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मौन

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आज का सतसंग करने से पहले आइए हम दो मिनिट भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“राधा कहे से बाधा कटे रे, राधे-राधे बोल रे, कृष्णा कहे से तृष्णा मिटे रे, कृष्णा-कृष्णा बोल रे”……

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “मौन” हर व्यक्ति को अपने जीवन में शांति चाहिए कोई कितना भी भाग ले, आम जिंदगी में हम सब रेस के घोडे की तरह भाग रहे है । हर व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से  कभी न कभी थकता है । और उसे शांति की तलाश होती है । और जिसे अपने जीवन में शांति पानी है उसे अपनी दोस्ती मौन से कर लेनी चाहिए क्योंकि मौन के वृक्ष पर शांति के फल लगते है ।

 

मौन का मतलब भीतर से होता है । आंतरिक बात न हो, हम देखते है कि अगर मुहॅ से कुछ न बोले  तो भी अंदर हमारे हलचल चलती रहती हम कभी शांत  नहीं रहते है । मौन नहीं है । वो चुप्पी है । जिसमे उपर से तो चुप है । पर अंदर से हलचल है । ये दो शब्द है । एक है मौन और दूसरा है चुप्पी, चुप्पी में होठों से तो हम चुप है । पर अंदर तो हलचल है । और मौन का मतलब है । अंदर से भी चुप है ।

 

प्रसंग १. - जैसे मान लो कोई पति पत्निी है अगर उनमें झगडा हो जाए तो सबसे पहले तो बात करना बंद कर देते है एक दूसरे से फिर दूसरे माध्यम से बात होती है । अंदर दोनों के बहुत सारे सवाल उठते है । उपर से तो दोनों चुप है । उनके उत्तर भी अंदर ही अंदर मिलते जाते है । और जो अंदर शब्द उछल रहे है, वो बैचेनी पैदा करते है और फिर अशांती पैदा होती है । और वो शब्द अंदर ही अंदर ज्वालामुखी बन जाते है । तो इससे अच्छा तो उस चुप्पी को तोड ही दे बाहर ही निकाल दे, अंदर इतनी हलचल हो जाती है । कि पूछों मत,

 

तो मौन और चुप्पी में बहुत फर्क होता है । चुप्पी बाहर होंती है । और मौन अंदर होता है । चुप्पी एक मजबूरी है । और मौन एक मस्ती है, कैसी मस्ती ? जब अंदर से शांति आ जाएगी  तो मस्ती आएगी ही दोनों का संबध शब्द से है । दोनों ही स्थ्तियों में शब्द बचाते है । मौन में भी और चुप्पी में भी  दोनों में शब्द बचाए जाते है । फर्क ये है । कि चुप्पी में बचाए गए शब्द उपर से तो व्यक्ति चुप रहता है । पर अंदर से वहीं शब्द चलते रहते है ।मौन में भी शब्द बचाए जाते है । पर अंदर ही अंदर वो खर्च नहीं होते क्योंकि अंदर तो शांति है । मौन यानी भीतर बात ना करना.

 

इसमें सबसे बडी चीज है । व्यक्ति का “वाणी में संयम” और वो संयम कर भी ले, मुह से भी कुछ ना बोले तो उससे बडी चीज है अंदर की शांति, व्यक्ति चुप तो बैठा है जुबान से भी नहीं बोल रहा पर वो अन्दर  ही अंदर ही इतना चलता है कि पता नहीं वो कहाँ कहाँ की यात्रा कर आता है । जबकि व्यक्ति बैठा है । पर मन पता नहीं कहाँ कहाँ की यात्रा कर आता है । तो अंदर का मौन बहुत जरूरी है ।

 

प्रसंग २. - एक बार एक व्यक्ति था वो भगवान का भक्त था वो प्रार्थना करता था उसकी प्रार्थना बहुत सच्ची थी । पर उसमें संयम नहीं था । जब देवताओं ने उसकी प्रार्थना सुनी तो उन्होनें भगवान से जाकर कहा - कि प्रभु ! ये व्यक्ति बडी ही सच्ची आराधना करता है । तो आपको इसको कुछ न कुछ वरदान तो देना होगा , पर इसकी एक कमजोरी है । इसको वाणी का संयम नहीं है. पर ये पात्र नहीं है फिर भी  इसको देना होगा ये प्रार्थना कर रहा है तो इसको इसका फल तो देना होगा.

