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चिंतन

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से, आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे, सब मेरे साथ गाये..

 

“श्यामा-श्याम, श्यामा-श्याम श्यामा-श्याम कहिए, वृंदावन-वृंदावन-वृंदावन रहिए........

 

आज के हमारे सतसंग का विषय है “चिंतन” है जब हम शांति से बैठकर कुछ सोचते है। वहीं चितंन है जो हमारे अंदर चल रहा है। वास्तव में चितंन तो वहीं सही है । जो हमें भगवान के पास ले जाए क्योकि  जब मन भगवान का चितंन करेगा, तो सही मायनों में वहीं सही काम है। और बाकि ये जो चितंन हैं । सब व्यर्थ है, ऐसा चितंन जो सही अर्थो में है, ऐसा चितंन उद्धव जी ने गोपियों में देखा था जब वे उनसे मिले भगवान का संदेश लेकर वृदांवन गए तो यमुना तट पर गोपियों को देखा उनका चितंन इतना गहरा कि उन्हें न तो खाने की सुध, न नहाने-धोने की सुध, कब सुबह हो गई, कब शाम हो गई, उन्हें पता ही नहीं.

 

ऐसा कृष्ण का चितंन तो जब ऐसा चितंन होता है भगवान का तो वो भक्त के पीछे पीछे चलते है । उन्हें बुलाना नहीं पडता, वो भक्तों के पीछे दौडते है और उनके चरणों की रज अपने मस्तक में लगा लेते है । भगवान कृष्ण ग्यारह वर्ष की उम्र में ही वृदांवन से मथुरा चले गए थे, पर एक पल के लिए भी गोपियों का चिंतन नहीं छुटा, गोपियों की याद में वो बसे रहे, ऐसा नहीं कि कृष्ण उन्हें भूल गए वो भी उनका चिंतन करते रहे है उनकी रानियों को भी पता था. सोलह हजार एक सौ आठ पटरानिया में से  सबसे ज्यादा वो राधा रानी और गोपियों को ही चाहते थे.

 

जब रूकमणी जी ने उनसे पूछा तो उनका एक ही जवाब था, कि राधा रानी सिर्फ मेरा ही चिंतन करती है गोपिया सिर्फ मेरा ही चितंन करती है उन्हें और कुछ सुध ही नहीं है । अब तुम बताओ कि कोई मेरा ऐसे चितंन करे तो मै कैसे उसका चितंन न करू । मै भी वहीं करता हॅू, तो भगवान कहते है कि जो भक्त जैसे भजता है वो भी उसे वैसे ही याद करते है । तो जितना चितंन गोपिया भगवान का करती है। उतना वो भी करते है ।

 

और हम तो बस संसार का ही चिंतन करते है । हमें भवरोग लगा है, जिससे हम भगवान से दूर हो गए है संसार में कोई भी सच्चा प्रेम करने वाला नहीं,  प्रेम यदि हो सकता है तो वो केवल कृष्ण से, ये संसार तो एक समुद्र के जैसा है । मोह का समुद्र जिसमें हम डूबते जा रहे है । किनारा हमें पता नहीं है  वासनाओं की लहरें उठती रहती है, जो हमें पटक पटककर गिरा देती है और हमे नचाती है और हम उन्हीं के इशारों पर नाचतें है । और बस ऐसे ही हमारा पूरा जीवन निकल जाता है तो हमें प्रभु का चितंन करना है । ये चितंन की डोर बडी मजबूत होती है.  ये सोच ही भगवान को प्रकट करती है ।

 

उदाहरण १. - जैसे एक कछुआ होता है तो वो मादा कछुआ नदी के किनारे अंडे देती है, और  कछुआ वापिस समुद्र में चली जाता है और वापिस देखने नहीं आता है फिर समुद्र में उसका चितंन चलता है कि मेरे अंडे बढ रहे होगें उसकी चिंतन की गर्माहट से अंडें में से बच्चे निकलते है ये ताकत है चितंन की. सिर्फ वह सोचती रहती है अंडों बारे में और उसी गर्मी से बच्चे बाहर आ जाते है ।

 

उदाहरण २ . - चंद्रमा आकाश में रहता है और कुमदनी का फूल जल में होती है और वो उसे देखकर ही खिल जाती है वो कोसों दूर है चंद्रमा से, समुद्र  पर क्यों वो खिल जाती है क्योंकि उसका चितंन है चद्रंमा के प्रति, तो वो दोनो को पास ले आता है ऐसे ही जब हमारा प्रभु के प्रति चितंन होगा तो वो भी हमें उनके पास ले जाएगा, हमें भगवान तक जाने की जरूरत नहीं है उन्हीं का चितंन करना है ।

 

उदाहरण ३ . - विदुरानी का चितंन, वो भगवान को दिन रात याद किया करती थी कि कभी तो वो आए और वो दिन भी आया, जब भगवान दुर्योधन के छप्पन मेवा त्याग कर विदुरानी के घर गए और केले के छिलके खाए तो कैसे पता चला भगवान को, कि वो उनसे इतना प्रेम करती है केवल चितंन से, क्योंकि जितना चितंन वे भगवान का करती थी उतना ही वो भी उसका करते थे । तो ये चितंन की डोर बडी मजबूत होती है ओर हमें यहीं पकडनी है ।

 

उदाहरण ४ . - माता शबरी का चितंन, वन में अपने आश्रम में रहती थी भगवान पता लगाते हुए आ गए क्यों? क्योंकि उसकी पूरी उम्र भगवान के चितंन में बीत गई, सोलह वर्ष की उम्र में मंतग-मुनि ने शबरी से कहा था कि मेरी तो आयु पूरी हो गई, मै अपने जीवन में भगवान के दर्शन नहीं कर पाया ,पर तुम जरूर करोगी फिर शबरी ने ये नहीं पूछा - कि भगवान कब मिलेंगे? बस उसी पल से उनका चितंन शुरू हो गया और वो चितंन, एक दिन नहीं, एक पल नहीं, वो पूरी उम्र चलता रहा. शबरी बूढी हो गई. जवान से, पर वो चितंन खत्म नहीं हुआ. भगवान का चितंन रहता और उसका प्रभाव ताकत देखिए, कि भगवान राम शबरी का पता पूछते हुए उसके आश्रम पहुच गए ,शबरी जी कही नहीं गई, भगवान खुद पता लगा के गए.

