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मोह और आशक्ति

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राधे राधे आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाईये. 

 

गोविंद के गुन गाइए गोपाल के गुन गाइए .....

राधारानी के युगल चरणोंमें कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “मोह और आसक्तिी” ये दोनों चीजें एक ही है । मोह का मतलब है किसी चीज से हमारा लगाव ओर वो किसी भी चीज से हो सकता है किसी व्यक्ति से, जानवर से, वस्तु से, दुनिया में इतनी चीजें है किसी से भी हो सकता है । पर इसमें एक बहुत बडा अंतर है । और हम इसमें दुबिधा में रहते है कि ये प्रेम है कि मोह है. तो ये दोनों अलग है । प्रेम निस्वार्थ हेाता है । और सबसे होता है । लगाव व्यक्ति का किसी से भी हो सकता है । हमारा हर कहीं मोह अटका है ।

 

प्रसंग १-. जैसे एक काँच का गिलास है हमारे पास और वो टूट जाए तो हम डिस्टरब हो जाते है । ये क्या है ?इतना लगाव करते है हम से वो चीज दूर हो तो हम नहीं रह सकते है तो ये सब झूठ है ये आसक्तिी है । ऐसी ही झूठी चीजों में मनुष्य पडा है । जिससे उसको आसक्त करना चाहिए मन को उससे तो वो कभी करता नहीं है । और ना जाने कहाँ-कहाँ लगा रखा है उसका मोह

 

प्रसंग २-  हम देखते है मोमबत्ती जल रही होती है । तो कीडे उसके पास आकर मर जाते है जल के तो ये उसका मोह है लौ के प्रति.  उस पंतगे का मोह उसको पता है कि वा जल जाएगा पर उसका मोह इतना हैउसे पता है की लौ के पास जाने पर मै मर जाऊँगा , ऐसी ही मछली अनाज के दाने के मोह में उसके पास जाती है । और फस जाती है ।

 

ऐसे ही हम विषयों के मोह जाल में फस जो है । विषयों में हमारी आसक्तिी है । दुनिया में व्यक्तिी का किसी से जरा टकराव हुआ और वो उसे अपना दुष्मन बना लेता है और वो दुष्मनी कभी कभी इतनी बाबढ़ा लेता है की उसकी पीढी दर पीढी चलती रहती है । और केस चलते रहते है । शत्रु बहुत बना लेता है । अपने व्यक्तिी पर वो कभी अपने अंदर नहीं देखता कि उसके आंतरिक शत्रु कितने है । व्यक्ति के आंतरिक शत्रु बाहर के शत्रुओं से ज्यादा खतरनाक है वो कभी उन्हें देखता ही नहीं उसे पता ही नहीं कि वो कौन है । छ : शत्रु होते है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सरता , ये सारे इतने हावी रहते है व्यक्तिी पर कि हम बाहर के शत्रुओं से तो जीते जाते है ।

 

हमारा वो दुष्मन था हम उससे केस जीत जाते है तो खुष होते हैं पर अंदर के दुष्मनों से हम कभी जीत नहीं पाते है । हमें तो पता ही नहीं है । काम संसार लौकिक काम भी इसी में आता है .क्रोध जब हमारे मन ने कोई चीज देखी तो उसमें एक विचार आया कि हमें ये चीज चाहिए बुद्वि ने निर्णय लिया कि हमें ये चीज चाहिए. और जब तक नहीं मिलती तब तक हम उसके पीछे भागते रहते है । मिल गई तो ठीक है और ना मिली तो फिर क्या है । इच्छा की पूर्ति नहीं हुई तो वहा से क्रोध आना शुरू हो गया क्रोध क्या करता है सबसे पहले वो विवके को मार देता है । "क्रोध" में व्यक्तिी ना जाने क्या क्या कर लेता है । व्यक्तिी खून भी कर लेता है ।

 

ऐसे ही मद है तो "मद" क्या है । व्यक्तिी का अभिमान घमंड कोई अच्छे पद पर है तो उसका उसको अभिमान है । किसी को रूप का तों किसी को धन का, हम पता नहीं किन-किन चीजों का अभिमान करते है । व्यक्तिी अपने आप को बढाने में सारी चीजें भूल जाता है ।

 

