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संत

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये

 

जय राधे,जय राधे-राधे,जय राधे श्री राधे, जय-कृष्ण,श्री कृष्ण-कृष्ण जय कृष्ण ......

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “संत” जिसका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता. क्योंकि इस दुनिया में लोग अपने स्वार्थ के लिए ही सबकुछ करते है । जिसका जितना बडा जहाँ स्वार्थ होता है जो जितना जहाँ झुका है उसका उतना ही स्वाथ है वहाँ पर. लेकिन संत वो है जिसका अपना कोई स्वार्थ नहीं वो जगत कल्याण में लगा रहता है क्योंकि उसमें मै और मेरेपन का भाव खत्म हो जाता है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

जो संत होते है उनका सबसे बडा लक्षण होता है ‘तीतीक्षा’ तीतीक्षा का मतलब होता है । ‘सहनशीलता’ संत के अंदर सहनशीलता होती है और उसका यहीं गुण उसे भगवान के पास ले जाता है । और संत बनाता है । क्योंकि संत जो है वो किसी व्यक्ति का नाम नहीं है या कोई भगवा कपडे पहने ले तो वो संत है ऐसा जरुरी नहीं है. संत होने के लिए उनकी क्वालिटी आना जरूरी है फिर व्यक्ति चाहे घर में रहे या वन में और उसे सबकुछ छोडने की जरूरत नहीं है, और ना ही भगवा कपडे पहनने की जरूरत नहीं है.  

 

प्रसंग १ - एक बार एक संत के पास एक व्यक्ति गया और उसने कहा - कि मै वैराग्य लेने वाला हूँ तो संत ने कहा – कि वैराग्य लेने वाला हूँ से क्या मतलब है. तो वो व्यक्ति कहता है संत से - कि मै अभी तैयारी कर रहा हूँ संत बनने की.

 

तो संत बोले – कि क्या तैयारी?

 

तो वो बोला - कि मैने पोशाक सिलने डाली है. तो संत बोले – फिर तो तुम  जीवन भर पोशाक ही बनवाते रहना, क्येांकि जब उस व्यक्ति ने ये कहा - कि मै तैयारी कर रहा हूँ या मै वैराग्य लूगाँ. तो संत बनने की तैयारी नहीं की जाती संत के गुण तो जीवन में अपने आप आ जाते है ।संत शरीर से नहीं होता , संत तो मन से होता है  आत्मा से होता है जिसमें संतुष्टिी हो, सहनशीलता हो, जगत कल्याण की भावना हो उसे संत कहते है । जिसमें ये सारी चीजें हो वो संत है । ये सारे गुण आने के बाद वो व्यक्ति खुद ही संसार से दूर हो जाता है प्रेम से कहिए श्री राधे सहनशीलता सबसे बडी चीज है

 

प्रसंग २. - एक संत थे उन्हें नदी के पार जाना था तो वो नाव वाले के पास गए और कहा कि मुझे उस पार छोड दोगे. तो नाव वाले ने कहा - बैठिए!

 

तो जैसे ही वो बैठे तीन चार लोग और आ गए. उस नाव के पास तो वो सभी उस नाव में बैठ गए तो संत की अपनी ही मस्ती रहती है । रहता तो वो शरीर से संसार में, पर मन से भगवान में ही खोया रहता है । यहीं बात संत को संसार के व्यक्तियों से अलग करती है । तो संत के हाथ में माला थी और वो भगवान का नाम जप रहे थे ।

 

तो जो दूसरे लडके थे उनको लगा कि ये संत तो ढोगीं है । हाथ में माला ले ली तो अपने आप को वैरागी समझता है । तो वो संत को बुरा भला कहने लगा अब संत संसार में तो थे नहीं वे तो परमात्म चिंतन में डूबे हुए थे. इसलिए संत ने कुछ नहीं कहा. तो उनमें से एक ने उनकी माला छुडाकर फेंक दी और एक ने उनका भगवा कपडा उतार दिया ओर फेंक दिया. पर वेा चुप रहे कुछ भी नहीं बोले. एक व्यक्ति ने तो उनके उपर थूक दिया पर वो कुछ नहीं बोले पर जब नाव बीच नदी में पहुची तो एक आकाशावाणी हुई और भगवान बोले - कि संत तुम इतने महान हो कि इन लोगों ने तुम्हारे साथ क्या नहीं किया पर तुमने गुस्सा करना तो दूर की बात कुछ भी नहीं कहा. तुम कहो तो मै अभी ये नाव पलट  दूँ और तुम्हें कुछ नहीं होगा । और ये चारों डूब जाउगाँ ।

