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भक्ति और भक्त

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से आइये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“गोविद जय-जय, गोपाल जय-जय, राधा-रमण हरि, गोंविद जय-जय”......

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “भक्ति और भक्त ” तो भक्ति को हम देखें तो श्रीमद भागवत में इसका वर्णन है । उसमें एक प्रसंग आता है जिससे हम इसके महत्व को अच्छे से समझ सकते है ।  एक बार गंगा जी के तट पर एक स्त्री बैठी थी । और उसकी गोद में दो पुरूष लेटे थे. दोनेां बूढे थे और अचेत अवस्था में लेटे थे । भक्ति उनको अपनी गोद में लिए रो रही थीं  । तो नारद जी वहा से निकलते है तो वो उनको बुलाती है और कहती है कि मेरी व्यथा सुनिए तो नारद जी उनके पास जाते है ।  तो भक्ति कहती है कि मेरी गोद में ये दो मेरे पुत्र है -  एक का नाम “ज्ञान” है और एक का नाम “वैराग्य” है । तो नारद जी को आश्चर्य हुआ, कि आम दुनिया में तो ऐसा होता है कि माँ बूढी होती है । और बच्चे जवान पर यहा तो उल्टा है माँ जवान है और बच्चे बूढें है। ऐसा क्यों है?

 

तो वो बोलती है कि ये समय का फेर है. मै तो ठीक हूँ,पर मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य बूढे हो गए है । तो आप कुछ उपाए बताइए? तो नारद जी जाकर संतो से पूछते है और आकर उनको बताते है कि श्रीमद भागवत सुनाने से वो ठीक हो जाएगें. यहा एक बात बहुत महत्वपूर्ण है कि ये भक्ति जो है वो तरूणी है और उसके बेटे बूढे है । भक्ति हमेशा जवान ही रहती है, तो जब वो यमुना जी के तट पर वृदांवन में बैठी थीं तो वहा ज्ञान और वैराग्य का उतना महत्व नहीं है जितना भक्ति का है । क्योंकि सबसे मुख्य भक्ति है। वहाँ भक्ति की ही प्रधानता है. लेकिन भक्ति अंधी नहीं होनी चाहिए भक्त को किसी चीज का ज्ञान नहीं है तो वो पतन की ओर चला जाता है । तो भक्ति में ज्ञान और वैराग्य दोनेां आना जरूरी है ।

 

व्यक्ति भक्ति तो करता है पर वो संसार में ही पड़ा रहता है, वैराग्य उसमें नहीं आ पाता तो वो भक्ति तो आ जाती है । पर वो बढ नहीं पाता है । वो कब बढेगी? जब उसमें ज्ञान और वैराग्य दोंनों हो. व्यक्ति को अपनी तरफ से कुछ नहीं करना है जिस तरह भक्ति बढती है उसी तरह ज्ञान और वैराग्य भी बढता जाता है । ये दोनों भक्ति के बेटे है जिसके अंदर भक्ति का जन्म हो गया है उसके अंदर ज्ञान और वैराग्य दोनेां आ जायेगे. भक्ति के साथ ही दोनों  आ जाते है.

 

भक्ति है क्या? व्यक्ति का भगवान के चरणों में आस्था ओर विश्वास होता है । यहीं आगें जाकर भक्ति बन जाती है । पर जब तक ये भक्ति आगें नहीं बढेगीं दुनिया में बहुत से लोग है जो भगवान को मानतें हैं पर वो स्थायी है जैसा बहता हुआ पानी ज्यादा साफ होता स्थायी पानी की अपेक्षा. ऐसी ही भक्ति में ठहराव नहीं आना चाहिए. ठहराव कब आ जाता है.जब भगवान से भक्ति में मांग आ जाती है. संसार की कामनाए पूरी कर देते है । पर जहा ये मागॅना शुरू हो जाता है ।

 

जैसे भक्त दो प्रकार के होते है - एक “सकाम भक्त” और एक “निष्काम भक्त” ऐसे ही भक्ति भी दो प्रकार की होती है । तो सकाम भक्ति में, वो जब संसारिक कामनाए रखता है तो उसके अंदर उतना आनंद नहीं आ पाता है । उसकी कामनाए बीच मे आ जाती है भगवान उसे पूरा तो कर देते है । पर वो मस्ती और आनंद कब आएगा जब हम भगवान से कुछ मागेंगे नहीं उनसे मागों पर क्या? उनकी भक्ति और शरणागाति मागों. भगवान को मांगों क्योकि जब वो हमें मिल जाएगें तो फिर हमें किसी ओर चीज की जरूरत नहीं है ।