प्रसंग ३-. एक व्यक्ति न्यूयार्क में खडा है तो उसको लगता है कि वो ये जगह कितना बडा है उसे वह बहुत बड़ी लग रही है पर हम उससे उपर जाए तो भगवान है जेसे हमारे शरीर में रोम है ।हम रोमो को गिन नहीं सकते , वैसे ही जितने रोम है भगवान के, उनके एक रोम में कई ब्रहमांड है । और असख्य ब्रह्माड में से किसी एक ब्रह्माड में पृथ्वी है । और पृथ्वी जैसे कई और पृथ्वी है जैसे बहुत से धूल के कण हो वैसे ही असख्य पृथ्वी है उसमें अमेरिका और भी छोटा और न्यूयार्क उससे भी छोटा और न्यूयार्क के एक किसी एरिया में खड़ा है हम अपने आपको बड़ा कैसे कह सकते है हम किस बात अभिमानकर रहे है हम हमेषा होड में लगे रहते है कि किस के पास कितना है ओर हमारे पास कितना है । हम अभिमान किए रहते है । व्यक्तिी इस पर विजय कभी नहीं पा पाता कि हम इससे कैसे जीतें.

चौथा शत्रु है “मोह” और ये मोह आसक्तिी मन के उपर है ये मन ही बंधन और मुक्तिी का कारण है । जहाँ व्यक्तिी ने अपने मन को स्थिर किया वहीं मुक्तिी है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ४- जैसे एक व्यक्ति था बूढा हो गया मरने वाला था वो सबको बुलाता है उसके बेटे , बेटी,  पोता पोती,  पत्निी,  सभी खडे थे तो वो हाथ उठाकर कुछ कहना चाहते है । पर वो बोल नहीं पाता तो उनके लडके समझते है ये कुछ बताना चाहते है कही ऐसा तो नहीं कि ये कोई खजाने के बारे में कह रहे हो  अगर ये मर गए तो खजाना हमे नहीं मिल पाएगा. तो वो डाक्टर के पास जाकर बोलते है । कि इन्हें केाई दवाई दो जिससे ये बोल सकें तो डाक्टर कहता है कि इन्हें एक इंजेक्सन देना पडेगा तो बेटा कहता कि लगा दो. इनको पता नहीं क्या बताने वाले है अगर कोई खजाना हुआ और ये मर गए तो हमें नहीं मिल पाएगा.

 

तो डाक्टर कहता है कि पाच हजार लेंगे इंजेक्सन के ? तो वो कहते है कि दे देंगे । तो डाक्टर लगा देता है इंजेक्सन तो वो व्यक्ति कहता कि बडा बेटा कहाँ है? तो वो बोलता है कि पिताजी मै यहीं हूँ. तो वो पूछता है कि छोटा और मजला कहाँ है? तो वो दोनों कहते है कि पिताजी हम भी यहीं है तो वो व्यक्ति बोलता है कि अगर सब यहीं हो. तो दुकान पर कौन है ?

 

तो ये मोह है कि मरते वक्त भी उसको दुकान दिख रही है । तो ये मोह है । तो दुनिया में कब तक इन चीजों मे फसे रहोगे तो उसका मोह मरते-मरते भी नहीं गया लोग कहते है कि हम अभी से क्या सतसंग करें ये तो बुढापे का काम है । भगवान का नाम लेना . जिसने बचपन में अपनी जवानी में भगवान को नहीं भजा,  तो क्या उसको बुढापे में भगवान याद आ जाएगें. अचानक बुढापे में जो आपने जीवन भर किया वो ही याद आएगा जहां आपका मोह फसा है ।

 

व्यक्तिी को बुढापे में भगवान का नाम इतना अच्छा नहीं लगता जितना की अपने नाती पोतों की बोली बस वहीं अच्छा लगता है । तो व्यक्ति का मोह पैदा होते ही शुरू हो जाता है । और मरते मरते भी नहीं जाता है और ना जाने किन किन चीजों में व्यक्तिी फसा है ।

 

जैसे कोई पक्षी मांस का टुकडा लेकर आसमान में उडता है तो बाँकि पक्षी उसके पीछे उडते है । उस मांस के लिए तो वो परेषान हो जाता है । अंत में वो मांस के टुकडे को छोड देता है ।तब सारे पक्षी उसका पीछा छोड देते है । तो जब तक आप उस मोह को पकडे हो वो तब तक हमारे ये ही छ शत्रु है ये पीछे ही पड़े रहेगे . तो ये हमारा पीछा कब छोडेंगे जब आप मोह छोड देंगे तब ये सारे आपका पीछा छोड देंगे केाई आपको परेषान नहीं करेगा.