 

तो यहाँ संत ने एक बहुत अच्छी बात कही - कि प्रभु! अगर आपको पलटना है तो ये नाव नहीं इन लोगों की बुद्धि पलट दो. तो क्येांकि नाव पलटने से ये तो मर जाएगें इनके कर्म तो बिगडे ही है । अगर इनकी बुद्धि सही हो जाएगी तो इनका जीवन सुधर जाएगा तो ये संत है.

कहने का मतलब संत की सहनशीलता देखो कि उनका कुछ भी होता रहे उन्हें उसकी परवाह नहीं और जो उनका बुरा करे वो उसका भी अच्छा करे। बस यहीं संत की विशेषता है । एक चीज और होती है । वो है संतुष्टिी है उन्हें सुबह मिल जाए तो उन्हें शाम की फ्रिक नहीं होती है । संग्रह का गुण नहीं होता है. उनमें लालच नहीं होता है ।

 

प्रसंग 3- एक संत थे जब बारिश का मौसम आने वाला था तो संत को लगा कि कुटिया बना लेते है बारिश आने वाली है वो विरक्त संत थे नीले आसमान के नीचे ही सो जाते थे. पर बारिश आने वाली थी अब उन्हेांने घास इकट्टा करके कुटिया बना ली. एक दिन बहुत तेज बारिश हुई तो वो सो रहे थे उन्होने कुटिया बहुत छोटी बनाई थी कि वो जिसमें सो सकें । जितने में उनका गुजारा हो जाए उनमें लालच नहीं था. तो रात में किसी ने दरवाजा खटखटाया तो संत ने खोला तो देखा कि एक संत भीगे हुए खडे थे तो वो बोले कि क्या मै आज रात आपकी कुटिया में रूक जाउॅ . तो वो बोले - कि हाँ आ जाओ!

 

संत ने कहा - कि मेरी कुटिया में दो लोग सो तो नहीं सकते पर आराम से बैठ सकते है । तो दोनों संत उस कुटिया में बैठ गए और थोडी देर बाद फिर एक व्यक्ति ने दरवाजा खडखडाया तो संत ने देखा कि एक व्यक्ति पानी से भींग रहा है तो संत ने उसको भी अंदर बुला लिया पर जगह कम होने के कारण संत ने कहा - कि हम तीनों बैठ नहीं सकते पर खडे हो सकते है.और इस तरह पूरी रात निकल गई.तीनो कि रात बड़ी अच्छी बीती.  

 

कहने का मतलब कि संत ने कुटिया बनाई थी खुद के लिए वो चाहता तो पूरी रात अकेला सो सकता था पर उसने सबको जगह दी. ये संत ही महानता है संत ही ऐसा कर सकता है .उसके अंदर वो जनकल्याण की भावना छिपी रहती है ।

 

संत की हर चीज निराली है । वो अपने आप में मस्त है । हम शरीर को अपना मान लेते है । हम शरीर को स्थायी मुकाम मान लेते है कि ये हमारा है पर संत शरीर को धर्मशाला मान लेते है । ये हमारा नहीं है । और जब भी कोई बीमारी आती है । तो संत को नहीं लगता कि वो बीमार है हमें जरा सा भी कुछ होता है तो हम परेशान हो जाते है । संत को भी बीमारी आती है पर वो ये देखते है कि ये मेरा स्थायी मुकाम नहीं है । वो उस शरीर से दूर हटकर ये देख सकते है कि ये मेरा शरीर और ये बीमारी और मै साक्षी हूँ इन दोनों का. दूर खड़ा दोनों को देखता है क्योंकि उसको मालूम है कि ये बीमारी, ये व्याधि, इस शरीर की है उसकी नहीं है ।

 

प्रसंग 4. - एक संत थे वो जहा पर कुटिया बना के रहते थे वो रास्ता एक बस्ती की तरफ जाता था, और एक रास्ता वहीं से मरघट की तरफ जाता था. तो जो भी व्यक्ति उस राह से निकलता था. कुटिया से निकलता था तो वो उनसे मरघट का या तो बस्ती का पता पूछता था । तो वो तो संत थे जो बस्ती का पता पूछता था उसे मरघट का बता देते, और जो मरघट का पूछता उसे बस्ती का पता बता देते थे । बाद में लोग उनसे झगडा करते थे कि ये क्या बता दिया.

