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भक्त चरित्र - कबीर दास जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

राधे-राधे-राधे-राधे गोविंदा, श्री राधे-गोविंद भजो, राधे-गोविंदा.......

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है  . .

आज के हमारे सतसंग का विषय है . भक्त चरित्र में – “संत कबीरदास जी”. भगवान की भक्तिी दुनिया की सबसे अनोखी विलक्षण वस्तु है. जहाँ केाई नियम, धर्म, जाति, वर्ण का कोई भेद नहीं है. यहाँ तो जो परमात्मा को भजता है. वो उसी का हो जाता है.  –“कि जाति पाति पूछे नहीं केाई, हरी को भजे सो हरी का होय”


यहाँ कोई जात पात नहीं पूछता है.  और भगवान कह रहे है.-  कि एक ब्राहमण है दह्र्म कर्म करता है जो वेद पाठ करता है. पर उसके मन में प्रेम भक्तिी नहीं है. वो मुझे प्रिय नहीं है. बल्कि एक शूद्र है सुपच (कुत्ते का मांस बेचने वाला)है जिसके मन में प्रेम और भक्तिी है. वो मुझे प्रिय है. परमात्मा परम दयालु है उनकी उदारता का तो कोई जवाव ही नहीं है कितना सरल मार्ग है उन्हें प्राप्त करने का न देश काल जगह का बंधन है, जो उनको प्रेम से पुकारे वो उसी के साथ हो जाते है. यही उनकी सबसे बड़ी कृपा है.


प्रसंग १

कबीर दास जी एक ऐसे ही भक्त थे जाति के मुस्लिम थे पर परमात्मा में भक्तिी थी. मन  अति गंभीर था और अंत:करण परमात्मा में डूबा था. जाति धर्म का भेद नहीं था इनके अंदर सच्ची भक्तिी थी. तो एक बार जब ये जवान थें तो  मानो इनसे परमात्मा कह रहे है. कबीर अपने शरीर में तुलसी की माला धारण करो, सिर पर ऊर्वपुंड चंदन लगाओ, और रामानंद जी के शिष्य बन जाओ. तो कबीर दास जी बोले - कि भगवन मै मुसलमान हूँ. क्या वो मुझे अपना शिष्य बनाएगें. भगवान ने रास्ता भी बताया.

तो भगवान बोले - कि देखो कबीर रामानंद जी गंगा स्नान करने जाते है. तो तुम रास्ते में पड जाना क्योंकि संत के चरण ही स्पर्श हो गया तो तो समझो कल्याण हो गया. तुम तो रास्ते में पड जाना. तो कबीर दास जी रास्ते में पड गए ओर सुबह के वक्त अधेंरे में रामानंद जी का पैर कबीर दास जी के उपर पडा तो उनके मुहॅ से राम नाम निकल गया. और कबीर दास जी की छाती पर तो रामानंद जी का पैर पडा तो उनको तो जैसे सारी दौलत मिल गई. अपने गुरू का चरण मिल गया और मुहॅ से राम नाम मानो मंत्र मिल गया. तो उस राम नाम को जपते हुए अपने घर आ गए.

अभी गुरू को भी नहीं पता कि कबीर मेरा शिष्य बन गया तो घर आकर भगवान का धन्यवाद करने लगे. और घर आकर तुलसी की माला ऊर्ध्वपुंड चंदन, लगाकर राम नाम जपने लगे पर ये जाति के मुसलमान थे तो घरवालो को ये बात कैसे सहन हो सकती थी अब तो माता चिल्लाने लगी- कि मेरे बेटे को क्या हो गया है ?


और जब पता चला कि ये रामानंद जी के शिष्य हो गए है. तो उनके पास आकर चिल्लाने लगी तो रामानंद जी को गुस्सा आया कि मैने तो इसे दीक्षा ही नहीं दी तो शिष्यों से कहा से हो गया ?शिष्यो को आज्ञा दी कबीर दास जी को पकडने के लिए भेजा. कि कबीर को पकड कर लाओ और कबीर जी से पदें की ओट में पूछा – क्योकि मुस्लिम थे कवि दास जी पूंछा  

तुम  कैसे शिष्य बन गए मेरे तो कबीरदास जी ने पूरा वृतांत सुना दिया कि आप जब स्नान को गंगा गए तो आपका पैर मेरे उपर पडा और मुझे राम नाम मिल गया और मन्त्र तो कानेां में फूका जाता है. और उस समय गंगा के किनारे और केाई नहीं था मेरी तो बस आपमें निष्ठा है. और राम नाम में विश्वास है. तो रामानंद जी ने पर्दा हटाकर कबीरदास जी को गले से लगा लिया ओर कहा कि भक्तों की सेवा करो ओर राम नाम को धारण करो.


