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भक्त चरित्र - जगदानंद जी

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे.

“गोपाल मुरलिया वाले, हे नन्दलाल मुरलिया वाले, श्रीराधा जीवन नीलमणि, गोपाल मुरलिया वाले...”  


श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है . .


आज के सतसंग का विषय है - भक्त चरित्र में “जगदानंद जी’ ये चैतन्यकालीन भक्तों में से एक है . महाप्रभु के जितने भी भक्त थे वो एक से बढकर एक थे . जगदानंद जी महाप्रभु से “प्रेम कलह’ चलती थी, प्रेम कि कलह बड़ी मीठी होती है, जिसके हद्रय में प्रेम ना हो वो इस कलह को नहीं समझ सकता है . प्रेम में से अगर इस कलह को हटा दिया जाए तो इसका स्वाद वैसे ही होता है . जैसे केाई हलवा बनाए उसमें धी डाले, मेवे डाले, पर चीनी ना डाले. तो ऐसे ही प्रेम की कलह है . प्रेम में बस प्रेम ही प्रेम हो, कलह न हो तो वो किसी काम नहीं है .



गोपियों की भगवान कृष्ण की प्रेम कलह ही तो थी, कभी भगवान उनकी मटकी फोड देते तो कभी माखन चुराते, तो कभी उनके बछडे खोल देते, और गोपियाँ उनको गारी देती क्योंकि ये  अधिकार सबको नहीं है. एक प्रेमी अपने भगवान को गाली दे सकता है,  गोपियाँ प्रेम भरी गाली देती थी क्योंकि भगवान यहीं चाहते थे.



एक वो गाली होती है संसार की, जो द्वेष वश दी जाती है . और एक प्रेम की होती है . जिसमे इत्म प्रेम भरा रहता है, उससे प्रेम को बढाते है . उससे दुख नहीं होता है .


भगवान से चोर लवार, जन्म जन्म के छलिया और कपटी गोपियाँ कहती थी . प्रेम उलाहना देती थी . और भगवान के मधुर भाव के उपासको का भूषण ‘कलह” है . दूसरे भावों में गाली अच्छी नहीं मानी जाती है .



जगदानंद जी जब नवद्वीप में श्री निवास जी के घर कीर्तन होता था तो वहाँ जाते थे .  महाप्रभु ने सन्यास ग्रहण कर लिया तो ये दंड लेकर उनके पीछे चलते थे ओर भिक्षा माँगकर जो भी मिल जाता उससे महाप्रभु को व्यजंन बनाकर खिलाते थे . प्रभु जब वृदांवन गए तो वहाँ चले गए फिर नीलाचल में जाकर स्थाई रूप से रहने लगे . और फिर कभी भी नवद्वीप जाते थे, ये मधुर भाव से भगवान को भजते थे. .



कहते है . “ये सत्यभामा जी के अवतार थे”, सत्यभामा जी से भवगान की  कलह चलती रहती थी भगवान को मनाया करते थे . तो जगदानंद जी महाप्रभु के सन्यास की चिंता नहीं करते थे सन्यास के नियम है . तेल स्पर्श नहीं कर सकते है, गददो पर सो नहीं सकते है. संसार के सारे सुख त्यागने पड़ते है.

 

जगदानंद जी भोले थे वो तो महाप्रभु के सन्यास की परवाह नहीं करते थे. वो चाहते थे महाप्रभु अच्छे वस्त्र पहने, अच्छे बिस्तरों पर विश्राम करे, व्यजंन खाए, और महाप्रभु यतिधर्म के विरूद्व कुछ करना नहीं चाहते थे. तो दोनों में कलह चलती रहती थी, तो जगदानंद जी महाप्रभु के तन को देखते थे कि उसमें कभी कष्ट ना हो इसलिए वे चाहते थे कि हम इनको सुवीधाएँ दे दे, तो महाप्रभु को जो र्भी देखा देते थे,इसलिए इनसे सहमें रहते थे क्योंकि इनसे प्रेम भी करते थे .


