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भक्त चरित्र - वृजमोहन दास जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे

“राधे-राधे गोविंदा, श्री राधे-राधे गेाविंदा,गोविंदा-गोविंदा –गोविंदा,....”  

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है .

आज के हमारे सतसंग का विषय है भक्त चरित्र -  “श्री ब्रजमोहन दास जी”  ये वृदावंन के बडे सिद्ध संत है . जिनका पूरा चरित्र जीवन चमत्कारों से भरा है जोकि  ब्रज में ही “सूरमा कुंज” में रहा करते थे क्योंकि भजन में और सदा प्रभु की लीलाओ में मस्त रहते थे. संत की अपनी मस्ती होती है, जिसे किसी से मोह, कोई आसक्तिी नहीं है. ऐसे ही इनके जीवन का एक बडा प्रसंग है. जोकि वृदावंन की महत्वतता को बताता है.

कहते है कि जो वृदांवन में शरीर को त्यागता है. तो उन्हें अगला जन्म श्री वृदांवन में ही होता है. और अगर कोई मन में ये सोच ले संकल्प कर ले कि हम वृदावंन जाएगे, और यदि रास्ते में ही मर जाए तो भी उसका अगला जन्म वृदांवन में ही होगा. पर केवल संकल्प मात्र से उसका जन्म श्री धाम में होता है

प्रसंग १-  ऐसा ही एक प्रसंग श्री ब्रजमोहन दास जी के सम्मुख घटा. तीन मित्र थे जो युवावस्था में थे तीनों बंग देश के थे. तीनों में बडी गहरी मित्रता थी, तीनो में से एक बहुत सम्पन्न परिवार का था पर उसका मन श्रीधाम वृदांवन में अटका था, एक बार संकल्प किया कि हम श्री धाम ही जाएगें और माता-पिता के सामने इच्छा रखी कि आगें का जीवन हम वहीं बिताएगें, वहीं पर भजन करेंगे. पर जब वो नहीं माना तो उसके माता-पिता ने कहा - ठीक है बेटा!  जब तुम वृदांवन पहुँचोंगे तो प्रतिदिन तुम्हें एक पाव चावल  मिल जाएगें जिसे तुम पाकर खा लेना और भजन करना,

जब उसके मित्रो ने कहा - कि अगर तुम जाओगे तो हम भी तुम्हारे साथ वृदांवन जाएगें तो वो मित्र बोला - कि ठीक है पर तुम लोग क्या खाओगे?  मेरे पिता ने तो ऐसी व्यवस्था कर दी है कि मुझे प्रतिदिन एक पाव चावल मिलेगा पर उससे हम तीनों नहीं खा पाएगें. तो उनमें से पहला मित्र बोला - कि तुम जो चावल बनाओगे उससे जों माड निकलेगा मै उससे जीवन यापन कर लूगाँ. 

दूसरे ने कहा - कि तुम जब चावल धोओगे तो उससे जो पानी निकलेगा तो उसे ही मै पी लूगाँ ऐसी उन दोंनों की वृदावंन के प्रति उत्कुण्ठा थी उन्हें अपने खाने पीने रहने की कोई चिंता नहीं है . तो जब ऐसी इच्छा हो तो ये साक्षात राधा रानी जी  की कृपा है . तो वो तीनेां अभी किशोर अवस्था में थे.

तीनों वृदांन जाने लगे तो मार्ग में बडा परिश्रम करना पडा और भूख प्यास से तीनों की मृत्यु हो गई और वो वृदांवन नहीं पहुँच पाए. अब जब बहुत दिनों हो गए तीनों की कोई खबर नहीं पहुँची तो घरवालों को बडी चिंता हुई कि उन तीनो में से किसी कि भी खबर नहीं मिली. तो उन लडको के पिता ढूढते वृदांवन आए, पर उनका कोई पता नहीं चला क्योंकि तीनों रास्ते में ही मर चुके थे,

तो किसी ने बताया कि आप ब्रजमोहन दास जी के पास जाओ वो बडे सिद्ध संत है. तो उनके पिता ब्रजमोहन दास जी के पास पहुँचे और बोले - कि महाराज हमारे पुत्र कुछ समय पहले वृदांवन के लिए घर से निकले थे पर अब तो उनकी कोई खबर नहीं है . ना वृदांवन में ही किसी को पता है .