 

"मत्सरता" इसका मतलब है । “ईष्र्या” इसके बाद है ।तो जलन व्यक्ति के पास जितना है उसमें संतोष नहीं करेगा वो देखेगा कि सामने वाले के पास इससे ज्यादा तो नहीं है । वो ये देखेगा.

 

प्रसंग ५. - जैसे एक व्यक्ति था उसके पास पैसा नहीं था तो उसने बहुत दिनों तक भक्तिी भाव से भगवान की सेवा की शिव जी उससे प्रसन्न हुए और कहा - कि माँगों ! क्या चाहिए?

तो उसने कहा - कोई ऐसी चीज दो जिससे सारी इच्छाए पूरी हो जाए.

तो षिव जी ने कहा-  कि ऐसी केाई चीज नहीं है । क्योंकि इच्छाँए कभी खत्म नहीं होती है । पर तुमने मेरी पूजा की है तो हम तुम्हें कुछ ना कुछ देगें तो उन्हेंने एक घंटा दिया और कहा - कि तुम इसे बजाओगे तो तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी और वो इतना कहकर चले गए.

 

और एक बात और बोले - कि तुम जो भी मागोगे वो तुम्हें एक और दो तुम्हारे पडोसी को मिलेंगे तो वो व्यक्ति घंटे को लेकर घर आया, तो उसने कहा - कि छप्पन भोज आ जाए ?

 

तो उसके पास आ गए पर पडोसी के पास उससे डबल तो उसे दुख हुआ.

 

फिर उसने कहा-  कि मकान बन जाए तो एक मकान बन गया और पडोसी के दो मकान बन गए तो वो जो भी चीज माँगता उसके पडोसी को डबल मिलती तो वो कहता कि भगवान ये आपने क्या किया तप मैने किया, भूखा मै रहा महनत मैंने किया और पडोसी को बिना तप किए मेरे से दुगना फल मिल रहा है । तो वो सोचता कि मै जो भी मागूगाँ उससे दुगना तो पडोसी को मिलता है । तो वो उसे रखकर चला गया.

 

एक दिन उसकी पत्निी को साफ करते समय वो घंटा मिला और जेसे उसने बजाया उसको तो वो जो इच्छा सोच रही थी वो पूरी हो गई तो वो समझ गई कि ये घंटा सारी इच्छाओं की पूर्ति करता है । तो वो पति से कहती कि तुम बाहर काम क्यों करते हो जब घरमें ये घंटा है । तो वो व्यक्तिी बोलता है । कि सामने वाले के यहाँ तो दो हो जाते है । काहे का घंटा.

 

तो पत्निी कहती है कि हम इतने में ही खुष रहें और सामने वाले का भला हो रहा है । तो हम क्यों जलें पत्निी कहती है - कि मै तो बजाउॅगी तो उसने बजाया.

तो पति ने कहा - कि मेरी एक आँख फूट जाए तो उसके पडोसी की दोनों ही फूट गई.

 

फिर बजाया तो उसने कहा - कि मैरे घर के सामने एक गढढा खुद जाए तो उसके पडोसी क घर के सामने दो खुद गए. तो उसके पडोसी गिर के उसमें मर जाएगें.

 

तो यहीं जलन है. कि दूसरों के पास हमसे ज्यादा ना हो उसके पास हमसे ज्यादा चीज ना आ जाए ये व्यक्तिी का मोह है । और व्यक्तिी इन छ शत्रुओं पर कभी विजय नहीं पा सकता वो बाहर ही बाहर लगा रहता अपने अंदर नहीं देखता कि हम कहा पडे है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ६. - एक व्यक्ति के यहाँ एक तोता था तो वो उसको रोज एक ही वाक्य सुनाता था कि कभी ये उड गया तो कोई भी शिकारी इसको पकड कर मार ही देगा. तो वो उससे कहता - कि शिकारी आएगा जाल फैलाएगा, हमें इसमें नहीं फसना,  

