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न्याय-अन्याय

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राधे-राधे, आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गए


“राधे-राधे-राधे-राधे गोविंदा, श्री राधे-गोविंद भजो, राधे गोविंदा ........”

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “न्याय और अन्याय” तो सबसे पहले तो न्याय क्या है । तो जो काम हम धर्म के अनुसार करे तो वो न्याय, और जो उसके विपरीत करके तो वो अन्याय. ये सीधा सा अर्थ है । जो काम हम धर्म के पक्ष को लेकर करते है वो न्याय है.

धर्म एक तुला है जिस पर व्यक्ति को हर चीज तौलनी होती है । और अगर व्यक्ति इसके विपरीत जा रहा है तो वो जिसके लिये है उससे अन्याय कर रहा है । जैसे पुराने समय में राजा होते थे तो पहले ये था कि एक राज्य का राजा था ओर उसके अधीन छोटे शहर गाँव रहते थे, तो उस राजा का ये दायित्व था कि जितने भी लोग वहाँ रहते है । उनके प्रति अन्याय ना हो क्योंकि वो जो कुर्सी है, सिंहासन है, उस पर बैठा व्यक्ति आम नहीं है वो धर्म की कुर्सी पर बैठा है । और अगर वो उसके विपरीत काम करता है तो वो अपना और सब का भष्ट कर देगा ।

प्रसंग १- महाभारत के समय में राजा भरत जब कुरूवंश् में आए तो पहले नियम था कि राजा का बेटा ही सिंहासंन पर बैठेगा तो राजा भरत न्याय प्रिय थे उनको लगा कि मेरा पुत्र गददी देने की बात आई तो मंत्री ने कहा - कि आप किसे अपना उत्तराधिकरी बनाएगे.

तो वो बोले - कि मेरे किसी भी पुत्र में वो योग्यता नहीं कि वो राजा की गददी पर बैठे. तो एक ऋषि को पुत्र को उन्ह्कोने सिंहासन पर बिठाया. जो उस गद्दी पर बैठकर न्याय नहीं कर सकता तो उसे उस गद्दी पर बैठने का अधिकार नहीं है. तो राजनीति बिना न्याय के नहीं चलती. इसमें तीन चीजें है – “धर्म” “नियम” “व्यवस्था” इनके बिना ना ये न्याय चल सकता है और ना वो कुर्सी ।

तो आज के युग में राजनीति के नियम है क्योंकि अगर नियम ना हो तो हर व्यक्ति मन चाहा काम करेगा सारी व्यवस्थाएँ भंग हो जाएगी नियम में रहना हर व्यक्ति को बहुत जरूरी है । क्योंकि अगर नियम ना हो तो व्यक्ति के जीवन का पतन हो जाए. अगर स्त्री कोई नियम ना मानें तो वो व्याभिचारिणी हो जाए, पता नहीं किस-किस के साथ रहे. पर ये धर्म है उसके कि उसका पति ही सबकुछ उसके लिए तो ये व्यवस्था बनाई गई है. और इसी का नाम धर्म है ।

ये सिर्फ राजा के लिए नहीं है बल्कि हर व्यक्ति के लिए है । कोई व्यक्ति परिवार का सदस्य है और मुखिया है जो उसको् नियम में रहना जरूरी है क्योंकि उसे पिता बनकर नहीं धर्म की कुर्सी पर बैठकर  निर्णय लेना पडता है । जब उसका अपना ही पुत्र धर्म पर नहीं चलेगा तो उसको दंड न्याय की दुष्टिी से मिलना चाहिए पर अगर वो व्यक्ति पिता की दृष्टिी से देखेगा तो कभी न्याय नहीं कर पाएगा तो उसके धर्म की कुर्सी पर बैठकर सबको एक-सा देखना होगा बहुत सारे लोग है उसके चार पाँच पुत्र है उनमें से एक चोरी करता है और पिता छुपाता है तो वो खुद के साथ और परिवार के साथ अन्याय का रहा है । उसे उस समय पिता नहीं बनना है उसके धर्म के सिहासंन पर बैठना है उसके देखना कि बेटा अधर्म कर रहा है । और जो छिपा रहा है तो उसका पतन निश्चत है । वो धर्म के अनुसार न्याय करें ।


प्रसंग 2-
राम चंद्र जी बहुत न्याय प्रिय थे उनका प्रसंग बहुत अच्छा था लोग कहते थे कि राम राज्य में अन्याय नहीं होता था. किसी का जब राम जी अयोध्या वापिस आकर राजा बने थे तो एक कुत्ता आया रो रहा था राम जी के पास तो वो कहता कि मुझे न्याय दो तो वो उनसे कहता कि एक व्यक्ति ने मेरे साथ अन्याय किया. मेरे उपर पत्थर मारा. और मुझे खुन निकल आया और मै चल भी नहीं पा रहा हूँ  तो राम जी ने उस व्यक्ति को बुलाया और कहा - कि क्या तुमने इसको पत्थर मारा?


