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Pandit Ji

राधा रानी जी की अष्ट सखियाँ- भाग 2

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आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये रोज की तरह हम दो मिनिट का भगवन नाम का संर्कीतन करें. बड़े भाव से बड़े प्रेम से सब मेरे साथ गाईये.

  "राधा स्नेह बिहारी, नंदलाल मेरो प्यारो मोहन, प्यारो मोहन-३ 

       श्री राधा कुंज बिहारी, नन्दलाल मेरो प्यारो मोहन.....

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि-कोटि वंदन है .

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “राधा रानी जी की अष्टसखियाँ - भाग २", ललिता जिसमें सबसे प्रधान है जिनका हमनें कल परिचय सुना था दूसरी है-  विशाखा जी, तीसरी है चित्राजी, चौथी है चंपकलता, उसके बाद सुदेवीजी, तुंगविद्या, इंदुलिखा,रंगदेवी  है. इनकी भी फिर सेविकाए है.

आज हम "विशाखा जी" के बारें में चर्चा करेंगे. तो विषाखा जी भाव में राधा जी की तरह ही है. उन्हीं के जैसे है जिस समय राधा जी का प्रादुर्भाव हुआ उसी समय विशाखा जी का जन्म हुआ है ,मतलब राधा जी के समान वे भी “चौदह वर्ष दो माही पद्रंह दिन” की है.



अष्ट सखियों में सबकी अलग ध्यान विधि है - वस्त्र सज्जा है. सबके अलग अलग मंत्र है. और इसके बाद इन सब की आठ-आठ सेविकाए है. जो उनकी सेवा करती है. वों “मंजरी सखी” कहलाती है. संतों ने इनका बडा प्यारा परिचय बताया है. क्योंकि राधा माधव को प्राप्त करने के लिए इनसे होकर जाना पडता है तो गेापी भाव प्राप्त करने के लिए इन्हीं सखियों का ध्यान करते है. चिंतन करते है. क्योंकि उनकी कृपा होनें पर राधा माधव अपने आप ही मिल जाएगें. तो हमें भक्त के पैर पकडनें है.



जैसे गज के पैर उस ग्राह ने पकडे थे डूबने लगा तो भगवान को पुकारा तो भगवान ने आकर उसको मारा, तो गज ने कहा - कि प्रभु पुकारा मैने आपको पर मेरे से पहले उस ग्राह का क्यों उद्धार किया?



तो भगवान ने कहा - कि मै क्या करूँ ? जो मेरे भक्त के पैर पकड लेता है. मै पहले उसका उद्धार पहले  करता हूँ.



“विशाखा” जी राधा जी की दूसरी सखी है. पहली ललिता जी तो विशाखा जी की वस्त्रावली कैसी है .-  "वो तारावली वस्त्र पहनती है. अर्थात नील वस्त्र धारण करती है. जैसे तारें चमकेते है. इनकी विघुत के समान क्रातिं है, गौर वर्ण की है. "यावट गाँव" की है. इनके माता-पिता भी वहीं के है. इनके माता-पिता का नाम “दक्षिणा” और “पावन” है . इनका विवाह “वाहिक” नामक गेाप के साथ हुआ .


चैतन्य महाप्रभु कौन है. एक बार जब भगवान को राधा जी का वियोग बहुत ज्यादा हुआ तो राधा जी ने भगवान से कहा - कि आप मेरा विरह कभी नहीं समझ सकते. आप राधा होते तो जानते ?

भगवान ने कहा - कि जब कलियुग में मेरा अवतार होगा तो शरीर तो राधा का होगा, पर आत्मा कृष्ण की रहेगी. तब मै तुम्हारी विरह वेदना को समझ सकूगाँ. तो कहते चैतन्य महाप्रभु के चरणों में वहीं चिन्ह थे जो राधा जी के चरणों में थे. इसलिए उनकी आत्मा कृष्ण और शरीर राधा जी का था. तो उसी विरह में पेड से लिपट जाते थे. जो रायमानंद जी है. गोविंद जी है. ये जो चैतन्य महाप्रभु के साथ भक्त है वो गेापियाँ ही है. तो विशाखा जी जो उनके साथ “रायरामानंद” करके विख्यात हुई. सखियाँ कैसे पीछे हो सकती है. तो चैतन्य महाप्रभु के साथ बहुत भक्त थे.

प्रत्यें सखी का अपना-अपना कुजं है. वे वहीं रहती है. तो विशाखा जी “आनन्द” नामक कुडं में निवास करती है.  

इनकी सेवा क्या है.-  जैसे ललिता जी की तामूल फल की है . वैसे ही इनकी सेवा “वस्त्र आभूषण” है.

इनका जो “मंत्र” है “ऐं सौ विषाखायै स्वाहा” है . संत जन इसी का जप करते है .

संत कहते है. . हमें अगर ध्यान करना है - विषाखा जी का तो “जिनकी अंग क्रांति चंपक पुष्प को पराजित करने वाली है . जो तारावली के सदृष्य मनोहर वस्त्र को धारण करती है . जो श्यामनंदन को वस्त्र नित्य देके सेवा करती है .ऐसी विषाखा जी के चरणों मे हमारा प्रणाम है.

इनकी भी अष्टसखियों का यूथ है . -  मालती, माधुरी, चंद्रलेखा, सुभानना, कुजंरी, हरणी, सुरभि, चपला, है. ये आठ सखियाँ है.