 

भगवान ने कहा - कि ये भी सही बात है कि उसने कर्म किया है श्रद्धा है तो अपात्र होने पर भी इसको देना तो होगा. तो भगवान ने उससे कहा-  कि मागों क्या चाहिए? तुम्हें ,

 

तो उसने कहा - कि भगवान मै जो चाहू मेरी वो इच्छा पूरी हो जाए. तो भगवान ने कहा - कि ठीक है पर एक शर्त है मै तुम्हें ये तीन काच के गोले दे रहा हू, इनसे जो भी मागोगे तुम्हारी वो कामना पूरी हो जाएगी । पर एक बात का ध्यान रखना कि ये टूटे ना, अगर ये टूट गया तो तुम इससे कुछ माँग नहीं सकते हो.

 

अब तीनों गोले उसको मिल गए अब वो व्यक्ति अपने घर आया तो उसका बेटा दौडते आया कि पिताजी आप क्या लाए, तो वो एक गोला नीचे गिर कर टूट गया तो उसे व्यक्ति को बडा गुस्सा आया कि अभी मैने कुछ माँगा ही नहीं और ये गोला टूट गया, तो उसने गुस्से में अपने बेटें से कहा - कि तुम्हारी दोनों आँखें फूट गई है क्या? तो वो जो गोला टूट गया था वो उसकी एक कामना पूरी करेगा तो उसके बेटे की आँखें फूट गयीं.

 

तो उसको बहुत दुख हुआ उसको अपनी वाणी में संयम ही नहीं था तो उसने दूसरा गोला गिराया और कहा कि मेरे बेटे के चहरे पर आँखें आ जाए थोड़ी देर में बेटे के चेहरे पर आँखें ही आँखें आ गई इतनी सारी आखें क्या काम की. अब सोचा कि क्या करू तो तीसरा गोला उसने तोडा और कहा - कि भगवान मेरा बेटा पहले की तरह ही हो जाए प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का मतलब सब कुछ था उसके पास उसने अपनी श्रद्धा से पा भी लिया था सब पर वाणी के संयम से उसका करा कराया कुछ भी उसके काम नहीं आया. अगर वो सोच के बोलता तो ये कामनाएँ उसके बहुत काम आती पर संयम न होने के कारण वो ना माँगने के जैसे ही रहीं और उससे उसी का बुरा हुआ ये अपात्रता वाणी पर संयम न होना लेकिन व्यक्ति इस पर कन्टोल तो कर लेगा, चुप्पी भी आ जाएगी पर ये मन की शांति कैसे आएगी इसका एक बहुत अच्छा तरीका है । वो है “सुनना”

 

व्यक्ति जितना सुनेगा उतनी ही उस में शक्ति आएगी क्येंकि आजकल व्यक्ति बोलना तो चाहता है पर सुनना कोई नहीं चाहता और सुनने में बहुत शक्ति है । जो जितना सुनेगा उसमें वो चीज उतनी ही दृढता से आएगी हमनें कभी अंदर की शांति के नाद को सुना ही नही हम बोलने में इतने व्यस्त है । कि अंदर शांत रह कर उस नाद को सुन ले, पर कब हम सुन सकते है. जब हम अंदर से शांत रहेगें जो भी संत बोल रहे है जो भी दो अच्छी बातें सुनने को मिलें उसे बिना विचार किए सुनना है बस फिर इसकी शक्तिी को देखना सुनने में बहुत बड़ी शक्ति है ।

 

हमें केवल प्रयास करना कि हममे रोज थोडा चुप रहने का अभ्यास करना है । क्योंकि ये जो सुनना है के मामले में आध्यात्म में एक बात बताई है । कि सुनने से चिंतन आ जाता है । सुनकर व्यक्ति अपने कल्याण का मार्ग जान सकता है । अपना आचरण सुधार सकता है जो कुछ भी व्यक्ति अपने कानों से अंदर डालेगा वो वैसा ही होगा अब ये हमें देखना है । कि हम संसार की विषय वासना अंदर डाल रहे है या फिल्मी दुनिया या भगवन नाम का कीर्तन कानो में डाल रहे है. क्योंकि जो व्यक्ति सुनेगा उसके मुहॅ से वैसा ही निकलेगा जो भगवान का नाम सुनेगा ऐसा कैसे हो सकता है कि उसके मुहॅ से ना निकले इसलिए सुनने मे बडी ताकत है ।

 

भगवान ने हमें दो कान और एक मुहॅ क्यों दिए है । कि व्यक्ति सुने ज्यादा और बोले कम और पर होता उलटा है व्यक्ति बोलता ज्यादा है सुनता कम हम देखते है कि जब हम किसी के बारें में सुनते है तो हमें उसकी याद आ जाती है । तो हमें भगवान की कथा को सुनना है ।  क्यूंकि कि हम इस संसार में इतना फसॅ गए है कि हम उन बाँके बिहारी को भूल गए है ।उन्हें याद करने के लिए हमें सुनना होगा  उसे हमें सुनना पडेगा जब तक व्यक्ति सुनेगा नहीं उसमें जीवन में मौन आ ही नहीं सकता जब वो सुनेगा और उसको चिंतन करेगा और अंदर से जो अशांती से बात ना करना जिस दिन उसको वो शुरू हो गया उसी दिन उसका कल्याण का मार्ग शुरू हो गया.

