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अपना अपना नजरिया

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलो के लिए बड़े प्रेम और भाव से भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

“हे गोविद, हे गोपाल, राधा वल्लभ, मदन-गोपाल,

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “अपना अपना नजरिया” हर व्यक्ति अपने हिसाब से कोई वस्तु हो या व्यक्ति हो सबका अपना-अपना एक दृष्टिकोण होता है । पर आध्यात्मिक दृष्टिी से देखें और अपने नजरिए मे हम थोडा सा परिवर्तन करें, तो सबकुछ हमें अच्छा ही दिखेगा. ये दृष्टिकोण बडा मायने रखता है ।

हमें संसार वैसा ही दीखता है जैसा हम देखना चाहते है । वो परमात्मा तो आनंद स्वरूप है । ऐसी ही उसकी बनाई हुई दुनिया उसने इसमें संसार में हर चीज अच्छी बनाई है । हम अपने दृष्टिकेाण से सबकुछ बदले देते है । वो हमें अपने नजरिए से देखते है ।

जैसे शरीर की पुष्टिी खाने से होती है । वैसे ही मन की पुष्टिी अच्छे विचारों से होती है । तो विचार अच्छे आना बहुत जरूरी है जब वो विचार बार-बार आएगें तो धीरे धीरे वो स्थाई हो जाएग. जब वो स्थाई हो जाएगें, तो वो आदत बन जाते है । और  आदत के बाद, वो एक दिन स्वभाव बन जाएगें । यानी वैसे ही वो खुद हो जाता है और वैसा ही उसका नजरिया बन जाता है ।

ये द्रष्टिकोण एक दिन में नहीं होता है । विचार जो चलते रहते है । व्यक्ति के मन में कुछ विचार आकर चले जाते है । और कुछ रह जाते है । वो ही आदत बन जाते है । और फिर संस्कार बन जाते है. तो जैसे ही वो विचार आते है । तो हमें उसका निरीक्षण करना है किे वो कहा से आए खाने में हम अगर स्वाद पर ही ध्यान दे तो हम शरीर को पृष्ट नहीं कर पाएगे क्योंकि जो पुष्टिी वाली चीजें है वो हमारे अंदर आ नहीं पाएगीं. तेा हमारा शरीर बनेगा चलेगा पर उतने अच्छे से नही. तो हमें विचार को देखना है

प्रसंग १-- .एक बार एक डाक्टर के पास एक रोगी गया और बोला कि मुझे शराब पाने के आदत है । और मै छोड नहीं सकता तो मेरी दवा करो. तो वो डाक्टर दो गिलास लाता है । और एक में पानी और दूसरें में शराब को भर देता है । फिर उस व्यक्ति के सामने रखता है और एक में केंचुआ लाते है । अब पानी वाले गिलास में केचुआ डाल देते है । तो वो तैरना लगता है फिर दूसरे केचुएं को शराब वाले गिलास मे डाल देता है । तो उसके  टुकडे हो जाते है ।

तो डाक्टर उस वयक्ति से कहता है कि तुमने देखा कि पानी वाले गिलास में केचुंआ तैरता है । और शराब वाले में उसके टुकडे हो जाते है । तों क्या सीखा तुमने ? तो वो रोगी कहता - कि डाक्टर साहब मैने सीखा कि शराब पीने से पेट के कीडे मर जाते है । ये है नजरिया डाक्टर उसके समझा रहे थे कि शराब कितनी बुरी होती है कि केचुए के टुकड़े टुकड़े हो गए. मर गया, ऐसे ही तुम मर सकते हो पर उस शराबी का नजरिया अलग था । ऐसे ही हम दंनिया को समझते है ।


प्रसंग २- एक बार एक राहगीर कहीं जा रहा था तो उसने देखा कि मंदिर बन रहा है । और बहुत से  मजदूर काम में लगे है । पत्थर तोड रहे है । तो वो व्यक्ति एक मजदूर के पास गया और बोला कि तुम क्या कर रहे हो? तो वो मजदूर बोला - कि दिखाई नहीं देता , कि मै पत्थर तोड रहा हॅू


फिर वो दूसरे मजदूर के पास गया और उससे भी यहीं पूछा - कि तुम क्या कर रहे हो? तो वो बोला कि मै अपने परिवार का पेट पाल रहा हॅू, बीबी और बच्चों के लिए काम कर रहा हूँ । राहगीर और  आगें बढकर तीसरे मजदूर के पास जाकर बोला - कि तुम ये क्या कर रहे हो?  तो वो गुनगुना रहा था ओर बोला-  कि मै मंदिर बना रहा हूँ । 

तो वो राहगीर कहता है कि तीनों काम तो एक ही कर रहे है पर नजरिए अलग-अलग है । एक ने झुझलाकर जवाब दिया, एक उसे काम समझकर कर रहा है जिससे पेट पले उसका, और जिसने गुनगुना कर जवाब दिया वो मंदिर बना रहा है । उसका काम के प्रति समर्पण है । और जहा उसको सकारात्मक नजरिया आया वहा वो उसका काम नहीं रहा वो पैसे के लिए नहीं रहा वो तो पूजा बन गया ।

क्योंकि सफलता पाना जीवन में उतना नहीं है जितना कि अपने काम से प्यार करना व्यक्ति काम तो करता है । पर काम के प्रति समर्पण नहीं है । वो खुष नहीं है । सब पाकर भी. क्योंकि नजरिया सकारात्मक नहीं है । इसके दो पहलू होते है । एक सकारात्मक दूसरा नकारात्मक सकारात्मक में उर्जा उसके पास रहती है । वो नकारात्मक में वो निराषा से घिरा रहता है । और आध्यात्म में व्यक्ति जब आता है । वो आगें बढता है । उसका नकारात्मक नजरिया अपने आप सकारात्मक बन जाता है । क्योंकि इस राह में संत है भगवान का नाम है क्योकि यहाँ भक्तिी है और उनके पास भगवान की ही चर्चा है । और जो खुद ही आनंद है । भगवान तो उनके चारों का वातावरण उर्जामय हो जाता है । जब हम जाते है तो हम भी उसी ऊर्जा से भर जाते है .