प्रसंग १- 
महाप्रभु नीलाचल में रहते थे ओर उनकी माता शचि नवद्वीप में रहती थी . तो जगदानंद जी को वहाँ भेजा तो उनसे मिलने गए और वहाँ पर एक भक्त थे शिवानंद जी उनके पास जाकर रहे ओर उनके घर में एक चंदन निर्मित तेल प्रभु के निमित ले लिया,कि महाप्रभु का शरीर दिन प्रति दिन क्षीण होता जा रहा है, और जब महाप्रभु भाव में रहते है . तो उनको तन की सुध नहीं रहती है . सुगंदिंत तेल कि मालिश से फिर हस्ट-पुष्ट हो जायेगा. पर ये भूल गए कि सन्यासी को तेल वर्जित है.पर वो तो प्रेम युक्त थे,क्योकि प्रेम में किसी नियम का विओचार नहीं होता,प्रेमी के लिए तो उसकी मथुरा ही तीनो लोको से न्यारी है   


वो तेल का कलश लेकर महाप्रभु के पास गए तो महाप्रभु के सेवक थे गोविंद जो उनके सारे काम करते थे, उनके लिए खाना, पानी सारी व्यवस्थाएँ करते थे . सोने के लिए बिस्तर बिछाते थे . अब जगदानंद जी ने तेल का वो कलश गोविंद जी को दिया और कहा कि उनके अंग पर मल देना.


तो गोविंद जी महाप्रभु के पास गए ओर बोले - कि जगदानंद जी तेल लाए है . ओर आपकी मालिश करने को बोला है . तो क्या आज्ञा है आपकी,



महाप्रभु तो वो बोले -
कि क्या तुम भी जगदानंद जी तरह पागल हो गए हो.क्या तुम भी पागल हो गए हो,  एक सन्यासी के लिए तेल वर्जित है . और ये तो सुगन्धित चन्दन मिला तेल है अगर मै इसे लगाकर निकलूगाँ तो लोग कहेंगे अगर सन्यासी बनने के बाद सांसारिक सुख भोगने थें तो संन्यास क्यों लिया? सब मेरी निंदा करेंगे. तो गेाविंद चले गए.



कुछ दिनों के बाद जगदानंद जी ने गोविंद से पूछा - कि तुमने तेल क्यों नहीं लगाया ? तो गोविंद बोले-  कि वो डाटॅते है . तो गोविंद जी ने बहुत कोशिश की, और महाप्रभु से बोले कि आप इस तेल समझकर नहीं ओषिधी समझकर लगा लो.



तो महाप्रभु गुस्से से बोले -  कि तुम सब मुझे क्यों धर्म से विमुख करना चाहते हो आज तेल को कह रहे हो, कल मालिश के लिए बोलेंगे, उसकी तो बुद्वि चली गई इस तेल को जगन्नाथ जी के मंदिर ले जाओ वहाँ दीपक जलेंगे,



तो गोविंद जी ने आकर जगदानंद जी से सारी बात कह दी तो वो गुस्से में आकर बैठ गए तो जब  महाप्रभु ने देखा - तो वो उनसे खुद ही कहने लगे कि जगदानंद तुम जाकर तेल जगन्नाथ जी के मंदिर में दे दो, क्रोध से जगदानंद जी भरे थे तो बोले - कि कौन-सा तेल मै कुछ नहीं लाया और वो तेल लाए आगन में वो लाकर फेंक दिया और बडबडाकर चले जगदानंद जी चले गए, ओर अपनी कुटिया से दो दिन नहीं निकले. 



