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दान की महिमा

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ....

 

“जय राधे-कृष्ण, गोविंद, गोपाल राधे-राधे, गोपाल राधे-राधे, नंदलाल राधे-राधे..........”

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है - “दान की महिमा” , तो सबसे पहले तो हमें ये जानना है कि दान क्या है? जब हम किसी व्यक्ति को कुछ देते है, तो ये बहुत छोटे रूप में दान का अर्थ है, इसके पहले हम संग्रह को जानना है । क्येांकि व्यक्ति को दान की क्यों आवश्यकता है इसके लिए हमें संग्रह को जानना बहुत जरूरी है । जैसे हर व्यक्ति कुछ चीजें इकटठी करके रखता है. ये संग्रह है. अब नियम प्रकृति का ये है। कि व्यक्ति को जितने की जरूरत है, व्यक्ति को उतना ही संग्रह करके रखना चाहिए पर क्या हम ऐसा करते है? नहीं, यहा तक कहा गया है कि जितने में व्यक्ति का एक वक्त का पेट भर जाए उतना ही संग्रह करके रखना चाहिए, पर हम क्या करते है इतना संग्रह कर लेते है जिसकी कोई सीमा ही नहीं है । वो हमारा सालों तक चलता रहेगा,केवल अनाज ही नहीं धन दौलत रूपया पैसा, और जितने से व्यक्ति का पेट भर जाए उससे ज्यादा संग्रह करना पाप माना गया,

 

अब इस पाप का निवारण कैसे होता है तो वो दान के द्वारा कि थोडा-थोडा दान करते जाओ, एक चीज और है, जैसे ग्रहस्थ में कोई व्यक्ति है तो उसके लिए दोष नहीं है वो तो संग्रह करके रख सकता है । पर अगर वहीं व्यक्ति सन्यास में चला गया तो वह संग्रह नहीं कर सकता उसके लिए वो दूषण हो जाएगा. केवल गृहस्थ आश्रम में संग्रह पर रोक नहीं है, क्योंकि जितने भी सन्यासी लोग वो किसके उपर निर्भर है, वो गृहस्थ पर ही निर्भर है. क्योकि शास्त्र में ऐसा नियम बताया गया है कि सन्यासी जो है वो ग्रहस्थ के दरवाजे पर जाए, उससे मागें और अपना पेट भरे, अब अगर गृहस्थ ही नहीं रखेगा, तो साधु का पेट कैसे भरेगा, तो ग्रहस्थ को उतना दोष नहीं है जितना सन्यासी को, संन्यासी कुछ भी संग्रह करे नहीं रख सकता अपने पास, पर ग्रहस्थ की भी एक सीमा है, और हम क्या करते है हमारा भी काम चल जाए और हमारे बच्चों का भी काम, हम इस तरीके से जमा करते जा रहे है । तो जरूर से ज्यादा संग्रह करना पाप होता है । तो दान वो पाप को काटे दे, भाव तो ये है, पर व्यक्ति दान का मतलब उलटा ही निकाल लेता है । वो ये समझता है कि वो दान कर रहा है हमसे बड़ा से बडा कोई है ही नहीं, वो ये सोचने लगता है । हम छोटा सा भी दान करते है तो उसे हर जगह लिखवाते फिरते है । वो ये नहीं सोचते कि हम अगर दान कर रहे है । तो हम पाप कर रहे है वो ये सोचता है । कि हम पाच रूपए का दान भी कर रहे है तो सबको बताएगें कि हम इतने का दान कर रहे है । इस भाव से दान कर रहे है कि चार लोग देखें, बल्कि दान इसलिए नहीं किया जाता है । वो जो हमनें संग्रह उसके दोष के लिए हम दान करें दूसरा कारण ये है कि काम भी बुरे किए है कहते है कि धन की शुद्धि करने के लिए क्योकि बहुत कारणों से जो धन आता है । पता नहीं कैसी जगह से आ रहा है. तो अन्न की शुद्धि के लिए अन्न का दान किया जाता है, तो हर चीज की शुद्धि के लिए दोष को कम करने के लिए दान करना पडता है और जो अनीति से कमाया हुआ धन है उसमें तो दोष ही दोष है ।

 

ऐसा भी कहा है भागवत में उसमें तो साक्षात कलयुग ही वास करता है । वो धन तो व्यक्ति को अपने पास रखना ही नहीं चाहिए. वो तो सारा का सारा दान कर देना चाहिए. और सन्यासी के लिए तो कुछ भी संग्रह करना दोष ही है.

