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राधा का सर्वस्व कृष्ण सुख

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे ।

 “हमारो धन, राधा श्रीराधा-श्रीराधा-श्रीराधा, जीवन धन राधा-राधा-राधा-राधा……”

श्री  बाँके बिहारी जी राधा रानी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है . .

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “राधा का सर्वस्व श्रीकृष्ण सुख” राधा रानी जी की विशेषता है. कि उनमें कोई भी लौकिकता नहीं है. वो तो दिव्य है. उनका शरीर, रूप  सबकुछ चिनमय और दिव्य है. उनका प्रेम इतना उच्च है कि जिसमें कामना की गंध का लेष भी नहीं है.

श्री कृष्ण आनंद है, और राधा उनका स्वरूप है. आनंद के कुछ भाव होते है. रति, प्रेम, स्नेह, भाव, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव. और संतो ने भावो का बडा प्यारा वर्णन किया है. ये सब राधा जी के अंदर है. क्योकि राधा रानी जी तो महाभाव रूपा है,और राधा जी प्रेम की पराकाष्ठा है.

तो ये भाव क्या है? कैसे उत्पन्न होते है.? ये जानना जरुरी है. पहला है “रति” - जब चित्त में भगवान के अलावा किसी की भी जरा सी चाह ना रहे, जब सारी इन्द्रियाँ कृष्ण सेवा में लग जाए, मन में हट जाए विषयों से, वो ही “रति” कहलाता है . और जब रति में प्रगाढ़ता आ जाये, उच्चता आ जाये. तो वो  प्रेम बन जाता है. “प्रेम” दूसरा भाव है प्रेम में अनन्य ममता होती है. सब जगह से हमारा मोह हट जाये केवल यह भाव हो जाए कि “सर्वत्र” “सर्वदा”,”सर्वथा” कृष्ण के अलावा मेरा कोई नहीं है. बस यही भाव प्रेम कहलाता है .ये जगत का प्रेम नहीं है. कृष्ण प्रेम बहुत दिव्य है. जो इस संसार से परे कि वस्तु है

प्रसंग १-  जैसे कि एक बार राधा जी भाव में निमग्न बैठी थी, तो सखी बोली - कि आप सदा भाव में रहती है. आप ना कहीं आती-जाती है ना किसी से बात करती है. तो आप बताओ कि कौन से भाव में है? तो उनकी आँखों से आँसू बहने लगते है .

तो राधा रानी कहती है कि मै खुद भी उस भाव को नहीं जानती हूँ. मेरी ममता इस संसार से हट गई है,सारा संसार विलीन हो चूका है,ये सब तुम मेरी अंतरगां सखी हो. इसलिए तुम्हे बता रही हूँ. अब तो बस में कृष्ण के चरणों से बधॅ गई हूँ, ये सब मैंने नहीं किया अपने आप हो गया, मै और मेरा भाव अपने आप कृष्ण चरणों में समर्पित हो गया है. बस ये ही प्रेम है.

जहाँ सब छोडकर कृष्ण का हो जाना तो ये प्रेम है. और जब इस प्रेम में प्रागाढता आती है. तो तीसरा भाव प्रकट हो जाता है वह है “स्नेह”. हम संसार में स्नेह का क्या मतलव बताते है. कि संसार में छोटों के प्रति बडो का वातस्ल्य भाव स्नेह है. पर ये वह स्नेह नहीं है.  


यहाँ चित्त की द्रवता का नाम - स्नेह है. चित्त द्रवित कब होगा जब भावान्वित हो जायेगा. कब जब से प्रीतम के प्रेम में भर जाए, तो चित्त द्रवित हो जाएगा उस चित्त की स्थ्तिी का नाम स्नेह है. और ये स्नेह जब उच्च कोटि कोटि पर पहुँचता है. उसमे प्रगाढता आती है. तो उस स्नेह का मधुर आस्वादन करने के लिए भाव जाग्रत होता है. और ये भाव क्या है ? कौन सा है?. चौथा है “भाव”, उस स्नेह का मधुर आस्वादन करने के लिए जो भाव जाग्रत ये है “मान”


पर ये जगत वाला मान नहीं है. वो तो त्यागने योग्य है. इसका यर्थाथ आदर्श राधा रानी जी के प्रेम में मिलता है. दिखाई देता है. राधरानी जी जब मान करती है.तो मान भंग करने के लिए, भगवान क्या करते है ? उनके चरणों में बैठकर उनको मनाते है अपने प्रेमअश्रु से उनके पाद-पदों को धोते है.