 

इसी प्रकार भक्ति के प्रकार बताए गए है कि नवधा भक्ति होंती  है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चना  वंदना, दास, सख्य, सक्षम, आत्म निवेदन. भक्ति की पहली सीढीं है “श्रवण” तो जब हम संतो के मुख ये भगवान की कथाए सुनते है । जहा भी हम अपने कानों से सुन रहे है तो मन अपने आप उनमे लग जाएगा । ये पहली भक्ति है श्रवण और जब हम अपने मुहॅ से भगवान के नाम का गान कर रहे है । तो वो दूसरी भक्ति है “कीर्तन” और जब हम एंकात मे बैठकर भगवान के नाम का स्मरण करते है, मनन करते है, तो ये भक्ति की सीढिया है । तो व्यक्ति जब तक श्रवण नहीं करेगा, क्योंकि नाम में श्रद्धा ही नहीं होगी तो कीर्तन कहा से करोगे. तो नवधा भक्ति में से कोई भी एक आ जाए, सिर्फ श्रवण भक्ति ही कर ले व्यक्ति, क्योंकि हम कानों से भगवन का नाम सुन रहे है । तो मन अपने आप लग जाएगा फिर कीर्तन होगा तो मन और आगें जाएगा फिर एंकात में हम स्मरण करेगें याद करेंगे फिर उसके बाद अर्चना फिर वंदना और आगें चलकर भगवान के चरणों की सेवा करें. फिर सख्य भाव इसी प्रकार आगे की भी है.  

 

भक्ति में भगवान से सम्बन्ध बनाना जरुरी है, कहते है व्यक्ति के जीवन में जहा कमी हो वहीं भगवान को बिठा दो । अगर जीवन में किसी का भाई नहीं है या पुत्र नहीं है तो उसकी जगह पर भगवान को बिठा दो । वो तो सबकुछ बनने को तैयार है बस उनसे एक संबंध बनाओ और उसी भाव से उनको जोडो ऐसे ही नवधा भक्ति में से हम एक ही को पकड ले तो उससे ही आगें बढ सकते है । उसी तरह भक्त भी “सकाम और निष्काम भक्ति” प्रकार के होते है जिस भक्त की कोई डिंमाड नहीं होती भगवान वो बिना कुछ पाने की इच्छा के भक्ति करता है । वो निष्काम भक्त है ।

 

प्रसंग १. - एक प्रसगं आता है एक भक्त था वो जब बाके बिहारी जी के मंदिर जाता था तो उसे बाकेबिहारी जी के दर्शन एक ज्योति के रूप में होते थे और बाकि को मूर्ति के रूप में, अब जैसे रोज मंदिर के पट खुलते थे तो लोग कहते थे कि बाके बिहारी जी का श्रृंगार आज ऐसा है वो ऐसे लग रहे है । वो व्यक्ति कहता था कि मुझे तो बिहारी जी दिखाई नहीं देते है. सबको दर्शन देते है मुझ में ऐसी क्या कमी है कि मुझे नहीं दिखाई देते है । तो उसने कहा - प्रभु मुझसे कौन सी गलती हो गई, कि आप मुझे दर्शन नहीं देते हो ऐसा क्यों है. फिर वो जिद करने लगा कि आप अगर मुझे कल नहीं दिखे तो मेरे ऐसे जीवन का क्या फायदा कि मै आपको देख न पाउॅ.

 

अब वो व्यक्ति दूसरे दिन गया तो उसे बिहारी जी फिर नहीं दिखे तो उसने कहा था कि यदि कल आपने मुझे दर्शन नहीं दिए तो मै नदी में कूद जाऊँगा  । अब उसे गुस्सा आया फिर उसी रात को भगवान एक कोढी के सपने में आए और कहा - कि तुम्हें अपना कोढ ठीक करना है । तो उसने कहा हाँ प्रभु! मै इससे छुटकारा पाना चाहता हॅू । तो भगवान ने कहा - कि कल एक भक्त निकलेगा तुम उसके पैर पकड लेना और जब तक नहीं छोडना जब तक वो ये न कह दे कि बाके बिहारी तुम्हारा कोढ ठीक कर देगें । जब वो ये कह दे तभी पैर छोडना. 

