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राधा जी का अधिरूढ भाव

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करेंगे ।

“जय राधे,  श्री राधे-राधे,  जय राधे,  श्री राधे,

जय कृष्णा,  श्रीकृष्णा-कृष्णा,  जय कृष्णा,  श्रीकृष्णा ....”

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के युगल चरणों में कोटि केाटि वंदन है .

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “राधा जी का अधिरूढ भाव” राधा जी प्रेम की प्रतिमूर्ति है. प्रेम उनकी पराकाष्ठा है. प्रेम राज्य की महिमा प्रकट होती है तो वो राधाभाव में प्रकट होती है. वो जो उच्च कोटि का दिव्यभाव है, उस तक पहुँचने के लिए सबसे जरूरी है “राधा जी की कृपा”. क्येांकि उनकी कृपा के बिना कोई भी ब्रज मंडल में प्रवेष नहीं कर सकता, और ना ही भाव में, ना ही परिकर में शामिल हो सकता है.


कोई अगर कृष्ण को भी चाहे तो बिना राधा के भगवान कृष्ण पूजा स्वीकार ही नहीं कर सकते है. इसलिए हमें भगवान को पाना है, तो राधा जी की आराधना करनी पडेगी. “श्याम कहे से, श्याम ना आए, राधे-राधे बोलो, श्याम भागे चले आते है”. राधा जी प्रेम के सर्वोच्च शिखर पर है. प्रकृति के प्रत्येक सपंदन में बिंदू रूप में सात रस कहे गए है. - “अनुराग”,  “वातसल्य”, “कृपा”, “लावण्य”, “रूप”, “सौन्दर्य” और “माधुर्य” और ये सातों रस भगवान कृष्ण और राधा जी से ही उत्पन्न हुए.


रासेश्वरी, नित्य निकुंजेश्वरी, श्री वृषभानु नंदनी उन्ही सातो रस अनंत, अगाध अधिष्ठाती देवी है. और अगर हम इन सातो रसो को देखे तो - इनका भाव “अनुराग” रूप “दहीमण्डित” से है. उन्हीं की करूणामयी दिव्य “दुग्धधारा” है. उन्हीं की “वातसल्यमयी” दुग्धधारा  है. जिससे सारी प्रकृति ओतप्रोत है. वो ही राधा जी की परम “घृतवत” “कृपा” तीसरा रस है. इन्हीं का जो “लावण्य” है. इनके लावण्य “मदिरा” से है. फिर “रूप” आता है. इन्ही का वो छवि रूप सुन्दर मधुर वो “इक्षुरस” है. इन्हीं का केलिविन्यास रूप है वही समस्त बह्रमांड में ओतप्रोत है. जो भी रस इस पृथ्वी में है वो राधा-श्याम से ही प्रकट हुआ है.


ऐसे ही अनंत विचित्र सुधामयी, प्राणमयी, रसमयी, चरम और सार्थक मीमांसा मूर्ति राधा जी का स्फुरण  जिसके जीवन में नहीं हो पाता है उसका तो जीवन ही अनर्थ है. उसने जीवन में कुछ नहीं पाया.जिसके जीवन  राधा जी की दिव्यता का बीज ना फूटा हो,



एक साधक यही प्रार्थना करता है की - "हे राधिके ! वह शुभ सौभाग्य क्षण कब आएगा,जब  तुम्हारा नाम लेने के लिए मेरी जिव्हया विहवल हो उठेगी, जब तुम्हारे चरण चिन्हों अंकित वृदांवन में भ्रमण करेंगे, मेरे सारे अंग लोट-लोट कर कृतार्थ हो जाएगें, जब मेरे हाथ तुम्हारी ही सेवा में रहेंगे, मेरे मन तुम्हारे ही ध्यान में लगा रहेगा, वो दिन कब आएगा". 


राधा जी भगवान की जो लीला है वो व्रज का कण-कण गता गाता है.वो हर भक्त गाता है. इसलिए साधक प्रार्थना कर रहा है. कि कब वो दिन आएगा, जब ब्रज की रज में, मैं लोट लगाउॅगा. तो ये एक भक्त के मन की बात है.

एक साधक का प्रष्न है. कि राधा जी का स्वरूप क्या है ? तो राधा जी के स्वरूप का बखान तो कोई कर ही नहीं सकता. उनको प्रेम तो अचिन्य और अनिर्वचनीय है. उनका वर्णन ना श्री राधा जी कर सकती है और ना माधव, तो हमें जैसे मूढ उनका वर्णन कर ही कैसे सकते है ? राधा जी के बारें में बस इतना ही कहा जा सकता है.


उदाहरण - कि वो परमप्रेम विशुद्ध और  उज्जवल है. जैसे कि स्वर्ण होता है, सोने को जब अग्निी में जलाया जाता है. तो उसके साथ सारी धातुएँ तो जल जाती है. और सोने कुदंन हो जाता है, उसकी सारी अशुद्धियाँ  चली जाती और सिर्फ शुद्ध सोना ही बचता है. वैसे ही राधा का प्रेम विशुद्ध है. उसमें कोई विकार नहीं है. पर एक बात का अंतर है. हम सोने की तुलना राधा जी से नहीं कर सकते. क्येांकि सोना पहले विशुद्ध था उसमें धातुँए मिली थी, जब हमनें उसाके जलाया, तपाया, तब उसमें धातुँए गयी और वो शुद्ध  हुआ.


