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ज्ञान और भक्ति मार्ग

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राधे राधे आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले दो मिनिट भगवन नाम का कीर्तन करें ।

“प्रिय राधे, श्री राधे, राधे-राधे, प्रिया-प्रिया,जय जय राधे-राधे......”  


श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग” एक भक्त जैसा जिस मार्ग से चाहे उसी मार्ग को भगवान स्वीकार कर लेते है । जैसे छोटी नदियाँ कई रास्तों से होकर जाती है पर उनका लक्ष्य एक ही होता है महासागर से मिलना, ऐसे कोई भी मार्ग से जाओ पर सब का उददेष्य एक ही है वो कृष्ण की प्राप्तिी. चाहे कोई भी मार्ग हो . भगवान ने कोई नियम नहीं बनाए उन्होंने खुला छोड रखा है जिसको जो मार्ग अच्छा लगता है वो उसे अपना लेता है. 


साम्प्रादायिकता जिसमें हमनें हिंदू मुसलमान बाँट रखा है । इसकी गहराई मे जाकर देखे तो वो ईष्वर हो, अल्लाह हो, ईषु हो, चाहे गुरुनानक हो ,पर एक ही मकसद है भगवान की प्राप्तिी. ये मजहब हम इंसानों ने बनाए है भगवान ने नहीं. वो तो सब एक ही शक्तिी है सबका एक ही लक्ष्य है जिसे जो अच्छा लगे

आध्यात्म में दो मार्ग होते है-  एक ज्ञान मार्ग जो निराकार भक्तिी की उपासना करते है । और दूसरे भक्तिी मार्ग जो साकार की उपासना करते है । निराकार को हम समझे तो ज्ञानी भक्त मानते है कि भगवान का कोई स्वरूप नहीं होता है । तो वो अपनी आखों के बीच ध्यान लगाते है.

भगवान में भक्ति मार्ग में भगवान का स्वरूप साकार होता है. जैसे हम मंदिर में बाँके बिहारी को मानते है । अब दोनों मार्ग अच्छे पर दोंनों में अंतर है ज्ञान मार्ग मं लोग अपने ज्ञान के दम पर भगवान को पाने की केाषिष करते है । पर भक्ति मार्ग में व्यक्ति के पास कोई सहारा नहीं होता है । क्योंकि वो ज्ञानी तो है नही तो वो भगवान के सहारे ही चलता है । उसके पास ज्ञान तो है नहीं.

जैसे एक बंदर का बच्चा है वो जब छलांग लगाता है पेड पर, तो वो अपनी माँ को बहुत जोर से पकडे हुए होता है । ताकी जब वो छलाँग लगाए तो वो छोड ना जाए. अगर वो ऐसे में छूट जाए तो गलती बच्चे की होती है । बच्चे ने अपनी माँ को ठीक से क्यों नहीं पकड़ा .

इसी तरह जैसे बिल्ली होती है । उसका बच्चा इतना असमर्थ होता है कि वो चल नहीं सकता तो उसकी माँ मुहॅ से उसको उठाती है और लेकर चलती है ।जहाँ उठाकर रख देगी वही पड़ा रहेगा. तो कहने का मतलब ज्ञान का मार्ग उस बंदर के बच्चे की तरह है वो उस बच्चे की तरह ज्ञान को पकडे रहता है । अब ज्ञान में वो कहीं छूट जा, उसमे भगवान कि गलती नहीं है, ज्ञानी की गलती है । और बिल्ली का बच्चा भक्तिी मार्ग की तरह है कि भगवान उसको जहाँ चाहे उठाकर रख दें वो अपनी माँ पर निर्भर है । ज्ञानी मार्ग मे व्यक्ति आगे चलता है और भगवान पीछे, वो खुद ही अपनी राह बनाता है. भक्तिी में भक्त भगवान को ही आगें करता है कि आप ही मुझे रास्ता दिखाओ प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग १-
एक प्रसंग है लक्ष्मी जी और नारायण का मंदिर था उसमें एक ज्ञानी और एक भक्त देानों जाते थे तो ज्ञानी अपने ज्ञान से भगवान को भजता और भक्त अपनी श्रद्धा से भगवान की पूजा करता बस ये रोज का नियम था. उस मंदिर में साक्षात नारायण रहते थे तो उनका पता चला कि दोंनों भक्तों के यहाँ चोरी होने वाली है । वो भी एक ही दिन में. तो भगवान ने क्या किया जैसे ही वो ज्ञानी पूजा करके उठा और जाने लगा तो भगवान ने कहा - कि आज तुम्हारें यहाँ चोरी होने वाली तो तुम सावधान रहना तो भक्त कहता कि भगवान आपकी बडी कृपा हुई कि आपने पहले ही बता दिया अब मै सावधान होकर रहूगाँ. अपने ज्ञान से कोई उपाय कर लूगाँ.