 

तो वो तोता सीख गया वो रोज यहीं बोलता कि शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा, हमें इसमें नहीं फसना एक दिन वो पिजंरे से भागकर जंगल में आ गया तो जितने उसके साथ वाले तोते थे उनके साथ वो उडते ही वन में पहुँच गया तो वहाँ एक शिकारी आया और जाल डालने लगा तो वो तोता डाल पर बैठा यहीं बोलता कि शिकारी आएगा जाल फैलाएगा. उसमें दाना डालेगा पर हमें उस में नहीं फसना तो शिकारी ने जाल डाला और उसमें दाना डाला तो वो तोता और सारे तोते उस दाने को चुगने के लिए आए और फसॅ गए उसके बाद भी वो तोता वहीं बोल रहा है कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा पर हमें नहीं फॅसना.

 

तो ये क्या है व्यक्ति को पता है कि हम कहाँ फसॅ रहे है पर हमें उतरना कहीं नहीं है । ऐसे ही ये माया का जाल है, ये मोह क्या है, जाल है व्यक्ति को पता है जिन चीजों से हम लगा रहे है वो सब यहीं छोड के जाना है । पर फिर भी हम उस जाल में फॅसते जा रहे है । भगवान ने सबको बुद्वि दी है

 

आध्यात्मिक जगत ये सिखाता है कि व्यक्ति बाहर से हटकर अपने अंदर तो झाँककर देखे कि क्या है । ध्यान क्या सिखाता है हम दो मिनिट के लिए आँख बंदकर अपने ही अंदर झाँक कर देखते है । आध्यात्म में हम इन सब चीजों काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, मत्सरता, इन पर व्यक्ति को विजय पानी है । तो उसका एक ही रास्ता है वो “भगवान की शरण” तो ये मन हमारे अधीन हो हम इसके नहीं पर ये कहना तो बहुत आसान है पर हो कैसे?

 

तो दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है । ये मन केवल अभ्यास से ही वष में हो सकता है व्यक्ति के घर में आग लग जाए और वो तुरंत कुआ खोदने बैठ जाए तो क्या उसका घर बचेगा नहीं ना तो यहीं हम कर रहे है कि जब व्यक्ति का बुढापा आ जाता है आख, कान, नाम काम करना बंद कर देते है । तब भगवान को याद करता है । तो याद नहीं आते तो वो सोचता है कि मैने पहले से किया होता याद क्योंकि मरने के वक्त व्यक्ति को जो अनुभव होता है । तब उसको पछतावा होता है । तो उससे अच्छा कि पहले ही मन पर काबू कर लें और ये जब होता है जब मन करे कहीं विश्राम दें उसको शांति मिले । तो वो कहाँ है । वो भगवान के चरणों में तो व्यक्ति कहता है कि चरणों में जाकर क्या होगा तो जाकर तो देखो भगवान खुद ही आगें का रास्ता बता देते है । उसकी सारी जिज्ञासाएँ सारे प्रष्न सब का समाधान अपने आप ही हो जाता है । भगवान के चरण्णें में ही शांति मिल जाती है पर व्यक्ति अभ्यास नहीं करेगा तो ये मोह और आसक्तिी उसको पीछा कभी नहीं छोडने वाली है ।

 

तो भगवान का नाम लेने में स्मरण का भी ध्यान रखना जैसे हमनें किसी व्यक्ति को नहीं देखा पर मन में उसका एक चित्र बना लेते है ऐसे ही भगवान को नहीं देखा पर हम अपने मन में उनका एक चित्र  बना लेते है जो भी हमारा इष्ट है । वो नाम के साथ “स्मरण” भी करें. तो उसकी सारी जिज्ञासाएँ खत्म हो जाएगीं. उसे किसी भी चीज की जरूरत नहीं फिर ये तो आसक्तिी है वो जा भी सकती है । जैसे आया था वैसे भी चला जाएगा जब हम उसे मोह को प्रेम में बदल देंगे . कौन से प्रेम में वो है कृष्ण प्रेम क्योंकि वो ही निस्वार्थ है । उसमें कोई बनावट नहीं है इसी से हम सारी चीजों पर कन्टरोल कर सकते है  

 

“राधे-राधे”


 

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