 

प्रसंग १.- जैसे चैतन्य महा प्रभु थे जब उन्होनें सन्यास लिया वो भ्रमण करते थे पूरे भारत का उन्होनें भ्रमण किया तो उनके साथ में एक गोंविद नाम के सेवक साथ में चलते थे, तो एक दिन वो कहीं ठहरे तो वो भिक्षा माग कर लाते थे और फिर महाप्रभु को देते थे भोजन कराते थे वो ही खाते थे. खाने के बाद मुह शुद्धि के लिए उन्होनें गोविंद से कुछ मागा. तो उन्होनें एक छोटा सा हरीतिका का टुकडा रख दिया तो महाप्रभु ने वो खा लिया. अगले दिन सुबह वो फिर से भिक्षा मागने गए और फिर से खाना बना कर महाप्रभु को दिया और खाना खाने के बाद जब फिर हाथ बढाया तो फिर वही हरीतिका टुकडा उन्होंनें दे दिया, जो कल आधा बचा लिया था तो महा प्रभु ने उसे आज खाया नहीं बल्कि ज्यों का त्यो हाथ में रहने दिया. वो देखते रहे फिर गोंविंद से पूछा – उन्होनें कि ये टुकडा कहा से लाए?

तो गोंविद ने कहा - कि मैने जो कल आपको मुख शुद्धि के लिए टुकडा दिया था, उसमें से बचा लिया और मैने अपनी धोती से बाध लिया. तो वो कहने लगे कि गोविंद अब तुम मेरी सेवा नहीं कर सकते हो तो गोविंद जी रोने लगें और कहने लगे - कि मुझसे क्या गलती हो गई? वो बोले - कि तुम अभी वापिस लौट जाओ, तुम अभी सन्यास के लायक नहीं हो, ग्रहस्थ में लौट जाओ तो गोंविद बोले-  मुझसे क्या गलती हो गई, तो वो बोले कि - जिस व्यक्ति के मन में थोडी-सी भी संग्रह की भावना है जो कल के लिए आज संग्रह करके रखता है. वो दोष है एक साधु के लिए, चाहे वो एक खाने का छोटा सा टुकडा ही क्यों न हो.

 

वो बोले-  तुम जाओ! ग्रहस्थ में लौटा दिया उसको जिस दिन ये तुम्हारा संग्रह चला जाएगा उस दिन तुम सन्यासी के लायक हो जाओगे. तो कहने का मतलब ये है कि सन्यासी के लिए ये दोष है वो सुबह के खाने में से शाम के लिए कुछ भी नहीं बचा सकता है । ग्रहस्थ में हम इतना संग्रह करके रख लेते है कि जिसकी कोई सीमा ही नही. तो हम दान करते है जिससे उसकी शुद्धि हो, अब दान की भी प्रकृति  अलग अलग होती है .अगर हमने सकंल्प कर लिया कि इस वस्तु का हमें दान करना है तो वो वस्तु कितनी भी प्यारी हो उसको अपने पास नहीं रखना चाहिए. अगर मन में आ गया है कि हमे ये दान करना है । जैसे हमारे मन में आया कि ये पाच हजार रूपए हमे दान करना है । तो मन में संकल्प आया और हमें दान कर देना चाहिए ।

 

प्रसंग २. - भागवत में एक कथा आती है एक राजा थे न्रग . भगवान कृष्ण के नाती पोते एक दिन खेल रहे थे, और खेलते-खेलते उनकी गेंद एक कुए में गिर गई, जब सारे बच्चों ने कुए में देखा तो उसमें पानी भी नहीं था, तो उसमें एक बहुत बडा गिरगिट पडा था, उतना बडा उन्हेांनें कभी देखा नहीं था तो वो दौडते हुए श्री कृष्ण के पास गए, और बोले कि पितामह एक बहुत बडा गिरगिट कुए में पडा है । तो जब उन्होनें उसे देखा तो आश्चर्य हुआ कि ये  यहाँ कैसे आया? 

