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भक्त चरित्र - द्रोपदी जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे.

“कृष्ण गोविन्द-गोविन्द,गोपाल नन्दलाल, कृष्ण गोविन्द-गोविन्द,गोपाल,गोपाल नन्दलाल....”  

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है . .

आज के हमारे सतसंग का विषय है – “द्रोपदी जी” इस संसार को जब भगवान ने बनाया तो सबसे अच्छी चीज जो है. वैसे तो सारी चीज ही अच्छी बनाई पर भक्त और भगवान का संबंध बडा दिव्य लौकिक है. दुनिया में कोई संबंध हो उसका संबंध केवल इस शरीर है. ओर जब तक कर्म साथ है. तब तक संबंध है. शरीर छूटा सारे रिश्ते खत्म ,पर भक्त और भगवान का संबंध तो जन्मों तक का है.


जैसे केाई बीज किसी उपजाउ जमीन पर गिरा भले किसान ने उसे सींचा हो या ना वो एक वृक्ष बन जाएगा कुछ समय बाद, ऐसे ही अगर किसी भी जन्म में भक्ति का थोडा सा बीज व्यक्ति के अंदर आ गया, तो जन्मों तक नहीं मिटता. क्योंकि उसका संबंध परमात्मा से है . जो शाश्वत है भक्त के बिना भगवान भी अधूरे है . भक्त ना हो, तो मंदिर में भगवान अकेले ही खडे रहेंगे, ये जीवन है. और इस संसार में जब कोई व्यक्ति आता है. तो उसके उपर परिस्थ्तियों की मार भी पडती है. और ऐसे में वो भूल भी सकता है भगवान को, ये ऐसे ही है. जैसे एक माँ है. और उसका बच्चा शायद खेल-खेल में वो माँ को भूल जाए पर वो कभी नहीं भूल सकती है. परमात्मा हमें कभी नहीं भूलते है . हम ही संसार के ऐश्वर्य में भगवान को भूल जाते है . ऐसा ही भक्त का भगवान के साथ रिश्ता है. जैसे कोई हीरा है. पर उसका कोई जौहरी नहीं है. तो वो तो पत्थर की तरह है . हीरे को सच्चा पारखी ही परख सकता है . तो भक्त को अपने भगवान की पहचान है .


भक्त को कितनी भी विपत्तिी आ जाए वो भगवान को नहीं छोडता और भगवान भी भक्त की पुकार पर दौडे चले आते है. ऐसे ही भक्त द्रोपदी जी है. इनके जीवन में कई विपत्तिी आई, पर भगवान के प्रति दृढ भक्तिी थी. भगवान कृष्ण, द्रोपदी की सास कुन्ती के भाई के बेटे थे. द्रोपदी जी भगवान को अपना भाई और देवर मानती थी और भगवान ने ये रिश्ता बखूबी निभाया


प्रसंग १- 
जब युध्ष्ठिर जी ने राजसूय यज्ञ किया, तो उसमें सारे देश के संत महात्मा सभी लोग आए थे बडी जोरों से तैयारी उस यज्ञ की हुई, और केवल भगवान कृष्ण की वजह से उनका वो यज्ञ पूरा हुआ और पांडवों ने उन्हें प्रथम पूजा का अधिकारी बनाया, उसी समय शिशुपाल वहाँ आया ओर भगवान को गालियाँ देने लगा और भगवान ने अपने चक्र से उसका सिर काट दिया उस समय चक्र से भगवान की उगॅली कट गई और रक्त की धार लग गई तो उनकी रानियाँ यहाँ वहाँ जाने लगी उपचार के लिए, तो द्रोपदी जी ने अपनी साडी को फाडकर उनकी अगूँली पर बाँध दी. 


तो भगवान ने कहा - समय आने पर इस वस्त्र को हर धागे का मूल्य चुका दूँगा. भगवान पहले अपने भक्त को पूरी तरह कसौटी पर खरा उतारे है . चाहे धुव्र जी हो, प्रहलाद जी, सुदामा जी, हो चाहे कोई भक्त हो, सोने को आग में जब जलाया जाता है . तो वो कुदंन बन जाता हैं, ऐसे भक्त विपत्तियों को पार कर निर्मल हो जाता है .


प्रसंग २- 
जब युध्ष्ठिर जी द्रुत क्रीडा में सब हार गए द्रोपदी को भी दाव पर लगा दिया ,तो भगवान द्वारिका में बैठे थे, द्रोपदी जी की पिछले जन्म की कथा आती है . कि पूर्वजन्म में ये एक ब्राहमण के घर में पैदा हुई थी और बहुत रूपावन थी तो इनके पिता की वन में मृत्यु हो गई. तो ये रोने लगी और कहने लगी कि - हे भगवान ! मेरे पिता के अलावा मेरा कौन है. मेरा तो विवाह भी नहीं हुआ अभी, तो वहीं से दुर्वासा ऋषि आ रहे थे, 

 

