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Pandit Ji

पूजा की पद्धति

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से, आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे, सब मेरे साथ गाये..

“अचुतम, केशवं, कृष्ण दामोदरं,राम नारायाणं जानकी वल्लभं....”  

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “पूजा की पद्धति" तो हमारे जो सनातन पद्धति है पूजा की वो है एक तो वैदिक पद्धति है जैसे हम मंदिरो में देखते है पुजारी जी करते है । तो इसमें पहले पंडित पहले वैदिक मंत्र बोलते है तो जब वो उठाते है भगवान को, या खाना खिलाते है, तो उसमें वेद मंत्र कहते है और उसमें स्वर रहते है । और दूसरी होती है रागानुमा पद्धति. तो वैदिक पद्धति जितने भी बाके बिहारी जी के मंदिर है वहाँ यहीं होती है । हर चीज में पहले मंत्र फिर भगवान को श्रृगांर करना, शयन कराना, हर चीज का अपना मंत्र है ।  मंत्रो के साथ जब पूजा हो तो वो वैदिक पद्धति है दूसरी रागानुमा पद्धति है ये भाव प्रधान है ।  वैदिक में नियम प्रधान है । कि ऐसा नहीं होता कि भगवान को उठा के भोग लगा दिया सब क्रम से होता है । तो इसमें ना तो नियमों में ना मंत्रो में हेर फेर होता है । तो इसमें बडी सावधानी रखनी पडती है पुजारी को.

क्योंकि इसमें उसको नियम से हर चीज करना है । इसमें कोई त्रुटी नहीं होनी चाहिए. दूसरी रागानुगा पद्धति भाव प्रधान है इसमे कोई नियम नहीं है । ना कोई मंत्र है । जो एक भक्त है वो बिहारी जी के सेवा करता है पर उनको नहलाता नहीं है, भोजन नहीं देता, बस भजन ही करता है उनका तो उसके लिए वो ही सबकुछ है । भक्त करता है अगर वो नियम से भी करे पर उसमें कोई त्रुटि रह गई तो उसे कोई फर्क नहीं पडता उसाके भगवान अपनी ओर से पूरा कर देते है । बहुत से जो भाव प्रधान है उनकें मन में जैसा आया उनको वैसा ही भज दिया

प्रसंग १. - एक वृदावंन का प्रसगं है सच्ची घटना है । एक मंहत जी जब भगवान की पूजा करके उनको सुलाते थे तो उनको लगता था कि जब बाँके बिहारी जी शयन करे तो रात में उनको भूख ना लगे तो वो इसलिए रात में चार बूदी के लडडू रखते थे कि भगवान रात में उठकर खा लेंगे और जब वो सुबह मंदिर के पट खोलते तो वो लडडू उनके पलंग पर बिखरे हुए मिलते थे तो ये सत्य घटना है । तो उनका ऐसा भाव था तो देखे तो भगवान तो खुद पूर्ण है जो खुद सूर्य चाँद की रौशनी हमें देते है उनके आगें क्या दीपक जलाएँ, तो हम अपने भाव से उनकों भोग लगाते है तो  ये रागानुमा पद्धति भाव प्रधान है । तो महंत जी का ये भाव था तो एक दिन वो भगवान को शयन करके लडडू रखना भूल गए.

और घर चले गए सोने को तो रात में बिहारी जी ने देखा कि कि प्रसाद नहीं हे तो जिस दुकान से मंहत जी लडडू लाते थे एक बालक के रूप में वो उसकी दूकान पर गए और बोले कि मुझे मिठाई चाहिए तो वो दुकानदार बोले कि मै बहुत कम बनाता हॅू और अब सब खत्म हो चुका है तो वो बालक बोला कि कुछ तो होगा तुम मुझे दो आप अंदर जाकर देखो चार बूदी के लडडे रखे  है. तो वो दुकानदार अन्दर गया तो सच में चार बूंदी के लड्डू रखे थे क्योकि आज वे लड्डू आज मदिर गए ही नहीं थे. अब दूकान दार बोला - पैसे दो! तो बालक कहता है कि मेरे पास नहीं है ।

तो वो कहता है - कि कल तुम अपने पिताजी को भेजना उनसे ले लूँगा अभी तुम ले जाओ. तो वो बालक कहता है कि  - इसके बदले मै तुम कुछ ना कुछ दूँगा तो वो दुकानदार  कहता है-  कि नहीं चाहिए पर वो बालक उसे अपना सोने का कंगन देता है । तो वो कहता है - कि ये क्यों दे रहे हो तो वो मना करते है की चार पैसे के लड्डू के लिए मै तुमसे सोने के कंगन थोड़े ही लूँगा. तो वो कंगन फेंक कर चला जाता है । अब बाबा दूकान बंद करके चले जाते है

