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कर्म

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें.

मेरे बाँके बिहारी, जय हो तुम्हारी, जय हो तुम्हारी प्यारे,जय हो तुम्हारी ........

 

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

 

आज के हमारे सतसंग का विषय है । “कर्म”, कर्म एक ऐसी चीज है जिसे किये बिना कोई भी व्यक्ति रह ही नहीं सकता है व्यक्ति तीन प्रकार से कर्म करता है एक होता है ‘मानसिक कर्म’ एक होता है ‘वाचक कर्म’ और एक ‘क्रियात्मक कर्म’ तो ये तीनों क्या है और इनमें क्या अंतर है ।

 

मानसिक कर्म वे है जो हमें मन में सोचते है वो भी कर्म में ही आता है । जब व्यक्ति शांत बैठा है कुछ बोल नहीं रहा, न कुछ कर रहा है, पर उसमें मन में कुछ चल रहा है तो ये हुआ मानसिक कर्म. दूसरा होता है वाचक कर्म जो हम बोलते है और तीसरा होता है । क्रियात्मक कर्म जो हम चल रहे है, उठ रहे है बैठ रहे है । इस तरह ये तीन प्रकार के कर्म है एक तो व्यक्ति जो मन से सोच रहा है, जो वाणी से बोल रहा है ।और जो व्यक्ति कर रहा है.  

 

तीनों हर पल लिखे जाएगें और अंदर बैठे हर पल उसका हिसाब होता रहता है । कि मन में क्या सोच रह है । हर पल की हमारी सोच लिखी जा रही है । जो हम बोल रहे है जो हम कर रहे है वो भी लिखा जाएगा क्योंकि हम अपने ही काम के परिणाम के ट्रस्टी है । जैसे एक ट्रस्टी है । वो उस के कार्य के लिए जवाब देह होते है । वैसे ही हम अपने कर्मों के उसके परिणामों के खुद ही जवाब देह होते है ।

 

बहुत से लोग कहते है कि हमारे साथ ऐसा क्यों होता है । हमें खुद ही मालूम नहीं होता कि हम क्या कर्म करके आए है । पहले के जन्म का कर्म हमारा वर्तमान है, जो हम आज करेंगे वो हमारा भविष्य हो जायेगा, सबके मन में यहीं प्रश्न उठता है कि कर्म के हम जिम्मेदार है । तो भगवान हम सब के अंदर है ।  तो व्यक्ति बुरे कर्म क्यों करता है । तो इसका सीधा सा जवाब ये है कि भगवान सिर्फ कर्म के साक्षी है । कर्म तो हमें ही करना है । अंदर तो सब के है,पर ये हमें निर्धारित करना है कि क्या करना है  भगवान ने सबको बुद्धि दी है । वो भगवान कहते है कि मै किसी के कर्म में हस्तक्षेप नहीं कर सकता हूँ मैने सबको बुद्धि दी सभी अपनी बुद्धि के हिसाब से उसका प्रयोग करके सही कर्म न करें तो भगवान इसके जिम्मेदार नहीं है ।

 

प्रसंग १. - और हमें पता नहीं होता कि हमनें क्या किया है, इसलिए हम भगवान को कोसते है कि आपने ये कर दिया मेरे साथ जेसे मान लो हम कहीं फिल्म देखने जा रहे है और हम अंदर सिनेमाहाल में देर से पहुँचे तो देखते है कि एक व्यक्ति के पीछे कुछ लोग भाग रहे है उसे मारने के लिए तो हमें उस सीन को देखकर यहीं लगता कि क्यों एक आदमी को लोग मार रहे है तो हमें ऐसा क्यों लगता है । क्योंकि हमनें आगें की फिल्म देखी ही नहीं थी तो हमें उसके प्रति सहानभूति होती है ।

 

पर जब हम शुरू से फिल्म देखते है तो जान जाते कि उस व्यक्ति ने अपने जीवन में बहुत बुरे कर्म किए है । इसलिए लोग उसे मार रहे है । उसने पता नहीं कितने लोगों को मारा है, तक हमें लगेगा कि इसे ओर मारना चाहिए.