 

क्योकि उनकी नजर ही अलग थी उनके अनुसार मरघट वो जगह जहाँ एक बार व्यक्ति चला जाये बस जाता है वहाँ उजाड नहीं था । और बस्ती में, वहाँ कोई व्यक्ति हमेशा रह नहीं सकता और जहाँ कोई हमेशा बस नहीं सकता, एक दिन वो उसे छोडकर जायेगा ही वो कैसी बस्ती है । इसलिए वो मरघट को बस्ती बताते थे तो उनकी अर्थ भारी बाते जो समझ लेते थे बस उनका कल्याण हो जाये. उनकी बातों को कम लोग ही समझ पाते थे.

 

संत कि हर बात में एक रहस्य गूढ़ बात छिपी होता है अर्थपूर्ण बात होती है उनकी . तो संत के पास हम जब भी जाएँ तो खुद की बात ना करें कि ये नहीं  हुआ संसार की चर्चा ना करें । अब ये हो जाए और वो हो जाए,घर बंगला हो जाये व्यापार अच्छा हो जाये . पर ये तो वहीं बात हुई कि मिठाई की दुकान पर शराब मागने जा रहे हो. गलत दुकान पर जाकर गलत चीज मागोंगे तो वो कभी नहीं मिलेगी

 

संत के पास ज्ञान है, भगवत चर्चा है । उनके चरणों में शांति से बैठो सुनों, कहीं तो हम जाकर चुपचाप बैठें और उनकी सुने फिर वो जो ज्ञान की बात बोलेगे उसकी तो बात ही अलग है. संत अगर श्राप भी दे दे तो उसकी भी बात अलग है । उनके तो श्राप में भी आशीर्वाद छिपा है । उनका सिर्फ एक ही ध्येय हेाता है वो है जन कल्याण. 

 

प्रसंग 5.- भागवत का एक प्रसंग है एक बार नारद जी भम्रण के लिए गए तो वन में कुबेर के दो बेटे थे नल कुबेर और मणिग्रीव. वो उस नदी में स्नान कर रहे थे तो वो बहुत रूपवान और बलवान थे तो उनको उसका बहुत घंमड था तो वो उस नदी में स्त्रियों के साथ स्नान कर रहे थे जब नारद जी वहा से निकले वो तो नारायण का नाम लेते हुए जा रहे थे. तो वो जो स्त्रिया थी वो उनको देखकर बाहर आ गई पर वो दोनेां कुबेर के पुत्र उनको अनदेखा कर अपनी मस्ती करने लगे. तो नारद जी को बहुत गुस्सा आया कि अपने रूप पर इतना घंमड ये शरीर हमनें भगवान ने दी है । ये तो हमारा है ही नहीं है वो रूप तो आज है कल नही,

 

तो नारद जी ने कहा - कि तुम को अपने इस हाडमासं के शरीर पर इतना घंमड तो जाओ. अब तुम जड ही हो जाओ और वो दोनों उसी समय वृक्ष बन गए लेकिन नारद जी ने श्राप दिया पर उनके कल्याण की भावना भी थीं. उनके अंदर थी जब दोनों ने क्षमा मागी. तो नारद जी ने उन्हें वृदांवन का वृक्ष बनाया और भगवान कृष्ण के आगन का और उनसे कहा - कि जब द्वापरा युग में भगवान का जन्म होगा तो उनके स्पर्श से तुम्हारी मुक्तिी होगी. तो इस पूरे प्रसंग को देखें तों यहा नारद जी ने श्राप तो दिया पर उसके साथ आशीर्वाद दिया ऐसे अगर वो तप भी करते तो भी भगवान के र्दर्शन नहीं कर पाते

 

और जब कृष्ण जी को यशोदा जी ने ओखली से बाँधा तो भगवान ने दोनों वृक्षों को गिराकर उनका उद्धार  किया । तो संत के श्राप में भी आशीर्वाद है.

