Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

परोपकार

  Views : 301   Rating : 5.0   Voted : 2
submit to reddit  

आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे

"राधा सनेह बिहारी नंद लाल मेरो प्यारो मोहन..... “

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “परोपकार” तो इस दुनिया में जब हम कोई भी काम बिना स्वार्थ के करते है । तो उस काम को करने के बाद मन मंे जो एक तरह का सुकून आ जाता है । जो एक शांति आती है वो परोपकार की देन है । तो जब हम कोई काम बिना स्वार्थ के करते है वो मन में एक तरह का सुकून आता है तो उसी का नाम परोपकार है । आज की इस दुनिया में हम इतने स्वार्थी हो गए है कि हमें लगता है कि बस हमारा ही काम होना चाहिए चाहे कैसे भी हो.


हम इसी दौड में भागे जा रहे है । हम सब को मालूम है कि जब हम इस संसार से जाएगें तो क्या जाना है हमारे साथ अगर हमारे साथ शरीर जाना है तो इसकी देखरेख करनी चाहिए और अगर विद्या साथ जानी है, तो मरने के बाद व्यक्ति को क्यों अगले जन्म में पहली क्लास से पढता है । जब उसमें एक जन्म में विद्वान बन गया तो वो अगले जन्म तक क्यों ज्ञान नहीं रहता है । एक जन्म में पढ़ लिखकर विद्वान बन गया फिर क्यों अगने जन्म में पहले से पढ़ना पडता क्योंकि वो ज्ञान हम शरीर को देते है आत्मा को नहीं, शरीर नाषवान है और आत्मा शाष्वत है।



मरने के बाद भी आत्मा है । अगर धन साथ जाता है । तो फिर हर व्यक्ति अपने साथ धन ले जाता और इतना कामा लेता कि उसे फिर किसी भी जन्म में नहीं कामना पडता उसे कभी उसकी जरूरत नहीं पढती तो क्यों सारी चीजें छूट जाती है । क्याकि शरीर नाषवान है ।सबको मालूम है पर हम भागने में लगे है तो दुनिया के काम भी जरूरी है क्योंकि अगर व्यक्ति धर्म के काम भी करता है । तो उसमें भी धन की जरूरत होती है । पर जीवन में कुछ काम ऐसे भी करने चाहिए जिससे दिल को सुकून मिले.ये तब होगा जब हम निस्वार्थ बनेगे और उसमें हमारा कोई भी स्वार्थ न हो ।

व्यक्ति दान भी करते है तो उसमें भी दिखावा करता है । मंदिर में  अगर कुछ भी दान करतें है एक पंखा दान करता है तो तो वहाँ पर लिखवा देते है । ये मंदिर मैने बनवाया है । यहाँ एक बोर्ड टाँग दो और उसमंे मेरा नाम लिखवा दो मै पहला जाता है तो जो दिखावे के लिए कर्म किया जाता है तो वो क्या वो दान परोपकार है । नहीं प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग २-
एक बार का प्रसंग है एक फकीर थे जिनका नाम था हाजी मोहम्मद ,उन्हेंाने अपने जीवन में साठ बार हज की यात्रा की पाँचों वक्त की नमाज किया करते थे । एक बार उन्हेांनें एक सपना देखा उसमें स्वर्ग से एक दूत आया और उसके हाथ में एक बैत है जिससे वो मारते है । तो वो दूत स्वर्ग और नरक के बीच में खडा है । तो लोग आते जाते है और उनके कर्मों के हिसाब से वो उनको स्वर्ग और नरक में भेजता है । जब हाजी मोहम्मद सामने आये तो  



तो दूत ने कहा-
 कि आप किस आधार पर स्वर्ग में जाना चाहते है । बताओ तब मै तुम्हारे कर्मों का हिसाब करूॅ । तो हाजी ने कहा - कि मैने साठ बार हज की यात्रा की है । तो मै स्वर्ग जाने के लायक हूँ ।



तो वो दूत कहता है - कि जब कोई व्यक्ति तुमसे तुम्हारा नाम पूछता था तो तुम बडे घंमड से कहते थे कि “मै हाजी मोहम्मद हूँ” । ये जो तुम्हारा अभिमान था उससे तुम्हारा पूरा पुण्य खत्म हो गया जो तुमने हज किए थे, इसके अलावा कोई और अच्छा काम किया है तो वो बताओ ? तो इतना सुनकर हाजी का चहरा उतर गया.



