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धर्म

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्त करे सब मेरे साथ गाये ......

 

“मेरो राधा-रमण गिरधारी,  मेरो राधा-रमण गिरधारी,  गिरधारी श्याम वनवारी........”

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “धर्म” , धर्म क्या है? और मानव जीवन में इसका क्या महत्व है? हर व्यक्ति का अपना-अपना धर्म होता है ।कोई ब्राहमण कुल में जन्म लेता है । तो कोई क्षत्रिय कुल में जन्म लेता है, कोई वैश्य, तो कोई शूद्र, चार ये वर्ण आश्रम होते है, सभी अपने-अपने धर्म का पालन करते है । तो ये वर्णाश्रम है । किसी चीज को करने के लिए अपनी अतंरआत्मा गवारा नहीं होती अगर किसी काम को हम करते है, तो मन तो हमारा हमेशा उसका साथ देता है, उससे बडी आत्मा होती है, वो कभी गलत नहीं होती है, आत्मा, जिसे जमीर कहते है, अंतर आत्मा की आवाज को, किसी काम को करने के लिए कहती है, तो वहीं सत्य है, क्योकि वो कभी धर्म के विरूद्ध जाती नहीं है । जिस चीज को करने के लिए अंतरआत्मा न बोले, वो काम व्यक्ति को नहीं करना चाहिए, क्योकि वो धर्म के विरूद्ध होगा,

 

धर्म और आत्मा का गहरा संबंध है, शक्कर से मिठास अलग नहीं हो सकती है । जैसे दूध की सफेदी वैसे ही धर्म और आत्मा एक दूसरे से अलग नहीं है । धर्म अगर शरीर है । तो आत्मा उसकी अनूभूति है, धर्म अगर व्यवहार है, तो आत्मा स्वभाव है, धर्म पिता का प्यार  है, तो आत्मा माँ की ममता है । । धर्म व्यक्ति को सिखाता है कि जीना कैसे है, जब हम अच्छा सोंचेगें, करेंगे, तभी हमारा जीवन सुखमय होगा और अच्छाई पर चलने का रास्ता हमें धर्म से ही मिलेगा, व्यक्ति बुरा कर लेता है पर वो अधर्मी हो जाता है ।

 

व्यक्ति का कर्तव्य केवल परिवार के लिए नहीं है । पिता अगर बच्चों के लिए कर रहा है तो वो कहता कि वो अपना धर्म निभा रहा हूँ, इसी तरह पत्नि, पति की सेवा करेगी, तो वो कहेगी मै अपना धर्म निभा रही हूँ । पर अगर वो व्याभिचारिणी हो जाएगी तो वो उसका अधर्म हो जाएगा तो क्या व्यक्ति का धर्म केवल अपने परिवार के प्रति ही है । कि उससे बढकर भी है अगह हम शांति से बैठकर सोचें तो हर व्यक्ति अपना कर्तव्य निभा रहा है । अगर हम इतने तक ही सीमित है, तो हम में और जानवर में फर्क क्या है । एक जो चिडिया और चिढा होते है । वो भी यहीं करते है । सुबह से निकल जाते है । अपने बच्चों के खाने के लिए और शाम को आते है । वो भी अपना धर्म निभा रहे है । तो हमें और उसमें फर्क क्या है । हमें और उसमें ये अंतर है कि हम में बुद्धि है । भगवान ने केवल इंसान को ही बुद्धि दी है । और इससे केवल हमें अपने परिवार तक ही सीमित नहीं रहना है । हमें मानव धर्म देखना है कि मावन मात्र का धर्म क्या है । मानव का एक धर्म है अहिंसा,

 

प्रसंग १.  - एक बार का प्रसंग है एक राजा था वो अपने दरबार में बैठा था उसके साथ उसके मंत्री और सांमत भी थे राजा ने पूछा - कि बताओ कि राज्य में मास की क्या कीमत है? तो सांमत ने कहा-  कि मास बहुत सस्ता है, उसकी कीमत कम है । तो सब ने उसकी हाँ  में हाँ मिला दी, कि मास सस्ता है । अब वहीं राजा का पुत्र बैठा था तो वो कहता-  कि महाराज! मै कहता हूँ, कि मास सस्ता नहीं है । तो राजा ने कहा - कि पुत्र तुम छोटे हो, अभी कुछ नहीं जानते, तो वो चुप हो गया. पर उसने मन में ठान लिया कि मै इस बात को प्रमाणित करूगा, कि मास सस्ता नहीं है । अब वो सभा जैसे ही खत्म होती है तो उसका बेटा सांमत के घर जाता है और कहता है - कि मेरे पिताजी बहुत बीमार है और कोई सांमत अपने कलेजे का मास दे दे तो वो ठीक हो जाएगें, उनका केवल एक ही उपचार है. तो उसने धन दे दिया पर मास नहीं उसने  कहा मुझे तो अपने जीवन से प्यार है ,इसके बाद वो दूसरे के यहा गया. पर उसे कोई भी सांमत तैयार नहीं हुआ, एक एक करके सबके घर गया पर कोई भी राजी नहीं हुआ .

