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भक्त चरित्र - श्वेतद्वीप के भक्त

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलो के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ...

“मेरो प्यारों नंदलाला, किषोरी राधे, किषोरी-राधे, अति भोरी-राधे...”

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है .


आज के हमारे सतसंग का विषय है – “श्वेत द्वीप के भक्त” इस बह्रमांड में अलग-अलग द्वीप बने है . क्येांकि जब गौलोक धाम का वर्णन आता है, जब गार्गाचार्य जी ने गौलोक धाम का गर्गसहिंता में वर्णन किया है, तो जब दानवों के भय से पृथ्वी आक्रांत हो गई, तो सारे देवता पृथ्वी, सभी भगवान विष्णु के पास गए, और कहा कि आप ही कुछ कीजिए?



तब प्रभु बोले कि -
हमें अब भगवान कृष्ण की शरण में जाना चाहिए. जिस ब्राह्मड में हम रहते है इस बह्रमांड से परे है, तो सबको पता ही नहीं था कि इस बह्रमांड से भी परे केाई धाम है . जहाँ हम रहते है उससे परे भी केाई जगह है ? और अगर है तो कहाँ है?



तो भगवान ने कहा- कि जब प्रभु ने वामन अवतार जब प्रभु ने लिया था तो बह्रमांड में उनके अगूठे से एक छेद हो गया था हम उसी छेद वाले ब्राह्मड में रहते है और उसी छेद से हम उस लोक के अंदर जाएगे, तो जब उस छेद से बाहर निकले तो देखा कि जिस बह्रमांड में हम रहते है . वो तो इससे बहुत छोटा है . और ऐसे ही बहुत से ब्रहमांड और भी थे. और आगें गौलोक धाम है, जिसके चारेां ओर यमुना जी बहती है . देखते है कि करोड बह्रंमांड उस नदी में गेंद की भांति तैर रहे है . तो समझ में नहीं आया कि हम किस बह्रमांड के है तो हर ब्रहमांड में “सात द्वीप” है, पहला जम्बू द्वीप जिसमें हम भारतवासी रहते है ,दूसरा लक्षद्वीप, सल्मली द्वीप ,कुशद्वीप, पुष्कर द्वीप, क्रोंच द्वीप, शाकद्वीप, इस प्रकार सात प्रकार के द्वीप कहे गए है और सात प्रकार के द्वीप में अलग-अलग तरह की सृष्टिी रची गई, इसी तरह श्वेतद्वीप है जिसकी महिमा बडी अदुभत है महिमा उसकी ही ज्यादा होती है जो प्रभु का हो जाता है वो सामान्य नहीं रहता है.



तो श्वेतद्वीप में एक नहीं दो नहीं, सब लोग बडे बिरले भक्त ही दिखते थे तो किसी एक का वर्णन नहीं किया नाभा जी ने भक्त माला में, कहा कि सारा द्वीप के जन सब भगवान के दास बसते है. जहाँ उनकी हर एक की कथा सुनने लायक है, वे कान धन्य है जो श्वेतद्वीप के ळाक्तों की कथा सुनते है, ऐसे भक्त जिनकी भक्तिी की , प्रेम की, दासता की, भाव की, का वर्णन कौन इस साधारण जिव्हया से कर सकता है . ऐसे भक्त है.



वहाँ की जो प्रभु के मुखारबिंद को नयनों से निहारते रहते है . वहाँ नारायण भगवान सगुण और निर्गुण दोंनों रूप में विराजमान है . वहाॅ जब भक्त प्रभु को देखते है, तो देखते-देखते अगर एक बार पलक भी हिल जाए तो उनको वो हजारों यम यातना के बराबर लगता है . ऐसी निष्ठा है प्रभु के प्रति, कि अपलक प्रभु को देखना चाहते है . इतना दुख भक्तों को होता है .

 

प्रसंग १ - एक बार का बडा प्यारा प्रसंग है नारद जी तो तीनों लोकों में भम्रण करते रहते है उन्हें ये वरदान है  िक वे तीनेां लोकों में कही भी आ जा सकते है . तो नारद जी जहाँ भी जाते तो भक्तिी की चर्चा करते और भगवान के गुणगान करते. तो संत, भक्त को, तो भगवान की चर्चा ही अच्छी लगती है . तो नारद जी तो सतसंगी ठहरे, मुखे से हमेषा श्रीमन नारयण नाम का गान करते, और हाथ में देवदत्त नाम की वाणी है जिस पर मीठे स्वर छेडते और हाथ में कर  ताल लेकर और प्रभु का नाम जिव्हया पर रहता है .

