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भक्त चरित्र - जनाबाई जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगें

"राधे राधे राधे प्रेम अगाधे श्याम संजीवनी जय जय श्री राधे".......

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है . .

आज के हमारे सतसंग का विषय है “जनाबाई जी” यूँ तो भारत में कई संत हुए और सबकी अलौकिक महिमा है. भारत की मिटटी सबसे पावन है भगवान के सारे अवतार इसी भारत भूमि पर हुए, और संतो का जन्म भी इसी भूमि पर हुआ. महाराष्ट में कई संत पैंदा हुए उनमें से स्त्री संत भी हुए उनमें से एक नाम जनाबाई जी का है जनाबाई केा शायद ही कोई महाराष्ट में ऐसा हो जो नहीं जानता हो ये महाराष्ट की कवित्री कहलाती है .

उन्होंने अपने काव्य में दास्य भक्तिी वातसल्य, योगमार्ग साथ-साथ धर्म रक्षा के लिए जितने अवतार भगवान ने लिए उन सबका वर्णन किया है. इनका काव्य ‘अभग” के रूप में आता है. और अभग का मतलब छोटी-छोटी कविता. तो जनाबाई की तो बहुत सी कविता है .तीन सौ से उपर उनके अभग है ये बात उन्होंने सिद्व की है कि एक स्त्री होकर दूसरे के घर की दासी होकर उन्होनें इतना महान काव्य लिखा तो सब के लिए मार्गदर्शक बन गया.


जनाबाई का जन्म मराठवाडा प्रदेष गंगावाडा में हुआ इनके माता-पिता का नाम दमा और करूण था. ये शुद्व जाति के थे. लेकिन बिठठल नाथ जी के परम भक्त थे. तो जिनके माता पिता भक्त हो. तो उनकी संतान भी भक्त होती है. तो जनाबाई के जन्म के बाद ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया तो ये अपने पिता से पूछती कि माँ कहाँ गई और बहुत रोती अब उनके पिता क्या कहता है . अब ये छोटी सी थी तो ये मरने का मतलब क्या जाने तो इनके पिता कह देते कि तेरी माँ तो बिठठल नाथ जी के पास चलीं गई है . तो पंडलपुर जाने की जिद करती कि आप हमें अभी लेकर चलो वहाँ और बिठठल नाथ जी के पास चलकर मेरी माँ को लेकर आइए


प्रसंग १-  
एक बार इनके पिता जनाबाई को लेकर पंडलपुर आए तो जनाबाई ने बिठठल नाथ जी के मंदिर में खुब पुकारा पर माँ कहीं नहीं दिखी तो इनके पिता को बहुत दुख हुआ और वो मंदिर में अपने मित्र दमासेठी जी के पास गए और जनाबाई केा उनके यहाँ छोड दिया. ओर खुद भी इस संसार से विदा हो गए . अब सात वर्ष की जनाबाई दमासेठी जी के यहाँ दासी बनकर रहने लगी ये घर कोई साधारण नहीं था, इन दमा सेठी जी के पुत्र “नामदेव जी” हुए और नामदेव जी की सेवा जनाबाई करती रहीं और उनके सतसंग से ही जनाबाई की बिठठल नाथ जी के प्रति निष्ठा हुई वो घर के काम करती जाती और बिठठल नाथ जी का नाम लेती जाती क्येांकि वास्तव में जब प्रभु कृपा करते है. जिनके धर में जनाबाई जी आई उनके पुत्र संत नामदेव जी हुए उन्हीं का सतसंग जनाबाई को मिलता रहा और सतसंग की तो बडी महिमा है. जिसके जीवन में “संत” और “सतसंग” आ जाए तो परमात्मा को आने में देर नहीं लगती.

 

अब नाम जप करने लगी तो जप करते-करते डूब जाती थी भगवान में. और नामदेव जी को अपना गुरू मानती थी और नामदेव जी ने उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया पर वो उनको अपना स्वामी और खुद केा दासी मानती थी. उन्होंने अपने अभग में कहा है कि ये परमात्मा की कृपा है. अभग में वो लिखती है कि - जैसे विवाह के लिए वर, वधु के घर जाता है. तो वास्तव में वर की शादी होती है वधु के घर जब साथ में और बारात लेकर जब वो जाता है  तो सारे बारातियों का स्वागत मान सम्मान होता है. सबको खाने पीने मिलता है. तो ब्याह कोई और करता है. और मान सम्मान सबका होता है. तो बोली कि ऐसा ही हमारे साथ है. संत नामदेव ने मुझे स्वीकारा और जो संत के साथ जुड जाता है  उसे परमात्मा वैसे ही मिल जाते है जैसे बारातियों को मिठाई  मिल जाती है. संत के कोई चरण भी पकड ले तो बिठठल नाथ जी उस पर कृपा कर देते है. तो संत की ऐसी अदुभत महिमा है. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

