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किसे मिलते है भगवान

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

 

“श्यामा-श्याम, श्यामा-श्याम, श्यामा-श्याम कहिये, वृंदावन-वृंदावन-वृंदावन रहिये” ....

 

आज का हमारा विषय है । “किसे मिलते है भगवान” आज के वक्त में जब व्यक्ति के पास पैसा और सुख होता है । तो सब उसके अपने होते है । उसके शत्रु भी उसके मित्र बन जाते है । पर जैसे ही व्यक्ति के पास दुख आता है तो वहीं लोग उसके साथ छोड देते है । इस संसार में सुख के सभी साथी होते है । पर दुख कोई भी नहीं, कहते है कि - अंधेरे में तो अपनी परछाई भी साथ छोड देती है । तो दुख में भले ही कोई भी साथ छोड दे पर वो परमात्मा किसी भी परिस्थ्तिी में साथ नहीं छोडता है ।  प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग १.- एक व्यक्ति था तो वो भगवान का बहुत बडा भक्त था । बडी श्रद्धा थी उसकी भगवान के प्रति. देखो मै आपको इतना मानता हूँ पर मेरे जीवन में अभी तक आपकी अनूभूति नहीं हुई मेरी ये इच्छा है कि मुझें भी आपकी अनूभूति हो तो आप कुछ ऐसा करो कि मुझे भी आपकी अनूभूति हो मुझें लगे कि आप मेरे साथ हो मै ऐसा चाहता हूँ कि आप मुझे अनुभव दो.

 

तो वो व्यक्ति रोज सैर के लिए जाता था तो भगवान कहते है - कि कल जब तुम सेर पर जाओगे तो तुम्हें तुम्हारें दो कदम और मेरे दो कदम दिखाई देंगे वो मेरे हेागें तो तुम समझ जाना कि मै तुम्हारे साथ हूँ । तो जब वो सुबह गया तो उसे दो पैरो के निशान खुद के और दो भगवान के पैरों के निशान दिखते. अब वो रोज सैर के लिए जाता तो उसको रोज बिहारी जी के पैर दिखते.

 

एक बार उसको व्यापार में घटा लगा, तो जो उसके अपने मित्र रिशतेदार थे सबने उसका साथ छोड दिया क्योकि उसके हाथ से सुख जा रहा है । अगले दिन जब वो सैर के लिए गया तो उसने देखा कि केवल दो पैरों के निशान ही दिखाई दिए, तो उसने सोचा - कि सब ने मेरा साथ छोड दिया वो तो ठीक है । पर क्या भगवान ने भी साथ छोड दिया अभी तक उनके पैरों के निशान दिखते थे पर अब नहीं दिख रहे है । तो क्या अब भगवान ने भी मेरा साथ छोड दिया. तो उसने कुछ नहीं कहा. और चला गया

 

फिर कुछ दिनों बाद उसका अच्छा समय आया फिर से पैसा आया, तो उसके सारे दोस्त रिशतेदार वापिस आ गए, पर उसको दुनिया वालों से कोई लेना नहीं था । उसको मालूम था कि ये दुनिया वाले ऐसे ही है अगले दिन जब वो सैर पर गया तो उसको फिर से चार पैर के निशान दिखने लगे, दो खुद के और दो भगवान के. तो अब उससे रहा नहीं गया और उसने पूछॅ लिया-  कि भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो दुनिया वालों की तरह आपने भी मेरा साथ छोड दिया था और आज जब मेरा अच्छा वक्त आया तो आप दुनिया वालों की तरह मेरे साथ आ गए आपके कदम मुझे दिखने लगे आपने ऐसा क्यों किया?

 

भगवान बोलिए तो भगवान ने कहा - कि देखो ये तुमने कैसे मान लिए कि जो तुम्हारे दुःख की दिनों में दो पैर तुम्हें दिख रहे थे वे तुम्हारें पैरों के निशान नहीं थे । वो निशान मेरे कदमो के थे, तुम्हारे नहीं थे, तो वो व्यक्ति कहता कि मेरे कदमों के निशान कहाँ गए तो भगवान कहते है कि जब तुम दुख में थे तो तुम चलने के लायक नहीं थे तो मै तुम्हें उस समय गोद में उठाकर चल रहा था ताकि तुम कहीं गिर न जाओ । तो वो निशान मेरे थे. तो वो व्यक्ति कहता है कि भगवान आप तो हमेशा ही हमारे साथ रहते है ।

 

तो कहनें का मतलब है कि हम भगवान को याद करें न करें वो तो हमेशा ही हमें चाहते है । हमें बस उनकी भक्तिी सदा करनी है । उन्हें और कुछ नहीं चाहिए, भगवान के लिए कोई शर्त नहीं है कि जब केाई ऐसा होगा तभी वो दर्शेंन देंगे, शर्तें तो दुनिया में लागू होती है ।