महाप्रभु जी गए उनके पास गए और बोले कि आज मै तुम्हारे पास भिक्षा करने आउगाँ अभी जाकर समुद्र में स्नान करके आता हूँ . तो जगदानंद जी का गुस्सा कपूर की भाँति उड गया और नहा-धोकर व्यजंन तैयार करने लगे और प्रसादी तैयार कर ली और जब महाप्रभु भोजन करने लगे तो जगदानंद जी से बोले - कि तुम भी मेरे साथ करो. तो वो बोले - कि आप पहले कर लीजिए, उसके बाद मैं आपका उच्छेदित अन्न खाउगाँ जब महाप्रभु खा लेते तो उसके बाद जो बचता था उसे ही सारे लोग खाते थे ऐसी निष्ठा थी सबकी, प्रेम से कहिए श्री राधे



तो जब महाप्रभु खाते और जब पत्तल खाली होती तो जगदानंद जी और भोजन रख देते तो उस दिन प्रभु ने बहुत सारा खाना खा लिया.



भक्त उत्तम मध्यम और प्राकुतिक रूप से तीन भेद है . जो भक्त अपने इष्ट देव को सर्वव्यापक समझकर सारे प्राणियों में इष्ट बुद्वि रखते है . उसके लिए प्राणियों में भेद नहीं है .  वो ‘सर्वोच्च केाटि का भक्त” है .



जो अपने इष्ट में तो प्रीति में रखता है . और उनके भक्तों में भी रखता है . पर जो असाधक है ,नास्तिक है उनमें प्रति उसका कृपा का भाव नहीं रखता है , कही कही द्वेष है ,कृपा का भाव उनके लिए नहीं है . श्रृद्वा का भाव नहीं है . अभक्तों को नहीं मानता है . वो “मध्यम केाटि” के है.



और जिन्हें सिर्फ भगवान से ही मतलब है . और किसी से नही तो वो “प्राकृतिक भक्त’ है . ये बुरे नहीं है . क्योंकि जब तक कोई व्यक्ति, प्राकृतिक भक्त नहीं बनता, तब तक वो उच्च केाटि और मध्यम केाटि का भक्त नहीं बन सकता है . जैसे किसी को स्कुल में पढना है . तो वो सीधे पाँचवी क्लास में नहीं आ सकता है . उसे पहले पहली क्लास पढनी होगी .


तो जगदानंद जी प्रकृतिक भक्त थे तो ये महाप्रभु समय के साथ साथ दुबले हो गए ओर केले के पत्ते पर ही सो जाते थे तो सारे भक्तों को दुख होता कि ये केामल शरीर कितने कष्ट भोगता है . तो जगदानंद जी कुछ ना कुछ करते रहते थे पर महाप्रभु कभी भी न्याय मार्ग का परित्याग नहीं करते थे . जगदानंद जी के सारे प्रयास असफल होते है .


प्रसंग २- 
एक बार जगदानंद जी बाजार से एक कपडा लेकर आए उसमें रूई भर दी ओंर सिल दिया ओर गोविंद जी केा दे दिया और कहा कि जब महाप्रभु सोने लगे तो ये बिछा देना और उपर से उनका कोई कपडा डाल देना तो जब महाप्रभु सोने लगे ओर पैर रखा उस कपडे केा हदाया तो देखा कि ये तो गेहूएँ रंग का गददा है . ओर गोविंद से बोले कि तुम लोग क्यों मेरा धर्म नष्ट करना चाहते हो अगर ये संसार के सुख भोगने थे तो मैने सन्यास ही क्यों लिया . मैने तो सन्यास लेकर गलती कर दी तो गोविदं जी चुपचाप सुनते रहे किसी की हिम्मत नहीं हुई कुछ बोलने कि वो बोले कि ये शरीर चैतन्य नहीं है . अगर तुम लोगे इसे चैतन्य मानते हो तो ये नाशवान है . तुम लोगों को क्या लगा कि मै इस बिस्तर पर विषयी व्यक्ति के जैसे सो जाता बताओ  कि कहाँ से लाए.