 

सुबह जब वो भक्त गया तो रास्तें में वो भिखारी बैठा था तो कोढी ने उसके पैर पकड लिए तो उसने कहा - कि तुमने मेरे पैर क्यों पकड है तो उसने कहा- कि आप कहो कि मेरा कोढ ठीक हो जाए तो उस भक्त ने कहा - कि मै क्यों कहू, पर वो कोढी नहीं माना तो वो भक्त कहता है कि बाके बिहारी जी मुझे तो दर्शन दे नहीं रहे है, तो मेरे कहने से तुम्हारा कोढ कैसे ठीक हो जाएगा । तो वो कोढी कहता कि मै जब तक पैर नहीं छोडूगा जब तक आप ये नहीं कहोगे. तो गुस्से में आकर उस भक्त ने कहा कि जाओ बाके बिहारी तुम्हारा कोढ ठीक कर देंगे.

 

अब वो भक्त मंदिर पहुचा और उसे बिहारी के दर्शन हुए, पर उसके मन में प्रश्न उठा, कि अभी तक मुझे दर्शन क्यों नहीं हुए, तो भगवान कहते है - कि तुमने मेरी जो भक्ति की है वो निष्काम की है । मुझसे कुछ मागा नहीं है । तो मै क्या मुहॅ लेकर तुम्हें दर्शन दूँ । पर आज तुम्हें मै दर्शन देने के लायक हुआ क्योंकि तुमने उस कोढी से कहा कि मै उसका कोढ ठीक कर दूगा. इसलिए मै तुमसे नज़ारे मिलने के लायक हो गया.  

 

कहने का अभिप्राय है – हमें उस परमात्मा ने सब कुछ दिया है ,कि भक्ति में अगर निष्कामता आ जा तो और भी अच्छा है सबसे बडा भक्त वो ही है तो बिना किसी कामना के भक्ति करता है, अगर हम देखें तो सबसे बडा भक्त वो परमात्मा है  हम तो एक भगवान को भी ठीक से याद कर नहीं पाते और वो तो सब को बराबरी से याद करता है । तो वास्तव में सबसे बडे भक्त तो वहीं है उनके दिल में सबके लिए जगह है । हम मंदिर जाकर वापिस आ जाते हे और कोई हमसे पूछें कि आज कौन सी पोशाक उन्होंने पहनी थी, कौन सा मुकुट पहना था तो हम तो यह भी नहीं बता पाते है । क्योकि मंदिर जाकर हम मागते रहते है, भक्त तो वो हे जो मंदिर जाकर भगवान के एक-एक श्रृगांर को देखे । उनके वस्त्र बाल, मुकुट, आखें ऐसे है ।जो उन्हें देख लेता है तो वो भी बस यहीं देखते है कि किस भक्त की नजर मुझ पर है । कौन कितनी श्रद्धा से मुझे देखता है, संसार में तो हम आखें खेालकर देखते है और मंदिर में आखें बंद कर लेते है उनकी आखेों में कोई डूबकर तो देखें जो सच्चा भक्त होता है वो देख लेता है.

 

भगवान भी उसे याद करते है जो उन्हें याद करते है । व्यक्ति भगवान की पूजा कब करता है जब उसका बचा खुचा टाइम होता है । जब हम सारे कामों से फुरसत हो जाते है तब भगवान के मंदिर जाते है । तो फिर भगवान भी ऐसा ही करते है हम उन्हें जैसे याद करते है वो भी हमें वैसे ही याद करते है ।

 

प्रसंग २. - एक बार का प्रसंग है नारद जी भगवान के दर्शन करने गए तो उन्होंने वहा एक रजिस्टर देखा उसमें भक्तों के नाम लिखें थे तो उन्होंने उसे खोला तो उसमें सबसे पहले नारद जी का नाम था. तो वो बहुत खुश हुए. और वहा से चले गए तो रास्तें में हनुमान जी मिले तो वो बोले - कि मै बैकुण्ठ से आ रहा हू वहा भक्तों की लिस्ट थी उसमें मेंरा नाम सबसे उपर था. और आपका नाम तो लिस्ट में था ही नहीं हनुमान जी कहते है कि - मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरा नाम है कि नहीं, मुझे तो राम को भजने से काम है । उनको याद करने के अलावा और कोई काम नहीं उन्हें कोई गम नहीं कि नाम है या नहीं.

