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Pandit Ji

राधा रानी जी को श्रीदामा जी का श्राप

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श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है.

आज का हमारा सतसंग का विषय है “राधारानी जी को श्रीदामा जी का श्राप”  पृथ्वी गौ का रूप रखकर इन्द्र के पास गई क्योंकि उस पर पाप बढ रहा था तो सारे देव बह्रमा, विष्णु, महेष, सभी गौ क धाम को गए जो बह्रंमाड से बाहर है सबसे अलग है. तो जब सबने राधा माधव को देखा जो कमल पर विराजमान थे जब सारे देवता गौलोक धाम में गए और वहाँ गिरीराज, वृदांवन, गौ, देंखी, तो सभी देवतागण आश्चर्य चकित हो गए, स्वंय विष्णु जी, स्तुति करने लगे. तो


गौ लोक धाम में जब देवताओ ने भगवान श्री कृष्ण से पृथ्वी के उद्धार के करने को कहा तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया में अवतार लूँगा.जब भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार बाते कर रहे थे उसी क्षण 'अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा ' यह समझकर राधिका जी व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी. 

 

श्री राधिका जी ने कहा - आप पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवश्य पधारे परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है प्राणनाथ आपके चले जाने पर एक क्षण भी मै यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी मेरे प्राण इस शरीर से वैसे ही उड़ जायेगे जैसे कपूर के धूलिकण 

 

श्री भगवान ने कहा -तुम विषाद मत करो! मै तुम्हारे साथ चलूँगा.तो भगवान कहते है.कि ये गौ लोक का खंड ऐसे के ऐसा ही मै ब्रज में उतारूँगा.  


श्री हरि की तीन पत्नियाँ हुई, श्री राधा, विजया (विरजा) और भूदेवी. इन तीनो में श्रीकृष्ण को श्रीराधा ही अधिक प्रिय है. एक दिन भगवान श्रीकृष्ण एकांत कुंज में कोटि चन्द्रमाओ की सी कांति वाली विरजा के साथ विहार कर रहे थे. 


तभी एक सखी ने राधा जी से आकर कहा - कि कृष्ण, विरजा के साथ है. तब श्री राधिका मन ही मन कुछ खिन्न हो गई. और सौ योजन विस्तृत, सौ योजन ऊँचे, और करोडो अश्र्विनियो से जुते सूर्य तुल्य कान्तिमान रथ पर, जो सुवर्ण कलशो से मण्डित था, दस अरब सखियों के साथ आरूढ़ होकर तत्काल श्री हरि को देखने के लिए गई.

 

उस निकुंज के द्वार पर श्री हरि के द्वारा नियुक्त महाबली श्री दामा पहरा दे रहा था. उसने श्री राधा को अन्दर जाने से मना कर दिया. बाहर सखियों की आवाज सुनकर श्री हरि वहाँ से अंतर्धान हो गए.श्री राधा के भय से विरजा सहसा नदी के रूप में परिणत हो कोटि योजन विस्तृत गोलोक मे उसके चारो ओर प्रवाहित होने लगी.श्री हरि चले गए, और विरजा नदी रूप में परिणत हो गई, यह देखकर राधा जी अपने कुंज को लौट गई. विरजा को श्री कृष्ण ने शीघ्र ही अपने वर के प्रभाव से मूर्तिमती और विमल वस्त्राभूषणों से बिभूषित दिव्य नारी बना दिया . 

 

फिर श्री राधा को विरह दुःख से व्यथित जान श्यामसुन्दर श्री हरि स्वयं श्रीदामा के साथ उनके निकुंज में आये. निकुंज के द्वार पर सखा के साथ आये हुए प्राणवल्लभ की ओर देखकर राधा मानवती हो उनसे बोली -

 

श्री राधा ने कहा - हरे ! वही चले जाओ! जहाँ तुम्हारा नया नेह जुड़ा है. जाओ, उसी कुंज में रहो! मुझसे आपको क्या मतलब?

 

यह बात सुनकर भगवान विरजा के निकुंज में चले गए तब श्री कृष्ण के मित्र श्री दामा ने राधा से रोषपूर्वक कहा - 

 

श्री दामा बोला - राधे ! श्री कृष्ण साक्षात् परिपूर्ण भगवान है वे स्वय असंख्य ब्रह्माण्डो के अधिपति ओर गौलोक के स्वामी है वे तुम जैसी करोडो शक्तियों को बना सकते है उनकी तुम निंदा करती हो ?ऐसा मान न करो. 

