Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

गुरु और शिष्य

  Views : 342   Rating : 5.0   Voted : 5
submit to reddit  
Convertion of eSatsung in text is in Process ...Mean while you can listen the Audio.
Comments
2012-01-11 10:04:14 By Gautam Kushwaha

गुरु दीक्षा

दीक्षा शब्द मूल रूप से चार शब्दों से बना हैं और यह शब्द हैं :

द ई क्ष आ.

द : सद्यः कुंडली, शिवा, स्वस्तिक, जितेन्द्रिय.
ई : त्रिमूर्ति, महामाया, पुष्टि, विशुद्धि, शांति, शिवा - तुष्टि.
क्ष : क्रौध, संहार, महाक्षोभ, अनल - क्षय.
आ : प्रचण्ड, एकज, नारायण, क्रिया, काँटी.

“जीवन में जो शिव और शक्ति का संयुक्त रूप हैं, जो महामाया, तुष्टि एवं विशुद्धता की स्थिति हैं और जो जीवन के मलों का संहार कर जीवन में कान्ति उतपन्न करने की क्रिया हैं, वह दीक्षा ही हैं.\"

या
व्यक्ति को पूर्णत्व (नर से नारायण बनने की पद्धति) प्रदान करने की दुर्लभ प्रक्रिया ही दीक्षा हैं. दीक्षाओं के माध्यम से ही शिष्य को कृत्कृत्यता प्राप्त होती हैं. सदगुरु की करुणा तथा शिष्य की कृतज्ञता का यह पवन सम्मिलन दीक्षा की उदात्ततम परिणति हैं. भगवन कृष्ण को भी दीक्षाओं से संवलित गुरु की कलाओं ने महानतम बना दिया, संदीपन की दीक्षाओं ने उन्हें पुरुषोत्तम बना दिया, जगदगुरु बना दिया. श्रद्धा और समर्पण दीक्षाओं के मूलभूत अधर तत्व हैं, इनके द्वारा ही गुरु के ज्ञानामृत दोहन से आप्लावित होकर साधक अनंत सिद्धियों का स्वतः स्वामी बनता ही हैं. निश्चय ही वह व्यक्तित्व सौभाग्यशाली एवं धन्य होता हैं, जिसके जीवन में सदगुरु दीक्षाओं के लिए ऐसा क्षण उपस्थित कर दें.

दीयते इति सः दीक्षा.

\"दीक्षा\" का तात्पर्य यह नहीं हैं की इधर आपको दीक्षा दी और उधर आप सिद्ध हो गए या सफल हो गए, दीक्षा तो गुरु द्वारा प्रदत्त ऊर्जा से सफलता के निकटतम पहुँचने की क्रिया हैं, इसके बाद पूर्णता, सफलता, सिद्धि तो आपके विश्वास, श्रद्धा और व्यक्तिगत रूप से मानसिक एकाग्रता से मंत्र जप के द्वारा ही संभव हैं.

कोई भी साधना हो, दीक्षा प्राप्ति के उपरांत उसमें शिष्य के लिए करने को अधिक शेष नहीं रह जाता हैं, क्यूंकि सदगुरु अपनी ऊर्जा के प्रवाह द्वारा शिष्य के शारीर में वह शक्ति जाग्रत कर देते हैं, जिससे मनोवांछित सफलता प्राप्त हों और एक प्रकार से 90 प्रतिशत से भी अधिक सफलता तो साधक को यों ही एक झटके में मिल जाती हैं, जो शेष 10 प्रतिशत रह जाता हैं, उसमें साधक मंत्र - जप एवं साधना के द्वारा गुरु प्रदत्त ऊर्जा को संगृहीत करते हुए सफलता को हस्तगत कर ही लेता हैं.


प्रत्येक मनुष्य, जिसने जन्म लिया हैं उसके लिए सर्वथा उपयोगी हैं दीक्षा, क्योंकि दीक्षा शिष्य के जीवन को पावन बनाने की दुर्लभ क्रिया हैं.