गिरगिट तो इतना बडा होता ही नहीं है । तो जैसे ही उन्हेांनें उसको छुआ वो एक युवक बन गया और उसने वो देह छोंड दी और प्रणाम करके भगवान से कहा -  तो भगवान तो अन्तर्यामी है पर वो अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिए उससे पुछतें है - कि तुम कौन हो? तो वो कहता है कि भगवान अगर आपने कभी दानियों की लिस्ट उठाकर देखी हो उसमें मेरा नाम सबसे उपर है. क्योकि इस पृथ्वी पर जितनी धूल के कण है उससे भी ज्यादा मैने दान किया है जिसकी कोई सीमा नहीं है । तो भगवान ने कहा - कि जब तुमनें इतना दान किया है तो तुम्हें उत्तम लोक में होना चाहिए तुम इस गिरगिट की योनि में क्यों हो ?

 

तो वो अपनी कथा बताता है कि मै एक न्रग नाम का राजा था मै प्रतिदिन गाय दान करता था और  इसकी कोई सीमा नहीं थी, इतनी दान करता था. तो एक दिन एक ब्राहमण थे उनकी गाय मेरी गायों के साथ मिल गई. हमनें उसे किसी दुसरे ब्राहमण को दान कर दिया. और जब वो जाने लगे, तो जिन ब्राह्मण देव की गाय थी वो कहने लगे - कि ये गाय तो मेरी है। तो दूसरे ब्राह्मण ने कहा - कि ये गाय  तो मुझे राजा ने दान की है । ये तुम्हारी कैसे हो सकती है । दोनों में झगडा होने लगा. तो दोनेां राजा के पास गए कि वो ही फैसला करेंगें. वो

 

राजा के पास गए अब राजा कहने लगें-  कि देखो ब्राहमण देव! हमें पता नहीं था कि ये आप की गाय है वो तो हमारी गायों के साथ आकर मिल गई । तो ब्राहमण कहने लगें-  कि ये आपने गलत किया तो राजा कहने लगे-  कि आप ये गाय इनको लौटा दो, हम आपको दूसरी गाय दे देते है । तो वो कहने लगा कि नही हम गाय देगे, हम तो यही गाय लेगें, वो दूसरे ब्राहमण से कहने लगे - कि आपकी गाय तो दान हो गई, मै आपको उसके बदले एक हजार गाय दे देता हॅू । तो वो कहने लगा - देखो राजन! हम अयाचक ब्राहमण है किसी से याचना नहीं करते है । दोंनों तैयार नहीं हुए. तो राजा ने दोंनों ब्राहमणों को भगा दिया और दान की गाय अपने पास रख ली.

 

राजा जब मरने के बाद यमलोक गया तो यमराज ने कहा - कि राजा अपने बहुत अच्छे कर्म किए है पर आपने एक बुरा काम किया. तो आप पहले पाप कर्मो को भोगना चाहेंगे, कि अच्छे? तो राजा ने कहा - कि पाप कर्मो केा मै भी देखू, कौन से पाप किए है? तो यमराज ने कहा - कि तुमने दान की हुई गाय अपने पास रख ली वो किसी तीसरे को दान कर देनी थी  जब तुम किसी चीज को दान कर चुके थे उसका संकल्प कर चुके थे तो तुम्हें अपने पास रखना नहीं था तुम कुछ भी करते पर उसे अपने पास नहीं रखते ये तुम्हारा फर्ज था । पर आपने दान की वस्तु अपने पास रख ली इसलिए अब आप को गिरगिट की योनी ने जाना पड़ेगा और मै गिरगिट बन गया.

