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भक्त चरित्र - कूबा जी

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलो के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ...

“गोविंद जय-जय, गोपाल जय-जय, राधा रमण हरी, गेाविंद जय-जय….”

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है .

आज के हमारे सतसंग का विषय है - भक्त चरित्र में “श्री कूबा जी” महाराज भगवान को अपने भक्त बहुत प्रिय है . भक्तिी भक्त और भगवान “भक्तिी, भक्त, भगवंत, गुरू, चतुर नाम वपु  एक, इनके पद वंदन किए, तो नाशत विघ्न अनेक”


यानी अगर हम वैष्णव है भगवान को मानते है तो हमें इन चारों में भेद नहीं करना चाहिए भक्तिी, भक्त, भगवंत, गुरू, चारों पूज्यनीय है 
. संत जहाँ भी मिल जाए खुद भगवान राम जब वनवास गए तो शबरी जी को नवधा भक्तिी का उपदेष करते है तो वो कह रहे है “सातम मोहि मै जग देखा, मोसे संत अधिक कर लेखा”, संतो को मुझसे भी ज्यादा मानना और निष्काम भाव से उनकी सेवा करना जितना प्रसन्न मै खुद की सेवा से नहीं होता हूँ . उतना संतो की सेवा करने वालों से होता हूँ . भगवान ने स्वंय कहा है कि ब्रज में संतजन तो गृहस्थों पर ही निर्भर रहते है . वो तो ब्रज वासियों के घर जाकर मधुकरी मागते है और जो मिल जाता है उसे ही खाते है, एक समय तो संत खाते ही है केवल, कुछ भी जो मिल जाता है वो ही खाकर भजन में मस्त रहते है . 


भगवान कहते है कि जिन जिन ब्रजवासियों ने मेरे भक्तों एक बार भी मधुकरी दे दी उन भक्तों पर मैं अपना तन मन सबकुछ लुटा देता हूँ
. उन्होनें मेरे भक्त की सेवा की है. तो हमें भगवान का प्रिय बनना है तो हमें उनके दासों का दास बनना होगा यहीं भगवान की सच्ची सेवा है .

 

और कूबा जी महाराज ऐसे ही थे जिनकी संतो में बडी निष्ठा थी वो कुम्हार जाति के थे उन्होंने न केवल अपने परिवार के लोगों को, सारे गाँव वालों को भवसागर से पार उतार दिया कैसी भी संत सेवा मिल जाए कभी भी अपने हाथ से अवसर नहीं जाने देते थे .


प्रसंग १- 
एक बार बहुत से संत घर पर आ गए तो ये देखकर प्रसन्न हुए क्येांकि “बिन हरि कृपा मिलहीं नहीं संता” बिना भगवान की कृपा से संतो का मिलना अंसभव है . और संत का अगर घर में प्रवेष हो जाए तो समझना भगवान पीछे-पीछे आते है . पर कूबा जी के मन में भाव आया कि घर में तो कुछ भी नहीं है . तो वो बनिए के पास सामान लेने गए, पर बनिए उधार देने से मना कर दिया तो ये बहुत परेषान होकर एक व्यक्ति के पास गए और उससे भी याचना की तो वो बोला कि हम पैसा देने को तैयार पर आपको हमारा एक काम करना होगा तो कूबा जी ने कहा -कि कैसा काम?

तो वो बोला - कि हम यहाँ कुआँ खुदवा रहे है तो आपको खोदना पडेगा तो कूबा जी तो चाहते ही थे कि कैसे भी संत सेवा हो जाए, तो वचन दे आए कि हम आपका कुआँ खोद देंगे, तो उस व्यक्ति को पता था कि कूबा जी भगवत भक्त है कभी झूठ नहीं बोलते है . तो उस व्यक्ति ने पूरा सामान दे दिया खाने पीने की. 


