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राधा रानी जी की अष्ट सखियाँ

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आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये रोज की तरह हम दो मिनिट का भगवन नाम का संर्कीतन करें। बड़े भाव से बड़े प्रेम से सब मेरे साथ गाईये।

  “जय राधे, श्री राधे-राधे,  जय राधे, श्री राधे,

 जय कृष्णा,  श्रीकृष्णा-कृष्णा,  जय कृष्णा,  श्रीकृष्णा.......”


श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि-कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “राधा जी की अष्ट सखियाँ” राधा रानी  भगवान कृष्ण की प्राणप्रिया है । ब्रज मंडल की  अधिष्ठाती देवी है ।  उनकी कृपा के बिना कोई ब्रज में प्रवेश नहीं कर सकता है । जिस पर राधा रानी की कृपा कर दें वो ना चाहते हुए भी ब्रज में पहुँच जाता है । सारी गोपियाँ उनकी कायरूपा व्यूहा है । उनकी कांति से सब प्रकट हुई है । उनकी सखियों मे कई यूथ है । गोपियों के "किंकरी" , "मंजरी", "सहचरी" ये अलग-अलग है । सब की आराध्य श्री राधारानी जी है भगवान कृष्ण आराध्य नहीं है प्रेम से कहिए श्री राधे


भगवान से गोपिया कह देती है । कि हम आपको नहीं पूजते हम तो राधा जी को पूजते है और आपके उनके प्रियतम हो  इसलिए आप हमें प्यारे हो । और नित्य सखियाँ राधा जी और श्याम सुन्दर की सेवा में लगी रहती है । सबकी अलग-अलग सेवाँए है । राधा जी के यूथ में मुख्य आठ सखियाँ कही गई इनमें जो पहली है । जो राधा रानी जी की अष्ट सखिया कहलाती है, "ललिता जी", फिर "विशाखा जी", "चित्रा जी", "चंपकलता", "सुदेवी", "तुगविघा", सातवीं है "इंदुलेखा", "रंगदेवी", तो ये आठ सखी है ।



और अलग-अलग संमप्रदाय में इनके अलग नाम आते है । इनके नाम जैसे चित्रा जी सुदेवी ,इन्दुलेखा के नाम क्रमशः सुमित्रा, सुंगदेवी इन्दुरेखा के नाम है । राधा जी ये ही अष्टसखी है. इन सब की भी प्रधान सेवाँए है ।राधा जी के प्रति.



फिर इनकी भी आठ सेविकाएँ है । और ये पाँच प्रकार की कही गयीं है । पहली है सखी, दूसरी है नित्यसखी, तीसरी प्राणसखी, प्रियासखी, परम श्रेष्ठसखी है । इनकी भी एक-एक सेविका है । जो “मंजरी” कहलाती है । जैसे "रूप-मंजरी", "जीव-मंजरी". "रस-मंजरी", "विलास-मंजरी", 'लीला-मंजरी", "कस्तूरी-मंजरी" है । ये हर ग्रथ में अलग-अलग नाम से विख्यात है । कहीं इन्दू रेखा है तो कहीं इंदु-लेखा. तो आठ सखियों की भी सेविकाँए ये मंजरी सखी है  और ये सब राधा जी की कायरूपा है ।



                                                ललिता जी का प्राकट्य -

एक बार राधा जी प्रसन्न हुई तो सोचने लगी कि मेरे जैसी कोई सखी तो मे उसके साथ खेलती तो इतना सोचते ही उनके तो उनके अंग से एक सखी प्रकट किया जो ललिता जी बन गई वो उनकी अंतरंगा सखी है । राधा कृष्ण का जो विस्तार है उसमे ये सखिया दो रूपां से आती है । पहली होती है । खंडिता दशा.  



जब राधा माधव निकुंज में जो लीला करते है । तो ये राधा जी का पक्ष लेती है । और जो दूसरी प्रकार की है वो भगवान कृष्ण का पक्ष लेती है । राधा जी की आलोचना करती है । पर ये सब लीला है । उनकी दृष्टिी में राधा कृष्ण एक है । उनके मन में जलन नहीं होती, क्योंकि राधा जी ही सब की आराध्या है । वो कृष्ण का संग कभी नहीं चाहती है । उन्हें राधा कृष्ण को संग देख कर ही सुख मिलता है । ऐसी त्यागमयी गोपियाँ है । ऐसे ही हर गोपी का वर्णन आता है ।



तो ललिता जी सबसे प्रधान सखी है । जो कि सर्वश्रेष्ठ है । राधा जी से २७ (सत्ताइस) दिन बडी है । इनकी आयु “चौदह वर्ष आठ माह” है । और राधा जी से बडी है । इनका एक नाम “अनुराधा” है.  हर सखी का अलग परिधान है । ये कोई सामान्य नहीं है । संत गोपी भाव को पाने के लिए तपस्या करते है. 



                                    ललिता जी की आज्ञा बिना रास में प्रवेश नहीं

 

जब रास लीला शुरू हुई तो करोंडों सखियाँ थी, ये पूर्व जन्म के संत, वेदों की ऋचाए थी, जिन्हेांनें भगवान से उनका साथ विहार मागा था तो जब रास शुरू होता है । उसमें हर एक का प्रवेष नहीं था पुरूषों का प्रवेश नहीं था, ललिता जी द्वार पर खडी थी,ललिता जी की आज्ञा के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता था. जब भगवान शिव आए तो ललिता जी ने मना कर दिया.