 

आज के युग में शब्दों का बहुत खेल है । अपनी बात को हम दूसरों तक कितनी ताकत से पहुचाँतें है ये शब्दों पर टिका है । शब्द ही प्रभावी बनाते है । तो हर व्यक्ति को चुप्पी से बचना है । चुप्पी चहरे का रोब है तो मौन मन की मुस्कान है । मौन में जो अंदर का नाद है वो जिस दिन व्यक्ति ने सुनी जिस दिन ये मौन अंदर उतर जाएगा उसी दिन उसे वो अपना अंतरनाद सुनाई देगा. संतो के पास यहीं शक्तिी है । उनके शब्द प्रभावी क्यों होते है ?वो बोलते तो है । पर कब, जब वो आत्म चिंतन कर लेते है ।वो मौन उनके अंदर घटित होता है उनके शब्द प्रभावी होते है उनका कहा हर एक वाक्य व्यक्ति के लिए प्रदर्शन बन जाता है । आदर्श बन जाता है । क्यों ? संत अगर बात करता है तो परमात्मा से और संसार को कुछ बताना है तो उतने ही समय के लिए वो बोलता है । बाकि समय मौन ही रहता है बात अगर करनी है तो सिर्फ परमात्मा से, और संसार से बात करने से क्या मिलता है संसार की चर्चा, इसलिए संत सोचता है कि संसार के लोग आएगें तो वहीं चर्चा संसार की बताएगे तो इससे अच्छा है कि अंदर के नाद मौन को ही बढाया जाए. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३. - पति पत्निी थे दोनों ही रोज झगडा करते थे ना पति चुप रहता था, और ना ही पत्निी, तो एक दिन पत्निी ने अपनी पडोसन से कहा - कि हमारे घर में शांति नहीं है

 

तो उसने कहा - कि इसमें कौन सी बडी बात है.  मै अभी तुम्हारी ये समस्या हल कर देती हूँ ।

 

तो उसने कहा - बहिन जल्दी बताओ कि लडाई शांत हो जाए. तो उसकी पडोसन ने कहा - कि मै तुम्हें एक दवा देती हू, जिससे लडाई खत्म हो जाएगी तो उसने एक दवा की शीशी लाकर दे दी. जब भी लडाई हो, तब तुम थेाडी सी दवा ले लेना और अपने मुह में भर लेना.

 

फिर अगलें दिन फिर झगडा हुआ तो उसने वो दवा पी ली.बड़ा आश्चर्य झगडा नहीं हुआ, तो लडाई शांत हो गई फिर अगले दिन फिर से उसके पति से उसकी लडाई हुई तो फिर दवा खाई तो लडाई शांत हुई तो वो पडोसन के पास गई कि बहिन तुमने अच्छी दवा दी हमारे घर में अब शांति है । अब लडाई बंद है । तो वो दवाई अब खत्म हो गई है । तो तुम मुझे बताओं कि दवाई कैसे बनाती है तो मै और बना लूँ तो

 

वो बोली - उस शीशी में मैने तो पानी ही भरकर दिया था, तो वो बोली - कि तो लडाई कैसे शांत हो गई? उसने कहा - कि जब लडाई शुरू हुई तो अपने मुहॅ मे तुमने पानी भर लिया तो कुछ बोला ही नहीं चुप रही और तुम दोनों में से एक शांत रहा, तो लडाई आगें कैसे बढती?

 

तो शांत रहना, चुप रहना बहुत जरूरी है । तो जब बाहर की लड़ाई शांत करने के लिए चुप रहना जरुरी है तो इस अंदर की शांति के लिए मौन बहुत जरूरी है । बस ये अंदर की लडाई जिस दिन बंद हो गई, तो बाहर की लडाई से तो आधी शांति मिलती है,जिस दिन अन्दर की बातचीत बंद हो गई,उसी दिन  आतंरिक शांति अपने आप आ जायेगी.  

 

“राधे-राधे”   

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