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भक्त चरित्र - श्री ललितलड़ैती जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवान नाम का कीर्तन करेंगें

“राधे-राधे-राधे प्रेम आगाह दे, श्याम संजीवनी, जय-जय-जय श्री राधे...”

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है .

आज के हमारे सतसंग का विषय है भक्त चरित्र -  “भक्त ललित लडैती जी” संसार में एक से बढकर एक विरक्त संत भक्त हुए, जिनके जीवन में भगवान की अनूभूति हुई. भगवान की लीला में उनका प्रवेश हुआ साक्षात प्रभु ने दर्शन दिए ऐसे बहुत संत है .ऐसे बहुत से संत है जो संसार के सामने नहीं आए जिन्हें परमात्मा की भक्ति के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगा.


ऐसे ही भक्त है. “इन्द्रभानु जी”  जिनका नाम ललितल लडैती जी पडा. ये पंजाब के रहने वाले थे एक कुलीन वैवैष्णव परिवार में इनका जन्म हुआ इनके पिता मुशीं जी थे, बचपन से ही भगवान का नाम संतसंग में इनकी रूचि थी. बडे होने पर इनके पिता ने इनका विवाह कर दिया इनकी पत्निी बडी कुशल थी.  विवाह के बाद भी सतसंग करते रहे. सरकारी नौकरी थी इनकी. जब भी नौकरी के बाद घर आते जो भी समय मिलता उसे सतसंग में बिताते या फिर शास्त्रों का अध्ययन करते या अनाथों की मदद करते थे. पर इनके पिता को ये अच्छा नहीं लगता था. कि ये हर समय भक्तिी सतसंग ही करते रहते है.



तो इनके पिता ने इन्हें घर से निकाल दिया और संमपत्तिी में भी केाई हिस्सा नहीं दिया, तो इन्द्रभानु जी बडे प्रसन्न हुए कि ये अच्छा हुआ पहले परिवार वालों ने निकाल दिया अगर ये नहीं निकालते तो में घर परिवार के कर्तव्यों में फस जाता यहीं गोपी कहती है -  कि “भलो भयो मेरी मटकी फूटी मै दही बेचन से छूटी” गोपी की मटकी फूट जाती है. ओर वो दिनभर दही बनाती है. और भगवान उस मटकी को फोड देते है . तो वो गोपी भगवान को धन्यवाद देती है. कि अगर ये मटकी नहीं फूटती तो मेरा ध्यान इसी दही में लगा रहता और मै भगवान को याद ही नहीं कर पाती, ना रही मटकी ना रहा दही. तो इन्द्रभानु जी को ये अच्छा लगा और दूसरी जगह पर जाकर रहने लगे. उस समय उनको चालीस रूपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. घर का खर्च निकालकर जो भी पैसा बचता उसे सग्रंह नहीं करते गरीबों में बाट देते थे.



कई बार वृदांवन भी गए और इनके गुरू का श्रृगांर वट में स्थान था. वृंदावन पहुचकर मन एक एकदम विरक्त हो गया. और वहाँ से काव्य का स्फुरण अपने आप होने लगा और काव्य लिखने लगे. केाई ऐसे वैसे पद नहीं थे, मंजरी भाव की उपासना करते थे. तो मंजरी भाव के ही पद लिखते थे, प्रिया प्रियतम की सदा प्रिया प्रियतम की लीलाओं का वर्णन करने लगे, उन ललित लड़ैती जी के पदों की लिपिबद्ध कर दिया.



ओर अपने आफिस में जाकर त्याग पत्र दे दिया, अपने साहब से बोले कि हमें ये नौकरी नहीं करना है . तो इनके साहब बोले कि आप ये क्यों छोड रहे हो तो वो बोले कि अब मैं ये संसार की नौकरी नहीं करूगाँ तो वो जानते थे कि ये बहुत सजज्न व्यक्ति है . तो वो बोले - कि आप पेन्सनं होने तक तो रूको पर इन्द्रभानु जी कहाँ मानने वाले थे. बोले अब तो प्रिया प्रियतम की नौकरी मिल गई है अब संसार की नौकरी कैसे कर सकता हूँ. और इस्तीफा देकर आ गए ओर उनके साहब ने उन्हें पेन्सन दिलवा दी सोलह रूपए मिलते थे इनकेा. तो उसी में जीवन भर अपनी और संतो की सेवा की.
जहाँ पर ये रहते थे तो आसपास के लोग इनको स्वामी जी कहने लगे और इनकी कथा में आते और सतसंग सुनते थे. 