तो गोविंद जी ने कहा - कि जगदानंद जी ने दिया फिर कुछ दिनों के बाद जगदानंद जी आए और कुछ भी नहीं बोले पर समझ गए कि महाप्रभु नहीं मानेंगे . वो उनके शरीर के सुख के पीछे लगे रहते थे . एक बार महाप्रभु के पास आए और बोले कि मुझे अब वृदावंन जाने की आज्ञा दीजिए पर  जाने नहीं दिया क्योंकि महाप्रभु जानते थे कि इनसे किसी की पटती तो है . नहीं इनका ये रोष भरा स्वभाव हर किसी को पंसद नहीं आता है . वृदांवन में किसी ने मन का नहीं किया तो गुस्सा करेंगे  इनका स्वभाव तो सरल  है इनके मन में कभी किसी के लिए गलत भाव नहीं आता है . इसलिए उन्हें जाने की आज्ञा नहीं देते थे .


प्रसंग ३- 
एक बार जगदानन्द जी महाप्रभु के पास आए और बोले कि आप मुझे जाने की आज्ञा दे दो अब रूप गोस्वामी जी पास में थे तो बोले कि ये आप से बार बार कहते है .  इन्हें जाने की आज्ञा दे दो तो महाप्रभु बोले कि जाओ और वहाँ सनातन जी के पास जाकर रहना . जब वृदांवन गए तो सनातन जी के पास रहकर भिक्षा करने लगे फिर एक मंदिर मे जाकर वहीं रहने लगे ओर वहीं पर भिक्षा माँगकर रहने लगे एक दिन सनातन जी को अपने यहाँ निमंत्रण दिया सनातन जी तो दो घर जाकर मधुकरी लाकर माँगते  और वहीं पकाते है .

तो सनातन जी उच्चकेाटि के भक्त थे उन्हेांनें स्वीकार कर लिया उनके साथ मुचुंदकेाटि नाम के दूसरे सन्यासी थे उन्होनें गेहूएँ रगं का वस्त्र ओढने को दिया तो उस वस्त्र को अपने सिर से बाँध लिया सनातन जी ने उसे प्रसादी समझकर रख लिया और अपने सिर से बाँधकर जगदानंद जी के पास गए तो उनके सिर पर कपडा बधा देखकर बोले कि ये आपने महाप्रभु की प्रसादी कहाँ से बाँध ली तो सनातन जी बोले कि ये मुकुंद सरस्वती जी नाम के संत ने दी  है . जो जगदानंद जी ने सुना कि  अपने महाप्रभु को छोडकर  किसी दूसरे का वस्त्र  ग्रहण कर लिया क्योंकि किसी दूसरे में श्रृद्वा नहीं थी .

महाप्रभु में एक निष्ठभाव था तो चूल्हे पर रखी हांडी को उठाकर मारने को दौडे तो सनातन जी हॅसने लगे तो जगदानंद जी बोले कि आप महाप्रभु के भक्त हो ओर उनकेअलावा किसी दूसरे की प्रसादी कैसे ली तो सनातन जी हसॅने लगे और बोले कि मै दूर से आप की एकनिष्ठ बातेंसुनता था पर अब अपनी आँखोंसे देखकर मुझे समझ में आ गया और मैने ये जानकर वस्त्र पहना था क्योंकि मै आपकी एकनिष्ठ भक्तिी को देखना चाहता था. और मैने देख ली वास्तव में आप बहुत बडे वैष्णव सन्यासी केा वस्त्र धारण करने की अनूमति नहीं है. मै तो आपकी भक्तिी देखना चाहता था तो जगदानंद जी प्राकृतिक भक्त थे उनकी प्रेमभरी कलह महाप्रभु से होती रहती थी. कुछ दिनों के बाद वे लीलाचंल महाप्रभु के पास आकर रहने लगे. क्योंकि महाप्रभु भी उनसे प्रेम करते थे. ऐसे जगदानंद जी को हम सब का प्रणाम है. 

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