 

राधा बोली - ओ मुर्ख ! अपनी माता की निंदा करता है.राक्षस हो जा. और गोलोक से बाहर चला जा! 

 

श्री दामा बोला - शुभे  !  श्री कृष्ण सदा तुम्हारे अनुकूल रहते है. इसलिए तुम्हे मान हो गया है अतः परिपूर्णतम परमात्मा श्री कृष्ण से भूतल पर तुम्हारा सौ वर्षों के लिए वियोग हो जायेगा. इस प्रकार परस्पर शाप देकर राधा और श्री दामा अत्यंत चिंता में डूब गए. तब भगवान वहाँ प्रकट हुए.

 

भगवान ने कहा - राधे !मै अपने निगम स्वरुप वचन को तो छोड सकता हूँ किन्तु भक्तो की बात अन्यथा करने में सर्वथा असमर्थ हूँ. राधे! तुम शोक मत करो. मेरी बात सुनो! वियोग काल में भी प्रतिमास एक बार तुम्हे मेरा दर्शन हुआ करेगा. वारह कल्प में भूतल का भार उतारने मै तुम्हारे साथ पृथ्वी पर चलूँगा.

 

श्री दामा !तुम अपने एक अंश से असुर हो जाओ. वैवस्वत मन्वंतर में रासमंडल में आकर जब तुम मेरी अवहेलना करोगे तब मेरे हाथ से तुम्हारा वध होगा फिर तुम अपने पूर्ववत शरीर प्राप्त कर लोगे.

 

इस प्रकार श्री दामा ने यक्ष लोक में सुधन के घर जन्म लिया वह शंख चूड नाम से विख्यात हो यक्षराज कुबेर का सेवक हो गया .


जब श्रीदामा जी को श्राप लगा तो भगवान कृष्ण श्रीदामा जी से बोले-  कि तुम एक अंश से असुर होगे और वैवत्सर मनमंतर में द्वापर में अवतार लूगाँ और मै गोपियों के साथ रास करूगाँ, तो तुम अवहेलना करोगे, तो मै वध करूगाँ. इस प्रकार श्री दामा जी यक्ष के यहाँ शंखचूर्ण  नाम के दैत्य हो गए. कुबेर के सेवक हो गए. 


जब द्वापर में भगवान ने अवतार लिए ब्रज की लीलाओं में भगवान ने रासलीला की तो यही शंखचूर्ण नामक दैत्य जो कंस का मित्र था उस समय वह कंस से मिलकर लौट रहा था, बीच में रास मंडल देखा उस समय राधा कृष्ण की अलौकिक शोभा है. गोपियाँ चवर डूला रही है.भगवान के एक हाथ में बंशी है .सिर पर मोर मुकुट है. गले में मणी है, पैरों में नुपर है. 



उसी समय ये शंखचूर्णने गोपियों को हरने की सोची उसका मुख बाघ के समान है, शरीर से काला है. उसे देखकर गोपियाँ भागने लगी, तो उनमे से एक गोपी शतचंद्र्नना को उसने पकड़ा, और पूर्व दिशा में ले जाने लगा,गोपी कृष्ण-कृष्ण पुकारने लगी. तो भगवान कृष्ण भी शाल का वृक्ष हाथ में लेकर उसकी ओर दोडे. 



अब डर से उसने गोपी को तो छोड़ दिया और भगवान को आते देख अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगा. और हिमालय की घाटी पर पहुँच गया तो भगवान ने एक ही मुक्के में उसमें सिर को तोड दिया और उसकी चूडामणी निकाल ली,शंखचूड़ के शरीर से एक दिव्य ज्याति निकली और भगवान के सखा श्रीदामा जी में विलीन हो गई तो शंखचूर्ण का वध करके भगवान  ब्रज में आ गए.



ये राक्षस श्रीदामा जी के अंश् था इसलिए शंख चूड़ की आत्मज्योति निकलकर श्री दामा में ही समां गई.यहाँ जो श्राप श्री राधा रानी जी ने श्री दामा जी को दिया था वह तो पूर्ण हो गया,अब जो श्राप राधा रानी जो को श्री दामा जी ने दिया था उसका समय भी निकट आ गया था और श्राप वश राधाजी केा सौ वर्ष का विरह हुआ. 



तो भगवान ने कहा कि मै अपने भक्त का संकल्प कभी नहीं छोड सकता है.इसलिए राधा जी को तो वियोग होना ही है. फिर जब भगवान मथुरा चले गए तो वो लौट के नहीं आए सौ वर्ष बाद कुरूक्षेत्र में सारे गोप ग्वालों की भगवान से भेंट हुई राधा जी से मिले.

 

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