प्रसंग २

कबीर दास जी  जुलाहा थे बाहर से कपडो धागों का ताना-बाना बुनते थे. और अंदर सीताराम का नाम जपते थे. बिना नाम के तो बात भी नहीं करते थे. वस्त्र बनाते और हाट में बेंचने जाते एक दिन साधु आया ओर बोला - कि मुझे कपडा दे दो तो कबीर दास जी थान में से आधा फाडने लगे तो संत बोला इतने से मेंरा काम नहीं बनेगा. तो कबीरदास जी ने पूरा थान दे दिया और घर वाले राह देखकर रहे थे कि अभी ये बेंचकर आयेंगे तो पैसे मिलेंगे. केाई संमपत्तिी तो थी नहीं रोज कमाते थे. तो इनकी माता, बच्चे, स्त्री इनकी राह देख रहे थे. तो कबीरदास जी सबकुछ साधु को देकर आए तो ये घर नहीं गए तीन दिन बीट गए


सोचने लगे कि घर जाकर क्या करेगे तक और राम-नाम में डूब गए घर का भी होश नही. क्योकि जब एक भक्त भगवान में पूर्ण डूब जाता है तो फिर सांसारिक काम स्वयं भगवान कर जाते है ऐसे कई उदाहरण मिल जायेगे  नरसी मेहता जी को देखो,उनके पिता का श्राद्ध थे सुबह घी लेने घर से निकले और एक व्यक्ति के घर बैठकर भजन करने लगे सारा दिन निकल गया ये भी भूल गए कि आज मेरे पिता का श्राद्ध है. तब भगवान स्वयं नरसी मेहता के गहर गए और नरसी मेहता बनकर श्राद्ध किया.


तो श्याम सुदंर भी भक्त के काम को खुद करने लगते वो एक व्यापारी का वेश बनाया कबीरदास जी के पास गए आता शक्कर, दाल, चावल, घी, लेकर बैलगाड़ी में ले जाकर घर पहुच गए. जो उनकी माता ने देखा तो और बोली - कि तुम कोन हो?

भगवान ने कुछ समझा दिया,तब जाकर सामान लिया कुछ लोगो ने जाकर ढूँढा तब कबीर दास जी घर वापस आये. सब समझ गए कि ये तो मेरी सरकार कि कृपा है मै इस सामान को धर्म में लगा दूँगा संतो को वैरागियो को बुला बुलाकर प्रसाद पावा दिया अब ब्राह्मणों को बहुत बुरा लगा कि हमें नहीं खिलाया शुद्रो और संतो को खिला दिया


कबीर दास जी बोले – मेरे पास पैसा तो है नहीं सब सामान भी खत्म हो गया. फिर से हाट जाता हूँ और पैसा लाकर भोजन कराता हूँ फिर हाट गए और कही छिप कर बैठ गए


यहाँ फिर भगवान आते है और कबीर दास के घर जाकर इतना समान बाँटा है कि आनाज खत्म ही नहीं होता और स्वयं कबीर दास जी के पास आकार बोले - यहाँ पास के गाँव में कबीर दास जी के पास हर कोई जाता है. गरीब और दरिद्र हो कोई भी भूखा हो और कबीरदास जी ढाई सेर अनाज दे रहे है. खुद भगवान कबीरदास जी से कह रहे है. और जब कबीरदास जी घर गए तो देखा कि बहुत भीड है .



तो संसार से मन हट गया संसार काँटे के जैसे चुभने लगा कबीरदास जी आसपास सब लोग इनकी बढाई करने लगे तो कबीरदास जी को ये अच्छा नहीं लगा क्योंकि वो भगवान का भजन नहीं कर पा रहे थे.


तो उन्होंने एक उपाय किया कुछ दिन जानबूझ कर एक वैश्या की संगत की क्येांकि भक्त को यहीं लगता है . कि उसकी भक्तिी में कोई बाधा नहीं आए तो अपनी निंदा करवाने चाहते थे. क्योकि नाम संसार में खूब होने लगा था तो सज्जन लोग तो जानते ही थे कि कबीरदास जी जान बुझ कर ये कर रहे है . पर दुर्जन लोग इनकी बुराई करने लगे उनमें से कई एक जन ने  निंदा की.


प्रसंग ३

एक बार कबीरदास जी राजा की सभा में गए तो इनका कोई सम्मान नहीं किया गया तो चुपचाप एक ओर बैठे रहे तो एक विचित्र घटना घटी सभा में एक जल का पात्र रखा था तो कबीरदास जी ने वो पात्र उठाकर सारा जल फेंक दिया. तो राजा ने पूछा - कि ये सारा जल आपने क्यों फेंक दिया?