अब थोडी देर बाद वो भक्त आया तो वो पूजा करके भगवान के भजन में खो गया और फिर उठा और चला गया अपने घर को. तो लक्ष्मी जी ने कहा - कि भगवान आप ने अपने दोंनो भक्तों के साथ पक्षपात क्यों किया आपने एक भक्त को तो बता दिया कि उसके यहाँ चोरी होने वाली है और दूसरे केा नही.

तो भगवान के कहा - कि भक्त आज रात आराम से सोएगा और ज्ञानी अपने ज्ञान से चोरी को रोक लेगा और भक्त को मेरा ही सहारा है, तो मै उसके घर के बाहर पहरा दूगाँ और चोर को अंदर नहीं जाने दूगाँ देखो ज्ञानी अपने ज्ञान से मुझे पा लेगा वो मेरे उपर आश्रित नहीं है । लेकिन ये जो भक्त है उसको तो मेरा ही भरोसा है जब केाई भक्त मेरे पास आकर ये कहता है - कि प्रभु आपके सिवा मेरा कोई सहारा नहीं है तो मै सब छोडकर उसकी चाकरी में लग जाता हूँ । तुमने ऐसा बोल दिया तो बस मै तुम्हें राह दिखाऊंगा. जैसे बिल्ली अपने बच्चे को मुहॅ से उठाती है । और उसी मुह से चूहे केा, तो उन्ही दातों से चूहा मर जाता है  और बच्चे को खरोंच भी नहीं आती । बच्चा भी बेसुत रहता है वो अपनी माँ पर आश्रित रहता है ।


ज्ञान मार्ग में ज्ञानी व्यक्ति को अपने ज्ञान का अंहकार हो जाता है । और उसे ये पता नहीं चलता कि उसे अंहकार हो गया है अपने ज्ञान का. वो कभी नहीं जान पाता और वो साधना की चरम सीमा पर पहुच कर भी वापिस आ जाता है । और जो भक्त होता है । वो अमानी होता है इसका मतलब है कि हमें सबकुछ आता है पर भगवान के सामनें ऐसे रहो कि हमें कुछ नहीं आता है तो आध्यात्म के मार्ग मं जो जितना आगें जाता है वो अमानी  बनता जाता है । वो भगवान की शरण मं अपने को समर्पित करता जाता है ।

एक बात और भक्तिी अंधी नहीं होती उसमें ज्ञान होना जरूरी है कैसा कि ये हमारे ईष्वर है । हमारें बांके बिहारी ऐसे दिखते है ऐसा उनका श्रृगांर है, उनकी आँखें है, अगर व्यक्ति इतना भी ध्यान नहीं रखेगा तो फिर वो अपने इष्ट का ध्यान कैसे रखेगा ज्ञान होना जरूरी है कि वो केसे दिखते है तो बिना ज्ञान के भक्तिी और बिना भक्तिी के ज्ञान अधूरा है । दोंनों चीज होना जरूरी है । केारा ज्ञान किसी काम का नहीं जब तक उसमें भक्तिी ना मिले जब भी ज्ञान और भक्तिी की बात हो.

प्रसंग २- भागवत का एक प्रसंग है उधौ जी और गोपी का प्रसंग. ये कृष्ण जी के चाचा के पुत्र थे और उस समय के ज्ञानी थे बृहस्पति के शिष्य थे तो जब ये मथुरा मिलने के लिए आए तो उन्हेांने देखा कि इनमें ज्ञान तो बहुत है पर बिना भक्ति के केारा है तो उन्होंने यहाँ वो खुद ज्ञान दे सकते थे पर उन्होने उनको वृदांवन भेजा क्योंकि वो जानते थे कि गोपियाँ ही इनके ज्ञान में भक्तिी का रंग चढ सकती है क्योंकि प्रेम और भक्तिी उनके अलावा कोई नहीं जान सकता है.

तो जब वो कृष्ण जी का संदेष लेकर वृदावंन गए तो गोपियों से बोले कि तुमने ये क्या रोना धोना लगा रखा है । इतनी विरह में क्यों डूबी हो तुम उस बह्रम कर ध्यान करो तो गोपियाँ कहती कि उधौ जी अगर आपको लगता है कि ये हमारा विरह है तो ये आपकी नजरों में विरह का मतलब दूर होना है । पर हमारी नजरों में ये विशेष योग है, जब भगवान यहाँ थे और गायॅ चराने जाते थे तो सुबह जाते थे और शाम को लौटकर वृदांवन आते थे । और हम दिन भर उनका इंतजार करते थे और अब जब वो मथुरा में है तो उनसे अच्छी उनकी याद है जो एक पल के लिए भी नहीं जाती. जब उनको बुलाते है वो आ जाते है ।  वो हमारे मन मं बसे है और ये जो आप ज्ञान ध्यान की बात कर रहे हो वो किस मन से करे  हमारे पास तो एक ही मन था वो ही भगवान कृष्ण ले गए. 