 

तो कहनें का मतलब कि जिसके अंदर सहनशीलता हो, संतुष्टि हो, जन कल्याण की भावना हो, जिसका मन भी शांत हो वो ही संत है । भगवान बस यहीं कहते है कि “निर्मल जन मन सो मोहि पावा , मोहि छल कपट छिद्र ना भावा”  मतलब कि जिनके अंदर ये सब गुण है वो ही संत है और भगवान का घर क्या है? जो संत महापुरूष है । उनका जो निर्मल हद्रय है वो ही भगवान का घर है वहीं वो रहते है । भगवान बैकुण्ठ में नहीं है भक्तों के हद्रय में है वो तो प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ५. - एक व्यक्ति था उसके यहाँ केाई संतान नहीं है तो उसकी पत्निी भी दुखी थी वो भगवान की बहुत पूजा करते थे तो नारद जी को देखकर दया आई और वो भगवान के पास गए और उनसे कहा - कि प्रभु! ये व्यक्ति आपका भक्त है । उसकी कामना पूरी करो इसको संतान दे दीजिए.

 

तो भगवान बोले - कि नारद इस व्यक्ति के भाग्य में संतान नहीं है मै इसे चाह कर भी संतान नहीं दे सकता हूँ ।  इसको सात जन्मों तक योग नहीं है । तो एक दिन उस व्यक्ति के घर से एक संत निकला और वो कहता है कि एक रोटी दो और एक पुत्र लो. अब उसकी व्यक्ति की पत्निी जो काम कर रही थी वो घर से बाहर आई और बोली कि क्या सच में ये हो सकता है कि मै आपको एक रोटी दूँ । और मुझे पुत्र होगा.

 

तो संत ने कहा - कि हाँ बिलकुल. तो उसने एक रोटी दे दी और उसके यहाँ पुत्र की प्राप्तिी हुई फिर अगले साल फिर संत आए तो उसने फिर रोटी दी और ऐसा करते-करते उसने सात रोटी दी और सात पुत्रों की प्राप्तिी हुई.

 

तो नारद जी ने देखा कि भगवान ने तो कहा था कि इसके यहाँ पुत्र नहीं होगा पर इसके यहाँ तो सात पुत्र हुए तो वो उनके पास गए और पूछाँ. आपने तो कहा था कि संतान उसके भाग्य में है ही नहीं पर उसको तो सात सात बेटे हो गए.

 

भगवान ने कहा - कि उसको संतो के आशीर्वाद से पुत्रों की प्राप्ति हुई है । तो नारद जी ने कहा कि आप बढे हो कि संतो का आशीर्वाद.?

 

तो भगवान ने कहा - कि नारद तुम चलो मेरे साथ मै तुम्हें समझाता हूँ. तो दोनेां बाह्रमण का रूप धर के संत की कुटिया पर गए और बोले कि हम आप के विश्राम करना चाहते है तो संत ने कहा - पधारिए फिर भगवान ने लीला रची और बाहर बहुत तेज बारिश करना शुरू हो गई .

 

भगवान ने कहा - कि हमें भूख लगी है । तो संत को संग्रह करने की आदत तो रहती नहीं है । वो तो भिक्षा मागते है ।तो संत ने कहा - कि मै आपके लिए खाने का प्रबन्ध करता हूँ ।

 

और वो संत जगंल गए और लकडियाँ लेकर आए तब तक बारिश शुरू हो गई थी. और घरों में जाकर भिक्षा मागकर कुछ ले आए तो जैसे ही वो लकडी जलाने लगे तो वो गीली हो चुकी थी. तो वो जल नहीं रहीं थी तो वो परेशान हुए पर लकडी जलती ही नही. तो संत ने तुरंत अपना पैर काटकर चूल्हे में डाल दिया, रोटी बनाने लगे तो उनका खून बहता जा रहा है । पर वो खाना बनाते रहे भगवान ने खाना खाया ओर बाहर जाने के बाद नारद से कहा - कि देखो अगर ये संत चाहता तो मना कर देता हमें खाना देने से. पर उसने अपने शरीर की भी परवाह नहीं की तो जिस संत के भाव इतने उॅचें है उसके आषीर्वाद से एक संतान तो क्या सैकडों संतान भी हो सकती है । मै कुछ नहीं करता हूँ सब संत के आशीर्वाद से होता है । तो हमें भी संत बनने की कोशिश करनी है कि उनके गुण भी हम में आ जाएँ ।

 

"राधे राधे”

Comments
2011-07-18 19:14:41 By Rajender Kumar Mehra

bahut khoob atyadhik sundar bhav se kaha gaya hai......radhe radhe

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