तो वो बोले - कि तुम पुरूषोत्तम मास का व्रत करो, पर द्रोपदी जी ने उनकी बात नहीं मानी बोली-  इतने मास है. ओर ये कौन-सा मास है? जो सब मासो में उत्तम है, इस तरह पुरुषोत्तम मास का अपमान किया ओर उसके कारण ही उनको कष्ट उठाने पडे . जब कोई नहीं रहा तब विवाह ना होने के कारण इन्हेंने शिव जी का तप किया ओर जल में रहकर और कठोर तप किया तो जब भगवान शिव प्रसन्न हुए तो इन्हेंने उत्सकुता में वर माँगा कि वो रूपवान हो बलवान हो, बुद्विमान हो, धर्मनिष्ठ भी हो, धनुरधर भी हो,


तो भगवान शिव ने कहा - कि तुम्हारे पाँच पति होंगे तो उस पुरूषोत्तम मास के कारण दूसरे जन्म में परेशानी भोगनी पडी और दूसरे जन्म में धुप्रद जी के यज्ञ से पैंदा हुई .



द्रोपदी जी से कभी किसी को शिकायत नहीं हुई, ना उनके पति को, ना घरवालों को, राजसूय यज्ञ में भगवान की सारी रानियाँ आई तो सत्यभामा जी ने द्रोपदी जी से “नारी धर्म” की शिक्षा ली और पूछा कि - आप कैसे निभा पाती हो? तो वो बोली - कि मै हमेशा इस बात का ध्यान रखती हूँ . कि मेरे परिवार मे कोन-कौन है .सबका मै ध्यान रखती हूँ . और कुंती जी की आज्ञाा मानती हूँ . बहुत देर तक सब रानियों नारी धर्म की शिक्षा दी.



द्रुत क्रीडा में जब भरी सभा में द्रोपदी जी को लाया तो वे समझ गई मेरे पति तो सब हार गए है . और अब ये कुछ भी नहीं कर सकते. तो वो द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कृपाचार्य जी, खुद धृतराष्ट जी ,से शरण माँगी, तो किसी ने साथ नहीं दिया तो जब दुशासन उनकी साडी खीचनें लगा तो उन्होनें दांतो से साडी को दबा लिया शायद मेरा शरीर ही साथ देगा, भगवान कृष्ण द्वारिका में बैठे सब देख रहे थे, वो जाने के लिए उतावले थे, पर जा नहीं सकते थे, क्योंकि द्रोपदी अभी संसार में मदद माँग रही थी और परमात्मा भक्त से पूर्ण समर्पण चाहते है . और जब तक संसार में सहारा ढूढते है. तो परमात्मा कहते है. कि अब तू संसार को ही सहारा बना ले, मै क्यों आउॅ ?



तो द्रोपदी जी अपने शरीर का आश्रय ले रही है. और जब दांतो से साडी सरक गई और वो समझ गई कि अब तो सिर्फ भगवान कृष्ण ही बचा सकते है . तो द्रोपदी जी ने आँख बंद करे भगवान को पुकारा उस समय भगवन द्वारिका में खाना खा रहे थे, तो भक्त की पुकार सुनकर खाना छोडकर, सभा में पहुँच कर द्रोपदी का चीर बडा दिया क्योंकि जो निर्बल है . उसके ही परमात्मा  है. हम भगवान का नाम तो लेते है, भजते है, पर उस आस्था के साथ नाम नहीं ले पाते है. हम कहीं ना कहीं संसार को पकडे रहते है. तो भगवान नहीं आते है.


“धु्रपदसुता निर्बल भयी, ता दिन गही लए निज धाम, दुशासन की भुजा थकित भई, वसन रूप भये श्याम, सुने री मैंने निर्बल के घनश्याम, अपबल, तपबल, और बाहुबल, चौथा है बलदाम, सूर किशोर कृपा ते सब बल, हारे को हरिनाम, सुने री मैंने निर्बल के घनश्याम”

भगवान ने मानो चीर अवतार ले लिया हो, द्रोपदी जी के हर एक धागे का मोल भगवान चुकाने लगे, जहाँ पर सारे बल काम नहीं आते वहाँ पर उनकी कृपा का बल ही काम आता है. किसी को नहीं पता की क्या हो गया ? इसके बाद द्रोपदी कभी संसार को नहीं पुकारा


प्रसंग ३- 
जब बारह वर्ष का वनवास हो गया तो दुर्योधन ने अपनी दुष्टता नहीं छोडी. दुर्वासा ऋषि को उसने पांडवो के पास भेज दिया. द्रोपदी जी को सुर्य भगवान ने एक अक्षय पात्र दिया तो उससे वो कितना भी भोजन बना सकती थी . पर एक बार धुलकर साफ हो जाने के बाद फिर उसमें से भोजन नहीं बना सकते थे . तो द्रोपदी जी ने पांडवो को भोजन कराके साफ करके ही रखा, तभी दुर्वासा जी अपने शिष्यों के साथ आ गए. तो पांडवो को चिंता हुई कि इनको भोजन कैसे कराएगें ? अगर ये बिना भोजन के चले गए तो श्राप दें देंगे. 