तो घर आकर कूबा जी ने संतो को बडे प्रेम से भोजन करवाया और उसके बाद कुआ खोदने के लिए उस व्यक्ति के पास पहुँचे और अकेले ही कुआं खोदने लगे पर माथे पर कोई शिकन नहीं थी कि हमें संतो की वजह से कुआँ खोदना पडा बल्कि खुशी थी कि संत हमारे घर से भूखे नहीं गए और कुआँ खोदते जाते और मुहॅ से भगवान का नाम सीताराम कहते जा रहे है और वाणी भी मधुर है . और कुआँ जब नीचे तक खुद गया तो वो बनिया बहुत खुश हुआ और जब बालू दिखने लगी तो जो मिटटी उपर की ओर फेंक दी थी वो अचानक से फिसल कर कूबा जी के उपर गिर गई . अब वै नीचे से कैसे बाहर निकलते और उपर से जो लोग देख रहे थे उनको कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और सब शोक करने लगे और चले गए वो कुआँ ऐसा ही पडा रहा, कौन वो हजारों मन मिटटी उठाता.


ठीक एक माह बाद एक व्यक्ति वहाँ से निकला और कुएँ से उसको राम नाम की ध्वनि सुनाई दी तो वो गाँव में गया और सारे लोगों केा लेकर वहाँ पर आया, तो सब लोगों ने वो राम नाम की मधुर वाणी सुनी और सब लोगों को वह राम नाम कि ध्वनि इतनी प्यारी लगी कि सब अपनी सुधि खो बैठे तो सब लोगों ने बडी शीघ्रता से मिटटी केा हटाना शुरू किया तो देखा कि कुबा जी थे वहाँ पर और वो हरे राम, हरे कृष्णा का गान कर रहे थे तो लोगों को आष्चर्य हुआ और देखा कि वहाँ एक छोटी सी गुफा है और थोडा-सा पानी रखा है ओर एक माह तक ये अपनी पीठ के झुकाए बैठे रहे तो उनकी कूबड निकल आइ्र तो लोग उन्हें केबल से कूबा जी कहने लगे तो जिन-जिन लोगों ने इनके बारे में सुना तो वो इनसे मिलने आने लगे कि ये एक माह तक कुएँ में रहे और हजारेां टन मिटटी उपर रही फिर भी ये सलामत है 
. ये तो भगवान की ही कृपा है . दूर दूर तक ख्याति फैल गई लोग मान सम्मान करने लगे ये संतो की सेवा करते थे तो बारह महीने संत आया जाया करते थे . तो ये सभी की सेवा करते थे .


प्रसंग २- 
एक बार एक संत इनके पास आए वो अपने पास राधा कृष्ण की एक बडी सुदंर मुर्ति थी वो किसी मंदिर में स्थापना करने के लिए ले जा रहा था . और मार्ग में चलते-चलते थक गया था तो वो कुबा जी के घर में रूक गया तो जब कूबा जी नजर श्यामसुदंर की मूर्ति देखी तो उसमें ही खो गए क्येंकि वो बहुत ही मनोहर सुंदर थी तो कूबा जी मन ही मन भगवान से कहने लगे कि प्रभु अगर मुझपर आपकी कृपा हो, तो यहीं रूक जाओ तो भगवान तो अपने भक्त की इच्छा को कैसे ठुकरा सकते थे . कूबा जी की बात भगवान ने सुनी और उनकी मुर्ति अचल हो गई और संत ने बहुत उठाया पर मूर्ति नहीं उठी, तो कूबा जी ने कहा - कि हरि अंनत है लगा है कि इनकी इच्छा यहीं रहने की है . संत भी समझ गए कि वास्तव में श्यामसुदंर को यहीं रहना है जाना चाहते है तो वहीं छोडकर चले गए. कूबा जी प्रसन्न् हुए औेर बोले - कि वाह प्रभु! आपने मेरे मन की बात जान ली तो आज से आपका नाम “जानराय” हुआ मन की जान लेते हो आप तो आपका नाम जानराय जी और मंदिर में स्थापित कर दिया और सेवा करने लगे .