तो वो बोला -
कि मैने अपने जीवन में पाॅचों वक्त की नमाज अता की है । उसका कुछ पूण्य होगा दूत हसॅता है । और कहता है कि तुम्हें याद है कि एक बार तुमसे मिलने धर्म के बहुत सारे जिज्ञासु आए थे तो तुमने उनको दिखाने के लिए नमाज थोडी देर के लिए ज्यादा पढी तो उसे दिखावे के कारण तुम्हारी उम्र भर की नमाज का पुण्य भी खत्म हो गया. जो दूत ने इतना कहा तो हाजी चुप हो गया,उनका सपना टूट गया.

जब जागे तो सोचने लगे. और समझ गया कि दूत ने उसे बहुत अच्छी प्रेरणा दे दी. कि मै जो हज गया, मैने जो नमाज अता की. उसमें मैने ‘मै” का भाव रखा, और दिखावा किया तो वो सारी नमाज और हज की यात्रा बेकार गई । कोई काम का नहीं उस दिन उसकी समझ में आए कि अच्छे कार्यों में दिखावा नहीं होना चाहिए. धर्म को दिखा कर नहीं करना चाहिए अपना स्वार्थ नहीं होना चाहिए. हम किसी के लिए भी कुछ भी करें उसमें स्वार्थ नहीं जिस दिन ये “मै और स्वार्थ” दोनो हट गए, उसी दिन सही मायने में परोपकार का मतलब समझ आ जाएगा प्रेम से कहिए श्री राधे


उदाहरण -
परोपकार का सबसे अच्छा उदाहरण है “वृक्ष” वृक्ष जब बडा होता है तो वो फल देता है, छाया देता है, और किसी से ये नहीं कहता कि तुमने मुझे क्या दिया. मै तुम्हें क्यों फल दूँ, छाया दूँ, और सबसे अच्छी बात ये है कि जब व्यक्ति एक पत्थर उठाकर वृक्ष को मारता है ।  तो वो बदले में फल देता है ।

ये समझने वाली बात है आज की दुनिया में किसी को एक छोटा सा पत्थर मार दो, तो वो मारने को तैयार है । पर उस वृक्ष का परोपकार देखो कि वो पत्थर मारने के बाद भी फल देते है । छाया देते है । और कभी भी वो दिखावा नहीं करते है हमेशा जिस पर फल लगते है झुकी हुई डाल होती है । उसमें अकड नहीं होती है । जैसे ही उसमें फल लगता है तो वो झुक जाता है ।उतनी कि विनम्रता  आ जाती है  तो जीवन में परोपकार है तो घंमड नहीं लाना है । तो  हम उस वृक्ष की तरह है जो तन के खडा है झुकता नहीं हैं । और जब आँधी आएगी तो वो उखड जाएगा, जो झुका है वो नहीं उखडेगा ।



उदाहरण -
बादल हमेशा समुद्र से खारा जल लेते है । समुद्र से खारा जल लेता है और फिर उसको बारिश के रूप में मीठा जल सबको देता है । वो कभी नहीं कहता कि मैने खारा जल लिया है । तो मै भी खारा ही दूगाँ । वो पुण्य करता है उसको मालूम है कि वो मीठा जल समुद्र को भी देगा चाहे उसे खारा मिले. प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग २-  स्वामी रामतीर्थ के जीवन का एक प्रसंग है कि जब वो पढा करते थे उनके पास पैसे नहीं थे । वो गरीब थे खाना नहीं खा पाते थे तो वो दूध पीकर अपना गुजारा कर लेते थे । अपना दिन बिता लेते थे. वो एक दुकान से खरीदते थे दूध. तो एक दिन ऐसा आया कि उनके पास दूध पीने के पेसै भी नही थे, तो उन्हेंानें दूध बंद कर दिया. तो एक दिन उस दूध वाले ने कहा कि आप दूध पीने क्यों नहीं आते तो वो बोले - कि मेरे पास दूध पीने के पैसे नहीं है ।