 

अब कुछ दिन बाद नारद जी फिर बैकुण्ठ गए तो वहा फिर एक रजिस्टर रखा था तो उसे फिर खोला तो उसमें हनुमान जी का नाम सबसे उपर था. तो नारद जी कहते है कि भगवान जो रजिस्टर बाहर था उसमें मेरा नाम था और अंदर वाले में हनुमान जी का तो ये क्या है । भगवान कहते है - देखो नारद जो बाहर रजिस्टर है उनमें वो भक्त है जो मुझे याद करते है. और अंदर वाले रजिस्टर में वो भक्त है जिन्हें मै याद करता हू. तो कहने का मतलब है कि भक्त को पद से मतलब नहीं है उन्हें तो हनुमान जी की तरह नाम से ही मतलब है. हनुमान जी निष्काम भक्त है उन्हें भगवान के नाम से बडा प्रेम है । तो भगवान भी उन्हें बहुत प्रेम करते है.

 

प्रसंग ३. - एक बार जब रामायण का प्रसंग है, भगवान राम का राजतिलक हुआ, उसके बाद एक दिन तो सबने हनुमान जी से कहा - कि आपने बहुत सेवा कर ली भगवान की. अब आप आराम करें, अब हम चारों भाई सेवा करेंगें सबने अपनी-अपनी सेवा बाँट ली. उन्होंने हनुमान जी को कोई सेवा नहीं दी. तो उन्हें दुख हुआ, भगवान समझ गए. कि हनुमान जी अन्दर से बड़े दुखी है,पर अब सेवा भी नहीं बची, सीता जी को भी ये लगता कि भगवान हनुमान जी से ज्यादा प्रेम करते है तो इन्हें सेवा से मुक्त करना होगा तभी ये हनुमान से हटेगे, तो भगवान ने कहा - कि हनुमान जब कोई सेवा नहीं बचीं तो जैसे ही मुझे जिमाई आती है तो तुम चुटकी बजा देना तो सब अपनी-अपनी सेवा करके चले जाते, कोई चरण सेवा करके चला जाता, तो कोई खाने की सेवा करके चला जाता, पर हनुमान जी हमेशा उनके पास रहते क्योकि पता नहीं कब जिमाई आ जाए तो रात में भी पलगे के पास हनुमान जी बैठे है ।

 

सीता जी ने कहा - अब रात हो गई अब आप सो जाओ,  हनुमान जी ने कहा – माता यदि रात में प्रभु को जभाई आ गई . पर सीता जी नहीं मानी.और हनुमान जी को बाहर कर दिया. अब रात में भगवान को जिमाई आई  उनका मुहॅ खुला का खुला ही रहा. अब तो सब वैध को बुलाया, पर कुछ नहीं हुआ. हनुमान जी एक जगह बैठे रात से ही चुटकी बजाये जाते कि पता नहीं प्रभु को अब जभायी आ जाये, यहाँ किसी से भगवान का मुहॅ बंद नहीं हुआ.

 

तो फिर सबको याद आया कि हनुमान जी नहीं दिख रहे और जो हनुमान जी ने चुटकी बजाई तो भगवान का मुहॅ बंद हो गया. और सबने कहा कि सच्चें निष्काम भक्त आप हो भगवान ने उनके अंदर सेवा का भाव समझा और बता दिया कि हनुमान उनके लिए जरूरी है चाहे दुनिया के सब लोग उनकी सेवा में क्यों न हो । ये लीला हनुमान जी की सेवा दिखाने के लिए भगवान ने ये लीला रची.

 

कहने का मतलब कि भक्त में कोई कामना का भाव नहीं है. जब वो भक्ति पानी में मिल जाती है तो वो पानी से “चरणामृत” बन जाती है । जब वहीं भक्ति खाने में मिल जाती है तो वहीं खाना “प्रसाद” बन जाता है और जब घर में मिल जाती है । तो वो “मंदिर” बन जाता है, और वहीं भक्ति व्यक्ति में मिल जाती है, तो व्यक्ति नहीं रहता है “भक्त” बन जाता है. तो ये भक्ति की महिमा है कि वो आम चीज को खास बना देती है । भक्त और भक्ति दोनों भगवान को बहुत प्रिय है.