 

प्रहलाद तो राक्षस कुल में पैदा हुए थे,क्या नहीं किया उन्हेांनें भगवान के लिए, अपने सारे सुख छोड दिए तो क्यों भगवान उनसे प्रसन्न हुए? क्योंकि उनके अंदर भक्तिी थी । तो भगवान ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया,  संत रविदास कोई उच्च कुल में पैदा नहीं हुए, वो चमार थे जाति के, जूते बनाते थे , पर सुमिरन भगवान का करते थे. क्यों उस सदना कसाई के घर भगवान को अच्छा लगता था.

 

प्रसंग २. - एक कसाई घर जा रहा था तो उसे रास्ते में एक पत्थर मिला तो वो पत्थर नहीं शालकराम भगवान थे वो उन्हें घर ले आया वो कसाई था सदना नाम था, तो वो उससे मांस तौलने लगा तो वो एक किलो तौलता तो भी सही और पाच किलो, दस किलो तौलता, तो भी सही, तो वो बडा खुश कि बडा चमत्कारिक पत्थर है । एक ही पत्थर से सबकुछ तुल जाता है । ऐसा वो रोज ही करता है ।

 

एक दिन एक संत वहाँ से निकले तो वो देखते है कि ये कसाई तो शालकराम भगवान को तराजू में रखकर मांस तौल रहा है । तो वो उस कसाई केा डाटतें है । कि ये भगवान है.

 

तो वो सदना कसाई कहता कि मुझे नहीं मालूम है । तो वो उनको वहाँ से अपने घर लेकर आते है । गंगा जल से स्नान कराते है, और उनकी पूजा करके सोने के सिंहासन पर उन्हें बिठाते है । चन्दन अक्षत से पूजा की. उस रात को संत को सपने में भगवान आते है । और कहते है कि संत तुम मुझे जहाँ से लाए थे वहीं छोड दो, तो वो संत कहता है । कि भगवान मै उस कसाई के यहाँ से आपको लाया आप उस गन्दगी में पड़े थे,मैंने आपके गंगा जल से स्नान कराए, वस्त्र पहनाए, पूजा करके आपको बिठाया. और फिर से आप उसके पास जाने को बोल रहे है । तो वो आपको बाँट समझता है ।

 

तो भगवान कहता है कि वो सदना कसाई मुझे तराजू में रखकर झूला झूलाता था और साथ में अपना काम करते हुए मेरे नाम का स्मरण भी करता रहता था। तुम्हारा सोने का सिंहासन उतना रास नहीं आता मुझे जितना उस सदना कसाई का तराजू रास आता था. दिन भर में झूलता था.

 

अगले दिन संत गए और उस कसाई को लौटा के आए. और बोले कि - भईया ! ये लो अपने भगवान. तो ऐसा कसाई के पास क्या था वो तो नीच कुल का था, कोई ऊँचे कुल नहीं था, संत कि तरह सोने का सिंहासन नहीं था, फिर भी भगवान को बो तराजू जिसपर एक तरफ मास रहते थे और दूसरी तरफ शलिग्राम भगवान को रखते थे उन्हें क्यों वो सुहाता था? तो भगवान ने ये सिद्ध किया है कि वो उसी को नहीं मिलते जो उच्चकुल में पैदा हुआ है ।

 

अगर हम कहें कि लबीं आयु वाले को भगवान मिलते है । तो ध्रुव जी तो पाँच वर्ष के थे, क्यों उन्हें पञ्च वर्ष की उम्र में मिल गए थे,क्योकि उनके मन में भक्ति थी और जब तप पूरा हुआ तो ध्रुव जी भगवान के दर्शन करने नहीं गए. भगवान गए थे ध्रुव जी का दर्शन करने के मेरा इतना छोटा सा मेरा भक्त है. भगवान खुद जाते है दौडे-दौडे भक्त के पास,

 

उस गजराज ने कौन सी स्कूल में शिक्षा ली थी, यदि व्यक्ति कहे कि भगवान पढ़े लिखे, ज्ञानी को मिलते है, कौन सा ज्ञान था उस गज को, जो उसकी पुकार पर भगवान बिना चरण पादुकाओं के ही दौडकर,  उसको बचाने के लिए चले गए उसको कौन सा ज्ञान था उसने एक फूल ही भगवान को समर्पित किया था । नंगे पैर उसके लिए गए थे, भगवान क्यों उस गज को मिल गए ? क्येाकि उस गज के अंदर भक्तिी भाव करूण पुकार थी ।

 