                             राधा जी की तीसरी सखी है -  “चित्रा जी”

राधा जी की तीसरी सखी है वो “चित्रा जी” है. इनके रहने का स्थान राधा जी के पूर्व में “पदमकुंज” नाम का कुंड है वे इसी में रहती है. और उनकी सेवा राधा माधव के प्रति “लौवंग माला” बनाकर सेवा करती है. इनकी अंग क्रांति केसर के वर्ण की है. और “वस्त्र काच वर्ण” के है.

इनकी भी आयु चौदह वर्ष है. इनके माता-पिता “चतुर और “चर्चिका” इनके पति “पीठरक” है. और ये गौरलीला में चित्रा सखी “गोविंदानंद” के रूप में विख्यात हुई.

चित्रा जी को जो मंत्र है .-  “श्री चित्राय स्वाहा”


प्रसंग १ -
इनके जीवन का प्रसंग है कि ये कैसे राधा जी की अष्ट सखियों में शामिल हुई है. चित्रा जी को बचपन से ही मोहनी विद्या आती थी. साथ ही बहुत अच्छी चित्रकारी करती थी किसी को एक बार देख लिया तो उसका वैसा ही चित्र बना देंती थी.



एक बार की बात है कृष्ण के मित्र श्रीदामा जी ने कहा - कि मित्र!  मुझे आपका चित्र चाहिए तो कृष्ण जी ने कहा - कि मै तुम्हें कल लाकर दे दूगाँ.



वे घर जाकर मैया से बोले - कि मेरा चित्र बनवा दो, मुझे मित्र को देना है.



तो मैया ने कहा कि ठीक है बनवा दूगी. और काम में लग गई. तो वो समझ गए कि यहा बात नहीं बनेगी, तो नंद बाबा सें जाकर बोले - कि बाबा ! मेरा चित्र बनवाओ तो नंद बाबा ने अपने मित्र से कहा कि जाओ कोई चित्र बनाने वाले को ढूढ कर लाओ.



तो वो गया चित्रा जी की तो सब में ख्याति थी तो वो उनके पास पहॅच गए, और बोले - कि मुझे नंद बाबा ने भेजा है. उनके लाला का चित्र बनवाना है. आप बना देगी ?



वे बोली - मै किसी के घर नहीं जाती.


तो उनके मित्र बोले-  कि मै आपको धन दिलवा दूगाँ.


तो वो बोली -  कि यहीं लाला को लेके आओ, तो वो बोले - कि वो यहाँ नहीं आ सकते. फिर ठाकुर जी की प्रेरणा से वो चलने को तैयार हो गई. फिर जब वो नंदबाबा के घर पहुची और जब कृष्ण जी को देखा तो देखती ही रह गई. बाल रूप को देखती ही रह गई. उनको योग ध्यान में नहीं रहा उनको देखकर तृप्तिी नहीं होती. वो मोहित हो गई. उनको रूप ही ऐसा है. उनके नयनों से अगर नयना मिल गए तो फिर वो बाके बिहारी का हो गया. वहीं बात



“मोर का मुकट मेरे चितचोर का मुकुट, दो नयना कटीले है. सरकार के,  दो नयना नहीं है. वो कटारें है जो साधक एक बार देख ले, उस पर कटार चला देते है. “कमर लजाए तेरी सूरत को देखकर, भूली घटाए तेरे कजरे की रेख पर, देखकर काली सावन भी फीका है. ये मुखडा निहार के, दो चाँद गए हार के. नयन सरकार के कटीले है, कटार से” चाँद भी लजा जाए.



                         “मोहन नयना आपके नौका के आकार, जो जन इन में बस गए, हो गए भव से पार”


जैसे बिहारी जी चंचल है. ऐसे ही उनके नयन है. ऐसा ही चित्रा जी के साथ हुआ और बोली कि हम कल बना देगे और घर आ गई तो जब चित्रा जी कहती है नारद जी से कि मेरा योग जा रहा है और मै बालकृष्ण की चित्र नहीं बना पा रही हूँ.


तो नारद जी ने कहा - कि आपको श्री राधा जी की आराधना करनी पडेगी. क्योंकि उनकी कृपा के बिना कोई भी बाँके बिहारी जी तक नहीं पहुँच सकता है . पहले उनकी आराधना करो और वो प्रसन्न हो जाएगीं तब तुम चित्र बनाने की अधिकारी बन जाउगी. और वो आराधना करने लगी तो वो प्रसन्न हुई तब वो चित्र बना सकीं. और राधा जी ने उन्हें अष्ट सखियों में शामिल कर लिया तो राधा माधव से मिलता है, तो गोपीयों की आराधना करनी होगी.



संत जन ने इनकी ध्यान की विधि बताई “केसर युक्त काँच के वस्त्र धारण करने सुदंर मुस्कान युक्त मुख वाली और श्री कृष्ण जी की लौवाग और माला प्रदान करके सेवा करने वाली चित्रा जी का हम ध्यान करते है.”



इनकी भी आठ सखियाँ है -  रसालिका, दूसरी तिलकनी, शौरसेनी, सुगंधिका, वामिनी, बामनयना, नागरी नागवल्लिका ये यूथ में प्रधान है . इस तरह राधा जी की तीन सखियों की बात की ललिता जी विशाखा जी और चित्रा जी की हम आगें और सखियों की बात करेंगे.

 

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2018-09-02 09:43:54 By Rakesh Kumar


जय श्री राधे

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