तो कुछ देर तक ब्रजमोहन दास जी चुप रहे और बोले - कि आप के तीनों बेटे यमुना जी के तट पर, परिक्रमा मार्ग में वृक्ष बनकर तपस्या कर रहे है . वैराग्य के अनुरूप उन तीनेां को नया जन्म वृदांवन में मिला है . जब वे श्री धाम वृंदावन में आ रहे थे तभी रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई थी. और जो वृदावंन का संकल्प कर लेता है . उसका अगला जन्म चाहे पक्षु के रूप या पक्षी के या वृक्ष के रूप में वृदांवन में होता है . तो आपके तीनेां बेटे यमुना के किनारे वृक्ष है वहाँ परिक्रमा मार्ग में है. और ये भी बता दिया कि कौन सा किसका बेटा है .

बोले कि - जिसने ये कहा था कि मै चावल खाकर रहूगाँ वो “बबूल का पेड” है जिसने ये कहा था कि मै चावल का माड ही खा लूँगा “बेर का वृक्ष” है . जिसने ये कहा था कि चावल के धोने के बाद जो पानी बचेगा उसे ही पी लूँगा तो वो बालक “अश्वथ का वृक्ष” है .उन्हें उन तीनो को ही वृदावंन में जन्म मिल गया उन तीनों का उददेश्य अभी भी चल रहा है. वो अभी भी तप कर रहे है . पर उनके पिता को यकीन नहीं हुआ तो ब्रज मोहन जी उनको यमुना के किनारे ले गए और कहा कि देखो ये बबूल का वृक्ष है ये बैर का और ये अश्वथ का.

पर उन लेागों के दिल में सकंल्प की कमी थी तो उनको संत की बातों पर यकीन नहीं किया पर मुहॅ से कुछ नहीं बोले और उसी रात को वृदांवन मे सो गए थे जब रात में सोए,तब तीनों के तीनों वृक्ष बने बेटे सपने में आए और कहा कि पिताजी जो सूरमा कुंज के संत है श्री ब्रजमोहन दास जी है . वो बडे महापुरूष है उनकी दिव्य दृष्टिी है उनकी बातों पर संदेह नहीं करना वे झूठ नहीं बोलने है और ये राधा जी की कृपा है कि हम तीनों वृदांवन में तप कर रहे है .

तो अब तीनेां को विश्वास हो गया और ब्रजमोहन दास जी से क्षमा माँगने लगे कि आप हमें माफ कर दो हमें आपकी बात पर सदेंह हो गया था सपने की पूरी बात बता दी तो ब्रज मोहनदास जी ने कहा कि इस में आपकी कोई गलती नहीं है  तीनों बडे प्रसन्न मन से अपे घर चले गए.

एक संत ब्रजमोहनदास जी के पास आया करते थे श्री रामहरिदास जी,  उन्हेंनें पूछाँ कि बाबा लोगों के मुहॅ से हमेशा सुनते आए कि “वृदांवन के वृक्ष को मर्म ना जाने केाय, डाल-डाल और पात-पात श्री राधे राधे होय” तो महाराज क्या वास्तव में ये बात सत्य है . कि वृदावंन का हर वृक्ष राधा-राधा नाम गाता है

तो ब्रजमोहनदास जी ने कहा क्या तुम ये सुनना या अनुभव करना चाहते हो तो श्री रामहरिदास जी ने कहा - कि बाबा! कौन नहीं चाहेगा कि साक्षात अनुभव कर ले. और दर्षन भी हो जाए. आपकी कृपा हो जाए, तो हमें तो एक साथ तीनो मिल जायेगे. तो ब्रजमोहन दास जी ने दिव्य दृष्टिी प्रदान कर दी. और कहा - कि मन में संकल्प करो और देखो और सामने तमाल का वृक्ष खडा है उसे देखा, तो रामहरिदास जी ने अपने नेत्र खोले तो क्या देखते है कि उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों से राधे-राधे लिखा है उस वृक्ष पर लाखों तो पत्ते है . जहाँ जिस पत्ते पर नजर जाती है . उस पर राधे राधे लिखा है तो और पत्ते हिलते तो राधे-राधे की ध्वनि निकलती है .

