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भक्त चरित्र - श्यामानंद जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

“ जय राधे, जय राधे-राधे, जय राधे श्री राधे…….”

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है .


आज के हमारे सतसंग का विषय है - भक्त चरित्र में – “श्री श्यामानंद जी प्रभु” श्यामानंद प्रभु जी का जीवन बड़ा ही अदुभत और अलौकिक है . जिन पर राधा जी ने अपनी कृपा की है . अगर हम इनका जीवन परिचय देखे तो इनका प्रादुर्भाव देखे तो सन पद्रंह सौ पैतीस में पश्चिम बंगाल के दंरभगा नामक गाँव में हुआ था . इनके बचपन का नाम “दुखी” था, चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन इनका जन्म हुआ था. 



बचपन से ही इनके अंदर कृष्ण भक्तिी थी और इनका मन संसार में नहीं लगता था.मन सदा सबकुछ छोडकर प्रभु में लीन रहता था. इनको ना तो संसार की चर्चा अच्छी लगती थी और ना ही संसार की कोई चीज में इनका मन लगता था, तो एक बार संसार में इनका मन एकदम ही विरक्त हो गया. तो ये नवद्वीप के निकट पहुच गए. श्री राधा जी की कृपा से फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ठाकुर जी ने इन्हें दीक्षा दे दी और इनके गुरू ने इनका नाम  “कृष्णदास” रख दिया. और लोग इन्हें दुखी कृष्णदास कहने लगे और गुरू ने इन्हें आज्ञा दी कि आप जाकर पुरे ब्रज धाम के तीर्थ का दर्शन करे.  


गुरू की आज्ञा को शिेराधार्य करके ये सब तीर्थों के दर्शन करने को गए और वृदांवन भी गए तो वहाँ पर ये सबकुछ छोडकर आ गए. और फिर इनका मन कहीं नहीं लगा. और मन एक दम छटपटाने लगा और ये समझ गए कि अब इस संसार में नहीं रह सकता, वृदांवन में ही जाना पडेगा तो बरसाने के दर्शन करते हुए गिरीराज की परिक्रमा करते हुए श्री धाम वृदांवन जा पहुँचे.



उस समय चैतन्यकालीन समय था तो महाप्रभु ने छै गोस्वामी थे जिनको वृदांवन भेजा था. उनमें रूप गोस्वामी जी, सनातन गोस्वामी जी, रधुनाथ जी, गोपालभटट जी, जीवगोस्वामी, रघुनाथ भट्ट जी  इन सबको प्रभु वे वृदांवन में रहकर वहाँ के सारे लुप्त स्थानों को प्रकट करके भक्तिी का प्रचार किया तो इन सभी ने उन स्थानो का जीर्णउदार किया, और राधा कृष्ण के पद लिखे.


तो जब कृष्णदास जी जीवगोस्वामी जी से मिले जीवगेास्वामी जी बहुत बडे भक्त संत थे. तो इन्होने देखा कि कृष्णदास जी का मन तो बडा विरक्त है. और इनके मन में तो भक्तिी भाव है. तो वो बडे प्रभावित हुए और अपने पास ही रख लिया और उनको सेवा दे दी. कि आप प्रतिदिन निधिवन की सफाई करेंगे.


अब कृष्णदास जी प्रसन्न हो गए कि आपने ये बडी कृपा की तो वो रोज बड़े निर्मल चित्त से खुरपा, सोहनि लेकर जाते और पूरे वन की सफाई करते थे,कई दिन ऐसा करते करते हो गए,



एक दिन सफाई करते हुए इनकेा एक विचित्र चीज उन्हें दिखी,एक अद्भुत नुपुर मिला और वो कोई सामान्य नुपुर नहीं था उसकी चमक से पूरा निधिवन प्रकाशित हो रहा था . मन में सोचने लगे कि ये इतना विलक्षण नुपूर किसका हो सकता है. इसमें जरूर कोई रहस्य है. उन्होंने वो नुपुर अपने पास रख लिया.



वो नुपुर वास्तव में राधा जी का था. राधा जी प्रतिदिन बिहारी जी के साथ आज भी निधिवन में रास लीला करने आती है. रास लीला परम दिव्यातिदिव्य लीला है, वो बडी दिव्य लीला है. सामान्य चक्षु से वो भी नहीं देखी जा सकती है . संतजन सिर्फ उस लीला में प्रवेश कर सकते है.



ऐसा कहते है.कि रोज जब शाम होती है. तो निधिवन से सारे पशु पक्षी वहाँ से बाहर चले जाते है. क्योंकि उस दिव्यलीला को कोई नहीं देख सकता है. दिन में हजारों पशु वहाँ पर रहते है.  पर शाम को सब वहाँ से चले जाते है. वहा पर एक व्यक्ति को तैनात किया गया है तकि वो दे्ख सके् कि केाई वन के अंदर रह तो नहीं गया, एक बार जो व्यक्ति वो देख ले्ता है. वो जगत के काम का नहीं रहता है. क्येांकि वो साधारण लीला नहीं है.  और ना ही वो इस जगत की लीला है. उसे देखने के परम दिव्य मन और चक्षु की जरूरत है. और जो हम साधारण मनुष्यों के बस की बात नहीं है. इसलिए वो कोई नहीं देख सकता है. जो भी देखता है. या तो वो पागल हो जाता है. या मर जाता है. ऐसा परम दिव्य और लौकिक वह निधिवन है .