तो वो बोला - कि हाँ जब मै जा रहा था तो ये भौकनें लगा और चुप ही नहीं हो रहा था तो मैने पत्थर मारा तब कुत्ता बोला राम जी सें कि अब आप न्याय करो तो इसमें में साफ बात है कि गलती तो कुत्ते की है । तो वो उस कुत्ते से कहते है कि इसने तुम्हारा अपराध किया है जानवर में तो बुद्वि नहीं रहती पर इंसान में तो रहती है उसको पता है कि कुत्तों का तो काम ही भोंकना है ।  

तो वो कुत्ते से बोले -कि तुम बोलो क्या चाहते हो. 

तो वो बोला - कि आप इसे मठाधीस बना दो. तो राम जी बोले-  क्या इसने तो तम्हें पत्थर मारा इसे तो सजा मिलनी चाहिये फिर मठाधीश क्यों बनाऊ. 


तो वो कुत्ता कहता-  कि राजा मै पिछले जन्म में मठाधीश था और मै दान की वस्तु को अपने निजी कामों में उपयोग किया. तो दान की वस्तु अपने आप रखना धर्म के विपरीत है । तो उसके कारण में  कुत्ता बना तो इसको वहा पर बिठाओ कि मठ में जितने लोगे होंगे वो धर्म में व्यवस्थ में रहेंगे क्योंकि धर्म न्याय से बढकर कोई चीज नहीं है ।

तो वो कहते - कि राम आप धन्य है कि आप के राज्य में कुत्ते की भी सुनी जाती है । राजा राम अपने राज्य का छिपकर भ्रमण करते थे कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते है और जब एक दिन एक व्यक्ति ने कहा कि राम ने सीता जी को अपना लिया जो रावण के पास रहकर आई थी तो राम उस वक्त न्याय की कुर्सी पर बैठे थे उन्हेंने सीता जी को भी त्याग दिया. वो उस समय पति नहीं, बेटे नही थे, वो प्रजा के मालिक थे उन्हेंने पत्निी को त्यागा, पर धर्म को नहीं, वो युग आज भी है.

आज उसका नाम बदल गया, राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है । उसमें से धर्म और व्यवस्था हट जाए तो वो बुरी है जो वयक्ति उस पर बैठा है वो सारी प्रजा के साथ न्याय करे । व्यक्ति कुर्सी के लिए ही लड रहा है व्यक्ति ये भूल जाता है कि मै उस पर बैठने के लायक है कि नहीं लोग उचीँ कुर्सी पर बैठने को तैयार है. हर आफिस में वो चाहते है कि सब उनके अधीन काम करें. इन सब पर बैठने वाला व्यक्ति ये कभी नहीं सोचता कि वो इसके लायक नहीं है. उसको परिवार की कुर्सी पर बैठकर धर्म के अनुसार न्याय करना चाहिए. जैसे भगवान राम ने किया उसे पिता पति बनकर नहीं रहना है ।


तक के युग में और अब के युग में क्या अंतर है.उस युग में लोग पाप करके छिपाते नही थे. वो जानते थे कि ये करकर मै खुद के प्रति अन्याय कर रहा हूँ । आज के युग में लोग पाप करते है और उसको छिपाते है ।


प्रसंग ३-
महाभारत में राजा पांडु जब वो राजा बने तो वो वन में गए अपनी रानियों के साथ तो षिकार करने गए थे तो राजा ने बाण मारा वो धोखे से ऋषि को लगा. और वो ऋषि मर गए. तो जब राजा वापिस आए हस्तिानापुर आये, तो वो चाहते तो वो छिपा सकते थे. ये बात पर उन्होने पूरे राज्य मंत्रियों से बोला - कि मुझसे पाप हुआ है.


तब सबने कहा-  कि आपने जान बूझकर नहीं मारा, अपने हिरण के भ्रम में उनको मार दिया तो पांडु ने कहा - कि भले ही अनजाने में किया, पर पाप तो पाप ही है. जैसे अग्नि में कोई वस्तु डालो, तो वो जलाएगी ही उसका काम ही जलाना है । अगर केाई काम हो गया तो वो अपना असर दिखाएगा तो वो उन्हेंनें तुरत सिहासंन छोड दिया.