तो हमें बस यहीं अपनाना है । कभी-कभी अच्छा कार्य करने पर भी परिणाम अच्छा नहीं मिलता तो हमें उस समय धैर्य से काम लेना है । क्योंकि हमें उस काम के परिणाम की राह देखनी है । अंत में वो अच्छा ही होगा है । हम कोई भी काम करें सबसे पहले हम नकारात्मक विचार करने लगते है । प्रेम से कहिए श्री राधे.

प्रसंग ३- एक बार का प्रसंग है । भगवान हस्तिनापुर आकर दुर्योधन से मिलते है । और कहते कि तुम मेरा काम करो कि अपने राज्य मे जाओ और कोई अच्छा व्यक्ति जो सज्जन हो उसको ढूढॅकर लाओ तो दुर्योधन शाम को आते है । पर उनको केाई भी अच्छा व्यक्ति नहीं मिलता वासुदेव से कहते है कि मेने जितने व्यक्ति देखे सब में कोई ना कोई बुराई थी तो मुझे कोई अच्छा व्यक्ति नहीं मिला.

फिर भगवान ने अजुर्न से कहा - कि तुम जाओ और कोई ऐसा व्यक्ति ढूढ कर लाओ जिसमें बुराई हो तो वो गए पूरे शहर में शाम को लौटे तो वासुदेव से बोले-  कि मै जहा भी गया जितने व्यक्तियों से भी मिला हॅ मुझे किसी में कोई बुराई नहीं दिखी केाई नहीं मिला,मै तो जिस जिस के पास गया मुझे तो  लगता है कि मुझसे बुरा कोई है ही नहीं .कहने का मतलब जिसका जैसा नजरिया उसको सब वैसा ही दिखता है । दुर्योधन में तो अवगुण भरे ही है इसलिए वह सब में वही दिखता था .  तो सबको बुरा ही समझता है । वो विचार उसकी आदत बन चुके थे और वो उसका संस्कार बन गए थे यहाँ तक कि भगवान मै भी बुराई दिखायी देती थी.

प्रसंग ४- एक विचार पूरे जीवन को बदल देता है । एक बार एक कुम्हार था तो वो मिटटी के बर्तन बनाता था तो एक बार उसके मन मे विचार आया कि मै एक सिगार बनाए जिसमें लोग जर्दा रखकर जलाकर पीते है । तो वो सिगार बनाने लगे पर बनातें-बनाते उसके मन में विचार आया कि मै सिगार नहीं बनाउॅगा और उसने विचार को त्यागकर पानी का घडा बनाया तो बनने के बाद वो घडा बोलता है । कि तुमने बहुत अच्छा काम किया तुम्हारे एक विचार ने मेरा पूरा जीवन बदल दिया.

अगर तुम सिगार बना देते मुझे, तो मै खुद भी जलती और दूसरों को भी जला देती जो भी मुझे पाते और बर्बादी की ओर बढते जाते पर तुमने मुझे घडा बना दिया जिससे मै भी शीतल हूँ । और लोगों की प्यास बुझाकर उनको भी शीतलता प्रदान करूगा ।

तो व्यक्ति का विचार ही सबकुछ है । तो हमें उसे ठीक रखना है । जैसे हम होंगें वैसे ही हमारे आसपास के लोग हो जाएगे हमारी आने वाली पीढियाँ बन जाएगीं. तो ये व्यक्ति के उपर निर्भर है । वो चाहे जैसा भी अपने परिवार को बना सकता है । तो हम वहीं देखते है जैसा हम देखना चाहते है । पर जैसे ही हम आध्यात्म में आते है ।  जब हम बाहर से अंदर की गहराई में जाते है । तो सारी चीजें एकदम साफ हेा जाती है । और जब हम शांति से सोचते हैं तो हमें पता चलता कि हमारा मन कहा है तो जब हम एंकात में बैठते है उस वक्त हमारा मन जहा जाता है । वहीं हमारा नजरिया है । तों ये हमें देखना है । कि हमें भगवान याद आ रहे है किे संसार याद आ रहा है । एंकात में तो  अगर भगवान याद है तो हम आध्यात्म में है । और अच्छा बुरा याद है तो हम संसार में है । लोगों की बुराईयाँ नजर आ रही है । तो हम संसार सागर मं है । तो ये व्यक्ति के उपर है कि वो अपने अपने अवगुणों मं और संसार के बुरे दोषों को देख रहा है । क्योंकि यहीं एक पर्दा हमारे और भगवान के बीच है । और जब हमनें ये पर्दा हटा लिया तो मदन मोहन सामने ही खडे होंगें ।

                                                                  “राधे-राधे”

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