 

“राधे राधे”

 

 

आज का कीर्तन शुरू करने से पहले से आइये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें  

“गोविद जय-जय, गोपाल जय-जय, राधा-रमण हरि, गोंविद जय-जय”

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “भक्ति” तो भक्ति को हम देखें तो श्री मद भागवत में इसका वर्णन है । उसमें एक प्रसंग आता है जिससे हम इसके महत्व को अच्छे से समझ सकते है ।  एक बार गंगा जी के तट पर एक स्त्री बैठी थी । और उसकी गोद में दो पुरूष लेटे थे. दोनेां बूढे थे और अचेत अवस्था में लेटे थे । भक्ति उनको अपनी गोद में लिए रो रही थीं  । तो नारद जी वहा से निकलते है तो वो उनको बुलाती है और कहती है कि मेरी व्यथा सुनिए तो नारद जी उनके पास जाते है ।  तो भक्ति कहती है कि मेरी गोद में ये दो मेरे पुत्र है -  एक का नाम “ज्ञान” है और एक का नाम “वैराग्य” है । तो नारद जी को आश्चर्य हुआ, कि आम दुनिया में तो ऐसा होता है कि माँ बूढी होती है । और बच्चे जवान पर यहा तो उल्टा है माँ जवान है और बच्चे बूढें है। ऐसा क्यों है?  

 

तो वो बोलती है कि ये समय का फेर है. मै तो ठीक हूँ,पर मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य बूढे हो गए है । तो आप कुछ उपाए बताइए? तो नारद जी जाकर संतो से पूछते है और आकर उनको बताते है कि श्रीमद भागवत सुनाने से वो ठीक हो जाएगें. यहा एक बात बहुत महत्वपूर्ण है कि ये भक्ति जो है वो तरूणी है और उसके बेटे बूढे है । भक्ति हमेशा जवान ही रहती है, तो जब वो यमुना जी के तट पर वृदांवन में बैठी थीं तो वहा ज्ञान और वैराग्य का उतना महत्व नहीं है जितना भक्ति का है । क्योंकि सबसे मुख्य भक्ति है। वहाँ भक्ति की ही प्रधानता है. लेकिन भक्ति अंधी नहीं होनी चाहिए भक्त को किसी चीज का ज्ञान नहीं है तो वो पतन की ओर चला जाता है । तो भक्ति में ज्ञान और वैराग्य दोनेां आना जरूरी है ।  

 

व्यक्ति भक्ति तो करता है पर वो संसार में ही पड़ा रहता है, वैराग्य उसमें नहीं आ पाता तो वो भक्ति तो आ जाती है । पर वो बढ नहीं पाता है । वो कब बढेगी? जब उसमें ज्ञान और वैराग्य दोंनों हो. व्यक्ति को अपनी तरफ से कुछ नहीं करना है जिस तरह भक्ति बढती है उसी तरह ज्ञान और वैराग्य भी बढता जाता है । ये दोनों भक्ति के बेटे है जिसके अंदर भक्ति का जन्म हो गया है उसके अंदर ज्ञान और वैराग्य दोनेां आ जायेगे. भक्ति के साथ ही दोनों  आ जाते है.  

 

भक्ति है क्या? व्यक्ति का भगवान के चरणों में आस्था ओर विश्वास होता है । यहीं आगें जाकर भक्ति बन जाती है । पर जब तक ये भक्ति आगें नहीं बढेगीं दुनिया में बहुत से लोग है जो भगवान को मानतें हैं पर वो स्थायी है जैसा बहता हुआ पानी ज्यादा साफ होता स्थायी पानी की अपेक्षा. ऐसी ही भक्ति में ठहराव नहीं आना चाहिए. ठहराव कब आ जाता है.जब  भगवान से भक्ति में मांग आ जाती है. संसार की कामनाए पूरी कर देते है । पर जहा ये मागॅना शुरू हो जाता है ।  

 

जैसे भक्त दो प्रकार के होते है - एक “सकाम भक्त” और एक “निष्काम भक्त” ऐसे ही भक्ति भी दो प्रकार की होती है । तो सकाम भक्ति में, वो जब संसारिक कामनाए रखता है तो उसके अंदर उतना आनंद नहीं आ पाता है । उसकी कामनाए बीच मे आ जाती है भगवान उसे पूरा तो कर देते है । पर वो मस्ती और आनंद कब आएगा जब हम भगवान से कुछ मागेंगे नहीं उनसे मागों पर क्या? उनकी भक्ति और शरणागाति मागों. भगवान को मांगों क्योकि जब वो हमें मिल जाएगें तो फिर हमें किसी ओर चीज की जरूरत नहीं है ।  