तो नारद जी ने मन में सोचा - कि श्वेत द्वीप जाए और वहाँ के भक्तों को ज्ञान के उपदेष दूगाँ, तो मन में ये भाव रखकर वो श्वेतद्वीप गए, अब प्रभु तो अंतर्यामी है वो समझ गए कि ये उपदेष देने जा रहे है तो जैसे ही उनका प्रवेष श्वेतद्वीप में हुआ, तो भगवान ने एक सेवक को उनके पास भिजवा दिया और कहा – कि इस स्थान पर मत आना. क्योंकि यहाँ के जो भक्त है भगवान ने कहलाया कि मरेी ओर से कहना - कि नारद जी यहाँ मत आना!  यहाँ पर जो भक्त है वो मेरे रूप अनूरूप को देखकर परम आनंद में मग्न है . रूप के ही वे अनुरागी है उनको किसी भी ज्ञान की केाई जरूरत नहीं है .


तो जो उस सेवक ने प्रभु की ये बात नारद जी से कही तो वो अवाक रह गए और कहने लगे कि मैने सदा ही लोग को ज्ञान का उपदेष देकर उनको परमार्थ पर चलने की राह दिखाई है प्रभु मुझे कभी नहीं रोक सकते है . फिर आज जब मैं यहाँ पर ज्ञान की चर्चा करने आया तो क्येां प्रभु ने मुझै मना कर दिया ?



तो वहाँ से चले गए पर मन में ये बात आई कि क्येां प्रभु ने मुझे रोक दिया? तो नारद जी वहाँ से सीधे बैकुण्ठ गए और भगवान को प्रणाम किया,



तो भगवान बोले - कि क्या बात है नारद आज बहुत खिन्न दिखाई दे रहे हो क्या बात है प्रभु तो सब जानते थे पर ये लीला तो भगवान ने श्वेत द्वीप के भक्तों की महिमा बताने के लिए रची. बोले कि - नारद क्या बात है?

तो नारद ने कहा - कि प्रभु सारी वार्ता बता दी, कि प्रभु हम वहाँ गए थे तो ऐसा हुआ हमें विश्वास नहीं होता, वहाँ ऐसे कैसे भक्त है जहाँ नारदभी ज्ञान नहीं दे सकते है . और ज्ञान का उपदेष नहीं दे सकते है .


तो भगवान ने कहा -
कि नारद!  वहाँ के लोगों के रोम-रोम में भक्ति ऐसी रंगी हुई है  की वे तो उस भक्तिी के रंग में सदा डूबे है . तुम्हें विष्वास ना हो तो हम तुम्हारे साथ चलते है और परीक्षा लेकर आते है .



प्रसंग २ - तो भगवान नारद जी के साथ उस सुदंर श्वेत द्वीप में गए तो वहाँ पर एक बडा प्यारा सरोबर था तो नारद जी को वहाँ एक पक्षी दिखा, तो वो प्रभु के ध्यान में एकदम शांत बैठा है ,तो नारद जी ने भगवन से कहा - कि प्रभु ! ये शांत क्यों है ? तो भगवान ने कहा - कि ये अति बडभागी है इसे साधारण मत समझना और ये भी मत समझना कि ये शांत बैठे है.



नारद इनको 1 हजार वर्ष बीत गए और उसके बाद में भी इनके चित्त में किसी भी प्रकार की चिंता नहीं है . ये सब मेरे ही ध्यान में बैठे है और ये सब इतने ही दिना से प्यासे है, इन्होने जल नहीं पिया, तो नारद जी को आष्चर्य हुआ कि एक खग हजारेां वर्ष से प्यासे है.जैसे कोई बडे संत है  



तो भगवान ने कहा - कि ये जल नहीं पीते है ? ये मेरे ध्यान में ही रहते है . और जिव्हया से मेरे ही प्रसाद को ही खाते है . इनकी मति भक्तिी रस में ऐसी डूबी है कि ये प्रसाद के अलावा कुछ भी नहीं खाते है . मेरी बात को सत्य मानो मै. अभी करके दिखाता हूँ .