प्रसंग 3- एक बार कुबा जी का मन हुआ कि द्वारिकापुरी जाए वहाँ पर जो भगवान के शंखपुष्प है लोग उसकी छाप अपने शरीर पर करवाते है . तो उनकी इच्छा हुई कि हम भी द्वारिाका जावे और प्रभु के दर्षन करके आए और शंख चक्र की छाप अपने हाथ में करवाले तो जब वो जाने लगे तो जानराय जी भगवान बोले - कि कूबा जी हमें छोडकर मत जाओ!  अगर आपकी इच्छा हो तो मैं सारी कामनाएँ यहीं पूरी कर देता हूँ . पर भगवान के मना करने पर द्वारिका पुरी नहीं गए और अपने घर वापिस आकर सो गए, और जब सुबह हुई तो देखा कि शंख चक्र की छाप इनके हाथ पर आ गई तो प्रभु का ये चमत्कार देखकर बडे प्रसन्न हुए.


और बोले कि सचमुत प्रभु आपका नाम जानराय बिल्कुल सही है आप मेरे मन की  हर बात जान लेते हो और उसे पूरा भी कर देते हो जब मेरी संतो की सेवा करने की इच्छा हुई तो आपने वो भी पूरी कर दी जब मेरी इच्छा हुई कि आप यहीं रह जाए तो आपने वो भी पूरी कर दी जब मेरी इच्छा हुई कि द्वारिाक जाउॅ और शंख चक्र की छाप करवा लूॅ तो आपने वो भी पूरी कर और क्येां ना हो कूबा जी भगवान के परमभक्त थे सच्चे मन से उनकी सेवा करते थे 
.


प्रसंग 4- 
एक बार जहाँ ये वासव करते थे वहाँ गोमती नदी थी तो उसके और समुद्र के बीच रेती हुआ करती थी समुद्र की लहरे आती थी और रेती को पार कर जाती और गोमती मंे मिल जाती थी अब एक बार वो जो लहर है उसका आना बंद हो गया तो वो संगम मिलना बंद हो गया तो उसके महत्व की हानि होने लगी क्योंकि जब वो संगम होता था तो उसका बडा महत्व था जब मिलना बंद हुआ तो सब लोग दुखी हुए कि गोमती समुद्र से मिलती नहीं है . बीच में जो रेती थी वो लोगों को परेषान करती थी उडउडकर लोगेों के घर में जाती तो कूबा जी को ये बात पता चली तो उन्हेंानें अपनी सुमिरन करने वाली माला को उस रेती पर रख दिखा और एक बडा चमत्कार हो गया फिर से वापिस समुद्र गोमती में आकर मिल गई और वो संगम फिर से होने लगा और कभी बंद नहीं हुआ तो जो भक्त है उसके लिए “मंत्र” “मूर्ति” और “माला” ये तीन चीजें बडी महत्वपूर्ण है . एक उसके गुरू द्वारा दिया गया मत्रं, जो गुरू ने उसके कान में दे दिया वो पत्थर की लकीर है. भक्त उसमें तर्क वितर्क नहीं करता कोई शंका नहीं करता है.


इस मंत्र को जपा जाए की नहीं, ये सिद्ध है कि नहीं, ऐसा नहीं है वो तो गुरू के मुख से निकल गया वहीं है सबकुछ, जो मुर्ति हमने परमात्मा की मन में बसा ली तो उम्र भर उसी का ध्यान करना है, वो ही बसे रहेंगे भक्त उन्हें बदलता नहीं है गुरू का मंत्र जैसे सिद्ध होता है . वैसे ही भगवान का श्री विग्रह भक्त के लिए सिद्ध हो जाता है और तीसरी माला जिससे एक भक्त भगवन को सुमिरन करता है और उस माला से जब गुरू मंत्र का जाप करते है और आँखों में भगवान के श्री विग्रह का ध्यान करते है तो फिर वो माला भी करते करते सिद्ध हो जाती है. और वो माला क्येां नहीं कर सकती है चमत्कार,