इसी प्रकार भक्ति के प्रकार बताए गए है कि नवधा भक्ति होंती  है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चना  वंदना, दास, सख्य, सक्षम, आत्म निवेदन. भक्ति की पहली सीढीं है “श्रवण” तो जब हम संतो के मुख ये भगवान की कथाए सुनते है । जहा भी हम अपने कानों से सुन रहे है तो मन अपने आप उनमे लग जाएगा । ये पहली भक्ति है श्रवण और जब हम अपने मुहॅ से भगवान के नाम का गान कर रहे है । तो वो दूसरी भक्ति है “कीर्तन” और जब हम एंकात मे बैठकर भगवान के नाम का स्मरण करते है, मनन करते है, तो ये भक्ति की सीढिया है । तो व्यक्ति जब तक श्रवण नहीं करेगा, क्योंकि नाम में श्रद्धा ही नहीं होगी तो कीर्तन कहा से करोगे. तो नवधा भक्ति में से कोई भी एक आ जाए, सिर्फ श्रवण भक्ति ही कर ले व्यक्ति, क्योंकि हम कानों से भगवन का नाम सुन रहे है । तो मन अपने आप लग जाएगा फिर कीर्तन होगा तो मन और आगें जाएगा फिर एंकात में हम स्मरण करेगें याद करेंगे फिर उसके बाद अर्चना फिर वंदना और आगें चलकर भगवान के चरणों की सेवा करें. फिर सख्य भाव इसी प्रकार आगे की भी भक्ति में भगवान से सम्बन्ध बनाना जरुरी है, कहते है व्यक्ति के जीवन में जहा कमी हो वहीं भगवान को बिठा दो । अगर जीवन में किसी का भाई नहीं है या पुत्र नहीं है तो उसकी जगह पर भगवान को बिठा दो । वो तो सबकुछ बनने को तैयार है बस उनसे एक संबंध बनाओ और उसी भाव से उनको जोडो ऐसे ही नवधा भक्ति में से हम एक ही को पकड ले तो उससे ही आगें बढ सकते है । उसी तरह भक्त भी “सकाम और निष्काम भक्ति” प्रकार के होते है जिस भक्त की कोई डिंमाड नहीं होती भगवान वो बिना कुछ पाने की इच्छा के भक्ति करता है । वो निष्काम भक्त है ।

एक प्रसगं आता है एक भक्त था वो जब बाके बिहारी जी के मंदिर जाता था तो उसे बाकेबिहारी जी के दर्शन एक ज्योति के रूप में होते थे और बाकि को मूर्ति के रूप में, अब जैसे रोज मंदिर के पट खुलते थे तो लोग कहते थे कि बाके बिहारी जी का श्रृंगार आज ऐसा है वो ऐसे लग रहे है । वो व्यक्ति कहता था कि मुझे तो बिहारी जी दिखाई नहीं देते है. सबको दर्शन देते है मुझ में ऐसी क्या कमी है कि मुझे नहीं दिखाई देते है । तो उसने कहा - प्रभु मुझसे कौन सी गलती हो गई, कि आप मुझे दर्शन नहीं देते हो ऐसा क्यों है. फिर वो जिद करने लगा कि आप अगर मुझे कल नहीं दिखे तो मेरे ऐसे जीवन का क्या फायदा कि मै आपको देख न पाउॅ.  

अब वो व्यक्ति दूसरे दिन गया तो उसे बिहारी जी फिर नहीं दिखे तो उसने कहा था कि यदि कल आपने मुझे दर्शन नहीं दिए तो मै नदी में कूद जाऊँगा  । अब उसे गुस्सा आया फिर उसी रात को भगवान एक कोढी के सपने में आए और कहा - कि तुम्हें अपना कोढ ठीक करना है । तो उसने कहा हाँ प्रभु! मै इससे छुटकारा पाना चाहता हॅू । तो भगवान ने कहा - कि कल एक भक्त निकलेगा तुम उसके पैर पकड लेना और जब तक नहीं छोडना जब तक वो ये न कह दे कि बाके बिहारी तुम्हारा कोढ ठीक कर देगें । जब वो ये कह दे तभी पैर छोडना.   