तो आष्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और ब्रजमोहन दास जी के चरणों में गिर पडे और कहा कि बाबा आपकी और राधा जी की कृपा से मैने वृदांवन के वृक्ष का मर्म जान लिया इसको केाई नहीं जान सकता कि वृदांवन के वृक्ष क्या है?  ये हम अपनेशब्दों में बयान नहीं कर सकते ,ये तो केवल संत ही बता सकता है हम साधारण दृष्टिी से देखते है . जहाँ पर हर डाल, हर पात पर, राधे श्याम बसते है .

व्रज की महिमा को कहे, को वरने व्रज धाम,
जहा बसत हर सास में श्री राधे ओर श्याम
व्रज रज जकू मिली गई, बकी चाट ना शेष,
व्रज की चाहत में रहे, ब्रह्मा विष्णु महेश

वृदांवन की  महिमा केा कौन अपनी एक जुबान से गा सकता है स्वंय शेष जी अपेन मुखों से वृदांवन की महिमा का गुणगान नहीं कर सकते है . जहाँ ब्रज की रज में राधे श्याम बसते है . ब्रज की चाहत तो बह्रमा महेष विष्णु करते है .


ब्रज के रस कु जो चखे, चखे ना दूसर स्वाद

एक बार राधा कहे, तो रहे ना कुछ ओर याद   
जिनके रग-रग में बसे श्री राधे ओर श्याम
ऐसे व्रज्वासिन कु शत-शत नमन प्रणाम

क्येांकि संत को वो वृदांवन दिखता है जो साक्षात गौलोंक धाम का खंड है . हमें साधारण वृदांवन दिखता है. जैसे स्वामी श्री हरिदास जी के जीवन का प्रसंग जब अकबर को हरिदास जी ख्याति के बारे में पता चला तो वो उनके पास जाकर बोले कि मै राजा हूँ ब्रज के लिए कुछ करना चाहता हूँ आप बताइए तो हरिदास जी को लगा कि इसे अभी कुछ अहंकार है अपने पद का,तब हरिदास जी ने समझ गए और सोचने लगे कि इन्हें ऐसा काम देना चाहिये जिससे इन्हें व्रज कि महिमा का पता भी चल जाए और इनका अहंकार भी टूट जाए.  

तो हरिदास जी  बोले -  यमुना जी के किनारे तट पर सीढियों में से एक का कुछ भाग टूट गया है आप उसको सही करवा दीजिए, अकबर ने जो ये बात सुनी तो जोर से हसॅने लगे कि आप मुझे इतना छोटा सा काम करने को दे रहे हो, सीढी का एक छोटा सा हिस्सा बस,

प्रसंग २-  तो हरिदास जी ने कुछ नहीं कहा और यमुना जी के किनारे ले गए और राधा जी की कृपा से कुछ समय के लिए दिव्य दृष्टिी अकबर केा दे दी और अकबर ने देखा - कि यमुना जी के तट की एक-एक सीढी में करोड-करोड दिव्य पद्मराग मणियाँ जडी है और यमुना जी की हर सीढी जगमगा रही है . ऐसी एक भी मणी अकबर के खजाने में नहीं है . और अकबर समझ कि प्रभु ने ऐष्वर्य बता दिया है और हरिदास जी के चरणों में गिर पडे और कहा कि यमुना जी की सीढी बनवाने में जो पत्थर लगे है उसको बनवाने के लिए मै पूरा खजाना लगा दूँ तो भी मै नहीं बनवा पाउगाँ मेरे पास ऐसी मणी नहीं है.