हम कैसे निराकार बह्रम की उपासना करें और ऐसे बह्रम का क्या करें जो हमारे माखन की चोरी न कर सके और हमारे विरह में न तडप सकें, और ना ही हमें तडपा सकें । अगर तुम्हारा बह्रम ऐसा है वो माखन के लिए नाँच सकता है अगर नही तो हम ऐसे बह्रम को लेकर क्या करेंगे. जब उधौ जी को उपदेष जो गोपियों ने दिया तो उनका ज्ञान पता नहीं कहाँ चला गया ओर गोंपियों के चरणों मे लोट गए ओर बोले कि वास्तव में जो तुम्हारी भक्तिी है । गोपियों तुम्हारा ये जो प्रेम है ज्ञान से कहीं बढकर है तुम मुझे अपना शिष्य बना लो फिर उसके बाद गोपियों राधा जी की चरण धूली अपने मस्तिक पर डालकर उधौ जी मथुरा आए. और मथुरा आकर भगवान से कहा - कि आप बडे निष्ठुर हो तो भगवान ने कहा - वाह एक भक्त के मुख से ही ये शब्द निकल सकते है एक ज्ञानी ये कभी नहीं कह सकता एक भक्त एक प्रेमी ही ऐसा बोल सकता है वो कहते है कि गोपी तुमसे कितना प्रेम करती है और तुम यहाँ हो.तब भगवान समझ जाते है कि उद्दो जी के ज्ञान पर भक्ति का रंग चढ गया है. प्रेम से कहिए श्री राधे


तेा कहने का मतलब भक्तिी में ज्ञान होना बहुत जरूरी है । और ज्ञान में भक्तिी ना हो तो उसका पतन हो जाएगा क्योंकि मन इतना चंचल है कि बडे से बडे तपस्वियों की तपस्या मन ने भंग कर दी अगर व्यक्ति अपने ज्ञाप से साधना की चरम सीमा पर पहुँच जाता है पर जब कामनाओं की तेज आँधी चलती है । तो ये ज्ञान रूपी दीपक कब बुझ जाए पता भी नहीं चलता तो इस लौ को बचा के रखना है तो वो कब बचेगी जब  कब वो कामना की आँधी उस लौ को छू नहीं पाएगी जब उसमें भक्तिी आ जाएगी प्रेम से कहिए श्री राधे


कहने का मतलब ज्ञानी अपने को ज्ञान से तो भरता जाता है पर पे्म से और भक्तिी से खाली कर देता है और जो भक्त होता है । वो प्रेम से, विरह से, अपने आप को भरता है उसके लिए तो विरह ही सबकुछ है । कि कृष्ण प्यारे हम तुम्हें कब पाएगें, ये तडप ही उसके जीवन का उददेष्य बन जाती है । उसकी आँखों से जब दो बूँद आसॅ गिर गए तो वो उसकी पूजा साधना हो गई उसे अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है ।


प्रसंग 3.- जैसे मान लो एक मेला लगता है उसमें माँ बाप और एक बच्चा जाता है तो उसमें बहुत भीड रहती है तो उनका बच्चा खों जाता है तो वहाँ पर माइक में एनाउसंमेंट करवाते कि मेरा बच्चा खो गया है । तो बच्चे केा तो ये नहीं मालूम था कि वो खो जाएगा हाथ किसने पकड़ रखा था माँ बाप ने यदि बच्चाछुटा तो तो गलती माँ बाप कि है. उसका हाथ छूट गया इसमें गलती कि नहीं.  ऐसे ही भक्त अपने हाथ को बढा देता है कि भगवान आप हाथ थाम लो उसमें अगर हाथ छूट रहा है तो ये भगवान की गलती है भक्त ने तो अपना हाथ दे दिया. और ज्ञान मार्ग में इसका उलटा है । ज्ञानी भगवान का हाथ पकड लेता है और अगर वो छोड दे तो उसमें ज्ञानी की गलती है कि क्यों उसने भगवान का हाथ छोडा प्रेम से कहिए श्री राधे


दोंनो मार्ग अच्छे है पर ज्ञानी में अहंकार छिपा है और वो कब आ जाए पता नहीं चलता ये आध्यात्म में सबसे बडी बाधा है बडे-बडे संतो को इसने नहीं छोडा. भक्त में तो दीन भाव हमेषा बना रहता है । ये दीनता ही उसका सबसे बडा सहारा है जो भक्तिी है वो दीनता के वाहन पर रहती है । ओर उसमें उतना ही अनुराग और प्रेम भरता है । और भगवान उसके पास आते ही जाते है । ज्ञानी जैसे ज्ञानी होता जाता है उसका अंहकार बढता जाता है और पता ही नहीं चलता कि कब कामना की आँधी आ जाए इसलिए मार्ग दोंनों ही श्रेष्ठ है पर भक्तिी को मार्ग को ज्यादा सुगम बताया है ।



                                                              "राधे-राधे"

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