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गोपियों का निरुपाधि प्रेम

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राधे राधे आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाईये

 “राधे-गोपाला, गिरधर-गोपाला, गोपी-गोपाला, प्यारो नन्दलाला”……

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है.

आज का हमारा सतसंग का विषय है - “गोपियों का निरुपाधि प्रेम”.

जगत जननी श्रीराधा, श्रीकृष्ण भगवान की प्राणाधिका है. श्री कृष्ण स्वरूपा भगवती श्री राधा बहुत से लोगों के लिए पहेली बनी हुई है, कि भगवान कृष्ण के साथ उनका विवाह नहीं हुआ तो ऐसा कौन सा रिश्ता है जो हर बार रूकमणी जी का उनकी रानियों का नाम नहीं आता उनके साथ राधा रानी जी का ही नाम क्यों आता है. कृष्ण राधे कोई नहीं कहता, सब राधे-कृष्ण ही कहते है.


और राधा जी के अनिर्वचनीय तत्व रहस्य को कोई जान नहीं लेता तब तक ये पहेली ही बनी रहेगी और उनके तत्व को जान लेना इतना आसान नहीं है
. क्योंकि ये तो साधन राज्य की सर्वोच्च सीमा का साधन है. सिद्ध राज्यों में समस्त पुरुषार्थों में परम और चरम पुरुषार्थमय है. उसके लिए उस प्रेम राज्त्य, साधन राज्य में प्रवेश जरूरी है.


और जब गोपी रहस्य ही परम गुह है, इतना गोपनीय है तो फिर राधा जी को कोई कैसे जान सकता है
. उनकी बात ही क्या है. लोगों की समझ में नहीं आ सकता, कि मोक्ष तक कि कामना ना रखकर ,भगवान से बिना कोई कामना, बिना मोक्ष तक की कामना बिना, जिस भगवान की भक्ति करना या जिससे प्रेम करें, उससे कभी कुछ ना चाहें लोग कहते है ये कैसी भक्तिी है ? कि गोपियाँ कुछ चाहती ही नहीं है, अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहती. तो लोग कहते है, ये कैसी भक्तिी ?कैसा प्रेम ?


सबसे आश्चर्य की यह बात है कि इस भक्तिी या प्रेम में श्रृगांर और भोग प्रत्यक्ष देखने को मिलता है
. यधपि उसमें गोपियों का अपना सुख नहीं है,उनका श्रृंगार,सजना, उनके हाव भाव श्रृगांर भगवान के सुख के लिए है. वो प्रेमास्पद के लिए है. उनकी हर श्वास में, उनकी सूक्ष्म वृत्तिी मे और शरीर की प्रत्येक क्रिया में सहज ही, केवल भगवान के सुख के लिए है. फिर भी इस प्रकार त्याग और समस्त भोगो का एक साथ रहना सबका साथ में रहना, लोगों की बुद्धि भ्रमित कर देता है. कि गोपियाँ अपना सब कुछ त्याग चुकी है, उसके बाद भी उस श्रृगांररस के बारे में समझ नहीं पाते,कि फिर इतना सज श्रृंगार क्यों ?जब सब कुछ त्याग चुकी है, कि इन आभूषणों से इतना मोह क्यों ? वो ये नहीं समझ पाते कि उनका ये श्रृगांर तो भगवान के लिए है. गोपिया इन संसारिक भौतिक चीजों से उपर उठ चुकी है, वे इसलिए सजती है.कि भगवान कृष्ण कि खुशी है इसमें.


उदाहरण १. - आप शुकदेव जी को देखो, शुकदेव जी कौन है ? वो बह्रमानंद में परिनिष्ठ है, महान रस रहस्य के मर्मयज्ञ है जो वैरागी है , माँ के गर्भ से निकल कर वन की ओर भागे, एक पल के लिए भी नहीं संसार में रुके, क्योंकि अगर वो देख लेते तो संसार में फस जाते, जब वो राजा परीक्षित को कथा सुनाते है
. कौन परीक्षित ? जिनके जीवन के कुछ रोज ही बचे है सात दिन भी नही बचे थे, और पाचवें दिन जब वो रासलीला का वर्णन करते है. अब परीक्षित के पास चार दिन ही बचे है, चौथे दिन कृष्ण जन्म और पाचवे दिन रस लीला का वर्णन करते है, जरा सोचो जो मौत के करीब है, उससे शुकदेव जी जैसे ज्ञानी “रास” का वर्णन कर रहे है ,राधा रानी और गोपियों के श्रृंगार का वर्णन कर रहे है, इस श्रृंगार रस के वर्णन करने का मतलब ये नहीं कि वो राजा परीक्षित को संसार के कामों में लगाना चाहते है, नहीं, लोगों की बुद्धि भ्रमित है इसलिए वो उसमें दोष बुद्धि लगाते है. 