 

तो भगवान हमें क्या बता रहे है कि अगर शबरी जैसा चितंन हो हमारा, अगर भक्त का शबरी की तरह चितंन हो तो उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं, वो तो बस एक जगह बैठा रहे मै ही उसके पास पहुच जाउगा, ये चितंन का प्रभाव है.

 

इस दुनिया का चितंन करने से सिवाय दुख के कुछ भी हाथ नहीं आएगा. जहा-जहा ये मन जाता है हम इस मन के कहने में चले जाते है, और अंत में दुख ही हाथ लगता है । क्योंकि उसमें संसार की कामनाए इच्छाए बंधी रहती है । और जब वो कामनाए पूरी नहीं होती, तो व्यक्ति का क्रोध जाग जाएगा दुख होता है, उसके अलावा कुछ भी हाथ में नहीं आएगा, तो फिर हम उसका चितंन क्यों करे जो शाश्वत  ही नहीं है, चितंन तो उसका हो जो शाश्वत हो, जो निरंतर है , वास्तव में प्रभु का चितंन ही व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए.

 

गोस्वामी जी ने कहा है - कि प्रभु हम तो नरक में भी जी लेंगे, बस प्रभु अपनी याद बनाए रखना क्योंकि उस चितंन से वो नरक भी हमें नरक नहीं लगेगा, चितंन से वो नरक भी हमें अच्छा लगेगा क्योंकि हमें वहा भी आपका चितंन मिलेगा.

 

वो यही कह रहे है कि प्रभु नरक में भी हम तेरी याद में जीतें रहेगें कयोंकि वहा आप नहीं हो पर आपका चितंन है. भक्त के लिए भगवान का चितंन ही सबकुछ है । भगवान दर्शन दे या न दें, हनुमान जी का चिंता देखिये, जब राम जी अपने धाम को गए तब हनुमान जी ने पूछा कि भगवन क्या वहा आपका नाम, कथा है? तो राम जी ने कहा – नहीं, वहा तो भक्त मुझ में ही समा जाता है । ये तो सिर्फ इस मृत्युलोक में है तो हनुमानजी ने जाने से मना कर दिया कि आप है वहा, पर आपकी याद नहीं है आपका नाम भक्ति इस पृथ्वी पर ही है । आपका चितंन तो मै इस धरती को छोडकर नहीं जाउगा, तो उन्हें भगवान ने वरदान दिया था कि वे चारों युगों में रहेगें यहा बैठकर वो चितंन करते है भगवान का.

 

उदाहरण ५  . - जैसे एक पतंग होती है उसमें एक डोर लगी हुई होती है, जो उसे जोडे हुए होती है । बस ऐसे ही हमें करना है ये जो डोरी है । ये ही तो चितंन की डोरी है । ये चितंन की डोर हमें भगवान से जोडे रखती है इसलिए हर व्यक्ति को सत्संग करना चाहिए. क्योकि चितंन सत्संग से ही आता है । जहा भगवान की चर्चा सकींर्तन होता है. वहा भगवान याद आ जाते है ।

 

तो केवल चितंन ही व्यक्ति करे और कुछ न करें, भगवान का चितंन तो ये ही उसे आध्यात्म के पथ पर बहुत आगें ले जाएगा. और अगर के संसार के काम भी है, जो कर्तव्य है, उनमें भी व्यक्ति अगर सही चितंन करे, तो अपने लक्ष्य को संसार में और आध्यात्म में भी पाता है । आध्यात्म जो है वो एकांत में होता है भीड में चितंन नहीं होता है । बडे-बडे राजा थे, जिनके पास करोडों की सम्पत्ति थी, उन्हेांनें वो सब छोडा और अतं में चितंन करने गए उन्होनें क्यों नहीं अपने राज्य में रहकर चितंन किया? वो वन में क्यों गए, क्योंकि वहा एकांत है और चितंन भीड का मामला नहीं है  । वो एंकात का चितंन ही वैराग्य लाता है । और जब व्यक्ति को वो वैराग्य और भक्ति मिल जाता है, तो उसे भगवान से मिलने से कोई नहीं रोक सकता है । बस जरूरत है उसे,तो भगवन को याद करने की.

 

और जब व्यक्ति एंकात में होता है । उसे सोचना चाहिए कि हमारे मन में क्या चल रहा है। अगर मन, संसार में जा रहा है, या भगवान में, तो उसे देखो कि कैसे हम इसे संसार से अलग करके भगवान में लगा सकते है । उनकी कथाये सुनना, नाम सुनना, क्योंकि सुनने से, भगवान की कथा, लीला, नाम, वो हमारे अंदर प्रवेश करते है और जब हम एंकात में बैठे रहते है तो जो हमनें सुना है वो ही उभर कर सामनें आता है । अब ये हमें देखना है कि हम क्या सुन रहे है और क्या देख रहे है संसार के विषय भोग या परमात्मा को ?

 

 “राधे राधे”         

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