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अहंकार

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आज के हमारे सत्संग का विषय है। “साधन”. साधन को अगर हम देखें तो आघ्यिात्मिक द्रष्टि से इसका महत्वपूर्ण स्थान है. कोई भी काम करने के लिए हमें एक साधन की जरूरत होती है. इसी तरह आध्यात्म मे साधन की जरूरत होती है. इसको हम इस तरह समझ सकते है. जिसमें सारी चीजें तो हो पर उसमें एक भी चीज ऐसी न हो,जिससे सारी चीजें बिगड जाए,

 

जैसे कि हम चाय या काफी बनाते है, तो सबको पता है कि चाय कैसे बनाते है, पहले दूध को गर्म करते हैं, फिर हम उसमें चीनी डालतें है, उबालतें है, तो चाय बन जाती है, अब आप जरा सोंचें कि हमनें सबकुछ किया पर चीनी की जगह नमक डाल दिया, सब कुछ किया. दूध डाला, उबाला, पर चीनी की जगह नमक डाला, तों क्या हम वो चाय अब पी सकते है, सीधा सा जवाब है, नहीं.

 

अब हम उसे फेंकने के अलावा कुछ नहीं कर सकते. कहने का मतलब है आध्यात्म में जानें के लिए जो साधन है. जैसे भक्ति, श्रद्धा, भाव, जरूरी है. ये सारें क्या है, साधन है, इन सब में एक भाव है “अहंकार” जब तक इसका त्याग नहीं होगा, ये एक सबसे बडी बाधा है, वही बात जैसे सब चीजें आपने अच्छी डाली, पर चीनी की जगह नमक डाला. तो सब कुछ बेकार हो गया, वो चाय अब पी ही नहीं जा सकती.

 

ऐसे ही आध्यात्म में हमने अपने अदंर त्याग, विनम्रता, भक्ति भी है, प्रेम भी, सारी चीजें कर ली, हमारें अंदर, पर सबसे मुख्य है – अहंकार, जब तक हम इसको त्याग नहीं करते इसको हमने चाय की तरह आध्यात्म में मिला दिया, तो वो सबकुछ खराब कर देगा,इसलिए उसका त्याग जरूरी है. संतो नें जो सबसे बडी बाधा बताई है, तो जो सबसे बडी बाधा है, वो यही अंहकार है,

 

और ये अहंकार क्या है? हर व्यक्ति के अंदर एक अहम की भावना होती है. अहंकार एक छोटा सा अणु है और जब ये अणु, अहम जड वस्तु से जुड जाता है, तो वो “मै” बन जाता है, और शरीर से पहचान बनाता है, और जब वहीं छोटा-सा अणु अहम, जब वो आत्मा से जुडता है, तो परमात्मा से पहचान बनाता है.

 

जैसे रिसर्च सेंटर में जो अनुसंधान केन्द्र होते है, जहाँ एक छोटे से अणु में जब संलयन और विखंडन होता है, इसी में पूरा रिसर्च होता है अणु होते है, उससे इतने बडे परमाणु बम,कैसे बनते है. उस छोटे से अणु से ही तो बनते है, वह छोटा-सा अणु कैसे बड़ा बन गया और कितना कमाल दिखाता है, बस यहीं चीज हमारे अंदर है, ये अहम का परमाणु, छोटा सा, जब मै-मै करके बढ जाता है, जड़ शरीर से जुडता है तो जुडकर इस अहंकार में विस्फोट होता है और अहंकारी से सीधा व्यक्ति नीचे गिर जाता है, पर जब आध्यात्म में ये ‘मै’ टूटता है, इसका विस्फोट होता है, चारो तरफ आत्मा का प्रकाश ही प्रकाश दीखने लगता है और आत्मा दिखने लगती है.  

 

प्रसंग १. - जैसे कि एक राजा था वो बहुत दान करता था उसको बहुत अच्छा लगता था दान करना उसके दरवाजे से कोई खाली हाथ नहीं जाता था, बहुत दानी था, एक दिन एक साधू आये. वो भगवान के बहुत भक्त थे सच्चे महात्मा थे.