तो उस समय द्रोपदी ने आँख बंद करके भगवान को याद किया और भगवान पांडवो की कुटिया में आकर बोले-  कि द्रोपदी मुझे भुख लगी है. कुछ खाने को दो ! तो


द्रोपदी ने कहा - कि केशव कुछ भी नहीं है.



भगवान ने कहा - कि वो पात्र लेकर आओ जिसमें तुम खाना बनाती हो. तो द्रोपदी उसे लेकर आई उसमें चावल का एक दाना उस पात्र में था.द्रोपदी ने कहा इस एक दाने से आधे से आप अपना पेट भर लेना और आधे से संसार का, और भगवान ने उसे खाया और कहा -  कि मेरा पेट भर गया ओर उनके खाते ही सारे संसार का पेट भर गया.


प्रसंग ३- 
ऐसे ही जब भीष्म पितामह ने प्रण लिया कि कल के युद्व में या तो अर्जुन रहेगा या मै.तो द्रोपदी जी को चिंता नहीं हुयी, तो भगवान द्रोपदी के पास जाकर बोले - कि तुम तो  कल विध्वा हो जाओगी. 

 

तो द्रोपदी ने कहा - कि आप के रहते में क्यों चिंता करू ?


तो आधी रात को भगवान द्रोपदी को साथ में लेकर भीष्म पितामह के पास चले द्रोपदी जी चप्पल से आवाज आ रही थी, तो भगवान ने कहा इन चप्पल को उतार दो, द्रोपदी जी ने  उतारी तो भगवान ने अपनी कमर में रख ली, और काली कमरी औढकर द्रोपदी जी के पीछे चलने लगे, और जब भीष्म पितामह के द्वारपाल ने पूछा कि ये कौन है आपके साथ में, क्योंकि वो द्रोपदी जी को तो जानता था,



तो भगवान ने कहा - कि मै इनका नौकर हूँ . तो उस समय भीष्म पितामह उस समय भगवान का ध्यान कर रहे थे . तो द्रोपदी से कहने लगे की द्रोपदी अब आपको ही आगे का काम करना है इस तरह द्रोपदी अंदर चली जाती है और भगवान काली कमरी ओढकर एक पेड के नीचे सो गए, द्रोपदी अंदर गयी, तो भीष्म पितामह के ध्यान में से भगवान चले गए,क्योकि भगवान ने कमाली औढ रखी थी न. तभी द्रोपदी जी ने चरण छुए तो पितामह ने आँखे बंद किये ही कहा-  “अंखंड सौभाग्यवती भव’ और जब आँखे खोली तो देखा द्रोपदी जी खडी थी अब तो आशीर्वाद भी मुख से निकल गया था.



तो वे समझ गए कि ये काम तो गिरधर गोपाल का ही हो सकता है,वे ही साथ में आए होगे  तो द्रोपदी जी ने बता दिया कि भगवान साथ में आए है. तो भीष्म पितामह उस पेड के नीचे गए जहाँ भगवान द्रोपदी की पादुका सिराहने रखकर सो रहे थे.



पितामह ने कहा - कि धन्य हो आप प्रभु ! जिस भक्त की पादुका को सिर पर रख लो, आप जिसके साथ हो वो युद्व हार ही नहीं सकता, फिर स्वयं ही अपने मरने का रास्ता बता दिया, भीष्म पितामह ने प्रण लिया पितामह भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे वो बोले कि भगवन  आपने प्रतिज्ञा की है . कि युद्व में शस्त्र नहीं उठाऐंगे, और मेरा भी प्रण है कि में आपसे शस्त्र उठवाकर रहूँगा, आपको मरे लिए शस्त्र उठाना पडेगा ओर दूसरे दिन जब अर्जुन ने पितामह को नहीं मारा तो भगवान कृष्ण ने गुस्से में रथ का पहिया उठा लिया तो पितामह चरणों में गिर पडे की धन्य हो आप प्रभु जो भक्त के लिए आपने अपनी प्रतिज्ञा तेाड दी. आपने भक्त के लिए अपना संकल्प तोड दिया. भगवान भक्त के लिए अपना सकल्प छोड देते है .



भगवान ने द्रोपदी का हर समय साथ दिया चाहे केाई भी परिस्थ्तिी हो, हमें हमेशा भगवान को ही याद करना है . द्रेापदी जी तो भ्रवान से कहती थी कि मै क्यों चिंता करूँ आप हो ना प्रभु बडा प्यारा संबंध है “भक्त और भगवान”  का ऐसे ही हमें भक्तिी का संबंध बनाना है . जिसमें कोई छल, कपट , धोखा नहीं है.  जब भक्त पुरी तरह शरणागत हो जाता है . तो फिर उसे संसार में किसी चीज कि परवाह नहीं होती, तो भगवान उसकी मदद करने को दौडे चले आते है 

 

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