प्रसंग १. - एक बार इनकी पत्नी पर कृपा हुई. इनके यहाँ संतान नहीं थी, तो पत्नी की कामना संतान की थी. उन्हें एक ऐसे पति मिले थे, जो सिद्ध पुरूष थे और भजनानंदी थे. पर उनके मन में मोह माया में था, कि काश प्रभु ने एक संतान दी होती तो कितना अच्छा हेाता, तो ये मन ही सारे फसाद की जड़ है. तो आसक्तिी ही इंसान को संसार में फसाती है . बडे-बडे संत भी मोह और आसक्तिी से नहीं बचे, जडभरत जी को जवानी में वैराग्य आया और सारा राजपाट छोडकर वन में गंडकी नदी के किनारे बैठकर तपस्या करने लगे, और एक हिरण के बच्चे के मोह में फस गए और तप छूट गया भजन छूट गया और हिरन का बच्चा याद रहा उसी को याद करते हुए मरे तो अगला जन्म हिरण का हुआ. हम सबने भरत जी की कथा सुनी है.


तो सारी फसाद की जड मन है. अगर ये चीजों में फसा तो मोह में रह गया और और परमात्मा में लगा तो मुक्तिी हो गई. मन चीजों में लग गया तो मोह हो गया मन यदि संसार से हटकर परमात्मा में लग गया तो मुक्ति हो गई, बंधन और मुक्तिी का कारण मन है. 



संत कहते है. कि मन को कैसे भी समझाओ पर इसे परमात्मा में लगाओ, तो इन्द्रभानु जी के पास दूर दूर से लोग आते थे सुनकर बहुत से लोगो को सद्बुद्धि मिलिती थी परन्तु पत्निी का मन अभी संतान में अटका था, उनकी एक भतीजी थी जिसका नाम राधा था, तो वो स्वामी जी से बोली - कि हम इस को गोद ले ले.



तो स्वामी जी ने कहा - ठीक है जैसा आप करना चाहती हो वैसा करो. पर एक बात का ध्यान रखना कि “संपत्तिी”, “संतति” दोनों ही माया में फसाने वाली चीजे है, और जो माया है वो बंधकारी है और अंत में दुख देकर जाती है. और माया में बॅधकर प्रभु से दूर हो जाता है. आज अपने बेटे बेटी कल को उनके भी होंगे, तो फिर इन सब में फसकर परमात्मा याद नहीं आते है , जिंदगी बहुत छोटी कब बीत जाए ये पता हीं नहीं कब चली जाए.



पर इनकी पत्निी नहीं मानी ओर उसे घर लेकर आई पाला-पोसा और बडे होने पर उसकी शादी कर दी ओर विवाह के कुछ दिनों के बाद उनकी बेटी की मृत्यु हो गई, तो स्वामी जी को कुछ तो नहीं हुआ क्योंकि उनका मन तो सदा ही वैराग्य पूर्ण था, बेटी नहीं थी तब भी, और आई तब भी कोई फर्क नहीं पडा, जब ये बात कोई गाँव वाला उनके पास कहने आया. तो उस समय वो सतसंग कर रहे थे और अंदर इनकी पत्निी बेठी थी तो वो रोने लगी. स्वामी जी तो सदा भगवान की लीला में रहते थे वो लीला में प्रवेश भी पाते थे खुद उन्हेंनें अपने पद में लिखा है. कि रोज मुझे प्रभु दर्शन देते है.