 

दूसरे दिन दरबार में उसने कहा - देखो राजा मुझे ये धन इन सामंतो के घर से मिला, मैने इनसे कहा कि पिताजी बीमार है । उनका इलाज आपके कलेजे के मास से ही हो सकता है तो इन्हेांनें मुझे इतना धन दिया, तो आप बताइए कि मास महगा है कि सस्ता, जब दूसरे पशु के मास की बात होती है तो मास सस्ता है और जब व्यक्ति की खुद की बारी आती है तो मास महगा है.

 

कहने का मतलब है कि व्यक्ति कितनी आसानी से किसी पशु पक्षी का मास खा जाता है । क्योंकि वो सस्ता है पर वो भूल जाता है, कि हम अपना मावन धर्म नहीं निभा रहे है, हर जगह अहिंसा बताई गई, है दूसरी बात जिसने हमें जीवन दिया है लेने का हक भी उसी को है .क्या हमनें किसी को जीवन दिया है? नही, तो फिर हम किसी की जान कैसे ले सकते है । और अगर व्यक्ति लेता है तो वो उसका मानव धर्म नहीं है । तो सबसे बडा धर्म अह्रिसा है जब अपनी बारी आती है तो कोई नहीं आता है ।  

 

एक होता है “धर्मान्ध्ता”, इसका अर्थ होता है , जब व्यक्ति सब कुछ जानते हुए भी देखना नहीं चाहते, मतलब हमारे पास आख तो है, पर हम देखना नहीं चाहते है । जिस व्यक्ति के पास आख नहीं है ,वो कोई काम करता है तो उसका पाप क्षमा किया जा सकता है, कि इसकी आखें नहीं थी , पर आख होते हुए भी वो गलत करे तो कहलाता कि धर्मं में अंधापन.

 

जब व्यक्ति भीतरी आख से धर्म केा देखता है । तो उसके मायने ही बदल जाते है, क्योंकि अंदर जाकर वो बदल जाता है । यू तो सब अपना धर्म निभाते है, पर जो अंत:करण से देखा जाता है, वो धर्म अलग है । क्योंकि धर्मान्धता उस परम शक्ति को भी नहीं देखती जिसके लिए ये सारे धर्म चलाए जा रहे है । मतलब लोग साम्प्रादियकता में बॅट गए, कि ये मेरा धर्म. ये उसका धर्म, और मेरा ही धर्म सर्वश्रेष्ठ है बाकि सब निकृष्ठ है, वो जिस भगवान के लिए लड रहे है, क्या उसने ये धर्म सिखाया, नहीं, उसने नहीं सिखाया, धर्म तो सदा से एक ही था, हमनें बाटा है, जो लोग धर्म के नाम पर लडते है पर उनको ये तो पता ही नहीं कि हम जिसके लिए लड रहे है वो तो एक ही है अलग नहीं.  

 

व्यक्ति के पास जीवन में सब सुख ऐशो आराम आ जाते है । तब वो एक चीज भुल जाता है अपने से छोटे का सम्मान करना. तो तब वो सबको समान दृष्टि से देखेगा तो ये सबसे बडा मानव धर्म है । व्यक्ति जब इंसान को ही नहीं समझता तो फिर किसी और को क्या समझेगा

 

प्रसंग २. - एक बादशाह था और उसकी लडाई पडोसी राज्य हुई तो हजरत और बादशाह में युद्ध हुआ, पर फैसला नहीं हो पाता, कि कौन जीता? दोनो तरफ से लोग मरते थे तो बादशाह ने सोचा कि ऐसे कब तक हम लोगों का खून बहाएगें? इससे अच्छा हम संधि करलें. तो उसने एक संधि पत्र भेजा दूसरे राजा को, कि हम संधि कर लें तो वो राजी हो गया कि ठीक है, हम कब तक ऐसे लोगों का खून बहाएगें तो उमर ने कहा - कि वो खुद आएगा संधि करने.

तो वो एक उॅट लेकर और एक सेवक को ले के साथ गए, तो रास्ता बहुत लंबा था तो उमर उॅट पर बैठ गया और वो नौकर उॅट की नकेल पकडकर चलने लगा अब आधारास्ता निकले पर राजा उमर ऊंट से नीचे उतार कर बोला की अब तुम ऊंट पर बैठ जाओ गुलाम ने मना किया पर उमर नहीं मना और नौकर कको ऊंट पर बैठा दिया, अब जैसे ही उनके राज्य में पहुचें, तो दूसरा राजा उनका स्वागत करने को आगे आए, तो उनको लगा कि ये जो उॅट पर बैठा है यहीं हजरत उमर है । तो सब उसको सलाम करने लगे, तो वो झट से नीचे उतरा और बोला कि हुजूर में बादशाह नहीं हूँ, मै तो गुलाम हूँ.