तो भगवान शिव ने कहा - कि कृष्ण हमारे आराध्य है ।

तो ललिता जी ने कहा - कि यहा ब्रज में कृष्ण के अलावा और कोई प्रवेश नहीं पा सकता.

तो शिव जी ने कहा - मै क्या करू ?

तो ललिता जी ने उन्हें गोपी का श्रृगांर करवाया, चोली पहनाया कानों में कर्ण फूल, और घूघट डाला. कानों में युगल मंत्र दिया. तब प्रवेश हुआ.



तो कहने का अभिप्राय ललिता जी शिव जी की गुरू हो गई, क्योकि युगल मंत्र का उपदेश दिया. तो सखी को केाई साधारण नहीं है । बड़े-बड़े ऋषि, मुनि जिनकी आराधना करते है ।ऐसी वे दिव्य और अलौकिक गोपियाँ है. तो गोप भाव अति उच्च है.


ललिता जी की अंग -
क्राति “गौरोचन” के समान है, वर्ण – लालिमा युक्त “पीले रंग” का वर्ण है. 
वस्त्र - ललिता जी “मोर पंख वाले” क्रांति वस्त्रों केा धारण करती है । उनके माता-पिता का नाम – पिता विशोक, और माता शारदा है । और भैरव नाम के गोप के साथ उनका विवाह हुआ. 


इनकी सेवा -  “कपूर मिश्रत तममूल फल” राधा माधव को देती है ।ये नित्यप्रति की सेवा है. और हर गोपी अपनी सेवा बडी तन्मयता से करती है । गोपी जीवन का उददेश्य ही एक है । राधा माधव की सुख सामग्राी को जुटाना


राधा जी की जन्म स्थती है । रावल गाव और ललिता जी “यावट” गाव की है । और कलियुग में  ललिता जी का अवतार स्वामी हरिदास जी को माना जाता है । वो ही ललिता जी का अवतार है  तो आज से पाच सौ साल पूर्व वृदांवन के पास के गाॅव में हरिदास जी का जन्म हुआ. तो उन्होंने अपनी  संगीत साधना भगवान के विग्रह को प्रकट किया.



प्रसंग -
बचपन का एक प्रसंग है । कि एक बार वो अपने पिता के साथ मंदिर में दर्शन करने गए और उनके पिता ने जल चढाने को कहा. तो वो भगवान शिव को जल चढाने लगे तो भगवान शिव उनके पिता से बोले - कि ये आप क्या कर रहे हो ? ये तो मेरे गुरू और भला कोई गुरू से सेवा लेता है । रास लीला में इन्होंनें मुझे मंत्र दिया था तो ये कोई सामान्य सखी नहीं है । ललिता जी को शिव जी अपना गुरू मानते है ।  तो स्वामी हरिदास जी को ललिता जी कर अवतार माना जाता है ।



यहाँ तक की मीरा बाई को भी किसी सखी का अवतार माना गया है । ललिता जी का जन्म यावट गाँव मे हुआ उनका निवास स्थान “ऊचा गाँव” है, इनके प्रयत्नों से ही राधा माधव का मिलन हुआ. जब उन्हें पता चलता है भगवान गोवर्धन पर आते है । तो वो राधा जी को वृदांवन से मिलाने के लिए वहाँ लेकर आती है । हर प्रयास करती है । ऐसी दिव्य और अलौकिक महिमा है. 



ललिता जी राधा रानी की सहचरी के अतिरिक्त इनका खंडिका नायिका के रूप में भी चित्रंण होता मतलब सेविका के रूप मे राधा माधव के साथ आती है । और कभी-कभी नायिका बनकर कृष्ण जी के साथ विहार करती है । ललिता जी एक सफल दुति के अनुरूप, मान रूप, तीक्ष बुद्वि वाली, वाकचातुर्य, आत्मीयता, नायक को रिझाने वाली व्यक्तित्व सौन्दर्य वाली है । बिलकुल राधा रानी के जैसी ही है.



संत जन इनके ध्यान की विधि बताई है यदि हमें राधा माधव तक पहुचना है तो हमें इनकी आराधना करनी चाहिये, क्योंकि इनकी कृपा के बिना राधा माधव तक हम नहीं पहुँच सकते है । क्योंकि भक्त के चरण पकडने में ही भलाई भगवान के भक्त के पीछे चलते है । तो संत जिन इनका ही ध्यान करते है । गोपियों का इनके बिना राधा माधव से नहीं मिल सकते है । तो इनकी ध्यान विधि है ।



                                               ललिता जी की ध्यान विधि -


जिनकी अंग क्रातिं गौलचन कांति को भी पराभूत करती है. सुन्दर बेलयुक्ता है । मोरपंख वस्त्र धारण करती है , उज्जवल आभूषण पहनती है , और जो राधा माधव की ताममूल फल से सेवा करती है.  जो राधा जी की प्रिय सखी है , ऐसी ललिता जी का मै ध्यान करता हूँ” . इनका मंत्र है - “श्री लाम ललिताय स्वाहा” ये इनका बीज मंत्र है संत जन इसी मंत्र का निरंतर जप करते है । तो ललिता जी कोई सामान्य सखी नहीं है  ये राधा जी कायारूपा है.

 

इन ललिता जी की भी आठ प्रधान सखी कही गई है -  रत्नप्रभा, रतिकला, सुभद्रा, चंद्र्रेखिका, भद्र्रेखिका, सुमुखी, घनिष्ठा, कल्हासी, कलाप्नी. ये तो एक सखी है राधा रानी जी की इसी तरह और भी प्रधान सखिया है.   

 

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