 

वो राजा के महल में आए, राजा नें उनका बहुत स्वागत किया, तो राजा ने साधु से कहा - कि हमने इतना दान किया है। आप तो पहुंचे हुए संत है, तो ये बताइए कि हम स्वर्ग में जाएगें, कि नर्क में? तो साधु ने कहा - कि तुम नरक में जाओगे,

 

जब राजा ने ये सुना तो उसने पूंछा, कि मै इतना दान करता हूँ . पर आप ऐसा क्यों कह रहे है तब साधु ने कहा - कि राजा तुम दान कर रहे हो पर दान में, ‘मै’ आ रहा है, अहंकार कर रहे हो, कि ये मै कर रहा हूँ, देखो राजा! वो जो सबका दाता है वो पता नहीं सबके क्या-क्या दे रहा है, और किसी को बताता भी नहीं, कि ये मै दे रहा हूँ, और तुम उसकी दुनिया में से एक छोटे से प्राणी हो, और अहम है तुमने दान तो किया, पर उसमें ‘मै’ रूपी अहंकार साथ में रखा.

कहते है कि - 

“मैना” ने ,‘मै’ न कहा, तो मोल लगा दस-बीस, और बकरे ने मै-मै कहा तो तुंरत गवाया शीश,”  

 

प्रसंग २- चैतन्य महाप्रभु ने कहा - कि व्यक्ति अगर आध्यात्म में भी है पर उसको तीन चीजें छोडना बहुत मुश्किल है. और जो इनसे पार पा गया, तो उसको संसार की कोई ताकत भगवान से मिलने से नही रोक सकती है।

 

“कंचन, कामनी, पद,” ये तीन चीजें इंसान नहीं छोड पाता है, उसे कठिनाई होती. ये संसार के तीन बडें गड्डे है, इनको अगर व्यक्ति ने पार कर लिया तो फिर वह सब पार कर गया, कंचन का मतलब - पैसा काम और पद मतलब - यदि व्यक्ति उच्च पद पर आसीन है तो वो उस पद को किसी के लिए भी नहीं छोड सकता.

 

चैतन्य महाप्रभु ने उस समय सन्यास लिया था तब वो पद की उच्च सीमा पर थे. वो संस्कृत के उच्च आचार्य थे ,दूर-दूर से बच्चे, उनसे पढने आते, जब वो ऊँचे पद पर पहुचे, तब उन्होंने सन्यास लिया वो हम सबको बता रहे है, तो ये जो पद का मद है, जैसे कोई व्यक्ति शराब पी कर झूमता है ऐसे ही व्यक्ति पद और पैसा आनें के बाद झूमता है, उसे खुद का होश नहीं रहता है, कि वो क्या कर रहा है. तो वहीं अणु जब शरीर से जुड जाता है फिर मै दुखी हूँ , प्रसन्न हूँ,

 

तो अध्यात्म में भगवान को अंहकारी व्यक्ति पंसद नहीं है, “व्यक्ति को ज्ञान का अंहकार तो हो जाता है कि मै बहुत बडा ज्ञानी हूँ, पर उसको अंहकार का ज्ञान नहीं होता कि मै अहंकारी हूँ.” अहंकारी व्यक्ति हमेशा भयभीत रहता है क्योकि उसे डर रहता है कि मै आहत न हो जाये, मेरा अधिकार न चला जाये.

 

प्रसंग ३. - जैसे कि एक बार का प्रसंग है कि एक बढई अपनी कला के लिए बहुत लोकप्रिय था वो जो भी बनाता था, वो एकदम वास्तविक लगता था जब राजा को पता चला तो राजा ने अपने दरबार में बुलाया.

 

राजा ने कहा -कि तुम ये कैसे करते हो। तुम्हारी बनायीं चीजों को देखकर ऐसा लगता है कि भगवान ने स्वयं बनायीं हो, ये बहुत बड़ी माया है तब बढई ने कहा - कि राजा इसमें माया वाया कुछ नहीं है, जब मै अपना काम करने बैठता हूँ, तो उस समय  ‘मै’ को हटा देता हूँ,  दूसरी चीज में मन को शांत कर लेता हूँ, तीसरा, मै फायदा या नुकसान नहीं देखता हूँ  मै ये बना रहा हूँ ,इससे मेरा कितना फायदा या कितना नुकसान होगा,कितनी कमाई हुई, यहाँ तक कि मै ये भी नहीं सोचता कि इससे मेरी कितनी प्रसिद्धि होगी, ये मै नहीं सोचता, मै इन सब चीजों को भूल जाता हूँ , मै अपनी कला के प्रति इतना समर्पित हो जाता हूँ कि फिर जो बन जाता है,वो आपकी आँखों के सामने है.

