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शांति

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राधे-राधे आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गए


हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा, हरे-हरे,

           हरे रामा, हरे रामा, रामा-रामा, हरे-हरे........  


श्री राधा रानी जी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।


आज का हमारा सतसंग का विषय है- “शांति” तो आज के युग में लोगों का समय बडी भारी व्यस्तता में बीतता है लोगों के पास किसी चीज का अभाव है तो वो है समय सभी लोग अपने कार्यों में व्यस्थ है । कुछ लोग कमाने में जुटे है तो कुछ उसे ठिकाने में लगे है तो किसी के पास फुरसत और समय तो है ही नहीं. जिनके पास बहुत धन आ गया और जिनके पास नहीं है तो धन कमाने के बाद भी अंशांति है अगर धन नहीं है तो वो भी अंशात है तो ये बेकार की मारा मारी है । क्योंकि शांति बहुत जरूरी है जैसे



दो व्यक्ति है दोंनो के पुत्र नहीं है तो कुछ समय के बाद एक के यहा पुत्र होता है तो वो उसका पढाता है और बडा करता है, तो वहीं उसे दुख देने लगता है और आगे जाकर उसकी मृत्यु हो जाती है । दूसरे के व्यक्ति की दशा देखो एक जिसके पास पुत्र नहीं है और जिसके पास था पुत्र और चला गया उसको ज्यादा दुख है क्योंकि उसको पता है कि उसके पास बेटा नहीं है पर जिसके पास था और उसने उसे पाला और वो मर गया तो वो व्यक्ति ज्यादा  दुखी है । तो अगर नहीं है तो उसको अशांति है ही और आके जाने के बाद भी अषांत तो सब बेकार है ।


प्रसग १.
-
एक बार एक व्यक्ति सडक से जा रहा था तो एक व्यक्ति दुकान लगाए था मूगॅफली की.  और वो सो रहा था.


तो आदमी बोला - कि उठो और बोलता है कि ये दुकान आपकी है.?

तो वो कहता - कि मै पास में हूँ तो ये मेरी ही होगी.

तो वो व्यक्ति बोला - कि तुम सो रहे हो दुकान के समय तो तुम्हें तो आवाज लगानी चाहिए तभी तो लोग खरीदंगे तुम्हारी मूगॅफली, वरना कैसे तुम्हारा काम चलेगा ? पैसे कहाँ से आएगें ।

तो वो बोला - कि मुझे क्या करना चाहिए ?

तो वो व्यक्ति बोला-  कि तुम अपनी दुकान के बारे में बताओ अपनी मूगॅफली की तारीफ करो. अभी तुम सो रहे हो तो मुनाफा कम हो रहा है । फिर ज्यादा होने लगेगा.


तो वो बोला-  उससे क्या होगा ? तो उससे बिक्री बढेगी तो उससे तुम और दुकान ले लेना.

तो वो बोला - फिर उससे क्या होगा ?

तो वो बोला - कि तुम थोक में बेचंना तो अब तुम्हारा व्यवसाय बढेगा. तो तुम काम मत करना नौकर करेंगे तुम आराम से सोना.

तो वो बोला - कि अभी भी तो मै शांति से सो रहा था. आप जाओ यहाँ से मुझे सोने दो । तो व्यक्ति आराम के चक्कर में भागता ही रहता है । कि बस थोडे करोड और कमा ले फिर उसके बाद आराम करेंगे और फिर भागते-भागते एक दिन जिदंगी खत्म हो जाती है । प्रेम से कहिए श्री राधे


“जिदंगी तिनका समझकर आसूओं में मत बहाना, जिदंगी पुर्जा समझकर आग में मत जलाना, जिदंगी के मायने जिदांदली के साथ है जिदंगी को सिगरेट के धुएँ में मत उडाना” 



क्योंकि ये मानव जीवन एक बार ही मिलता है । ना जाने कितनी यौनियों के बाद और वो चीज कमाने में अपना जीवन निकाल देते है जो हमें अपने साथ में नहीं ले जानी है । जीवन में शांति नहीं आती है । और व्यक्ति के जीवन में भागम भाग में वो एक पल भी शांति से नहीं बैठ पाता. और इसमें वो मानसिक संतुलन और उत्तेजना से ग्रसित हो जाता है । क्योंकि कभी काम बनता है । तो कभी काम नहीं बनता । तो अंशांति आ जाती है । अधीरता से  हद्रय छोटा हो जाता है । और व्यक्ति एक जगह नहीं टिकता तो हमें ये देखना है कि हमनें क्या बचाया. कि क्योंकि साधन हमें सुख तो दे सकते है पर क्या उससे हमें शांति मिली अगह हमनें शांति नहीं बचायी तो सवब बेकार.