हमारे कई - कई जन्मों के दोष, पाप एवं कुसंस्कारों के रूप में संकलित रहते हैं. इन्हीं दुःसंस्कारों से साधक को मुक्त करने के लिए दीक्षाएँ अपेक्षित हैं. गंदे कपड़े के मैल को बिलकुल निर्मूल करने के लिए जैसे कई बार कई प्रयास करने पड़ते हैं, वैसे ही कर दुःसंस्कारों को मिटने के लिए दीक्षा ही सबल उपाय हैं.
इसीलिए पाप मुक्त होने के लिए साधक द्वारा अनेक बार दीक्षा लेने का शास्त्रीय विधान हैं. दीक्षाओं के अनेक स्वरुप एवं प्रकार हैं, इसलिए आवश्यकतानुसार उनको लेने का प्रयास करते रहना चाहिए.

शिष्य के जीवन की यह एतिहासिक घटना होती हैं, कि सदगुरु उसे गुरु दीक्षा के माध्यम से अपना ले, ह्रदय से लगाकर अपने जैसा पावनतम बनाकर, एकाकार कर ले. केवल शिष्य के कान में गुरु मन्त्र फूंक देना ही गुरु दीक्षा नहीं होती. शिष्य के जीवन के पाप, ताप को समाप्त कर बंधन मुक्त करना, जन्म - म्रत्यु के चक्र से छुड़ा देना ही दीक्षा होती हैं, नर से नारायण बनाने की, पुरुष से पुरुषोत्तम बनाने की तथा मृत्यू से अमृत्यू की ऑर ले जाने की पावनतम क्रिया ही गुरु दीक्षा होती हैं. गुरु दीक्षा लेने के बाद तो यह सम्पूर्ण जीवन ही विकसित कमल पुष्प की तरह सम्मोहक, पूर्णमासी के चन्द्र सामान आह्लादक एवं अमर फल की तरह मधुर व रसपूर्ण होता ही हैं.

दीक्षा का महत्त्व इसलिए भी कई गुना बढ़ जाता हैं क्योंकि आजकल इस आपाधापी वाले युग में, इस तीव्र - गति से चलने वाले समय में हर कोई इस भाग - दौड़ में शामिल हैं और किसी में भी इतना संयम नहीं, और न ही किसी के पास इतना समय हैं की वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु साधनाओं में समय दे सके क्योंकि साधनाओं में लगातार कई दिनों तक साधक को पूर्ण मनोवेग के साथ जुटना पड़ता हैं.... और यह सब आज के युग में संभव नहीं......

आगे कुछ विशेष दीक्षाओं को स्पष्ट किया जा रहा हैं, जिन्हें गुरु दीक्षा के बाद ग्रहण करना चाहिए. ये दीक्षाएँ पूर्णतः गोपनीय हैं आर गुरु - शिष्य परंपरा के अनुसार ही ये अभी तक गतिशील रह सकी हैं. इन दीक्षाओं द्वारा शिष्य जीवन में अपने प्रत्येक अभीष्ट की प्राप्ति कर सकता हैं.

2012-01-11 10:03:26 By Gautam Kushwaha

प्रश्न : तैतीस करोड़ देवी-देवताओं के होने पर भी हमें आखिर गुरु की आवश्यकता क्यूँ हैं?

जवाब :
क्यूंकि तैंतीस करोड़ देवी-देवता हमें सब कुछ दे सकते हैं. मगर जन्म-मरण के चक्र से सिर्फ गुरु ही मुक्त कर सकता हैं.
यह तैतीस करोड़ देवी-देवताओं के द्वारा संभव नहीं हैं.
... इसलिए ही तो राम और कृष्ण, शंकराचार्य, गुरु गोरखनाथ, मेरे, कबीर, आदि... हर विशिष्ट व्यक्तित्व ने जीवन में गुरु को धारण किया और
तब उनके जीवन में वे अमर हो सके....
..... आज भी इतिहास में, वेदों में, पुराणों ने उन्हें अमर कर दिया....