वास्तव में संत के सान्ध्यि में अगर केाई आ जाए तो जैसे पारस पत्थर होता उसको लोहे के साथ छिला दो, चाहे वो अनायास ही जान के छिल जाए तो वो उस लोहे को सोना बना देता है . ऐसे ही संत है-  चाहे कोई संत के पास चला जाए, ओर चाहे संत किसी के पास चले जाए, दोंनों ही स्थ्तियों में उद्वार तो व्यक्ति का ही होना ही है, संत की ऐसी महिमा है . वो यहीं कह रही है कि प्रभु की ये कृपा हुई है मेरे उपर,


तो जो संत की महिमा को जानता है, वो संत से धन कभी नहीं मागॅता क्योंकि वो जानता है इन के पास सारी सिद्वियाँ है . जो भगवान के चरणों में चला जाता है . उसके पास सारी सिद्वियाँ अपने आप ही चली आती है . उसे फिर किसी भी पारस पत्थर से केाई काम नहीं होता है . जैसे रविदास जी को एक संत पारस पत्थर दे गए थे तो रविदास जी ने उसे हाथ भी नहीं लगाया और उस संत से बोले - कि इसे कुटिया की छत पर रख दो और वो संत चले गए अगले साल जब वो आए तो वो पारस पत्थर ज्यों का त्यों रखा रहा, रविदास जी के पास धन भी नहीं था पर उन्होंने उसकी ओर देखा भी नहीं, सनातन गोस्वामी जी ने एक बार पारस पत्थर मिला यमुना के किनारे वृदांवन में. तो एक बार एक बाह्रमण इनके पास आया और बोला कि हमें धन दो तो ये बोले - कि भैया हम तो खुद ही माँगकर खाते है . तुम्हें क्या देंगे ?

पर वो बाह्रमण तो जिद करने लगा,


तो वो बोले - कि मैं भगवान शिव की आराधना करता हूँ . और कल रात में भगवान शिव ने मुझे आकर कहा - कि मुझे आप धन देगे, इसलिए में आपके पास आया हूँ, सनातन जी को याद आया कि मुझे यमुना के किनारे एक पारस पत्थर मिला थाउस व्यक्ति को लेकर यमुना के किनारे गए और पत्थर ढूढनेलगे और पत्थर उस व्यक्ति को दे दिया. और व्यक्ति ने उसका परीक्षण किया और लोहे को टुकडे को उससे छिवाया तों वो सोने का हो गया. 



अब तो बाह्रमण खुश् होकर जाने लगा सनातन जी को धन्यवाद कहकर जाने लगा रस्ते में उसके मन में एक बात आई कि सनातन जी तो वैरागी है इन्होने पारस पत्थर मुझे आसानी से दे दिया लगता है कि इनके पास इससे भी बडी कोई चीज है. तो वो उनके पास फिर से गया ओर बोला - कि आप ने मेरे साथ धोखा किया है . आपके पास इस पारस पत्थर से भी बडकर कुछ है. आप बताइए कि आपके पास ऐसी कौन सी वस्तु है जो इस पारस पत्थर से भी ज्यादा कीमती है.



संत बोले - वास्तव में आप सच कह रहे हो मेरे पास पारस पत्थर से भी बढकर एक रत्न है वो है “भगवान का नाम” अब बाह्रमण को जब दो पल का सतसंग मिला तो उसने पारस पत्थर यमुना में फेंक दिया और सनातन जी से भगवन नाम की दीक्षा ले ली और कुछ दिनों बाद भगवत भक्त संत बन गया.