तो वो दुकानदार बोला –कोई बात नहीं  कि आप दूध ऐसे ही पी लिया कीजिए जब आप के पास हो तब दे देना, तो वो उसके यहाँ उधार का दूध रोज पीने लगे.एक महीने का दूध उधार पिया . फिर कुछ समय बाद उनको एक अच्छी नौकरी मिली. तो जो उनकी पहली सेलरी मिली तो उन्हेंाने उस दूध वाले को पैसे भेजे. जैसे उनकी हर महीने सेलरी आती वो पैसे भेजते. उस दूध वाले के तो उसने सोचा कि इन्हेांने दूध तो एक महीने का उधार लिया था फिर ये हर महीने पैसे क्यों भेजते है ।



तो वो व्यक्ति उनके पास गया और बोला कि आपने मुझसे एक बार दूध उधार लिया था उसके पैसे दे दिए आपने अब हर बार क्यों ? तो वो बोले - कि तुम्हारा अहसान है उसका तो मैंने तुम्हे लौटाया ही मै इसके बाद भी देना चाहता हूँ, बहुत अच्छी बात कहते है.  



जो लौटाते नहीं है वो “राक्षस” होते है । और जो लेने के बाद लौटा तो देता है पर नाप तौल करता है वो “मानव” होता है । और जो वापिस करता है और विचार करता है । कि मैने इतना दिया वो “देवता” होता है । और जो सिर्फ देता जाए विचार न करे मुझे उस श्रेणी का बनना है उस कोटि का बनना है मुझे ऐसा उन्होंने कहा जब व्यक्ति ये कहे कि “मैने दिया” वहीं उसका स्वार्थ हो जाता है । “मै” ही बीच में आ जाता है । जहाँ पर विचार ना हो,मैंने दिया यहीं उदारता है उदारता मतलब है ना किए का, और ना ही किसी को दिए का. कि मैने किसको कितना दिया । वहीं सच्चा परोपकारी है ।



अगर व्यक्ति को स्वाभिमानी बनना है तो वो कुछ ऐसा काम करे कि ना तो पैसे से उसका बदला दे सके और ना ही कैसे भी. अभिमानी बनना बुरा है । पर स्वाभिमानी बनना नहीं है ।



प्रसंग ३- जैसे एक छांेटी सी बच्ची वो एक रेस्टोरेंट में गई. और बोली - अंकल मुझे एक पेस्टी खानी है तो वो कितने की आती है ? वेटर बोला - चालीस रूपए की.  


अब वो छोटी सी बच्ची टेबल पर बैठकर सिक्के गिनने लगी.

तो वो वेटर बोला - जल्दी करो


तो वो बोली - कि अंकल इससे कम में मिल जाएगी ?


वो वेटर कहता है - हाँ छोटी पेस्टी मिलेगी. और वो वेटर पेस्टी लाकर टेबल पर रख देता है । तो लडकी खाने के बाद चली जाती है ।



तो वो वेटर जब प्लेट उठाने जाता है तो वो देखता है कि टेबल पर प्लेट के नीचे दस रूपए टिप के रखे है । उस वेटर को वो बात दिल को छू जाती है । क्योकि वो लड़की चहाती तो ४० रुपये कि पेस्टी खा कर जा सकती थी, पर उसने सिक्के गिने और तो उस लडकी ने पहले वेटर की टिप निकाली फिर जितने पैसे बचे उसकी पेस्टी खाई. चाहती तो वो पूरे पैसे की ही पेस्टी खा सकती थी ।