यदि हम कहे कि भगवान सुदर को मिलते है तो कुब्जा कौन सी सुन्दर थी ऐसा नहीं है ।यदि ऐसा होता तो क्यों भगवान उस कुब्जा को मिल गए. भगवान अंदर की सादगी को देखते है । वो बाहर के रूप को देखते ही नहीं है ।

 

आज हम देखते है कि दुनिया में जरा सी भी सुदंरता दिखती है तो व्यक्ति उस पर मोहित हो जाता है । हमारे बाँके बिहारी जी से सुंदर तो कोई है ही नहीं . हम जब कहीं जाते है तो बहुत सजते है ।बार बार आईना देखते है  भगवान भी सजते है । पर हमारा आइना देखना और उनके देखने में बहुत फर्क है । हम काँच के आइने में देखते है ।

 

बाँके बिहारी भी आईना देखते है और जब और जब मंदिर में पुजारी जी पट खोलते है तो जब भक्त बड़े भाव से बड़े प्रेम से एकटक से बाके बिहारी जी के दर्शन करता है । तो भगवान का आइना क्या है भक्त की आँखें वो उसी में देख लेते है कि वो कैसे लग रहे है । बस भक्त जब प्रेम से भाव से देखता है तो वो समझ जाते है कि मै कैसा लग रहा हूँ । उन्हें सजने कि क्या जरुरत है

 

वो कहते है - कि "तडप के दिल से जो निकले वो सदा होती है । हर सख्श की फितरत जुदा होती है अच्छी सूरत को सवंरने की जरूरत क्या है । सादगी भी तो कयामत की अदा होती है “

 

अगर हम कहे कि भगवान धनवान को मिलते है । तो सुदामा जी के पास कौन-सा खजाना था, वो तो निर्धन थे । पर जब वो भगवान के पास पहुँचे तो भगवान को लगा कि मै क्या दे दूँ, सुदामा जी को,त्रिलोकी दान करने चले, तीन मुठठी चाँवल में भगवान ने उन्हेांने तीनों लोक दे दिए, पर जब तीसरी मुठठी में बैकुण्ठ लोक भगवान देने लगे तो रूकमणी जी ने हाथ पकड लिया कि भगवान ये भी दान में दे दोगे तो आप कहाँ रहोगे ये सोचा है तो भगवान ने कहा-  कि देवी! आपको याद है कि जब सुदामा जी के पास एक चाँवल का दाना था खाने को, वो इतने गरीब थे कि खाना ही नहीं नसीब होता था तो उन्होने एक बार एक चाँवल का दाना था उनके पास, उस समय सुदामा दी कि दम्पति वह एक चावल का दाना था जिसे सुदामा जी और उनकी पत्नी ने आपको और हमें अर्पण कर दिया ,

 

तो उन्हेंनें कहा - कि देवी वो पूरी समपत्तिी उन्होने मुझे अर्पण की थी तो अब मेरी बारी है । सुदामा जी गरीब थे पर वो संतोषी थे । उनके अंदर वो भक्तिी थी.

 

अगर व्यक्ति कहे भगवान बलवान को मिलते है । तो उग्रसेन जी के पास कौन सा बल था । कंस के पिता थे, उनको बंदी बना लिया था, तो भगवान कंस को मारकर वो उन्हें छुडाने गए. वे तो निर्बल थे और उन्हें मथुरा का राजा बनाया.

 

जिस जिस भक्त के पास भक्ति थी तो भगवान अपने हर भक्त के पास खुद गए. क्यों गए वो उनके पास? क्योंकि उनके पास भक्तिी थी भगवान के लिए कोई नियम नहीं है ,भगवान के लिए, कि व्यक्ति उच्च कुल का हो, पढा लिखा हो, बलवान हो, रूपवान हो, धनवान हो, उनके लिए तो व्यक्ति सिर्फ “भक्तिमान” हो बस इसके अलावा उन्हें कुछ नहीं चाहिए.

 

एक बार भगवान आँख बंद किए हुए किसी का ध्यान कर रहे थे तो युध्ष्ठिर जी ने पूछा कि भगवान आप भी किसी को याद कर रहे हो आप तो सर्वशक्तिमान हो आप किसको याद कर रहे हो तो भगवान ने कहा कि धर्मराज ! मै अपने भक्तों को याद कर रहा हूँ  वो मुझे याद करते है । तो हम भी उन्हें याद करते है, तो हमें देखना है कि हम भगवान को कैसे याद कर रहे है, जब व्यक्ति के जीवन में भक्ति विश्वास याद जीवन में आ जाती है तो भगवान तो हमारे अपने ही पास है । हम उन्हें कैसे याद कर रहे है . बस हमें यहीं देखना है ।

 

“राधे-राधे” 

 

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