वो राज्य अपने छोटे भाई केा देकर वन चले गए तो अब भी वहीं राज्य है आज प्रधान मंत्री है । व्यक्ति पाप करके दूसरों से तो छिपा लेता पर वो खुद के प्रति अन्याय करता है । क्योंकि उसी को भोगना वो अपना और परिवार का पतन कर रहे है । बेटे ने अगर गलती की है तो पहले उसे देश निकाला दे देते है तो वहा मोह नहीं रहता है वो पिता नहीं वहाँ वो न्यायधीश है । तो करने से पहले व्यक्ति धर्म के नियम को अपने पर तौले फिर करे. पर वो अगर ऐसा नहीं करता तो वो अधर्म करता है और बाद में वो ही भोगता है क्योंकि कर्म तो उसी ने किया है यहीं प्रकृति का नियम है । प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग ४- महाभारत में राजा युध्ष्ठिर थे तो वो राजा बनने वाले थे. तो दरबार में चार लोगों को लाया गया और मंत्री ने कहा - कि इन चार लोगों ने मिलकर एक व्यक्ति की हत्या की है । तो राजा आप न्याय करो.


तो दुर्योधन कहता है कि इनकेा मौत की सजा दो तो जब सबने राजा से पूछा तो युध्ष्ठिर ने कहा - कि इन चारों के परिचय दो तो एक बोला मै बाह्रमण हॅ, दूसरा बोला मै क्षत्रिय हूँ, तीसरा बोला मै वैश्य हॅ, चोथा बोला मै शूद्व हूँ ।

तो युध्ष्ठिर बोले - कि शुद्व को तीन महीने की सजा दो, वैश्य को छ महीने की सजा दो, क्षत्रिय को जीवन भर कैद करो,

तो सबने कहा राजा अपराध सबने करा पर सजा अलग-अलग क्यों ?

बोले - कि शुद् केा तो शास्त्रों का ज्ञान नहीं था, पर इसने गलत किया तो सजा मिलेगी, ये नीच जाति का है, दूसरा वैष्य है इसने भी बुद्वि नहीं लगाई पर इसके थोडा ज्ञान है, और क्षत्रिय को तो सबसे ज्यादा सजा मिलेगी क्योंकि ये तो धर्म का रक्षक है और ज्ञान भी है. और ऐसे ही बाह्रमण उसको तो सारे धर्म का पता है, उसके पास तो ज्ञान भी है, कि न्याय और अनीति क्या है. तो उसे भी सजा मिलेगी सबकुछ जानकर वो ये काम करता है. उसके भी सजा मिलेगी.

तो सब ने कहा -कि राजा क्या न्याय किया. अगर राजा न्याय प्रिय ना हो तो राज्य का विनाष हो जाएगा. जैसे राजा धुतराष्ट को पता था कि दुर्योंध राजा बनने के लायक नहीं था वो धर्म के मार्ग पर चलता नहीं था और अंत में सारे कौरव मारे गए और पांडव ही बचे क्यों वो धर्म पर चले और न्याय के साथ रहे.

राम जी के राज्य में राम और भरत लडते थे. पर एक अंतर था भरत कहते थे कि राम राजा बने और राम कहते थे कि भरत बने पर आज इसलिए लडते है कि ये मुझे मिल जाए उसे ना मिले लोग ये क्यों भूल जाते है कि जिस व्यक्ति को कुर्सी पर बिठा रहे है वो उसको उत्तराधिकरी नहीं है । जो उसकों चला ना सके लोग लडते है वो भूल जाते है कि वो न्याय कर पाएगें की नहीं लोग ये भूल रहे है कि जो वो कर रहे है उस की सजा उन्हीं को मिलेगी लोग कहते है कि सामने वाला गलत कर रहा है तों मै क्यों नही तो क्या वो कुए में गिरेगा तो तुम भी जाओगे.

लोग कहते है कि हमारे अकेले करने क्या होगा पर एक से ही शुरूआत होती है एक अच्छा काम करेगा तो उसको देखकर चार भी करेंगे तो लोग सहनषीलता सीखें न्याय से कि हमें क्या करना है हमेषा धर्म केा अपनाना है । उसे राजा राम जैसा न्याय करना है उसके लिए उसाक परिवार प्रजा है ।

                                                                “राधे-राधे”

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