पर राधा जी का प्रेम तो पहले सें ही शुद्ध है. वो सहज है, और पूर्ण है. सच्चिदानंद में दूसरी धातु आएगी कहाँ से ? राधा जी में विकार जैसे शब्द का प्रयोग करना ही अपने आप में घृणित है . उनको प्रेम तो पवित्र है. सोना तो तपाने के बाद विशुद्ध होता है. पर राधा प्रेम तो स्वंत ही विशुद्ध है. ये शुद्धता वाली बात “साधको” पर अच्छी लगती है.


कि श्री कृष्ण प्रेम की साधना में परिपक्व साधको के हद्रय में जो उस भाव पहुँचें है. उनके हद्रयों में जो दूसरें राग है. संसार के काम है, राग है. तो जब वो प्रेम में आता है. तो वों सोनें की तरह शुद्ध हों जाता है. उसके विकार शुद्ध हो जाते है . सोने की तरह क्येांकि विकारों को जलाया जा चुका है. सारे विकार संस्कार भस्म हो चुके है. बचा क्या केवल शुद्ध प्रेम उस भाव तक पहुँचते व्यक्ति निखर जाता है. उसके अंदर कोई विकार नहीं रहता है. लेकिन ये बात साधको के लिए है. राधा जी के लिए नहीं. वो तो उस परम दिव्य प्रेम के परमोच्च शिखर पर है आरूढ है. इस राधा प्रेम का दूसरा नाम अधिरूढ भाव है. जहाँ उनके अंदर विकार नहीं है. वो परमशुद्ध है. प्रेम से कहिए श्री राधे


संतजन इसे अधिरूढ भाव कहते है. पहले से ही उस अधिरूढ भाव पर राधा जी है. ऐसा नहीं है कि वो साधना करके वहाँ पहूँची है. उनका तो स्वभाव ही एकदम सहज है. और "गोपियां" प्रेम का “आश्रय” है, जो राधा जी में है. तो प्रेम का आश्रय “गोपीजन” है. और “कृष्ण” प्रेम का “विषय” है.



गोपियों का अप्राकृतिक दिव्य भाव है, वो ही तो निराकार से साकार बना देता है. परमात्मा क्यों ? साकार हो गए,यही राधा जी का अधिरूढ भाव है. वही पर ब्रह्म में सुखेच्छा उत्पन्न करता है. सुख जैसी चीज परमात्मा के लिए नहीं है, पर वो कैसे प्रकट हो गई? क्येांकि गोपियों का वो दिव्य भाव था. प्रेम  का, जो महान उच्च भाव है, वो ही उन "निष्काम में" "कामना" पैदा करता है, “नित्य तृप्त” में “आतृप्ति” पैदा करता है. “क्रियाहीन” होते हुए “क्रिया जाग्रत” हो जाती है. “आनंदमय” में “आनंद की वासना” जाग्रत हो जाती है.

और वो सब इन्द्रि जन्य नहीं है. कृष्ण का रूप हाडमांस से नहीं है, वो तो जगत को दिखाने के लिए ऐसा बना है, ऐसा है नहीं. उससे परे की चीज है, इसलिए भगवान का वो हॅसना, दुःख करना, रोंना, रूठना, क्रोध करना, ये सब क्या है ?ये गोपियों का, व्रज वासियों का, दिव्य अप्राकृतिक प्रेम भाव ही तो है. जसिके वजाह से वो परमात्मा निराकार से साकार बन गए, जो आनंदमय थे, उनमें वासना जाग्रत कर देती है . ये कैसे हुआ? गेापियों के प्रेम से.


गोपियाँ का प्रेम भी अपने आप नहीं हुआ भगवान चाहते थे कि गोपियाँ मुझे गाली दे, वो ही चाहते थे कि गेापियाँ शिकायत करें, तो यहाँ पर निज सुख की नहीं, परसुख की कामना है. जिसमें ये उच्च भाव आ जाता है. तो वो जो राधा रानी उस महाभाव उच्च भाव में आरूढ है.


तभी तो भगवान कहते है- कि हे राधे ! जो तुम हो, वो ही मै हूँ. जब उनकी इच्छा होती है. तो वो ही राधा बन जाते है. और वो ही कृष्ण बनकर लीला करते है. राधा जी जब चाहें तो कृष्ण बन जाती है. तो दोनों में कोई भेद नहीं है. जैसे अगिन में दाहक शक्ति है, दूध में सफेदी रहती है. ऐसे ही हे राधे ! मैं सदा तुम में रहता हूँ.



भगवान कहते है-  जो अज्ञानी हम में भेद बुद्वि करता है. तो जब तक सूरज चाँद रहता है. तब तक  मेरी कृपा उसको नहीं मिल सकती, तो वो एक है. भगवान की सारी सृष्टिी संकल्पमय है. जब उनकी लडने की इच्छा हुई तो जय-विजय को राक्षस बना दिया, और फिर उनसे युद्ध किया, जब ज्ञान देने की इच्छा हुई तो कपिल बनकर आ गए, औेरवो ज्ञान अवतार भगवान का हुआ. तप करने की इच्छा हुई तो  नर और नारायण बनकर तप करने लगे, भगवान की इच्छा भजन करने की हुई, तो भजन किसका करूँ? सबसे बडे तो मै ही हूँ. तो अपना ही भजन करने के लिए, राधा जी को अपने में से प्रकट किया. तो राधा कृष्ण में कोई भेद नहीं है. तो राधा जी तो परम भाव में डूबी रहती है. उससे कभी बाहर नहीं आती है . ऐसा उच्च उनका वो अधिरूढ भाव है. 

 

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