भगवान बोले कि देखो मै इस जल को पीता हूँ फिर इस खग को दूँगा, और भगवान ने जल पिया सरोवर से और खग के सामने रख दिया तो खग ने भगवान का प्रसाद समझकर चोंच में भरका उसे पान कर लिया और तुरंत खग की आँखों में से प्रेम के आँसू बहने लगे बडा प्यारा भाव था कि प्रभु आप बडे कृपालू हो, अपने दास पर कृपा की है कि अपने अधरेां पर जल लगाकर अधरामृत हमें दे दिया, तो उस खग की प्रसन्नता की सीमा ना रही अब तो बडे प्रसन्न हुए प्रभु और वो खग फिर से ध्यान में मग्न हो गया, तो नारद जी समझ गए कि प्रभु सही कह रहे थे यहाँ के भक्त तो प्रेम भक्तिी के रंग से रगें है इनको ज्ञान की कोई जरूरत नहीं है . तुरंत पक्षी राज की परिक्रमा नारद जी ने की और कहा कि धन्य हो आप और आपकी भक्तिी



प्रसंग ३-  प्रभु ने कहा - कि देखो नारद तुम मान गए कि द्वीप के भक्त महान है तो नारद जी ने कहा हाँ प्रभु!  तो भगवान ने कहा - कि अब आगें चलो तो देखा कि बीच में भगवान नारायण का बडा प्यारा मंदिर है और पुजारी जी आरती कर रहे थे और सारे भक्त बडे प्रेम से भगवान की आरती गा रहे थे, तो जब आरती हुई तो एक भक्त जिसके अंदर बहुत प्रेम भाव था वो दौडते हुए आए, क्योंकि घ्ंटे बज रहे थे तो जब वो पहुँचा तो किसी ने कहा - कि आपकेा देर हो गई आरती तो हो गई तो जब उस भक्त ने सुना कि मैं आरती नहीं कर पाया तो वो जमीन पर गिरा और प्राण त्याग दिए .



तो भगवान ने कहा - कि देखो नारद इस भक्त की निष्ठा देखो कि बिना मेरी आरती केइन्होने प्राण त्याग दिए तो नारद जी अवाक रह गए, और पीछे उसकी पत्निी आई, और जब लोगों ने बताया कि आपके पति आरती नहीं कर पाए और इससे आपके पति ने प्राण त्याग दिए, तो जब उसकी पत्निी ने ये सुना तो वो भी अपने पति के चरणों में गिरी और उसने भी प्राण त्याग दिए, तो नारद जी को आष्चर्य हुआ कि पति और पत्निी दोंनों की इतनी निष्ठा उनके पीछे उसके पुत्र आए उसने भी प्राण त्याग दिए, और उसके बाद उसकी बेटी आई उसने भी ऐसा ही किया, ऐसा करते-करते सब मर गए.



तो नारद जी को लगा कि मै इन्हें क्या ज्ञान का उपदेष देता और जब प्रभु ने उस चारेां की ओर देखा तो वो फिर से जीवित हो गए और आरती होने लगी और चारेां प्रेम में मग्न होकर नृत्य करने लगे तो प्रभु ने कहा - कि देखा नारद ! ये लोग प्रेम से भींगे है, आप इन्हें ज्ञान का क्या उपदेष देते?  मुझै तो केवल प्रेम ही प्यारा है. “राम ही केबल प्रेम प्यारा” वहाँ खगराज को देखो उन्हें अपने शरीर की चिंता ही नहीं है और इन लोंगों को देखों कि बिना आरती के सबने अपने प्राण त्याग दिया और यष्हीं सच्चा प्रेम भक्तिी है . 

नारद जी ने सबको प्रणाम किया और श्री  मन नारायण का गुनगान करते हुए चले गए तो धन्य है,नाभा जी कहते है कि ऐसे भक्तो का गुणगान कौन अपने मुख से गा सकता है,धन्य हैऐसे भक्त और भगवान, ऐसे भगवान जो प्रेम ही खाते है प्रेम ही पीते है . और धन्य है वे भक्त जो भगवन के प्रेम में ही डूबे रहते है केबल अपने प्रभु के लिए प्रेम में ही रंगे है .


Comments
2011-12-04 02:14:48 By Kamlesh

Please enlighten me how to use this site

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