सुबह जब वो भक्त गया तो रास्तें में वो भिखारी बैठा था तो कोढी ने उसके पैर पकड लिए तो उसने कहा - कि तुमने मेरे पैर क्यों पकड है तो उसने कहा- कि आप कहो कि मेरा कोढ ठीक हो जाए तो उस भक्त ने कहा - कि मै क्यों कहू, पर वो कोढी नहीं माना तो वो भक्त कहता है कि बाके बिहारी जी मुझे तो दर्शन दे नहीं रहे है, तो मेरे कहने से तुम्हारा कोढ कैसे ठीक हो जाएगा । तो वो कोढी कहता कि मै जब तक पैर नहीं छोडूगा जब तक आप ये नहीं कहोगे. तो गुस्से में आकर उस भक्त ने कहा कि जाओ बाके बिहारी तुम्हारा कोढ ठीक कर देंगे.  

अब वो भक्त मंदिर पहुचा और उसे बिहारी के दर्शन हुए, पर उसके मन में प्रश्न उठा, कि अभी तक मुझे दर्शन क्यों नहीं हुए, तो भगवान कहते है - कि तुमने मेरी जो भक्ति की है वो निष्काम की है । मुझसे कुछ मागा नहीं है । तो मै क्या मुहॅ लेकर तुम्हें दर्शन दूँ । पर आज तुम्हें मै दर्शन देने के लायक हुआ क्योंकि तुमने उस कोढी से कहा कि मै उसका कोढ ठीक कर दूगा. इसलिए मै तुमसे नज़ारे मिलने के लायक हो गया.  

कहाने का अभिप्राय है – हमें उस परमात्मा ने सब कुछ दिया है ,कि भक्ति में अगर निष्कामता आ जा तो और भी अच्छा है सबसे बडा भक्त वो ही है तो बिना किसी कामना के भक्ति करता है, अगर हम देखें तो सबसे बडा भक्त वो परमात्मा है  हम तो एक भगवान को भी ठीक से याद कर नहीं पाते और वो तो सब को बराबरी से याद करता है । तो वास्तव में सबसे बडे भक्त तो वहीं है उनके दिल में सबके लिए जगह है । हम मंदिर जाकर वापिस आ जाते हे और कोई हमसे पूछें कि आज कौन सी पोशाक उन्होंने पहनी थी, कौन सा मुकुट पहना था तो हम तो यह भी नहीं बता पाते है । क्योकि मंदिर जाकर हम मागते रहते है, भक्त तो वो हे जो मंदिर जाकर भगवान के एक-एक श्रृगांर को देखे । उनके वस्त्र बाल, मुकुट, आखें ऐसे है ।जो उन्हें देख लेता है तो वो भी बस यहीं देखते है कि किस भक्त की नजर मुझ पर है । कौन कितनी श्रद्धा से मुझे देखता है, संसार में तो हम आखें खेालकर देखते है और मंदिर में आखें बंद कर लेते है उनकी आखेों में कोई डूबकर तो देखें जो सच्चा भक्त होता है वो देख लेता है.

भगवान भी उसे याद करते है जो उन्हें याद करते है । व्यक्ति भगवान की पूजा कब करता है जब उसका बचा खुचा टाइम होता है । जब हम सारे कामों से फुरसत हो जाते है तब भगवान के मंदिर जाते है । तो फिर भगवान भी ऐसा ही करते है हम उन्हें जैसे याद करते है वो भी हमें वैसे ही याद करते है ।

एक बार का प्रसंग है नारद जी भगवान के दर्शन करने गए तो उन्होंने वहा एक रजिस्टर देखा उसमें भक्तों के नाम लिखें थे तो उन्होंने उसे खोला तो उसमें सबसे पहले नारद जी का नाम था. तो वो बहुत खुश हुए. और वहा से चले गए तो रास्तें में हनुमान जी मिले तो वो बोले - कि मै बैकुण्ठ से आ रहा हू वहा भक्तों की लिस्ट थी उसमें मेंरा नाम सबसे उपर था. और आपका नाम तो लिस्ट में था ही नहीं हनुमान जी कहते है कि - मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरा नाम है कि नहीं, मुझे तो राम को भजने से काम है । उनको याद करने के अलावा और कोई काम नहीं उन्हें कोई गम नहीं कि नाम है या नहीं.  