तो संत को वृदांवन वैसा ही दिखता है जैसा गौ लोक धाम से उतारा है . जहाँ कि भूमि में करोडो मणियाँ जगमगाती है. जहाँ का हर वृक्ष, पशु, पक्षी, कोई ना केाई संत,भक्त है, जो तप कर रहे है . तो जब केाइ्र भक्त वृदांवन जाता है . तो वो वहाँ की हर वस्तु को प्रणाम करता है . वहाँ की रज को मस्तक में में लगाता है क्येांकि वो जानता है कि ये सब केाई ना केाई संत भक्त है .

इस तरह ब्रज मोहनदास जी के जीवन में कई चमत्कारिक घटनाएँ घटी भावराज में जाकर प्रभु की लीला का आनंद उठाते थे सूरमा कुंज उनकी निवास स्थली है .  उसकी भी बहुत महिमा है .

एक बाबा सोलह वर्ष की उम्र में श्री धाम वृदांवन में आए तो वहाँ आकर श्री कृष्णदास जी के भक्त हुए तो सूरमा कुजं को अपनी तपोस्थ्ली बनाया उस समय उसका नाम सूरमा कुंज नहीं था तो सब छोडकर वहाँ पर तप करने लगे अन्न-जल त्याग कर ब्रज रज खाते थे. ऐसी निष्ठा थी तो ब्रज रज खाने लगे तो शरीर क्षीण हो गया.

राधे-राधे नाम दिन रात जपते थे एक जगह मरणासन्न स्थ्तिी में बैठ गए राधे नाम ही लेते रहते थे . तो राधा जी ने देखा कि बाबा कुछ ही समय में शरीर को छोड देंगे तो राधा जी बिहारी जी के पास जाकर बोली-  कि प्रभु इस भक्त मुचकुंद केा देखो जो मेरा ही नाम लेता रहता है . और ब्रज की रज खाता है . अब तो मरणासन्न स्थ्तिी में है . प्रभु इस पर कृपा नहीं करोगे तो भगवान ने कहा कि  वृदांन की अध्षिाठाती तो आप हो, आपकी आज्ञा के बिना तो कुछ नहीं हो सकता है आपने कृपा कर दी तो अभी चलो भक्त को दर्षन देते है. तो राधा जी को मुकंदानंद की दशा देखकर आँखों में आँसू आ गए दोनों जन प्रकट हो गए. और मुकंदानद जी इतने रोए कि आँखो की रोषनी चली गई पर राधे नाम लेते रहे तो राधा जी ने कहा - कि देखो तुम्हारे सामने कौन है . तो आवाज सुनकर ये खडे हुए पर आँखों की ज्योति चली गई थी तो कुछ देख नहीं पाए तो राधा जी ने इनकी आँखों में सूरमा लगा दिया तो सूरमा लगा देने के बाद अपने दर्षन दिए और कहा कि बाबा हमारा ये विग्रह रखो और अर्तंध्यान हो गए तो बाबा नाचने लगे कि मुझे तो भगवान का दर्षन हो गया और आनंद से नाचने लगे तो नयनो मं आनंद के कारण “राधानयनानंद ठाकुर जी”  का नया नाम पड गया और राधा जी ने उनकी आँखों में सूरमा लगाया था तो अब मुकंदानंद जी का नाम “सूरमानंद” पड गया और जिस स्थान पर वो तप कर रहे थे वहाँ का नाम सूरमाकुंज पड गया जो आज भी वृदांवन में पत्थरपुरा में है जहाँ पचास से उपर मंदिर है .

तो ब्रजमोहनदास जी की तपोस्थ्ली रहा है . उनके कोई षिष्य नहीं थे पर जब वो भागवत करते थे थे तो कई शिष्य बन गए उन्हीं में से एक कोई को गददी में बिठाकर सन उन्नीस सौ पंद्रह में भगवान की निकुज लीला में उनका प्रवेश हुआ तो ऐसे कई संत हुए जिन पर भगवान ने अपनी कृपा की और लीला में प्रवेश दिया. ऐसे संतो के चराणों में केाटि केाटि प्रणाम  है .

 

Comments
2011-12-19 11:47:28 By ramjeewan solanki

cow is a mother

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