तो सुबह महंत जी जब मंदिर के पट खोलते है तो देखते है कि भगवान का पूरा श्रृगांर है । पर उनका कंगन नहीं है तो वो सोचते है कि अगर चोर आया होगा तो वो बिहारी जी का एक कंगन ही क्यों चुराता तो थोडी देर में ये खबर पूरी जगह फैल जाती है । तो वो दुकानदार कंगन को ढूढकर उसको लेकर मंहत जी के पास पहुँचा ओर बोला किे ये कंगन क्या बिहारी जी का है. तो मंहत जी कहते है हाँ पर आपके पास कहाँ से आया. तो वो कहता - कि रात में दो बजे एक बालक आया था वो लडडू लेकर गया और कंगन फेंक गया था तब मंहत जी को याद आता है कि मै रात में प्रसाद रखना भूल गया था ।

तो कहने का मतलब है कि ये जो रागानुना पद्धति है । इसमें भक्त से नियम में कमी रह जाती है तो भगवान अपने से पूरा कराते है । तो इसमें भक्त भाव ही सबकुछ है वो ही भगवान के लिए मायने रखता है । अगर हम मंदिर में भगवान को भोग लगाते है उनको नहलाते है पर भाव नहीं है । तो ये  एक कर्मकांड है । ये पूजा नहीं है । जैसे हम खाते है, नहाते है, ऐसे ही ये एक कर्म है । जहाँ भाव नही वहाँ पूजा कर्मकांड है ।

वो कहते है – “कि राम नाम सब केाई कहे, ठग, ठाकुर, और चोर, बिना भाव रीझे नहीं, नागर नंदकिशोर”

सब भजते है राम का नाम, पर उसमें भाव है कि नहीं जैसे बहुत अच्छा खाना बना हो उसमें सारे मसाले डले हो पर उसमें नमक अकेला ना डला हो तो सारी चीजें फीकीं लगती है । नमक के बिना स्वाद ही नहीं आता है । ऐसे ही पूजा है । आपने उसमें सारी चीजं आपने रख दी पर भाव नहीं रखा तो बेकार है हम माला जप रहे है पर भाव नही तो कर्म कांड है ये ।

प्रसंग २- जैसे कर्माबाई थी वो रोज भगवान का नाम जपती थी तो वो एक दिन भगवान से कहती है कि मै आपको कुछ भोग लगाना चाहती हूँ, पुत्र भाव से भजति थी, भगवान को, तो वो दूसरे दिन खीचडी बनाती है । और भगवान का इंतजार करती थी तो बाल रूप के कृष्ण आते है । और वो खिचडी खाते है तो उनको बहुत आनंद आता है । तो वो कर्माबाई से कहते है - किे क्या माँ आप रोज ऐसी खिचडी खिला सकती हो ? तो वो कहती है - कि हाँ मै रोज बनाके भोगे लगाउॅगी आपकेा, अब रोज वो उठकर सबसे पहले खिचडी बनाती और बाँके बिहारी जी रोज घर पर आते और खाते उनको बडा आनंद आता तो ये रोज का नियम था.

एक बार एक संत उनके पास रहने आया उसने देखा कि ये रोज उठती है और सबसे पहले खिचडी बनाती है । नहाना धोना बाद में करती है । संत उनके पास जाते है । और बोलते है कि आप नहा के रसोई साफ करके खिचडी बनाया करो तो वो अगले दिन उठी और नहा के रसोइ साफ करने लगी खिचडी बनाने लगी अब इधर भगवान दरवाजे पर खडे होकर आवाज लगाते है-  कि माँ ! मै आ गया हॅू.

तो वो बोलती है - कि ठहरो ! मै अभी स्नान कर रही हूँ ,तो भगवान सोचते है - कि मेरी मा केा आज क्या हो गया. तो वो कहते है-  किे मा जल्दी करो, जगन्नाथ पूरी में मेरे भक्त मेरा इंतजार करते है  पुजारी जी पट खोलने वाले है. तो कर्मा बाई जी कहती है - कि रूको ! मुझे रसोई साफ करनी है अभी तो वो सोचते है - कि ये क्या हो गया ?तो फिर उनने जैसे-तैसे वो खिचडी खाकर बिना हाथ धोए गए और बोलने लगे कि माँ आज वो आनंद नहीं आया.

