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राधा रानी जी का सखी प्रेम

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राधे राधे आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलों के लिए बड़े प्रेम से बड़े भाव से भगवन नाम का संकीर्तन करे ....

“भानू की किशोरी श्यामा प्यारी राधे , गोविंद-राधे, गोपाल-राधे, राधे-राधे-राधे”...

श्री बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है .

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “श्री राधा रानी जी का सखी प्रेम”  राधा जी महाभाव रूपा है और नित्य निंरतर भाव का प्रवाह बहाती रहती है . वे त्यागमयी है. उनमें कभी स्वसुख की कामना वासना नहीं है. केवल कृष्ण सुख की कामना है. इसीलिए प्रेम राज्य की आदर्श है. राधा जी चाहती है कि जैसे मेरे द्वारा श्री  कृष्ण को सुख होता है, वैसी ही उनकी जो कायरूपा गोपांगनाएँ है वो भी भगवान को सुख दें क्योंकि उनका सखी प्रेम भी अदभुत है. जो सुख मै भगवान को दे रही हूँ. वो इन गोपियों को भी मिले वे श्री कृष्ण को केवल अपनी वस्तु मानकर अधीन नहीं रखती कि भगवान कृष्ण बस मेरे है, नहीं नहीं


सारी गेापियाँ उनकी सखियाँ है और उनकी सेविकाएँ है. और गेापियों के जीवन का उददेष्य क्या है-  कि राधा-माधव के सुख में ही उनका सुख है. और राधा जी का कितना महान त्याग है और भगवान जब शरद पुर्णिमा की रात में रास शु      रू करते है . उस समय भी यहीं भाव था . जब महारास शुरू हेाता है . तो भगवान पहले सिर्फ राधा जी के साथ रास करते है . तो राधा जी को लगता है कि जो सुख मुझे मिल रहा है . वो सबको मिले.



तो भगवान उनकी इच्छा पुरी करने के लिए बहुत सारे रूप रखे तो हर गेापी के बीच में कृष्ण प्रकट हो गए तो राधा जी अपना आधिपत्य नहीं जमाती है . तो भगवान गोपियों के विशुद्ध प्रेम का रसास्वादन करने लगे, राधा रानी जी का प्रेम सीमित नहीं है, उनका प्रेम अंनत है . वो सबको वितरण करती है . हर समय सचेत रहती है . कि उनकी सखियाँ भी रास का आनंद ले .



प्रसंग १ - निकुंज में एक बढ़ी प्यारी लीला है “झूलन लीला”  एक बार राधा जी भगवान के बायी तरफ बैठी झूला झूल रही थी और सारी सखियाँ राधा माधव को झूला रही है . इतने में राधा जी को लगता है कि ये सुख मेरी सखियों को भी मिले और उनके मन में आया उनका तो यहीं व्रत है जो सुख मुझे मिले वो सारी सखियों को मिले. राधा रानी जी प्रेम कल्प लता है, राधा लता है और पुष्प गोपियों है . जैसे लता अपना रस पुष्प को देकर पुष्प को पुष्ट करती है उनको वो रस देती है .वैसे ही राधा जी कल्पलता है . गेापियों को रस देती हैं उन्हें प्रफुल्लित करती है . राधा जी के रोम से सखी प्रकट हुई है . तो झूलन लीला में राधा जी ने बताया कृष्ण को कि मेरी तरह सारी सखियों को झूले में बिठाओ और सुखदान की लीला श्यामसुदंर ने शुरू कर दी. पहले तो ललिता जी को दूसरी तरफ भगवान ने बिठा लिया और वो बीच में है . इस लीला का चित्रण बड़ा प्यारा है.निकुंज में कदम के पेड में वो झूला है झूले पर राधा माधव बैठे है तो ललिता जी को बाये बैठा लिया और उनके कंधे पर अपना हस्त कमल रख  दिया और उन्हें राधा की ही भांति सुख देने लगे.



