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Pandit Ji

राधा रानी जी की अष्ट सखियाँ- भाग 3

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आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये रोज की तरह हम दो मिनिट का भगवन नाम का संर्कीतन करें। बड़े भाव से बड़े प्रेम से सब मेरे साथ गाईये.

 

"जय, राधे-कृष्ण, गोविन्द, गोपाल राधे-राधे२,गोपाल, राधे-राधे, नंदलाल, राधे-राधे..."

 

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है .

हमारी जो राधा रानी है उनकी  आठ सखियाँ है  जो प्रधान है  वैसे तो उनकी कई गोपियाँ है. उनकी सखियों में मुख्य है - ललिता जी, विशाखा जी,चित्रा जी, चंपकलता जी, सुदेवी, तुंगविद्या जी, इन्दुलेखा जी ,रंग देवी जी है.

आज हम “इन्दुलेखा जी” के बारे में चर्चा करेंगे जो की  “अष्ट सखियों में चतुर्थ सखी” है. इनकी निकुंज की स्थिती बताई गई, - कि राधा कुण्ड के अग्निकोण में, अर्थात पूर्व-दक्षिण कोण में जो “पूर्वेंन्द्र कुज” है. जो स्वर्ण की तरह कांतिमय है. और हरिताल, जो पूर्णन्नेद्र कुंज है. उसमें इन्दुलेखा जी का निवास है उनकी अंग क्राति स्वर्ण की तरह है. हरिताल मतलब पीत वर्ण अंगों वाली है.

"उनके उनके वस्त्र की सज्जा" - अनार के फल की तरह वस्त्र पहनती है. श्री कृष्ण जी की वल्लभा है. श्री कृष्ण में प्रोशिंत भार्तिका भाव का पोषण है इस प्रीति भाव से भगवान को भजती हैं और सेवा क्या है -  नंदनंदन के ये अमृत भोजन बनाने की सेवा करती है राधा माधव को नित्य नए व्यंजन बनाकर सेवा करती है.


शास्त्रों में इनकी आयु वयस् “चौदह वर्ष, तीन माह १०१/२ दिन” बताई गई है. और ये “वामप्रखर नायिका” है. और भगवान की “चामर सेवा” भी करती है. प्रेम से कहिए श्री राधे.

सब सखियों की अलग-अलग सेवाएँ और निंकुज लीलाएँ है. इन्दुलेखा जी “यावट गाव” की है इनकी माता का नाम - बेला और पिता का नाम - सागर है. और पति का नाम - दुर्बल है.

और ये जब चैतन्य महाप्रभु का प्रादुर्भाव हुआ है. तो उनकी गौर लीला में ये  “रामानंद बसु” के रूप में प्रकट हुई है. और चैतन्य महाप्रभु की, गौर लीला में भी गोपियों की अलग-अलग सेवाए है,महाप्रभु के प्रति, महाप्रभु साक्षात राधा रानी जी का स्वरूप माने गए है.

और जो इन्दुलेखा जी है इनका मंत्र – “ओम इन्दुलेखाय: स्वाहा” जो योगी जन है वो इसी मंत्र का जाप करते है, . और सत ने इनकी ध्यान विधि बताई है. -

"जिनकी श्री अंग की कांति हरिताल के समान है, जो खिले हुए अनार के पुष्प के समान है शोभायमान वस्त्र को धारण करती है , और श्री कृष्ण को जो अमृत के समान,पाक व्यंजनों का आस्वादन करती है उन इन्दुलेखा जी का हम ध्यान करते है. तो ये राधा जी की चतुर्थ सखी है. राधा माधव की नित्य नए नए व्यजंन बनाकर सेवा करती है". प्रेम से कहिये श्री राधे.

इसी तरह फिर “चंपकलता जी” का वर्णन आता है. जो पाँचवी सखी है. क्योकि जितनी भी अष्टसखी है और उनकी भी जो सेविकाएँ है. सब का उददेष्य क्या है ? राधा माधव की सुख सामग्री को एकत्रित करना है. ब्रज में माधुर्य भाव की प्रधानता है. और गोपियाँ भगवान को “कांतभाव” से ही भजती है. उन सब में डाह या जलन नहीं है.