और जब ये घर के अंदर गए तो देखा कि इनकी पत्निी को दिल का दौरा पडा है. और वो जमीन पर गिर पडी जब देखा तो झट तुलसी का पत्ता उनको दिया और भगवान का चरणामृत दिया ओर बोले कि तेरे मुहॅ में तुलसी का पत्ता अब जल्दी से उठ जाओ, तो भगवान के चरणामृत पाते ही एकदम ठीक हो गई.पर यू एकदम से ठीक नहीं हुई थी उसमे भी एक राज था



जब तीन वर्ष बीत गए तो स्वामी जी के बहुत सारे शिष्य बन गए थे, एक दिन उनके एक शिष्य थे नवनीत राम, तो उनको उन्हेंने बाजार भेजा और कहा मैंने इस पर्चें में सामान लिखा उसे लेकर आओ तो वो शिष्य उसे पढने लगा उसमें वो सारी चीजें लिखी तो जो मरते समय मगाँई जाती है. रूई, कपडा, घी घड़ा, तो उस शिष्य को समझ नहीं आया. कि  गुरूजी ने ये सारी चीजें क्यों मॅगाई है. वो जानता था कि स्वामी जी कोई साधारण नहीं है. कोई जरूर बात होगी,



तो स्वामी जी ने वो सामान लेकर अलमारी में रख दिया और शाम को इनकी पत्निी की अचानक तबीयत खराब हो गई तो आश्रम में भींड हो गई तो स्वामी जी बोले - कि तुम घबराओ मत ! तुम नंद नंदन की बस्ती में जा रही हो, आंनदपूर्वक जाओ!  चिंता मत करो. और सबके देखते-देखते वो गौ लोक धाम को चली गई.



तो वो शिष्य देखता रह गया कि स्वामी जी को पता था कि ये मर जाएगीं तो स्वामी जी ने स्वयं इस राज को खोलावे कहने लगा - कि आज से तीन साल पहले जब मेरी पत्निी को दिल का दौरा पडा था इनकी मृत्यु उसी समय की थी लेकिन मैने भगवान से प्रार्थना की और नंदनदंन प्रकट हो गए, मैंने उनसे कहा - कि प्रभु ! कितने लोगों को मैं आपकी कथा सुनाता हूँ. मेरे पास आके नाम रूपी “संपत्तिी”पाते है, परन्तु मेरी पत्निी की अभी “संपत्तिी और संतति” में आसक्तिी है. तो मैं ये नहीं चाहता कि ये आसक्तिी लेकर इस संसार से जाएँ मैं ये चाहता हूँ . कि जब ये संसार से जाएँ तो इनके अंदर की वासनाएँ चली जाए.



तो उस समय भगवान श्री कृष्ण ने कहा - कि आज से ठीक तीन साल बाद इसी दिन ये मेरे गौ लोक धाम को जाएँगी और आज जब ये संसार को छोडकर गयीं तो इनके मन मे संसार की संमपत्तिी ओर संतति की कोई आसक्तिी नहीं है. मैंने इन तीन सालों में इनको संसार की वासनाँओं से मुक्तिी दिला दी है. अब इनकी बुद्वि परमात्मा में लगी है. इसलिए मैंने सुबह सारी सामग्री मॅगाई थी और किसी ने एक आँसू भी नहीं बहाया सबको पता था कि इनकी मुक्तिी हो गई है. और सब स्वामी जी के चरणों में गिर पडे कि धन्य है आप.
संत का स्वभाव ही ऐसा है. वो कभी अपने बारे में नहीं सोचता है. उसके लिए तो संसार ही उसका घर है

 

प्रसंग २-  इसी तरह इनकी भक्तिी की चर्चा दूर दूर तक फैली थी तो रोज लोग सतसंग में आते थे. तो एक दिन स्वामी जी कथा करते हुए बोले - कि जो भगवान का परमभक्त होता है. भगवताकार होता है. तो सारी रिद्धि-सिद्धि अपने उसके पास आती है. उस भक्त को चाहत नहीं होती है. पर वो उसके पीछे भागती है. वो उनको प्रर्दशित नहीं करता है. क्योंकि उसे तो अपने परमात्मा की भक्तिी चाहिए और उसके अलाया उसकी रूचि और किसी भी चीज नहीं होती है.