 

प्रसंग ४ - भगवान जब गोंपियों के साथ गोकुल में रास लीला कर रह थे तो पहले तो रास हुआ था फिर महारास हुआ  तब भगवान वहा से अचानक अंतर्ध्यान हो गए, क्योकि तब गोपियों को ये अहंकार हो गया कि वो बहुत भाग्यशाली हैवे स्वयं परमात्मा के साथ है, और इस संसार में उनसे अधिक भाग्यशाली और कोई नहीं है । उन्हें अपने भाग्य पर अंहकार हो गया. व्यक्ति का मन दो ही जगह रह सकता है या तो ‘संसार’ में रहेगा या ‘भगवान’ में,तीसरी जगह है ही नहीं, और मन भी एक ही है और एक बार में एक ही जगह रह सकता है,संसार में होगा तो भगवान में नहीं होगा भगवान में होगा तो संसार में नहीं होगा गोपियों का मन जैसे ही भगवान से हटा और स्वयं के भाग्य पर गया. हम भाग्यशाली है, भगवान को गोपियों में अहंकार कि हल्की सी रेखा दिखी,भगवान क्यों गए क्योकि जहा अंहकार हो वहाँ वो रूक नहीं सकते है ।

 

भगवान बोले अब मेरा यहा कोई काम नहीं, गोपियों ने अपना सब कुछ तो समर्पित कर दिया तन-मन सब कुछ, सब गोपियाँ साधन की चरम सीमा पर थी, गोपी सब कुछ पाने के बाद,यहाँ तक कि भगवान को भी पाने के बाद, उनके अंदर थोडा सा मान रह गया और इसलिए भगवान चले गए, असल में भगवान कहीं नहीं गए हम स्वयं अपने अंहकार में खो गए है. फिर जब गोपियों को इस बात का अहसास हुआ तो उन्होनें गीत गाया, फिर भगवान आए. तो वो बता रहे कि जब मेरे पथ पर आओ तो इसे छोड कर आओ क्योकि भगवान तो वहीं है पर अहंकार के पर्दे के कारण दिखाई नहीं देते है.

 

प्रसंग ५ - एक राजा महावीर स्वामी के पास गया उसने सुना था उनके बारे में तो वो पहले दिन मिलने गया तो हार लेके उनसे मिलने गया. क्येाकि वो राजा था तो उसे अंहकार था.

 

जब महावीर स्वामी ने देखा कि वो हार लेके आया है तो उन्होनें कहा- कि इसे गिरा दो. नीचे तो राजा को आश्चर्य हुआ. कि मै  इतना महगा हार लेके आया हू, और ये गिराने को बोल रहे है तो उस राजा ने वो गिर दिया, पर उसे बडा दुख हुआ. अगले दिन वो फिर गया एक फूलों का गुलदस्ता लेके तो महावीर स्वामी जी के कहा - इसे भी गिरा दो, अब राजा बडा परेशान मै रोज लेके जाता हू, ये रोज गिरा देते है उसने मंत्रियों से सलाह की कि बताओं मुझे मै क्या करू, मंत्री समझदार था, उसने कहा कि राजा तुम कल खाली हाथ जाओ, तब वो तीसरे दिन बिना कुछ लिए महावीर स्वामी के पास गया तो उन्होंने कहा कि गिरा दो. तब वो राजा अवाक खडा रह गया तब वो समझ गया कि उन्होने ऐसा क्यों कहा क्योंकि उसमें अहम था कि मै राजा हू, और वो स्वामी जी के सामने अकड कर खडा था. वो एक संत से मिलने आया है पर उसमें एक अहंकार था कि मै राजा हू, तो स्वामी जी ने कहा- कि उस अंहकार को गिरा दो फिर उसकी समझ में आया कि क्यों दो दिन उन्होने वो तोहफा नहीं लिया.

 

उनकी नजर में कोई अमीर गरीब नही था उनके लिए सब बराबर है, तो ये जो संत फकीर होते हे ये कहते कि तू अपनी खुदी को गिरा दे, फिर तुझे ईश्वर से मिलने ये कोई नही रोक सकता है. क्योकि यही सबसे बड़ी बाधा है, तो सब साधन है व्यक्ति के पास, पर सबसे बडा इस अहंकार का त्याग है. जब हम शरीर से जोडते है जब हम आत्मा से जोडते है तो शरीर से नहीं तभी परमात्मा के पास हम जा सकते है ।

 

“जय जय श्री राधे


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