भगवान ऐसा चाहते है तो राधा जी ऐसा करती है. गोपियाँ जो भी लीला करती है. वो कृष्ण के सुख के लिए. तो स्नेह में जब प्रगाढता आती है. तो मान का भाव जाग्रत होता है.

जैसे गंगा जी प्रवाह में जा रही है. उनके रास्ते में बाध्य आ जाए, बड़े तेज वेग से जा रही है तो उददीपन गर्व से वो उपर उठकर अंत में समुद्र में मिल जाता है. वैसे ही राधा रानी का प्रेम मान भी है.वो भी उच्चवसित होकर, कालांतर के पश्चात, मधुरतम श्याम सागर में मिलाकर आत्म समर्पण कर देता है.


जरा उस मान कि कल्पना करो, इतना मधुर कितना सुन्दर वो मान का भाव है,भगवान कृष्ण उनका प्रेम मधुरता से उठकर प्रेम मे डूब जाता है . राधा जी मान के भाव में है, कृष्ण चरणों में बैठे मना रहे है. लेकिन राधा रानी जी किसके लिए कर रही है, कृष्ण के लिए, और कृष्ण किसके लिए कर रहे है, राधा रानी जी के लिए , तो दोंनों एक दूसरे के लिए कर रहे है. यहाँ ना प्रेमी समझ में आता है ना प्रेमास्पद समझ में आता है, कि कौन किसको माना रहा है? कौन किसके लिए कर रहा है?. यहाँ कोई भेद नहीं है. और जब मान में उच्चता आती है. तो वो पाँचवा भाव “प्रणय” में बदल जाता है.



प्रणय के दो भेद है. दो प्रकार से अभिव्यक्त है . – १.-“मैत्र” और २.- “सख्य”. तो मैत्र “विनय-युक्त” होता है, सख्य “भयरहित” होता है. इसे हम ऐसे समझ सकते है. जैसे मित्र होता है वह मित्र का कभी अपमान नहीं करते, एक-दूसरे का कभी अपमान नहीं करता. जैसे सख्य भाव में कृष्ण जी के ब्रज के सखा है वो भगवान का पग-पग में अपमान करते है. लेकिन वो ईष्र्या वश अपमान नहीं है. ये एक भाव है प्रणय को व्यक्त करने का तरीका है .



मैत्र में एक पर्दा रहता है . पर सख्य भाव में पर्दा नहीं है, अपमान कर देते है . जैसे जब भगवान अपनी खेल में अपनी धाक जमाते है. तो एक ब्रज सखा कह देते है – “कि न्यारी करो हरि आपनी गैया, ना हम चाकर नंद बाबा के,ना तुम हमरे नाथ गुसईया”..



हम नंद बाबा के चाकर नहीं है, और ना तुम हमारे स्वामी हो, जाओ अपनी गईया अलग कर लो. लड़ते है कृष्ण से, ये सखा भाव है,यहाँ कृष्ण के प्रति वप स्वामीपने का,ब्रह्म का ,परमात्मा का भाव नहीं है  मित्र कुछ भी कह सकते है प्रभु से ,एक मित्र ही ये कह सकता है . तो ये दिव्य प्रणय भाव है. और जब इसमें प्रगाढता आती है. तो उसका फल राग है छटा भाव है, वो “राग” में परिवर्तित हो जाता है.



राग में अपने प्रियतम से प्राप्य होने दुख में सुख मिलता है. ये राग है पर ये संसार का राग नहीं है . यहाँ तो दुख में भी सुख की अनूभूति है. ऐसो दिव्य राग है.



प्रसंग २- एक बार जेठ के महीने में बहुत गर्मी पड रही है. दोपहर का समय था. तो राधा जी केा पता चला कि श्याम गोवर्धन पर आए है. तो वो नंगे पैर दोड कर, जलती हुई भूमि पर चल पड़ी जाने लगी. इसलिए नहीं कि  उन्हें कृष्ण मिलन कि लालसा है उत्सुकता है नहीं नहीं. कृष्ण को सुख होगा वे इसलिए दौडी कि उनको देखकर कृष्ण को सुख मिलता है. तो गोपियों का राधा जी का एक ही भाव है कृष्ण का सुख है. प्रेमास्पद सुख “तब सुख सुखितव्म” का भाव है.