अब वहीं पर एक भक्त थे उनके मन में ये बात आई कि स्वामी जी इतने बडे भागवतकार है . पर इनमें कभी कोई सिद्धि नहीं देखी और अपने घर सो गए , तो स्वप्न में देखा कि स्वामी जी आए और अगूठा किसी ने जोर से मरोड दिया जोर से चिल्लाए और जब सुबह उठे तो देखा कि अगूठाँ सूज गया सत्संग के समय नियमनुसार स्वामी जी के पास गए और और सवामी जी के आश्रम में जाकर उनके चरण दबाने लगे, तो अगूठे से तो दबा नहीं पा रहे थे, सिर्फ उगलियों से पैर दबा रहे थे तो स्वामी जो को तो सब पता था. तो वो बोले - कि क्या बात आज अगूठे को किसी ने मरोड दिया है. लगता है कि किसी योगी ने तुम्हें सिद्धि दिखाई है. भक्त तुरंत समझ गया कि मैंने जो इनकी सिद्धि पर शंका की है . उसी का परिणाम है . ये मेरे सपने में अपनी सिद्धि द्वारा आए और मुझे दंड दिए तो उसने स्वामी जी से क्षमा माँगी.



प्रसंग ३- एक बार एक नूतनदास नाम के व्यक्ति थे एक बार उनको अपने घर के लिए पैसे चाहिए थे तो एक व्यापारी से सौ रूप्ए उधार ले लिए, अब सेठ ने कहा - कि देखो अगर तुमने नियत समय पर पैसे नहीं लौटाए तो सौ के दौ सो रूपए देने पडेंगे,  नूतन दास जी बोले ठीक है. और पैसे लेकर घर आ गए ओर नियत समय पर वो पैसे देकर आ गए, पर ये तो बहुत भोले थे ये देकर आ गए पर सेठ ने अपनी बन्दी में नहीं चढाए और ना ही रसीद ली,



कुछ दिनों के बाद नूतनदास से सीठ बोलने लगा - कि आप पैसे वापिस करो नूतन दास जी ने कहा पर सेठ नहीं माना, तो उस समय सौ रूपए बहुत बडी बात थी और नुतनदास जी अब दुबारा उतने पैसे भी नहीं दे सकते थे तो सवामी जी के पास गए और सारी बात सुनाई दी.



तो स्वामी जी ने कहा - कि आप मत घबराओ केार्ट में फैसला आपके ही हक में होगा. अगर आप सही हो तो परमात्मा आपका ही साथ देगे. जब वो कोर्ट में गए तो वकीलों ने कहा - सेठ जी आपके पैसे इस नूतनदास ने लौटा दिए?


तो वो बोला - कि हाँ लौटा दिये तो सारे वकीलेां को आश्चर्य हुआ. तो वकीलों ने कहा - कि आपने केस क्यों कियां किस बात का दावा ठोका है ? तो वो लज्जित होकर घर वापिस आ गया. तो वो खुद भी नहीं समझ पाया कि उसने ऐसा क्यों बोला, ये सब स्वामी जी की भक्तिी का चमत्कार है.


संतो की संगति ही ऐसी है. उससे ये लोक ही नहीं परलोक भी सुधर जाता है. ललिललडैती जी ना केवल अपनी पत्निी को बल्कि अपने सान्ध्यि में आने वाले सारे भक्तों को भक्ति मार्ग में परमात्मा की ओर लगा दिया, उनके पत्नी वाले प्रसंग से यहीं शिक्षा मिलती है कि वो पति,पति नहीं है, वो पिता, पिता नहीं है वो माता, माता नहीं है वो पत्नी, पत्नी नहीं है. जो हमें संसार के बंधनो से हटाकर परमात्मा में लगा  दे, संसार के बंधन में ही रहेंगे तो जीवन की सार्थकता भी कुछ नहीं है. क्योंकि उसमें परमात्मा नहीं है.

नारद जी बड़ी अच्छी बात कही है कि जिसकी वाणी में परमात्मा का गुणगान नहीं है,उनका नाम नहीं है,  वो भेले ही कितना भी सुदंर भाषण क्यों ना दें, कितना सुंदर क्येां ना गाए, उनकी कथा नहीं है. तो वो वाणी कौए की समान है. जो बस काउ-काउ ही करता है. वो कोई काम की नहीं है वाणी, जिस कान से परमात्मा का गुणगान नहीं सुना, वो सर्प के कान के ही जैंसे है. और जिन आँखों ने भगवान की दर्शन  नहीं किया, देखी वो मोर पंख के समान है .जो सिर्फ दिखानें की है. उनसे हम देख नहीं सकते है. और जिस जीवन में परमात्मा नहीं है वो मुर्दे के समान है. 

 

 

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