जैसे ही उसने ये बात सुनी तो वो उमर के चरणों में गिर पडा, कि मै बेकार में ही इतने महान शासक से लड रहा था, तुमसे क्या बैर करें, तुम्हारी नजर में एक गुलाम और राजा में कोई फर्क ही नहीं है । बोले सबसे बडा मानव धर्म तो तुम ही निभा रहे हो जिस राजा में ऐसा गुण हो उससे मै कैसे लड सकता हू मुझे तो ये काम बहुत पहले ही कर लेना चाहिए.  

 

प्रसंग ३. - महाभारत का एक प्रसंग है, धर्मराज युधिष्ठिर थे , उनका तो नाम ही धर्मराज है वो हमेशा  धर्म पर ही चलते थे, कितनी भी बडी परिस्थिति आ जाए, उनके जीवन में बड़ी से बड़ी कठिनाईया आई सबसे पहले उनके पिता नहीं थे, और कौरव उनको यातनाये देते रहते थे, इतना सब होने पर भी उन्होनें धर्म को नहीं छोडा, और क्यों भगवान बिना कुछ कहे पांडवों के साथ थे क्योंकि महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म का ही था, और जब अधर्म बढ गए था, तो भगवान को वो उतारना पडता है क्योंकि अधर्म ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकता है । क्यों? अंत में पांडवों की जीत हुई, और कौरव हार गए,क्योकि  धर्म उन्हेांनें किसी भी कीमत पर नहीं छोडा और वो धर्म ही आखिर में उनकी विजय का कारण बना कौरवों को अगर डर था तो इस बात का कि पांडव अपने धर्म से विचलित नहीं होते है । जो अपने धर्म से विचलित नहीं होता उसकी जीत हमेशा होती है हार कभी नहीं.

 

व्यक्ति गलता करता है उसको पता रहता है कि मै ये धर्म के विरूद्ध काम कर रहा हू । पर वो करता है वो अपनी आत्मा की नहीं सुनता है और अगर सुनता तो, वो धर्म के साथ ही चलता दोंनो का रास्ता एक ही है। अलग नहीं है । पर वो मन की सुनता है, और मन का तो काम ही है, एक बार व्यक्ति उसको गुलाम हुआ और वो जहा चाहेगा वहा ले जाएगा, ये मन ही है जो सब काम खराब कर देता है । और अंदर से समझेंगे धर्म को,

 

और गीता में एक ही बात कही भगवान ने कि सब धर्मों के के भेद भुलाकर एक मेरा शरणागत हो जा तुम कहा ये धर्म अधर्म के चक्कर में हो, जैसे गोपिया थी, सब के पति थे, बच्चे थे, परिवार था, पर वो सब चीजें त्याग कर, भगवान के पास आई थी,  तो क्या वो धर्म के विरूद्ध गई थी. नहीं, वो अपने अंदर से उन्होनें वास्तव में अपने धर्म को समझा और वो प्रेम है ।धर्म एक ही चीज सिखाता है वो है प्रेम  प्रेम भी कैसा  निष्काम प्रेम जहाँ  स्वार्थ आया तो परिभाषा ही बदल जाती है । क्येांकि निष्काम प्रेम और संसारिक प्रेम में बहुत फर्क है

 

जब कृष्ण ग्यारह वर्ष की उम्र में मथुरा गए थे फिर बाद में कुरूक्षेत्र में गोपियों से मिले तब वो १२५ वर्ष  के थे, इतने वर्षों मे वो एक भी बार गोंपियों, राधा रानी से नहीं मिले फिर भी उनका प्रेम कम नहीं हुआ हम देखते है संसार में जब कोई मर जाता है ।दूर का रिश्तेदार होगा तो वो चार दिन रोएगा, बच्चे और पत्निी साल भर रोएगें, फिर धीरे-धीरे भूल जाएगें, क्यों? वहा प्रेम नहीं, कामनाए, इच्छाए है जब वो खत्म तों प्रेम भी खत्म, प्रेम तो भगवान कृष्ण का था गोंपियों से, जो एक सौ पच्चीस साल बाद भी उनका प्रेम कम नहीं हुआ, जब वो मिले तो उससे कई गुना बडा प्रेम, कम नहीं हुआ क्योंकि वो निष्काम था वो उनका धर्म जब व्यक्ति अपने भीतर उतरता है तभी उसको धर्म के मायनें समझ में आतें है । 

 

“राधे राधे”      

 

 

Comments
2011-11-18 15:45:49 By Meenakshi Goyal

radhe radhe

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