तो एक सखी कुंदलता जी कहने लगी - कि देखो ये कलंकहीन चंद्र आज अपने राधा और अनुराधा को वाम और दक्षिण में लिए हुए शोभा का विस्तार कर रहे है . भगवान तो पूर्ण चंद है . तो ऐसे ही सारी सखियों को बारी-बारी बिठाकर सुख देने लगे, तो राधा जी का त्याग देखे वो कहती है कि अब दोनों ओर सखियों को बिठाओ और वो झूला झुलाने लगी. जैसे सखिया हम राधा माधव को झुलाती है, कितना त्याग है कितना बड़ा आदर्श राधा रानी जी का.



और सखियाॅ निज सुख की कामना से हिडोंलें में आकर नहीं बेठी है . वो तो राधा जी के सुख के लिए झूले में बैठी है . उनको कोई निज स्वार्थ नहीं है. इस लीला केा भगवान चाहते थे राधा जी के सुख इच्छा को पूर्ण करने के लिए, राधा रानी जी ऐसा चाहती थी, इसलिए गेापियों ने लीला को स्वीकारा किया ये गोपी प्रेम की पराकाष्ठा है, राधा का सुख कहा ? “कृष्ण में” और गोपियों का सुख “राधारानी” में जिससे राधा-कृष्ण सुखी हो, वो ही गोपियों के जीवन का उददेष्य है. और राधा जी का महान त्याग उनके पेमानुगमन करने वाली सखियों को राधा जी सुख देती है. कैसा अलौकिक और दिव्य सुख है .



गेापियों के प्रेम महत्व की विषेता क्या है? वह है “अभिमान शून्यता” उनमें कोई अहंकार नहीं है . राधा जी भगवान के पास बैठी है झूला झूल रही है .कृष्ण मेरे अधीन है ये उनको अहंकार नहीं है और गोपियों को भी नहीं है की कृष्णा हमारे कंधे पर हाथ रखकर बैठे है. क्योकि साधना में कोई बाधक है. तो वो है . अंहकार. उनके त्याग, प्रेम में, सबसे बडी वस्तु “दैन्य” और “अंहकार” रहित सेवा कर रही है भगवन की सब कुछ भगवान को अर्पण कर दिया है . सब कुछ निछावर कर चुकी है पर मन में यहीं भाव है कि मै प्रियतम से लेती हूँ देती कुछ नहीं बल्कि वो तो सब कुछ तन,मन, धन, शरीर, घर, बार, परिवार, सबो का त्याग कर दिया है . कृष्ण के चरणों में सब अर्पण कर दिया ये अभिमान नहीं है कि हम देते है . पर मन मे भाव आ जाता है . ये देंय कि स्मृति नहीं है, तो गोपियाँ दैन्य को व्यक्त नही करती तो “अभिमान शून्यता” “दैन्य” और “त्याग” ये तीन ही ही गोपियों के जीवन को महान बनाती है.



ऐसा नहीं है की वहाँ मान नहीं, कि सखिया मान नहीं करती सखियाँ मान लीला करती है . भगवान मनाते है . पर वो विशद्ध प्रेम का ही एक रूप है . राधा जी मान करती है क्योंकि भगवान चाहते है कि वो मान  करें वो मनाएँ तो यहाँ मान है . पर दूषित अभिमान नहीं है . इसलिए यह मान की लीला करती है, वहाँ तो प्रेम का अथाह सागर है .



राधा रानी जी गुणों की खान है . और अपनी सखियों से कह रही है. कि मै तो अवगुणों की खान हूँ . मुझ में कोई गुण नहीं, मै तो स्वार्थी हूँ . जहाँ त्याग खत्म होता है. वहीं प्रेम उदय होता है. जहाँ त्याग की पराकाष्ठा है वहीं प्रेम प्रारंभ होता है . जऔर अपने प्रेमास्पद कृष्ण को प्रेम का समुद्र मानती है. हाँ जितना त्याग है वहाँ उतना ही प्रेम है उतना ही सुख है . त्यागनें में सुख है. स्वार्थ सीमित होता है. तो वो गंदा है . और अगर विस्तृत है तो पवित्र है . राधा जी के स्वार्थ की सीमा असीम है . वो चाहती तो भगवान तो उनके अधीन है . सबके आराध्य कृष्ण है पर कृष्ण के भी आराध्य राधा है. वो सारा सुख अकेले ही ले सकती थी, हम ससार में देखते है हम प्रेम को बांटना नहीं चाहते, पर नहीं, वो तो त्याग की मुर्ति है . वो तो अपनी सखियों के सुख में अपना और भगवान का सुख देखती है. भगवान तो सबके आराध्य है पर वो तो राधा जी को अपना आराध्य मानते है . तो राधा जीतो अकेले ही सुख ले सकती है पर राधा जी को त्याग ही में सुख मिलता है . भगवत प्रेमी भक्तों को क्षण मात्र के संग के साथ मोक्ष की तुलना नहीं कर सकते है .