 

संतो के पास तो ऐसे हजारेां पारस पत्थर है जिनकी ओर वो देखते भी नहीं है उनके पास तो प्रभु का नाम है, सतसंग है, जो इससे भी बढकर है और वास्तव में सतसंग की ऐसी ही महिमा है . संसार के विषयों में जो फसा है . उसे सतसंग मिल जाए तो वो सब छोडकर परमात्मा की ओर लग जाता है . संसार में किसी चीज से कोई लेना देना नहीं है तो जनाबाई अपने अभग में कह रही कि मुझे भगवन का नाम, सतसंग, घर से ही मिल गया और पुर्ण निष्काम होकर  उन्हेांनें बिठठल नाथ जी की शरण ली और सगुण साकार की उपासना से धीरे-धीरे वो निगुण निराकार की साधना करने लगी और अंत में आत्मा का साक्षात्कार हुआ.

प्रसंग २- 
जनाबाई जी की भवगान के प्रति ऐसी निष्ठा थी जब काम करती थी जिस घर में दासी थी उस घर में पंद्रह सदस्य थे. तो सब काम करने पडते थे, कपडें धोना, बर्तन साफ करना, नदी से पानी भरकर लाना, घर आँगन में गोबर का लेप करना, जंगल से लकडी लाना, सारे काम जनाबाई केा करने पडते थे. पर सारे काम करते वक्त प्रभु को कभी नहीं भुलती थी तो सारे काम करती जाती और बिठठल नाथ जी का नाम लेती जाती. मन निरंतर बिठठल नाथ जी में लगा रहता उनके नामों का जोर से उच्चारण करती गान करती मन में उनका स्मरण करती तो जो प्रभु का जैसा स्मरण करता है वे भी उसको वैसा ही याद करते है जैसे धन्ना जाट जी जब ,खेत में काम करते थे तो प्रभु उनके साथ खेतों में काम करते थे तो जनाबाई के साथ भगवान चक्की पीसते, जब जनाबाई कोई भी काम करती तो बिठठलनाथ जी सामने आकर बैठ जाते और सारे काम करते

तो प्रतिदिन जैसे सुबह होती बिठठलनाथ जी दौडे चले आते, क्येंकि जनाबाई उनको याद करती और जब कभी जनाबाई थक जाती तो हमारे बिहारी जी तो सेवा भी कर देते जनाबाई जी के बालों में मक्खन लगाते, उनको नहलाते, बालेां केा बनाते, उनका श्रृगांर भी करते थे. जनाबाई जी का भी भगवान के प्रति “वातसल्य भाव” था प्रभु भी उसी तरह उनसे नाता निभाते  थे भगवान से जो जैसा नाता निभाता है वे भी वैसा ही नाता निभाते है . भक्त का भाव देखते है .


प्रसंग ३- 
 प्रतिदिन बिठठलनाथ जी आते और जनाबाई के साथ काम करवाते और बातें भी करते और शाम को भी आते थे तो एक दिन बिठठलनाथ जी को रात में नींद आ गई और अपने सारे गहनें उतारकर टाँग देते थे क्येांकि जनाबाई जी के साथ काम करवाते थे जब काम कराते थे तो अपना पीतांबर उतार देते थे गहनों के साथ, तो रात केा अपने वस्त्र आभूषण और वो फेटा उतार कर टाँग दिए और नींद आ गई तो सो गए. अब रात में बहुत देर तक बात की तो सुबह नींद जल्दी नहीं खुली. 


तो जनाबाई ने उनको जगाया तो बिठठलनाथ जी हडाबडा के उठे कि अभी हमारे मंदिर के पट खुल जाएगें और हम तो यहीं सो रहे है . तो प्रभु ने जल्दी-जल्दी में जो जनाबाई की फटी चादर प्रभु ओडे थे वहीं बाधकर भागे और जाकर मंदिर में खडे हो गए तो जो पुजारी जी ने पट खोला तो देखा कि बिठठलनाथ जी तो आभुषण नहीं पहने है और पीताम्बर तो है पर फेटा नहीं है सिर्फ एक फटी चादर है तो जब पता लगाया तो पता चला कि वो फटी चादर तो जनाबाई जी की है .

अब तो पंडितो को बडा गुस्सा आया वो तो निरीह थे उन्हें केवल कोरा ज्ञान था भक्तिी नहीं थी, वे इस प्रेम को क्या समझाते. वो जनाबाई के वातसल्य भाव को क्या समझते. तो जब सब लोग जनाबाई के घर गए तो वो बोली कि शायद प्रभु रात में छोड गए होंगें पर जनाबाई रात में रोज मंदिरा जाती थी तो सबको लगा कि ये मंदिर आई होंगी और हमारे बिठठलनाथ जी का पीतांबर और गहने ले गई हेागीं. पर जनाबाई ने तो सारी बात सच सच बता दी पर लोग उनकी बात पर कैसे भरोसा किया, क्येांकि प्रेम की रीत को तो केवन जनाबाई और बिठठलनाथ जी ही समझ सकते है.