तो कृष्णदास जी को नुपुर मिला और वो राधा रानी जी का था रासलीला करके सुबह जब राधा जी ने देखा कि उनके बाएँ पैर के चरण का नुपुर “मंजुघोषा” नाम का वो नहीं है . तो ललिता जी से राधा जी ने पूछाँ कि मेरे बाँए पैर का नुपुर नहीं है. तुम अभी जाओ और निधिवन में जाकर मेरा नुपुर ढूढकर लाओ. तो ललिता जी एक वृद्ध का रूप रखकर गई और बोली कृष्णदास जी से कि नुपुर हमें दे दो.



तो कृष्णदास जी समझ गए कि ये नुपुर पृथ्वीलोक में से तो किसी का है नही. तो वो बोले कि हम तो ये नुपुर उसी को देंगे जिसका ये है. तो राधा जी वहीं खडी थीं तो ललिता जी ने अपना असली परिचय दे दिया.



तो कृष्णदास जी ने कहा - कि हम तो राधा जी का दर्शन करना चाहते है. और उन्हीं के पैरों में ये पायल पहनाना चाहते है. तो राधा जी बडी प्रसन्न हुई और ललिता जी से बोली - कि आप कृष्णदास जी को मंत्र दो, और मेरे कुडं में स्नान कराओ, जब ये कुंड में स्नान कर लेंगे और दिव्य मंजरी स्वरुप धारण कर लेगे तब ये मेंरे दर्शन के पात्र बन जाएगें.


ललिता जी तो रासलीला में जब किसी का प्रवेश नहीं होता है. तो उसे युगल मंत्र देती है. तो  ललिता जी ने कान में राधा मंत्र दिया और उस मंत्र को जपते हुए कृष्णदास राधा कुंड में स्नान करने गए. और   गए थे कृष्णदास जी स्नान करने पर कुंड में से मंजरी नाम की सखी बाहर निकली. जो कृष्णदास जी थे वो मंजरी सखी बन गए. और नुपुर अपने मस्तिक में रख लिया.


और जब ललिता जी के साथ राधा जी के मंदिर में गए. राधा रानी जी की आज्ञा से ललिता जी ने वो नुपुर कृष्णदास के माथे पर रखा तो वो नुपुर राधारानी के चरणों की आकृति का तिलक हो गया. श्याम सुदंर श्याममनोहर नाम के तिलक हो गया और राधा जी ने उन्हें श्यामनंद नाम दिया इसके बाद उन्हें दुखी के नाम से कृष्णदास के नाम से कोई नहीं जानता है. आज भी उन्हें प्रभु श्यामानंद जी के नाम से जाना जाता था. जोकि वास्तव में पूर्वजन्म में “कनक मंजरी” नाम के सखी थे. और राधा जी ने स्वयं तिलक के बीच में गोल बिंदी लगाई.


फिर ललिता जी बोली कि -  अब आप वापिस मृत्युलोक में चले जाए तो ये बोले - कि अब हमारा मन कैसे किसी लोक में लग सकता है. और रोने लगे.



तो राधा जी बोली कि श्यामानंद तुम चिंता मत कारो मै तुम्हें एक श्यामसुदंर जी का विग्रह देती हूॅ . और सबके देखते-देखते “राधा जी के हद्रय से वो विग्रह प्रकट हुआ.” और उसे मंदिर में स्थापित किया गया. और बसंत पंचमी के दिन श्री राधाश्यामसुदर की स्थापना की गई.



और पूरे विश्व का वो एक मात्र मंदिर है जो राधा जी के हद्रय से विग्रह द्वारा स्थापित है. बहुत से मंदिर है वृदांवन में पर ऐसा मंदिर कोई नहीं है. जहाँ श्याम सुन्दर राधा रानी जी के ह्रदय से प्रकट हुआ हो और बडा अलौकिक मंदिर है.



मंदिर में स्थापना तो हो गई पर श्यामसुदंर मंदिर मे अकेले थे, वहीं पास में एक राजा रानी थे जो राधा जी के परम भक्त थे, तो राधा जी ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा - कि वृदांवन में श्याम सुन्दर  प्रकट हो गए और मै आपके खजाने में हूँ. तो आप मुझै वहाँ ले जाकर स्थापित करो और मेरा विवाह श्याम सुदंर से करा दो.



राजा जब सुबह उठा तो देखा कि खजाने में राधा जी का बुहत ही सुदंर विग्रह है. तो राजा वो विग्रह लेकर वृदावंन गया और मूहूर्त देखकर विवाह करवा दिया. और वहाँ पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया और उसका “श्री राधाश्यामसुदंर मंदिर” रख दिया. वहाँ पर बिहारी जी लाला लाली जी के रूप में पूजा होती है.



अक्षय तृतीय के दिन दिव्य चंदन का श्रृगांर होता है. संत कहते है कि ये पहला मंदिर है जहाँ पर चंदन से श्रृगांर होता है. आज भी लोग वहाँ जाते और वहीं पर मंदिर के पास श्यामसुंदर जी की समाधि बनी है और वो स्थान बना है. जहाँ पर श्यामानंदन जी को राधा जी का नुपुर मिला था तो धन्य है वे श्यामानंद जी जिन्हें राधा जी के दर्शन हुए और ललिता जी से युगल मंत्र मिला हम सब उनके चरणों में वंदन करते है. 

 

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