ब्रह्मानंद “ब्रह्म के मिलने में जो आनंद है” उसकी अपेक्षा “भगवत सेवानंद” श्रेष्ठ है और सेवानंद से “प्रेमानंद” श्रेष्ठ है, वह इसलिए क्योकि ब्रह्मानंद में एकरूप से है उसमे विलास या नवंनवयमान नहीं है जैसे प्रेमानंद है जिसमे कभी प्रेम है, कभी मान है, कभी रस है. अनुराग है ,तो कभी नयी नयी भावनाओ का उदय है प्रेमी प्रीतम नए-नए से रहते है जो नित्य बढते रहते है ये केवल प्रेमानंद में ही है.


बह्रमानंद मे क्या है? हम ध्यान करके शॅून्य को ही देखते है. तो ब्रह्मानंद किस काम का जो सगुण साकार भगवान बैठे है. उनके प्रेम मे जो आनंद है . वो उस “ब्रह्मानन्द” में भी नहीं है. “भगवतसेवानंद” में भी “श्रीकृष्ण सेवानंद” से भी श्रेष्ठ है . भगवान की सेवा से कृष्ण सेवा मं आनंद है . और गोपीभाव में तो भक्त को सेवा में ही आनंद मिलता है . पर सेवाआनंद से मिलने वाले आनंद को भी नहीं चाहते. वे तो अहेतु की सेवा चाहते है. क्योंकि सेवाआनंद में सेवक के मन में आनद का अनुसन्धान, आवेश और पिपास रह जाती है. कि मुझे सेवा में आनंद मिले.



प्रसंग - एक बार का निकुंज में राधा माधव बैठे है. गोपी पंखा चला रही है . पंखे की हवा से उनको सुख मिला तो वो गोपी की सेवा से प्रसन्न हुए तो इससे गोपी में आनंद के कारण अंदर सात्विक भाव का उदय हो गया प्रेम में “सात्विक भाव” होते है . कंपन, स्तब्ध, तो उसे स्तभता और इसके साथ जडता हाथ में आ गई और पंखा झुलाना रुक गई तो गोप ने आनंद केा धिक्कारा कि ऐसा आनंद किस काम जो सेवा में बाधा डाले तो ये प्रेम की पराकाष्ठा है . ये ब्रहमानंद भगवत सेवा नंद भी नहीं चाहिए सेवा में आनंद और सेवा में बाधा आए तो गोपी वो आनंद नही चाहती गेापी को अपना सुख नहीं. राधा माधव का सुख चहिए ऐसा राधा जी का गोपी के प्रति और गोपी का राधा जी के प्रति दिव्य प्रेम है . यहाँ पर कोई जलन नहीं है . कि हम भवगान की प्रियसा है . और तुम कुछ नहीं ऐसा नहीं है . वहाँ तो सब  दूसरे के सुख के लिए ही है. 

 

Comments
2011-08-12 18:49:44 By Ashish Rai

ati sundar.. radhey radhey

2011-08-07 00:11:43 By Gulshan Piplani

वाह आनंद आ गया| राधे राधे

2011-08-07 00:11:36 By Gulshan Piplani

वाह आनंद आ गया| राधे राधे

2011-08-07 00:10:59 By Gulshan Piplani

वाह आनंद आ गया| राधे राधे

2011-08-06 14:08:34 By Rajender Kumar Mehra

radhe radhe

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