संसार के विषयों मे फसे लोग इस प्रेम को नहीं समझ सकते है . तो राजा ने कहा - कि जो हमारे बिठठलनाथ जी के वस्त्रों केा चुराए उसे सूली पर चढा दो ताकि दूसरे लोगों को शिक्षा  मिले और आगें से लोग ऐसा ना करे. तो चंद्रप्रभा नदी पर सुली रखी गई और जनाबाई को चढाने लगे तो उससे पहले उनकी इच्छा पूछी गई,


तो वो बोली - कि अंतिम समय में मैं बिठठलनाथ जी के दर्षन करना चाहती हूँ. तो इनको लेकर भगवान के मंदिर गए तो देखा कि बिठठलनाथ जी का चेहरा मुरझाया है वे उदास से है खडे-खडे रो रहे है. तो जनाबाई का वातसल्य भाव उमड आया और बोली कि बिठठल तुम्हें मेरे कारण कितना दुख हुआ फटी चादर ओढनी पडी, और रोंने लगी अब अतिंम बार मिलने आई थी और फटे आँचल से उनके आँसू पोछने लगी, कि तुम दुखी मत हो. और वापिस नदी के तट पर आई तो हमारे प्रभु कैसे उनकी रक्षा नहीं करते क्येांकि वे हर पल उनको याद करती थी, सुमिरन करती थी,  इतना उच्च वातसल्य भाव था जनाबाई का. तो जब ये सूली के सामने लाई गई तो अचानक वो सुली गायब हो गई और फूलों का एक पेड आ गया और फूल जनाबाई पर गिरने लगे और थोडी देर बाद वो पेड भी गायब हो गया और वहाॅ पानी हो गया.

सब लोगों को बडा आष्चर्य हुआ और समझ गए कि ये प्रभु की ही कृपा है और सबको सच्चाई पता चली तब राजा ने आकर क्षमा मागी तब जनाबाई केा बह्रम ज्ञान हो गया और जनाबाई केा हर तरफ केवल बिठठलनाथ जी ही दिखाई देते है और वो कहती है कि मुझे अन्न मे, जल में, सभी जगह प्रभु ही दिखाई देते है. शैयया में बह्रम के उपर ही मैं सोती हूँ . जहा रूप में मैं बह्रम से ही व्यवहार करती हूँ. उनसे ही लेती हूँ उनको ही दूती हूँ, पूरे संसार में बह्रम के अलावा कुछ भी नहीं है  मेरे अंदर ब्रहम है बाहर ब्रहम है. ऐसी उच्च केाटि की भक्त है उन्होंने बताया है कि ईष्वर कर्मकांड से धनसंमपत्तिी से नहीं मिलते, संसार त्यागने से भी नहीं मिलते, उन्हें पाने के लिए किसी आंडबर की जरूरत नहीं है .

वे तो एक छोटी सी दासी थी. प्रभु की उदारता देखो वे भक्त के भाव के लिए उनके साथ आटा पीसते और घंटो चक्की चलाते थे. वो भगवान जो त्रिलोकी नाथ है जिन्होंनें कभी कोई काम नहीं किया जिनके आगें करोडो भक्त बह्रमा, शिव, इन्द्र सब हाथ बाँधें खडे रहते है . वे चक्की चलाते थे जनाबाई के साथ उनके साथ धान कूटते थे, ये प्रभु की उदारता है क्येांकि जो भक्त प्रभु को जैसा भजता है . वे भी उसे वैसा ही भजते है . वास्तव में इस प्रसंग से भगवान यहीं बता रहे है और जनाबाई भी यही बता रहीं है . कि भगवान के लिए किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं है भगवान अगर बसते है . तो भक्त के भाव में बसते है . और जैसा हमारा भाव होगा वैसे ही हमें प्रभु के दर्षन होंगे

 

Comments
2011-12-22 11:30:27 By gautam

दुनिया का बनकर देख लिया श्यामा का बनकर देख जरा
इस प्रेम के प्याले ओ प्राणी इक बार तू पी के देख जरा
राधा नाम में कितनी मस्ती है इस राह पे चल के देख जरा ||

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