वरना शुकदेव जी क्यों मरणासन्न परीक्षित को रासलीला का वर्णन करते, और उल्लास के साथ मुग्ध होकर रासलीला के उस गुह्तम रहस्य खोल रहे है.प
रीक्षित जी का प्रश्न भी था, रस लीला कोई साधारण लीला नहीं है रास लीला भगवान की बहुत दिव्य लीला है.

उदाहरण २. - चैतन्य महाप्रभु क्या है? जिन्हेांने अपने जीवन में सब त्याग कर, सन्यासी बन गए, वे संग्रह नहीं करते और संन्यासी जीवन का नियम है कि ना ही किसी स्त्री से बात कर सकते तो जब चैतन्य महाप्रभु ने सन्यास लिया तो स्त्री का नाम नहीं सुनते थे. पर जब वो चैतन्य महाप्रभु रासलीला का दिव्य प्रसंग सुनते है, तो उन्हें अपनी देह की सुध नहीं रहती, और वो आनंद में डूब जाते है. उन्हें बाहरी दुनिया की खबर नहीं रहती, उस प्रेम राज्य में डूब जाते है, तो वे सन्यासी होकर क्यों उन पदों का गान कर रहे है? क्योकि वास्तव में रास लीला परम गुह है और गोपियाँ साधना की परम सीमा पर है. 


पर लोग उसे साधारण काम लीला समझते है
. यहाँ तक कि उदाहरण भी दे देते है. लोग कहते है जहाँ कही सामान्य स्त्री पुरुष को खड़ा देखते है तो कहते है कि वहाँ रास लीला चल रही है. लेकिन वास्तव में वे उस रास लीला के अधिकारी तो क्या उसे सुनने के भी अधिकारी नहीं है,इसीलिए अपनी कलुषित बुद्धि से उसमें दोष ढूँढते रहते है.


परन्तु त्यागमय प्रेम कि जो प्रकाशित बुद्धि से देखते है वो भगवान की ओर उर्ध्वातम बढते जाते है
. और वे कौन है वे संत है. और वे संत हद्रय है जो अपने दुख से जरा भी नहीं घबराते है. ना अपने लिए सुख चाहते है,परताप देखकर पिघल जाता है, पर जो अपने सारे सुख साधन को, परताप के नाश में लगा देते है वे ही “संत” है. तुलसीदास जी ने कहा है – “संत हद्रय नवनीत समाना, कबही परिक है ना जाना, निज परिताप द्रवित नवनीता, परदुःख द्रवित संत सुपुनीता”


मतलब जैसे माखन पर आच लग जाए तो वो पिघल जाता है
. ऐसे ही संतो का हद्रय है. उस माखन के समान ही है, वो दूसरों का दुख नहीं देख सकते है,उनका जीवन ही परोपकारी है, उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं सुख नहीं है. उसकी कही मोहमाया नहीं है, वो जीता है तो परोपकार के लिए, संत का दूसरा नाम “परोपकार” है. 


जो परदुःख कतर है, और परसुख परायण है
. वे ही वास्तव में संत है,क्योकि घर छोडकर जाने और भगवा पहन लेने से संत नहीं बन जाते, वन में भी, घर की याद आए, तो वो वन जाना किस काम का घर में रहकर हमारा मन परमात्मा में लगा रहे, उसी के चिंतन में रहे, तो घर में रहते हुए भी वो साधारण व्यक्ति “संत” है.  संत के लिए कोई भगवा चोले पहनने की जरूरत नहीं है. संत शरीर से  नहीं होता, वो तो आतंरिक भाव, अपने स्वभाव से, अपने गुणों से होता है. 