तो कबीरदास जी ने कहा - कि राजा! जगन्नाथपुरी में एक पंडा है. उसके शरीर में आग लग गई है. वो जल रहा है. तो उसे बचाने के लिए मैने जल फेंका है. राजा को आश्चर्य हुआ कि ये कैसे हो सकता है .  कि आग जगन्नाथ पुरी में लगी है . और आपने यहाँ से जल फेंक दिया तो राजा ने सैनिकों से पता करवाया तो सैनिेकों ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में एक पंडा को आग लग गई थी और बाद में वो अपने आप बुझ गई.

तो जब राजा ने ये बात सुनी तो वो अपनी पत्निी सहित कबीरदास जी के चरणों में गिर गया और क्षमा याचना करने लगे. कबीरदास जी बोले - कि सबछोड कर परमात्मा का भजन करो ये तो मेरे राम सरकार की कृपा है. मैने कुछ नहीं किया.


ये बिलकुल वहीं बात है जैसे नदी जब सामान्य हो तो कोई नहीं देखने आता है. और बाढ आए तो सब देखने आते है . भक्तिी की कसौटी पर एक भक्त को खरा उतरना पडता है. जब सामान्य भक्तिी होती है. तो कोई नहीं आता पर जब भक्तिी में बाढ आती है. तो परमात्मा उसकी परीक्षा लेते है. तो जब कबीरदास जी की ख्याति फैलनी लगी तो एक व्यक्ति ने आगरा के सिंकदर लोधी जी से जाकर कह दिया कि मुस्लिम होकर हिन्दूओं के भगवान को पूजते है . कबीरदास जी भजन करते है.

अब तो सिकंदर लोधी गुस्से में आ गया कि ये खुदा को तो भजता नहीं है. और जब बादशाह के दरबार में कबीरदास पहुँचे. तो उसको प्रणाम नहीं किया तो बादशाह को बहुत गुस्सा आया तो कबीरदास जी बोले – मेरे तो एक ही बादशाह मै वे है श्री राम और ये सिर केवल प्रभु राम के आगें झुकता और उसके अलावा मैं अपना सिर कटवाना पंसद करूगाँ पर किसी और के सामनें नहीं झूकूगाँ उन्हीं के चरणों में मेंरा सिर रहेगा.



बादशाह ने कबीरदास जी केा पानी में डुबाया,  जलाया और हाथी से कुचलवाया. पर जिसके साथ भगवान हो उसका कौन कुछ बिगाड सकता है. जैसे प्रहलाद जी के साथ हुआ था तो बादशाह ने जंजीर पहनाकर कबीरदास को पानी में डाला तो जंजीर टूट गई. और बादशाह ये देखकर चरणों में गिर गया. और बोला - आप बोलिए क्या चाहिए ? सारी बादशाहत आपकी है तो कबीरदास जी ने कहा - मै तो बस राम नाम ही जपता हूँ . और उसी सभा से राम का नाम लेते हुए चले गए. राजा से लेकर प्रजा तक सभी राम नाम भजने लगे संतों की संगति ऐसे ही होती है. जो उनके पास जाते है. उन्हें वो भगवान के पास ले जाता है . इसलिए भगवान कहते है . कि जो मेरे भक्त के एक बार चरण पकड लेता है . तो मै पहले उसका उद्धार कर देता हूँ 


उस गज और ग्राह के जैसे जब ग्राह ने गज का पैर पकड लिया था तो गज ने भगवान को बुलाया तो भगवान ने पहले ग्राह को मारा तो गज ने कहा - कि मैने आपको बुलाया था पर आपे पहले इसका उद्धार क्यों किया तो भगवान ने कहा - कि देखो गज! तुम मेरे भक्त हो ओर ग्राह ने तुम्हारे पैर पकड लिए थे तो जो मेरे भक्त के चरण पकड ले पहले उसका उद्धार करता हूँ . इसलिए यदि परमात्मा से मिलाना है तो संत के चरण पकड़ लो.



मै कबीरदास जी की भक्तिी से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि आप जब चाहो अपनी देह छोड सकते हो मृत्यु आपके पास नहीं आएगी और जब कबीरदास जी एक सौ एक वर्ष के हुए तो इन्होने फूलों की एक सेज बनाई और उस पर लेट गए अपने उपर एक कपडा डाल लिया ओर जब लोगों ने वो कपडा हटाया तो उनको कुछ भी नहीं कबीरदास जी का शव नहीं मिला वो तो अपने प्रभु राम के पास सशरीर चले गए ऐसे भक्त के चरणों में हमारा नमन है. 

 

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