 

अब कुछ दिन बाद नारद जी फिर बैकुण्ठ गए तो वहा फिर एक रजिस्टर रखा था तो उसे फिर खोला तो उसमें हनुमान जी का नाम सबसे उपर था. तो नारद जी कहते है कि भगवान जो रजिस्टर बाहर था उसमें मेरा नाम था और अंदर वाले में हनुमान जी का तो ये क्या है । भगवान कहते है - देखो नारद जो बाहर रजिस्टर है उनमें वो भक्त है जो मुझे याद करते है. और अंदर वाले रजिस्टर में वो भक्त है जिन्हें मै याद करता हू. तो कहने का मतलब है कि भक्त को पद से मतलब नहीं है उन्हें तो हनुमान जी की तरह नाम से ही मतलब है. हनुमान जी निष्काम भक्त है उन्हें भगवान के नाम से बडा प्रेम है । तो भगवान भी उन्हें बहुत प्रेम करते है.  

एक बार जब रामायण का प्रसंग है, भगवान राम का राजतिलक हुआ, उसके बाद एक दिन तो सबने हनुमान जी से कहा - कि आपने बहुत सेवा कर ली भगवान की. अब आप आराम करें, अब हम चारों भाई सेवा करेंगें सबने अपनी-अपनी सेवा बाँट ली. उन्होंने हनुमान जी को कोई सेवा नहीं दी. तो उन्हें दुख हुआ, भगवान समझ गए. कि हनुमान जी अन्दर से बड़े दुखी है,पर अब सेवा भी नहीं बची, सीता जी को भी ये लगता कि भगवान हनुमान जी से ज्यादा प्रेम करते है तो इन्हें सेवा से मुक्त करना होगा तभी ये हनुमान से हटेगे, तो भगवान ने कहा - कि हनुमान जब कोई सेवा नहीं बचीं तो जैसे ही मुझे जिमाई आती है तो तुम चुटकी बजा देना तो सब अपनी-अपनी सेवा करके चले जाते, कोई चरण सेवा करके चला जाता, तो कोई खाने की सेवा करके चला जाता, पर हनुमान जी हमेशा उनके पास रहते क्योकि पता नहीं कब जिमाई आ जाए तो रात में भी पलगे के पास हनुमान जी बैठे है । सीता जी ने कहा - अब रात हो गई अब आप सो जाओ हनुमान जी ने कहा – माता यदि रात में प्रभु को जभाई आ गई . पर सीता जी नहीं मानी.और हनुमान जी को बाहर कर दिया. अब रात में भगवान को जिमाई आई  उनका मुहॅ खुला का खुला ही रहा. अब तो सब वैध को बुलाया, पर कुछ नहीं हुआ. हनुमान जी एक जगह बैठे रात से ही चुटकी बजाये जाते कि पता नहीं प्रभु को अब जभायी आ जाये, यहाँ किसी से भगवान का मुहॅ बंद नहीं हुआ तो फिर सबको याद आया कि हनुमान जी नहीं दिख रहे और जो हनुमान जी ने चुटकी बजाई तो भगवान का मुहॅ बंद हो गया. और सबने कहा कि सच्चें निष्काम भक्त आप हो भगवान ने उनके अंदर सेवा का भाव समझा और बता दिया कि हनुमान उनके लिए जरूरी है चाहे दुनिया के सब लोग उनकी सेवा में क्यों न हो । ये लीला हनुमान जी की सेवा दिखाने के लिए भगवान ने ये लीला रची. 

क्हने का मतलब कि भक्त में कोई कामना का भाव नहीं है. जब वो भक्ति पानी में मिल जाती है तो वो पानी से “चरणामृत” बन जाती है । जब वहीं भक्ति खाने में मिल जाती है तो वहीं खाना “प्रसाद” बन जाता है और जब घर में मिल जाती है । तो वो “मंदिर” बन जाता है, और वहीं भक्ति व्यक्ति में मिल जाती है, तो व्यक्ति नहीं रहता है “भक्त” बन जाता है. तो ये भक्ति की महिमा है कि वो आम चीज को खास बना देती है । भक्त और भक्ति दोनों भगवान को बहुत प्रिय है.  

 

“राधे राधे”

    

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