और जब मंदिर का पट खोला मंहत जी ने तो देखा कि बिहारी के मुहॅ में तो खिचडी लगी तो वो कहने लगे - कि ये क्या है ?आप कहाँ से आ रहे हो तो वो कहते है - मै कर्मा बाई के यहाँ से आ रहा हूँ । रोज वो मुझे जल्दी दे देती खिचडी पर उनके घर के पास एक संत आकर रहने लगा तो उसके कोई पटटी पढाई तो आप जाकर उसको समझाओ तो पंडत जी उस संत के पास एक संत को देखा है मुझे तो लगता है कि मेरी माँ को उन संत ने कुछ पट्टी पढाई है आप जाओ और उन संत को समझओं.

अब महंत जी उस संत के पास गए और और बोले कि आपने कर्माबाई से क्या कहा. तो वो बोले कि मैने ये कहा-  कि आप नहा धोके बनाया करो. तो महंत जी ने कहा-  कि ये बिहारी जी का आदेश आप जाकर कर्माबाई से कहो कि जैसे वो पहले बनाती थी वैसे ही बनाया करे.

तो वो संत जाकर उनसे बोला - कि माता जी आप वैसा ही करो रोज सबसे पहले बिहारी जी केा खिचडी बनाओ,ये नियम धर्म तो हम जैसे सन्यासियों के लिए है आपके जैसे भाव थे वैसे ही बनाओ .

तो फिर दूसरे दिन उन्हेांने खिचडी बनाई और भगवान ने खाकर कहा - कि आज वहीं आनंद आया है जब कर्माबाई का देहांत हो गया. तो उस दिन जब महतं जी ने जगन्नाथ भगवान के पट खोले तो बिहारी रोने लगे. तो मंहत बोले प्रभु क्यों रो रहे हो ?

भगवान बोले - कि आज मेरी मा मर गई. जो मुझे रोज खिचडी बनाके खिलाती थी । महतं जी ने कहा कि आप चाहते तो उन्हें और जीने देते सब आपके हाथ में तो है । भगवान कहते है - कि ये तो सृष्टिी का नियम है । तो महतं जी कहते है – आज से आपको पहले खिचडी का भोग लगेगा बाद मे छप्पन भोग लगेगे ।

कहने का मतलब भगवान ने भक्तिी में कोई नियम नहीं है ये जो दोष व्याधिया है । वो शरीर की है और हमें भगवान को मन और आत्मा से भजना है । जिसमें कोई नियम नहीं है । हमने सारी साफ सफाई कर ली पर भाव नहीं आया तो सब बेकार है भक्तिी, भाव मागती है ।

प्रसंग ३- वृंदावन के संत थे वो अपनी कुटिया के बाहर बैठे थे तो एक व्यक्ति दर्षन करके आ रहा था बाके बिहारी जी तो वो संत गा रहे थे कि “नयन हमारे अटके श्री बिहारी जी के कमल चरण में” जो उस व्यक्ति ने सुना ये भाव तो वो उनके पास बैठकर गाने लगा तो बुहत समय बीत गया तो जब दर्षन करके  घर  गया तो वो भी वो भाव गाने लगता है. पर उसको शब्द याद नहीं रहते वो भूल जाता है । तो वो उलटा गाने लगता है  “कि नयन बिहारी जी के अटके हमारे कमल चरणों में“

मतलब बिहारी के नयन हमारे चरणों में अटके तो वो गलत गा रहा था पर जैसे उसने उसी प्यारे भाव से गाया तो जब ग्यारह बार गाया भगवान के विग्रह के दर्शन में पहले चरणे से ही शुरू होते है । फिर उपर आते है । चरणों से सिर तक्.  तो वो यहीं भाव रखकर गा रहा था पर गलत गा रहा था तो साक्षात बिहारी जी प्रकट होकर उसे बोले कि लोग मेरे चरणों में अपने नयन अटकाते है पर तुमने तो मेरे नयन अपने चरणों में अटका दिए. तुम जैसा भक्त तो पहली बार देख तो भगवान ने उसके भाव देखे वो शब्द को नहीं देखते वो तो भाव देखते है । वो बस प्रेमकी बोली ही बोलते है और भाव की भाषा ही समझते है तो वो रागानुमा भक्तिी को मानते है । इसमें अगर त्रुटि होती है । तो उसे अपने से पूरा कर लेते  है ।

                                                            “राधे-राधे”

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