जब एक सखी कृष्ण विरह में डूबी हुई होती है. तो दूसरी उसे दिलासा देती है. कि कृष्ण कहीं नहीं गए है वो हमारे पास ही है . सब एक दूसरे को समझाती है. जब वह दूसरी सखी स्वयं ही विरह में आ जाती है तो पहली सही उसे दिलासा देती है. सब एक दूसरे के भावों को समझती है.उनमें जलन नहीं है, कि कृष्ण हमारे है. ये नहीं है .गोपी भाव इतना उच्च है कि उसमें इन सब की जगह ही नहीं है.

प्रेम से परिपूर्ण वो ब्रज है, प्रेम से ही भगवान बने है , वो प्रेम ही खाते है, पीते है, वो पे्रमावतार है. राधा जी और सखिया भागवान को प्रेम ही देती है. जहाँ सब ओर प्रेम ही प्रेम बसा है –
    

“प्रेम की परीक्षा होती, प्रेम का ही प्रष्न पत्र,  

 उद्धव जैसे ज्ञानी आए, यहाँ प्रेम पढने को, वृदावंन प्रेम की पवित्र पाठशाला है” 


भगवान चाहते तो उद्धव को खुद ही प्रेम की शिक्षा दे देते, पर प्रत्यक्ष देखने के लिए उन्हेांनें उनको भेजा वृदांवन. क्योंकि वहीं उन्हें प्रेम का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता, जहाँ पर सखियाँ प्रोफेसर है, जो प्रेम पढाती है और उस पाठशाला की हेड कौन है ? वो ”श्री राधा जी” है. जिनके अनुसार सारी चीजें होती है. ब्रज में राधा जी की कृपा के बिना कोई प्रवेश नही कर सकता,क्योकि वहाँ कर्म की प्रधानता नहीं है. वहाँ  कृपा साध्य है. व्यक्ति चाहे कि अपने पुरूषार्थ से वहाँ प्रवेश पा ले, तो ऐसा नहीं हो सकता, वहाँ कर्म सारे खत्म हो जाते है. वहाँ तो कृपा ही सब कुछ है. जिस पर राधा जी की कृपा हो जाए कितनी सारी निकुंज में लीलाएँ होती है.

प्रसंग १. - जैसे काम्यक वन में ललिता कुडं है जिसमें वो स्नान किया करती है. और जब स्नान करती थी तो राधा और कृष्ण को मिलाने की चेष्टा करती थी तो एक दिन वो बैठे-बैठे हार बनाती, और तोड देती, हर बार यही करती फिर बनाती और फिर तोड़ देती. तो नारद जी उपर से ये देखते है. तो आकर ललिता से पूछते है - कि आप ये क्या कर रही हो ?

तो वो कहती है. कि मै कृष्ण के लिए हार बनाती हूँ. और मुझे लगता है कि ये हार छोटा होगा कृष्ण को तो मै तोड कर दूसरा बनाती हूँ, पर फिर लगता है कि ये बडा ना हो तो उसे भी तोड देती हूँ.  इसी में बार-बार बनाकर तोडती हॅ.

तो नारद जी कहते है - कि भगवान को बुला लो और उनके सामने बना दो तो नारद जी जाकर बालकृष्ण को ले आते है. तो ललिता जी उनके नाप का हार बनाकर पहना देती है. नारद जी तो पहले ही भगवान से कहकर आते है कि आज हमें कि आज मुझे ललिता कृष्ण की लीला देखनी है कृष्ण और ललिता जी को  नायक-नायिका के रूप में देखना है.

तो भगवान ललिता जी से कहते है - आओ झूले पर बैठो, तो ललिता जी कहती है- . कि अभी राधा जी आती होगीं, पर भगवान के जिद करने पर वो बैठ जाती है. क्योंकि गोपियों का उददेष्य भगवान का सुख है. तेा नारद जी दोंनों झूले में देखकर बडे प्रसन्न होते है.

