्यों ? उन्होंने प्रेम की बोली,क्यों ? वो चाहते तो दो दिन में ही महाभारत खत्म कर सकते है । क्यो? प्रेम की वाणी बोली. क्योकि वो उनके चरित्र, आचरण को प्रदर्शित करती है. शांति हमें किसी भी मूल्य पर मिले और वहीं सबसे बड़ी है वही व्यक्ति चरित्रवान है जिसके पास क्षमा है। लेकिन वो दुयोंधन की बुद्धि थी-  “कि विनाश काले, विपरीत बुद्धि” जो भगवान के समझाने से भी वो नहीं समझा. वो क्यों हारा? क्योकि वो अपने सदगुण खो चुका था.

 

जो बडों के प्रति आदर था जब उसने ये सारी चीजें खोई तभी उसकी मृत्यु हो गई, मर तो वो उसी दिन गया था जिस दिन चीरहरण हुआ था द्रोपदी का, उसने भरी सभा में किसी का मान नहीं रखा. बडों का मान नहीं रखा और जब-जब व्यक्ति ने अपना आचरण बदला है ।वह बर्बाद हो गया तो व्यक्ति का चरित्र बहुत मायने रखता है । चरित्र हमें जीवन सिखाता है कि हमें कैसे जीना है.

 

“राधे राधे“

 

 

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