इसीलिए तो कहा गया हैं:
तीन लोक नव खण्ड में गुरु ते बड़ा न कोय!
करता करे न कर सकें , गुरु करे सो होय!!See More

2012-01-11 10:01:35 By Gautam Kushwaha

यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः |
विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः |

जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं | दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नीगमन करनेवाले के समान पापी है

2012-01-11 09:54:21 By Gautam Kushwaha

शिष्यता के सात सूत्र

भगवत्पाद शंकराचार्य ने “शिष्य”, और सही मायने में कसौटी पर खरे उतरने वाले शिष्य के सात सूत्र बताए हैं,
जो निम्न हैं| आप स्वयं ही मनन कर निर्णय करें, कि आपके जीवन में ये कितने संग्रहित हैं :-

... अन्तेश्रियै वः – जो आत्मा से, प्राणों से, हृदय से अपने गुरुदेव से जुड़ा हो, जो गुरु से अलग होने की
कल्पना करते ही भाव विह्वल हो जाता हो|

कर्तव्यं श्रियै नः – जो अपनी मर्यादा जानता हो, गुरु के सामने अभद्रता, अशिष्टता का प्रदर्शन न कर
पूर्ण विनीत नम्र पूर्ण आदर्श रूप में उपस्थित होता हो|

सेव्यं सतै दिवौं च – जिसने गुरु सेवा को ही अपने जीवन का आदर्श मान लिया हो और प्राण प्रण से
गुरु की तन-मन-धन से सेवा करना ही जीवन का उद्देश्य रखता हो|

ज्ञानामृते वै श्रियं – जो ज्ञान रुपी अमृत का नित्य पान करता रहता हैं और अपने गुरु से निरंतर ज्ञान
प्राप्त करता ही रहता हैं|

हितं वै हृदं – जो साधनाओं को सिद्ध कर लोगों का हित करता हो और गुरु से निरंतर ज्ञान प्राप्त करता
ही रहता हैं|

गुरुर्वे गतिः – गुरु ही जिसकी गति, मति हो, गुरुदेव जो आज्ञा दे, बिना विचार किए उसका पालन करना
ही अपना कर्तव्य समझता हो|

इष्टौ गुरुर्वे गुरु: - जिस शिष्य का इष्ट ही गुरु हो, जो अपना सर्वस्व गुरु को ही समझता हो|
-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान अक्टो. 1998, पृष्ठ : 71See More

2012-01-11 09:53:06 By Gautam Kushwaha

गुरु तत्व विमर्श...

☼ अपने हृदय में “गुरु” स्थापन करना समस्त देवताओं को स्थापन करने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं!!
-ऋग्वेद
☼ जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ की अपेक्षा “गुरु-पूजन” ही हैं!
... -गुरौपनिषद
☼ चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – की प्राप्ति केवल गुरु-पूजन के द्वारा संभव हैं!
-याज्ञवल्क्य
☼ जीवन की पवित्रता, दिव्यता, तेजस्विता एवं परम शांति केवल गुरु-पूजन के द्वारा ही संभव हैं!
-ऋषि विश्वामित्र
☼ “गुरु-पूजा” से बढ़कर और कोई विधि या सार नहीं हैं!
-शंकराचार्य
☼ समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों का आधार मात्र गुरु-पूजन हैं!
-आरण्यक
☼ जो प्रातःकाल गुरु-पूजन नहीं करता, उसका सारा समय, साधना एवं तपस्या व्यर्थ हो जाती हैं!
-रामकृष्ण
☼ गुरु-पूजा के द्वारा ही “इष्ट” के दर्शन संभव हैं!
-गोरखनाथ
☼ संसार का सार “मनुष्य जीवन” हैं, और मनुष्य जीवन का सार गुरु-धारण, गुरु स्मरण एवं गुरु-पूजन हैं!
-सिद्धाश्रमSee More

2011-07-18 20:37:13 By Rajender Kumar Mehra

bahut khoob...........radhe radhe

Enter comments


 
 
Tags :
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com