गेापियाँ श्रृगांर क्यों करती है. उनको पता है कि भगवान प्रसन्न होंगे, वो तो देह से उपर उठ चुकी है. भगवान को अच्छा लगता है. कि उनके सुख के लिए वो नित्य नए श्रृगांर करती है.वेणी लगाती है.यहाँ तक कि उनका खाना-पीना सब उनके लिए गोपियाँ गाली भी देती है. क्योंकि कृष्ण चाहते है. उनमें क्रोध नहीं  है. उसमे प्रेम है इसमें प्रेम का भाव है. इसे वही समझ सकता है जब साधक देह से उपर उठकर जब रति, प्रेम, राग, इन अवस्थाओं में पहुचता है.


प्रसंग ३ - एक बार राधा जी निकुञ्ज में थी तो उनको पता चला कि भगवान आ रहे है. तो राधा जी ने सखियों को मना कर दिया कि वो आ ना पाए और सखिया भी ऐसा ही करती है तो ऐसा क्यों किया क्योंकि भगवान ऐसा चाहते है. तो प्रियतम की चाह पूरी करने में, अगर उनकी अवज्ञा भी करनी पड़े तो वो् भी करती है. इसे कहते है राग और राग की उच्च अवस्था प्रगाढ़ता आती है तो वह “अनुराग” जो सातवा भाव में परिवर्तित हो जाता है.  


ये अनुराग क्या है ? नित्य नव अनुराग कि अनुभूति होती है इसमें, प्रियतम की नित्य नई छवि दिखती है. क्षण क्षण नए अनुराग कि अनुभूति होती है. अनुराग तो संसार में भी होता है. नया घर, नई गाडी, नया बगीचा, वस्त्र नया, नया प्रेमी, नयी प्रेमिका. सब में अनुराग होता है, उनमे भी अनुराग होता है, मानो घर में नयी गाड़ी आई तो नई चीज तो अच्छी लगती है. पर बार-बार उसका प्रयोग करने पर हमें उसमें से आनंद नहीं मिलेगा जैसा पहले बैठने या देखने पर मिला था, क्यों ?क्योकि वह स्थायी होती जा रही है, जैसे-जैसे स्थाई होती जा रही है, अनुराग घटता जाता है. अनुराग कम होता जाता है. आकर्षण नहीं रहता ये संसार का अनुराग है. मकान पुराना हो जाता है,घर पुराना हो जाता है, प्रेमी प्रेमिका पुरानी हो जाते है,तो फिर अनुराग घटने लगता है ये संसार का अनुराग है,ये संसार का अनुराग नहीं है यहाँ तो श्यामसुन्दर नित्य नव नवायमान दिखायी देते है.



यहाँ संसार में सब का नाश होना है. आज हम जवान है, कल बूढे हो जाएगें, गाड़ी आज नयी है कल पुरानी हो जायेगी,और एक दिन खटारा हो जायेगी और हम बाद में बेंच भी देंगे. अनुराग था पर वो समय के साथ कम हो गया, वो वास्तव में मोह था अनुराग नहीं है. बिहारी जी को देखो, हमारे बाँके बिहारी जी जब हम छोटे थे तभी वो वैसे ही दिखते थे और आज हम जवान होकर बूढे हो गए, पर वो तो ज्यों के त्यों ही दिख रहे है.

गोपियां जब जब भगवान को देखती है तो भगवान का रूप नया दिखता है. नित्य आनंद है. श्री कृष्ण के इसी लीलाविलास का नाम ही “अनुराग” है. और यहीं अनुराग में प्रगाढ़ता आती है. तो वह "भाव" में परिवर्तित हो जाता है. और जब भाव में परिपूर्णता आती है तो वह  “महाभाव” में परिवर्तित हो जाता है. जो राधा जी का स्वरुप है. यह महाभाव ही गोपियों की उपासना पद्धति है. उसी भाव से वे भगवान श्री कृष्ण को पुजती है,यही उनकी पूजा का क्रम है,यह गेापियों का प्राण है, आत्मा है. और इसी महाभाव का आश्रय लेकर भगवान तृप्त रहते है. अगर ये भाव ना हो तो भगवान ना हो, कुछ ना हो, गोपियों की सत्ता, भगवान की सत्ता इसी भाव से है. 