 

तो ऐसा ही हमारे साथ है हमें पता ही नहीं कि पिछले जन्म में हमनें क्या किया उस रील के बारें में हम जानतें ही नहीं है । क्यों? जो हमें आज मिला है । हम उसे ही देखते है ओर उसी के हिसाब से फैसला करते है । पर जब हम पिछले जन्म में जाएगें तो हमें पता चलेगा कि हमनें कितने बुरे कर्म किए है कि हमें तो उसका और बुरा फल मिलना चाहिए पर वो तो दयालु परमात्मा है । कि वो हमारे द्वारा किए गए कर्मों का फल हमेशा काट-काट कर देते है । अगर सही मायनों में हमें कर्मों का फल मिले तो व्यक्ति जीते जी मरे हुए के समान हो जाएगा. जी ही नहीं पाएगा. क्योंकि व्यक्ति कर्म करने से पहले सोचता ही नहीं है । हम जो कर रहे है वह किस श्रेणी में आएगा. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग २.- अगर हमने पिछले जन्म में किसी के साथ बुरा किया है । तो इस जन्म में हमें उसका फल भोगना पडेगा हमें जैसा करके आए है वैसा ही पाएगें जैसे हमनें किसी व्यक्ति सें पाँच सौ रूपए उधार लिए अब कुछ दिन बाद वो हमसे पैसे वापिस माँगता है । जब पैसे लिए थे तब हम और कुछ कपडे पहने हुए थे और जब वो आता है । हम दूसरे कपडे पहन लेते है । जैसे माँगते वक्त पहने थे वैसे नही तो क्या वो नहीं मागेंगा, मागेंगा क्योंकि हम तो वहीं है ।बस कपडे ही बदले है लेकिन हमनें अगर उधार लिए है । तो वो तो हम से लेकर जाएगा ही इसी प्रकार कर्म है । ये शरीर बदल गया तो क्या ये तो कपडे की तरह है । पर आत्मा तो नहीं बदली जन्म बदल गया पर हम तो नहीं जिसका हमनें लिया था वो तो इस जन्म में मागॅने आयेगा ही और हमें हर हाल में चुकाना है । क्योंकि कर्म का ये विधान है ।

 

व्यक्ति अगर सोच समझ कर नहीं करेगा तो भगवान ने बुद्धि दी किसलिए दुनिया में जितने भी प्राणी है भगवान ने व्यक्ति को ही बुद्धि दी व्यक्ति जब कर्म करता है । तो उसका एक कर्म उसकी पूरी दुनिया बदल देता है । पहला कर्म तो स्वतंत्र होता है पर दूसरा कर्म तो बधॅ जाता है ।

 

प्रसंग ३ . - एक व्यक्ति था मोहम्मद उन्होंने अपने शिष्य अली से कहा - कि तुम अपना एक पैर उठाओ उसके शिष्य अली ने पहला पैर उठाया फिर उन्होंने कहा दूसरा पैर उठाओ तो उसने नहीं उठाया क्योकि वो जानता था कि एक पैर तो उठा सकते है पर दूसरा उठाने पर गिर जाएगें सम्हाल नहीं सकते खुद को, पहला पैर आजाद था पर दूसरा परिस्थ्तिी में बधॅ गया तो इसी तरह व्यक्ति पहला कर्म तो कर लेता है । पर दूसरे कर्म में बधॅ जाता है । और जब वो ऐसे ही करते जाता है । तो सब बर्बाद कर लेता है भगवान किसी के साथ पक्षपात नहीं करते है । वो तो सबको समान चीजें देते है । हम हीं अपना बिगाड लेते है । वो बनाता है हम बिगाडते है ।

 

प्रसंग ४ . - एक भक्त था वो रोज मंदिर जाता था और बाँके बिहारी जी की पूजा करता और रोज पाठ करता था. उसी मंदिर में एक चोर आता था और रोज भगवान से लडता था, कभी-कभी गाली भी दे देता था अब रोज का यहीं नियम था. वो आए पूजा करे और बैठ जाए. चोर आए भगवान से लडने लगे.

 

तो अब एक दिन वो दोनों एक साथ मंदिर से निकले तो उस भक्त को पैर में एक कील चुभ गई और चोर को एक सोने का घडा मिला तो वो भक्त मंदिर में गया और बोला भगवान ये कैसा न्याय है । मै रोज देखता हूँ कि ये व्यक्ति रोज आकर आपको बुरा भला कहता है । और मै रोज पूजा करता हूँ । पाठ करता हूँ तो मेरे साथ अच्छा होना था, तो मुझे कील चुभ गई.और इसे घड़ा मिल गया .ये तो अन्याय है  

 

तो भगवान ने कहा –कि इस व्यक्ति ने पिछले जन्म में कुछ कर्म ऐसे किए थे इसको आज राजा बनना था पर इसने इतने बुरे कर्म किए है कि इसे आज सिर्फ थेली ही मिली पैसे की. और तुम्हें आज के दिन फाँसी होनी थी तुम्हारे पिछले जन्म के कर्म के कारण इसीलिए तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण उसकी जगह पर तुम्हें एक छोटी सी कील लगी ये तुम्हारी भक्तिी की ताकत है । तो अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है और बुरे का बुरा तो ये हमारे हाथ में है हमें अपना कर्म कैसे करना है ।