वैसा ही छोडकर वो राधा जी के पास आकर उनको भडकाने लगते है. और गाने लगते है. कि कृष्ण ललिता की जय हो, कृष्ण ललिता की जय हो, तो राधा जी कहती है क्या बात है नारद ? आज ललिता जी का नाम ले रहो, तो नारदजी कहती क्या प्यारी जोडी है झूले में ललिता और कृष्ण की.

तो राधा जी को रोष आ जाता है. और नारद जी वहाँ से चले जाते है. और वो झट ललिता कुडं में आकर देखती है कि यहाँ पर तो सारी सखियाँ झूला झुला रही है. तो वहाँ से चुपचाप चली जाती है. तो भवगान को लगता कि राधा जी अभी तक नहीं आई तो वो ढूढने जाते है. देखते है. तो राधा जी अपने निकुंज मे मान करते हुए बैठी है. तो वो मनाते है और राधा जी मान जाती है. फिर वो आकर माधव के साथ झूला झूलती है. और ललिता विषाखा जी सारी सखिया झूलाती है.

ये मान लीला है. राधा जी की. कोई साधारण नहीं है. राधा जी को लगता है. कि भगवान मेरे साथ-साथ ललिता जी को भी बिठाए झूले पर, राधा जी का इषारा पाकर भगवान ललिता जी को बिठा लेते है. तो फिर कुछ देर बाद फिर राधा रानी की इच्छा होती है कि अब मै झूले से उतार जाऊ और अब दूसरी ओर भगवान ललिता जी को बैठाए ओर वे वैसा ही करते है.

कहने का अभिप्राय कि ये वास्तव में लीला मात्र है. जो भगवान कृष्ण चाहते है. कि राधा जी मान करें राधा जी के अंदर मान, लेष मात्र नहीं है वो उच्च भाव में है. तो ऐसी निकुंज लीलाए है.

तो पाचवी सखी है “चपंकलता सखी” है. जो राधाकुडं के दक्षिण दिशा वाले दल पर “कामलता” नामक कुंज में निवास करती है. जो कि अतिशय सुख प्रदायनी है .शुद्ध स्वर्ण की तरह कांतिमय है. श्री चम्पकलता जी उसमे निकुज में विराजती है. ये कृष्ण की “वासक सज्जा” नायिका भाव से सेवा करती है.

इनका मंत्र है – “चंपकलताए स्वाहा” संत जन इसी मंत्र का उच्चारण करके ध्यान करते है - इनकी ध्यान विधि है -  "जिनकी चंपकलता के जैसे अंग कांति है. जो चातक कांतिमय वस्त्रों आभूषणों को धारण करती है .”चामर” झूलाकर राधा माधव की सेवा करती है. उनकी चंपकलता के चरणों में कोटि वंदन है." 

संत कहते है . इनकी वस्त्र सज्जा कैसी है - जैसे चास होता है,अर्थात नीलकंठ पक्षी के पंख के जैसे वस्त्र है. जिनकी अति श्रेष्ठ चंपक के जैसे अंग क्रांति है, जो सुन्दर रत्न जडित स्वर्ण चामर हाथ में धारण किये रहतीहै, जो जो नील के परों की भांति वस्त्र धारण करती है. जो गुणों मे विषाखा जी के समान है. संत कहते है. हे राधे ! आपकी सखी की मै शरण ग्रहण करता हूँ. वास्तव में राधा माधव से मिलने के लिए हमें गोपियों के चरण पकडने है. गोपी भाव उच्चा है. जहाँ संतजन तपस्या के बाद भी नहीं पहुँच पाते है. जो चंपकलता जी है. वो राधा जी की पाँचवी सखी है .

इनके यूथ में भी आठ सखियाँ है – कोरंगाक्षी, सुचरिता, मंडली, मणि कुण्डला, चंडिका, चन्दलतिका, कंदुकाक्षी, सुमंदरा ये आठ सखिया चम्पकलता के यूथ में सबसे प्रधान है, सारी सखियाँ इनकी सेवा में है. प्रेम से कहिए श्री राधे

 

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