कहने का अभिप्राय है कि जब व्यक्ति खुद को करने से पहले दूसरों का सोचे वहीं परोपकार है । जिसमंे कोई स्वार्थ ना हो इसके लिए हमें कुछ ज्यादा नहीं करना है हमें बस एक नियम बनाना है कि हम किसी एक व्यक्ति, पक्षी के लिए, एक काम भी बिना स्वार्थ के कर दें । तो समझना आज हम परोपकारी बन गए. उसमें बस घंमड ना हो, उसमें अभिामान ना हो, दिखावा ना हो । प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग ४-  एक किसान था वो अपने खेत में काम कर रहा था तो पुराने समय की बात है तो कुछ सैनिक युद्व से लौट रहे थे । तो उसने घोडों के लिए घास चाहिए थी, तो वो उस गाँव में घुसे और उस किसान को पकड लिया जोकि रास्ते से जा रहा था. तो उससे पूछा - कि यहाँ कि सबसे अच्छी फसल कौन सी है । तो वो किसान बोला - कि यहाँ कोई भी फसल अच्छी नहीं है । आप को अच्छी फसल देखने के लिए मेरे साथ चलना होगा. तो रास्ते में जब वो जाने लगे तो हरे भरे खेत दिखे तो सैनिक कहता है कि इनमें क्या बुराई है । तो वो किसान कहता है नहीं नहीं और अच्छे है कि आप आगें मेरे साथ और चलो. तो चलते है उसके साथ तो और हरे भरे खेत मिले, फिर थोडे आगें जाकर एक खेत मिला.

तो किसान ने कहा - ये ही है तो सैनिकों ने घास काटी और गठठे अपने सिर पर रखकर चलने लगे. तो सैनिक ने कहा – तुम तो बोलते थे कि बहुत अच्छे खेत है कि ऐसे ही खेत तो पीछे भी थे, ऐसे ही खेत उस गाँव में भी थे तो किसान ने कहा-  कि आप लोग जिस खेत से भी घास लेते उसका दाम तो चुकाते नही, तो ये मेरा खेत है और मेरे लिए यहीं सबसे अच्छा है ।



मुझे ये मालूम था कि आप दाम नहीं चुकाओगे तो मै दूसरे के खेत का नुकसान क्यों करू? इसलिए मै आपको अपने खेत में ले आया. जो उस किसान ने इतना कहा. तो सारे सैनिकों के सिर झुक गए. क्योंकि वो चाहता तो किसी के भी खेत में से फसल कटवा सकता था ।  इसने अपना स्वार्थ नहीं देखा इसने सबके खेत बचाए परोपकार किया इसने सैनिकों ने उस किसान को दाम भी दिया उसकी फसल का और पुरस्कार भी दिया.  



हम जितना भी दूसरों को देते भगवान उसका कई गुना हमें लौटा देते है । हमें पता नहीं चलता है । परोपकार लेने के उददेष्य नहीं करना चाहिये क्योंकि वो परोपकार ही नहीं है जिसमें लेन देन के भाव से किया जाए. हमारा किया हुआ एक सत्कर्म खाली कभी नहीं जाता है । बस भगवान तो यहीं कहते है कि तुम एक कदम तो आगें बढाओ मै तुम्हारी ओर दस कदम आगें बढाउगाॅ ।



अब जब हम अपनी शक्ति से एक कदम आगें बढाते है । तो वो परमात्मा तो सर्वषक्तिमान है ।जब वो अपनी शक्ति से आगें बढेगा तो वो हम तक पहले ही पहुँच जाएगा वो कोषिष करने वालों के साथ रहता है और जब वो हम तक पहुँच जाएगा फिर हमें वो और आगें कर देगा उस समुद्र की तरह जो खारा पानी देता है पर बादल उसी खारे पानी के बदले उसको मीठा पानी देता है । बस यहीं परोपकार है ।


“राधे-राधे”   

 

Comments
Enter comments


 
 
Tags :
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com