 

इसका सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि व्यक्ति कर्म के बिना तो रह ही नहीं सकता है. तो कर्म का भाव बदल दो  एक ‘सकाम भाव’ होता और एक ‘निष्काम भाव’ तो कर्म के प्रति हमारी कामना हो तो सकाम भाव कहलाता है । निष्काम भाव वो है जिसमें व्यक्ति का कर्तापन न हो. वो आकर्ता हो

 

जैसे कहीं विवाह हो रहा हो और कोई व्यक्ति उस विवाह में जा रहा हो, अब वो व्यक्ति शादी में जाकर व्यवस्था करवाने लगता है वहाँ पर, और वैवाहिक काम तो कराता है पर उसे मालूम होता कि ना तो उसका विवाह हो रहा है । और ना ही वो दूल्हा है और ना ही उस घर का स्वामी है । इसलिए मै तो कर्म कर हूँ । परिणाम से मुझे केाई मतलब नहीं है । मै तो अब अपना कर्म कर रहा हूँ । परिणाम की चिंता नहीं है अब कर्म ही करना है ये होता है ‘आकर्तापन’  और हमें यहीं लाना अपने जीवन में क्योंकि जहाँ ये आकर्ता का भाव आ जाता है वहाँ अंहकार कभी नहीं आता सिर्फ शांति आती है । तो हमें अपना कर्म भगवान को अर्पण करना है । प्रेम से कहिए श्री राधे

जब हम भगवान को अर्पण कर देगें तो अब वो जाने उनको जो करना होगा वो करेंगे वो ही जाने ।

 

प्रसंग ५ . - एक औरत थी वो बाँके बिहारी जी की भक्त थी वो जो भी काम करती अब श्री कृष्ण को अर्पण करती सुबह से उठती जो भी काम करती और साथ में  श्रीकृष्ण अर्पणम्मस्तू  मेरा हर काम कृष्ण जी को अर्पण है । खाना बनाए, झाडू लगाए, कोई भी काम करें, कृष्ण को समर्पित हर काम भाव उसका यहीं रहता.

 

एक दिन उसने झाडू लगाई और कचरा उठाकर घर के बाहर फेंक दिया और बोली कृष्णम्  अर्पणमस्ते वहीं से नारद जी निकले तो वो बोले कि ये जो औरत है? ये किस तरह की भक्त है जो भगवान को कचरा अर्पण कर रही है । नारद जी को गुस्सा आया कि भगावन को लोग क्या-क्या नहीं अर्पण करते और ये कचरा दे रही है तो उन्हेंते जोर से उसके गाल में एक चाँटा मारा. कि तुम ऐसा काम कर रही हो भगवान को कचरा दे रही हो.

 

उसके बाद वो बैकुण्ठ गए तो वो देखते है कि भगवान के गाल पर उगॅलियों के निशान है । तो नारद जी पूछतें है –भगवान ! ये आपके गाल पर निशान कैसे आए? किसने आपको मारा? तो

 

वो कहते है-  कि नारद जी आपने ही मारा है । आपको याद जब वो भक्त मुझे कचरा अर्पण कर रही थी तो आपने उसको चाँटा मारा. तो नारद जी कहते है - कि हाँ मारा

 

तो भगवान बोले - कि वो मेरी सबसे बडी भक्त है । जो कुछ भी उसके साथ हुआ वो उसके साथ न होकर मेरे साथ भी हुआ उसने ये नहीं देखा कि मै क्या कर रही हूँ .उसमें उसने कर्म को नहीं देखा बस भाव को देखा कि मै जो भी कर रही हूँ वो मेरे कृष्ण के लिए ही है । बाँके बिहारी के लिए है तो उसका भाव निष्काम और शुद्व था.

 

तब नारद जी को समझ में आया कि निष्काम भाव बहुत बडी चीज है । तो हमें भी अपने कर्म के प्रति निष्काम भाव बनाए रखना है ताकि आकर्तापन बना रहे क्येांकि जब व्यक्ति आकर्ता बना रहेगा तो उसे कर्म में कभी अहंकार नहीं होगा, कभी मेरा पन नहीं रहेगा. उसका जो परिणाम होगा वो भगवान के चरणों में अर्पण कर देंगे. भगवान ने खुद ही कहेगा कि सब धर्मों के भेद भुलाकर एक मेरा शरणागत बन जा मै हर कर्मं से मुक्तिी दूगाँ शोक न कर मेरी भक्तिी में खो जा. फिर भगवान उसको देखेंगें हमें बुद्धि  नहीं लगानी है . प्रेम से कहिए श्री राधे

 

“राधे-राधे”

 

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