तो जिदंगी में ठहराव जरूरी है । व्यक्ति शाम को घर क्यों आता है । क्योंकि  वहाँ उसे सूकून मिलता है ऐसे ही हमारा मन है हम दिनभर हजारों विचारों में लगाये रहते है. हम इसको संसार में लगाए रहते है पर हम इसको हम घर नहीं आने देते है हमारे मन का कोई भी कोना ऐसा नहीं है जहाँ हम शांत है । प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग २- 
जैसे एक कुत्ता था तो वो एक पुल से जा रहा था तो वो नीचे देखता है तो पानी भरा था तो उसे अपनी ही शक्ल दिखती है उसमें कि ये दूसरा कुत्ता है । तो वो उसे देखकर डर जाता है तो वो उसे भोंकता है तो वो भी उसकी परछाई थी तो वो भी भोंकती है । ऐसे ही जैसा वो करता वैसी ही उसकी परछाई करती तो वो कुत्ता गुस्से में कूदॅता है पानी में तो उसको पता चलता है कि यहाँ तो कोई नहीं है


ये तो मै ही था ऐसे ही हम करते है जब हम अपने अंदर उतरते है तो देखते है कि कोई नही हम ही है पर इसके लिए हमें अंदर उतरना होगा पर हम खुद से ही लडते रहते है । हम लगता है कि ये दूसरे की छाया है पर अर्थात दूसरे की लगाती है छाया .वास्तव में है वो हम. तो हम जैसे ही अपने को बीच से हटाएगें तो हमें शांति मिल जाएगी और इसमें सबसे बडी बाधा है “लालच और अहंकार “ आप कहीं भी जाइए वो आपके साथ रहेगा आपका अहम लालच किस चीज का? कि हम बस थोडा-सा और करे. फिर हो गया. तो सुकून तो रहता ही नहीं.


प्रसंग ३-
 
एक राजा था उसके राज्य में एक किसान था तो वो बहुत लालची था ।


तो राजा ने कहा - तुम कल आना तो उसे दरबार में बुलाया और कहा-  कि तुम्हें क्या चाहिए? तो वो किसान बोला- मुझे जमींन चाहिये -  राजा बोला - कि कल सूर्योदय से जितनी जमीन तुम अपने पैरों से नाप लोगे वो तुम्हारी हो जाएगी. पर तुम्हें सूर्यस्त तक वापिस आना होगा.


तो वो किसान बडा खुष जैसे ही अगले दिन सूर्य निकला तो उसे चलना शुरू करता है पूरा दिन था उसकें पास. तो वो सोचने लगा-  कि मै तो बहुत चल सकता हूँ पर अगर मै दौडूँ तो और ज्यादा जमीन मिलेगी. तो वो बहुत दौडा और खुष हुआ कि मेरी तो बहुत जमीन हो गई पर जब उसको याद आया कि सूर्यस्त होनें के पहले मुझे पहुँचना है तो उसने फिर दौडना शुरू किया वापस आने के लिए. और वो एक जगह गिरा और मर गया. तो ये लालच है वो चाहता तो थोडी-सी जमीन ले लेता और उससे फिर और भी ले सकता था तो ये हमारे साथ भी है । हमारी चाहते भी खत्म नहीं होती है तो सबसे सुखी वो है जिसकी चाहते खत्म हो जाती है. व्यक्ति इतना अधीर हो जाता है कि उसे अपनी चाहतों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है.  और वो ये भूल जाता कि जिसकी वो चाहत कर रहा है वो नष्वर उसको मिटना है. एक दिन जब हम इस दुनिया से जाएगे . अगर व्यक्ति को शांति पानी है तो उसको लालच और अंहकार से दूर होना होगा अहंकार बाधा है कि मै कर रहा हूँ । शांति के लिए लोगों ने क्या नहीं किया.



प्रसंग ४-
महाभारत में युधिष्ठिर ने क्या नहीं किया शांति के लिए. जब वो वनवास पूरा करके आए तो दुर्योधन ने उनसे कहा कि मै तुम्हें राज्य तो दूर की बात सुई की नौंक बराबर जगह नहीं दूगाँ तो वो बोले - कि ठीक है पाँच गाँव ही दे दो. तो दुर्योंधन् अधर्म पर था तो इसलिए शांति उसे प्राप्त नहीं और युद्व हुआ हमसब जानते है कि युद्व से किसी का भला नहीं होता.  युधिष्ठिर को तो आगें चलकर सबकुछ मिला क्योंकि उनमें धैर्य था शांति संतोष था ।



भगवान राम रावण को क्षमा करने को तैयार थे कि तुम सीता को वापिस कर दो हम युद्व किए बिना लौट जाएगें । पर वो माना नहीं चाहे राम हो या कृष्ण हो सबने शांति ही माँगी तो इसका बडा मोल है । इसके लिए हमें अपने भीतर उतरना होगा । जब हम सिनेमा हाल में जाते है तो वहाँ अधेंरा रहता है अगर उजाला हो तो वो फिल्म हमें नहीं दिखाई देगी. ऐसे ही हमारे मन के साथ है अपने अन्दर है तभी हमें उसमें ही वो शांति दिखाई देगी तो जब तक व्यक्ति अपने भीतर नहीं जाएगा उसको शांति नहीं मिलेगी किन चीजों से हम शांत रहेंगे प्रेम से कहिए श्री राधे


कहने का मतलब व्यक्ति के अंदर ही हर चीज हे हमें बाहर नहीं जाना है । व्यक्ति को हमें संसार में रहना है पर उसके अपने अंदर नहीं लाना. एक संत में और संसार के लोंगों में यहीं तो फर्क है वो रहता तो संसार में है पर संसार उसके अंदर नहीं रहता उसके अदर तो परमात्मा रहते है वहीं शांति और आनंद है । हम क्या करते है हम संसार में रहते है और अंदर भी संसार है तो हमें अपने अंदर संसार को नहीं लाना है । तभी हम शांति को पा पाएगें और उसकी अनूभूति कर पाएगें ।  


                                                                     
                                                                   “जय जय श्री राधे”

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