गोपियां सतं ही तो है
. उनका अपना केाई स्वार्थ नहीं है. अगर साज श्रृंगार है तो कृष्ण के लिए है क्योकि उनके पास अपने बचाने के लिए कुछ भी नही है. भोग कामना,त्याग करने के बाद एक कामना बचती है. वो है “मोक्ष” की कामना. व्यकित सब कुछ त्याग देता है पर ये कामना नहीं छूटती कि मेरी मुक्ति हो जाये. और ये कामना जब तक है शरीर त्याग नहीं माना जाता.


परन्तु गोपियों में ये सर्व त्याग सहज ही था. वे सच्ची प्रेमिकाए थी, इसी से वे वेदधर्म, लोक-धर्म, लज्जा,धैर्य ,स्वजन,  देह-सुख, आत्म सुख, सब का सहज त्याग कर दिया, सिर्फ कृष्ण के लिए. अनन्य भाव से कृष्ण का भजन करती थी,और इतना होने पर भी उन्हें अपने इस महान सूर-मुनिमन उच्च स्वरुप का, उच्चकेाटि का ज्ञान नहीं था, कि हम कौन-सी मुनि-देह से भी ऊपर, गोपी देह को प्राप्त हो चुकी है ,इसका उन्हें ज्ञान ही नहीं था, कि वो भक्तिी के उच्च शिखर पर है
. वो देह से उपर उठ चुकी थी, इसलिए गोपी प्रेम को “निरुपाधि प्रेम” कहा गया, सारी उपाधि उनके लिए छोटी थी.


व्यक्ति को सब कुछ छोड देने के बाद कहीं ना कहीं केाई चाह रहती है, उसे लगता है कि मुक्तिी और मिल जाए बस जन्म ना लेना पडे संसार में. पर जहा मुक्तिी भी चाह ना हो वहीं सच्चा प्रेम और सच्चा प्रेम है।जरा सी भी चाह बांकी है तो ये समझना कि अभी समर्पण पूरा नहीं है, इसलिए  संत कहते है कि गोपियां के प्रेम केा कोई उपाधि नहीं दी जा सकती. वो तो सारी उपाधियों से परे है
. इसलिए उनके प्रेम को “निरुपधि प्रेम” कहा गया.


और गोपी भाव में पहुॅच कर साधक सबकुछ त्याग कर सकता है
. उसे पहले वो कोई त्याग नहीं कर सकता और अगर हम देंखे जो बृहस्पति जी के शिष्य उद्धव जी थे. वो गोकुल से लौटकर बोले कि हमें तो गोपियों के चरणों की रज चाहिए बस उनके पद की रज मिल जाए. इसलिए प्रभु वृंदावन ने हमें कुछ भी बना दो, वास्तव मे गोपियों का जीवन ही धन्य है, उनके पास भगवान प्रतिक्षण है, उनके चिंतन में. गोपियों में राधा रानी जी प्रमुख है. उनसे ही सारी गोपिया बनी है. उन्ही कि तरह उनका रूप है स्वभाव है, गोपियों के प्रेम  में कितना त्याग है. वो भगवान कृष्ण केा अपना आराध्य नहीं मानती, वो राधा जी को अपना आराध्य मानती है. और जब भगवान राधा जी केा मिला देते है. उसे अपनी सुखमय का क्षण मानती है उनका स्वभाव सहज ही ऐसा है. 

सारी उपाधियां, गोपी प्रेम के आगें बहुत छोटी है, उनका प्रेम निरुपधि प्रेम है
. ऐसा दिव्य और अलौकिक प्रेम है जिसके आगे संसार कि मुक्ति–भुक्ति भी गोपियों के में चरणों में लोट लगाती है  कि मेरी मुक्तिी हो जाए, पर हमारी मुक्तिी कब होगी जब वो गोपी के चरणों की रज हमारे मस्तिक में लग जाए.   

 

Comments
2011-08-12 22:15:02 By Rajender Kumar Mehra

radhe radhe

2011-08-12 13:59:10 By Gulshan Piplani

radhey radhey

2011-08-11 07:42:57 By Rbs Kushwah

hare krishna radhe radhe

2011-08-11 07:42:47 By Rbs Kushwah

hare krishna radhe radhe

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