कूबा जी ने अपनी माला भेज दी और देखिए उसने कितना बडा चमत्कार कर दिया इसमें केाइ आष्चर्य नहीं है. वो बडे सिद्ध थे उनकी भक्तिी माला मंत्र सिद्ध थे तो यूँही कूबा जी की जब ख्याति चारेां और फैल गई इनके कई षिष्य बन गए और सभी मिलकर संतो की सेवा करने लगे और दिनों दिन बढती गई संतो की संख्या खूब लोग धन देते इनको और उसी से संतो की सेवा करते कहते है धर्म का पैसा धर्म में ही लगाओ और कूबा जी पूरा पैसा संत सेवा में ही लगाते  कूबा जी संत सेवा की अथाह महिमा का प्रमाण दिया .


प्रसंग 5 -
एक बार इनके घर में संत आए और उसी समय इनकी स्त्री का भाई भी आया कूबा जी ने अपनी पत्निी से कहा- कि संतजन घर में आए है आप इनको प्रसादी तैयार कर दो तो इनकी पत्निी ने संतो के लिए साधारण खाना बना दिया ओर भाई कि लिए खीर बना दी तो कूबा जी ने देखा-  कि भाई से इतनी प्रीति है कि अपने भाई के लिए खीर और महान संतो के लिए खीर नहीं बनाई तो उनको कूबा जी को बुरा लगा.



तो वे बोले -
कि जा! पानी भरकर ला, तो वो चली गई पर मन में ये बात लगी रही कि मेरे जाने के बाद ये खीर संतो को ना खिला दे और जब वो गई तो कूबा जी खीर उठाकर उसमें तुलसी डालकर भगवान को भोग लगाकर संतो को खिला दी और जब इनकी पत्निी आई तो देखा कि भाई को बनाई गई खीर संतो को खिला दी तो क्रोध आया और दुख करने लगी कि भाई की खीर संतो केा दे दी तो कूबा जी ने देखा कि संतो के प्रति प्रेम नहीं है 
. तो कूबा जी ने घर से निकाल दिया,


तो वो स्त्री भी कुटिल थी उसने दूसरा विवाह कर लिया और दूसरे पति से उसे बच्चे हो गए एक बार बडा अकाल पडा और उसके पति को और उसे भूख से मरने की नौबत आई तो वो कूबा जी के पास आई और कूबा जी का तो यहाँ नित्य का नियम चल रहा था वो हरे राम, हरे कृष्ण का जाप कर रहे और संतो के लिए रोज रसोई बनाते जैसे समुद्र के पास चारेां तरफ से नदियाँ आती है, वैसे ही कूबा जी के पास संत आते थे,

तो वो स्त्री रोने लगी तो कूबा जी ने कहा - कि तुम तो मुर्ख हो, जो संसार में पडी हो, मेरे स्वामी कृष्ण का प्रभाव देखो कितने आराम से सारे काम हो रहे है 
. और तुम अपने पति को देखो कितनी कठनाई में जी रही हो ठीक है  उसने कहा दया करे, तब कूबा ने उसे रख लिया और कहा साफ सफाई करना तो अपनी पत्निी को छोडा दिया पर कूबा जी ने संत सेवा नहीं छोड़ी और बाद में उसको अपनाया भी नहीं,


क्येांकि जिसके मन में संत सेवा नहीं है तो परमात्मा कहते है कि जो मेरे संतो से बैर करता है मै भी उसे नहीं रखता “संत हद्रय नवनीत समाना” संत कभी अपने लिए नहीं जीते है 
. संत तो भगवान का भजन करते है . और दुनिया के लिए जीते है .उनसे की किसी का दुख नहीं देखा जाता है . कूबा जी बहुत संत सेवा करते थे और अपने शिष्यों को भी सीख दी कि तुम लोग हमेशा संत की सेवा करना, अगर तुम भगवान के गुण, रूप को चाहते हो, तो कभी संतो की सेवा केा मत छोडना और उनके शिष्यों ने भी यहीं किया उनके शिष्य भी एक से बढकर एक हुए और संत सेवा करके भगवान की प्राप्तिी की.ऐसे संतो के चरणों मे केाटि वंदन है .

 

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