एक विशिष्ट बात कि जिस प्रियतम के प्रेम के सामने कोई चीज नहीं रहती सबकी विस्मृति हो गई , कोई तृप्तिी ना हो, रति, प्रेम, स्नेह, राग, अनुराग, भाव, और अब महाभाव की स्थिति, तो जहाँ सबकी विस्मृति हो गई, संसार बहुत पहले छूट गया, संसार का राग अनुराग भी छुट गया और दिव्य राग अनुराग में परिवर्तित हो गया, सब का विलोप हो गया, वह ऐसा प्रेम जो सबको जलाकर उसका ध्वंस अवशेष बचा है उस पर हर्षोन्मत्त होकर प्रेमी नाच उठा, कितनी विचित्र बात है,कि सबकुछ अपने हाथो से ही स्वाहा कर दे ,ये बिलकुल वैसा ही है जैसे कोई अपने घर में आग लगा दे और फिर आग लगने पर खूब ताल ठोक ठोक कर नाचे. अपना सब कुछ जला दिया सबकी तिलंजली दे दी और उसकी राख पर कोई नाचे, तो जहा ये प्रेम रहता है वहाँ सबकी राख करनी पड़ती है.



यहीं बात उद्धव को गोपी समझा रही थी, कि “ये तो प्रेम की बात है उद्धो, बंदगी तेरी बस की नहीं है.यहाँ सर देके होते है सौदे आशकी इतनी सस्ती नहीं है.” प्रेम इतना आसान नहीं है. यहाँ सब चीजों कि तिलांजलि देनी पड़ती है, सबको मिटाना पडता है, तब कही जाकर प्रेम की प्राप्ति होती है. तो जहाँ ये प्रेम रहता है वहाँ सबकी राख करनी पड़ती है, जो सब को जलाकर, सबको फूककर, लोक-परलोक को ध्वसं करके, मुक्ति-भुक्ति का  धुआँ उडाकर,सबके भस्मा वेश पर नाचना जानता है. उसी को प्रेम की प्राप्तिी होती है.


गेापी कहती है कि “घर तजु, वन तजु, नागर-नगर तजूँ, वंशी वट तट तजु, कहू पे ना लज हूँ, एक पल में सब को छोड़ दू. “ये देह तजु, गेह तजु, ये घर क्या, ये शरीर भी छोड दूँ, पर नेह कहो कैसे तॅजू” मै सब छोड दूँ, पर कृष्ण प्र्रेम को कैसे छोडू. “आज सारे राज बीच ऐसे साज सज हो.

 

प्रेमी वास्तव में ऐसा ही होता है.सब छोड देता है. में संसार की नजर में वो पागल है. पर प्रेमी की नजर में तो संसार के लोग पागल है, क्योंकि हम संसार के प्रेम, तुच्छ राग में फॅसे है. इसलिए वो संसार को पागल कहता है और संसार उसे पागल कहता है.

ये संसार मुझे कुछ भी कहे जहाँ मैने सबकी तिलाँजलि दे दी वहाँ ये संसार “ये बाँवरो भयेा है लोक बाँवरी कहे मोहो, बाबरी कहे ते पे में कहू ना बरजो” किसने मुझसे क्या कहा मै तो भूल गई ,"कहयिया सुनाईया तजु, बाप और भैया तजो, दईया तजु मईया पे कन्हैया नहीं तज हूँ". क्योकि जहाँ कृष्ण ,मिल गए अब क्या पाना शेष रहा. ये एक प्रेमी ही कह सकता है गोपियाँ ही ऐसा कह सकती है वो उस महाभाव में स्थित है ये महाभाव कब आता है? जब हम आनंद की सारी अवस्थाओं को पार कर लेते है. पर गोपियाँ राधा जी इस भाव में स्थित है. उनके जीवन का एक ही उददेष्य है वो है कृष्ण का सुख और कृछ भी नहीं. 

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