 

दान की वस्तु हमें कभी भी अपने पास नहीं रखनी चाहिये, यदि किसी ने हमें सौ रुपये दिए और कहा कि मंदिर में दान कर देनातो वो हमें किसी भी कीमत पर अपने पास नहीं रखना है और ब्राहमण कि वस्तु तो भूलकर भी नहीं रखनी चाहिये जो ऐसा करता है कतो उसकी पीढियां नष्ट हो जाती है  दान हमेंशा निष्काम भाव से करना चाहिए, क्येांकि हम देखते है कि जब पंडित जी से संकल्प कराते है और कहते है कि कामना रखो तो हम पाच रूपए का दान कर रहे है ।और कामनाये सौ प्रकार की रख देते है  कि इस दान से हमारे सारे काम हो जाए तो इस भाव से दान करना चाहिए कि भगवान प्रसन्न हो हम उनकी प्रसन्नता के लिए दान कर रहे है । जो दान निष्काम भाव से किया जाता है उसका फल अंनत मिलता है और जो भगवान के श्री चरणों में किया जाता है । और जो सकमा भाव से करता है उसे पुण्य मिलेगा और उसे अच्छे लोंको की प्रप्ति होगी जब पुण्य फल खत्म हो जाएगा तो वापिस पृथ्वी पर आ जाएगें. तो सकाम से किया दान कोई काम का नहीं रहेगा. तो व्यक्ति को हमेशा भाव निष्काम ही रखना चाहिए ।

 

और दान को बता मत करो व्यक्ति को देश, काल, समय देखकर सुपात्र को ही दान करना चाहिए जैसे हम एक गाय दान कर रहे है तो हमें ये पता होना चाहिए कि जिसे हमने गाय दी तो क्या वह  उस गाय की देखभाल करेगा या हमनें  गाय दान की और वो जाकर कसाई को दे दे । उस गाय क्या हुआ उस कसाई ने उसे काट दिया तो ये दान नहीं हुआ,  तो हमें ऐसे व्यक्ति या संस्था को दान करना है जो उसकी देखभाल करे और उसकी रक्षा भी करें । जैसे गौ शाला में जाकर हम दान करें या तो गायों को चारा दे दे तो ये सोच समझ कर दान करना है ऐसी ही अगर संम्पत्ति दान करे तो ऐसी संस्था को जो उसे सही जगह लगाए उसका दुरूपयोग करे लोगेां की भलाई के लिए उसका प्रयोग करे । तो इसे कहते है  सुपात्र को किया  हुआ दान जहा हमारी दी हुई चीज का सदुपयोग हो. 

 

प्रसंग ३- राजा बलि जब यज्ञ कर रहे थे उनके सौ यज्ञ पूरे हो जाते, तो उन्हें इन्द्रलोक मिल जाता तो उनके यज्ञ पूरे न हो पाए तो भगवान याचक बनकर उसके द्वार पर गए और दान मागा, तो राजा बलि के गुरू थे, जो उन्होनें कहा - कि इन्हें दान मत करो! ये साक्षात भगवान विष्णु है और इन्हें देवताओं ने भेजा ताकि तुम्हारा यज्ञ पूर्ण न हो पाए. वे तुम्हें छलने के लिए आए ये तुम्हारा सब कुछ ले जाएगें.

 

तो राजा बलि ने कहा - कि जिनके यहा दुनिया मागॅने जाती है और जो तीनों लोको के स्वामी है वो मेरे दरवाजे पर खडे है, मागॅनें वाले भगवान हो या कोई साधारण व्यक्ति, मेरा धर्म है दान देना तो मै दूगा अगर वो मेरे दरवाजे पर खडा है तो मै दान दूगा, तो भगवान ने उनसे तीन पग धरती मागी और फिर राजा बलि ने संकल्प लिया. और उसमें उन्हेांनें कुछ मागा नहीं, निष्काम भाव से दान का संकल्प किया और जब एक पग में उन्होंनें एक लोक नापा और दूसरे पग में दूसरा लोक नापा और तीसरा पग रखने कोई जगह नहीं बची, तो उन्होनें पूछा - बलि से बताओ तीसरा पग में कहा, रखू ? तो राजा बलि ने कहा - कि प्रभु अब तो आपने सबकुछ ले लिया तो आप ये तीसरा पग आप मेरे सिर पर रखो तो भगवान बोले - कि राजा बलि मै तुम्हें से प्रसन्न हू । क्येांकि तुम्हें मालूम था कि मै तुम्हारा सबकुछ हर लूगा फिर भी तुमने दान किया अपना धर्म निभाया तुम्हारे गुरू ने भी तुमसे कहा था.

 

और भगवान ने राजा को पाताल लोक दे दिया, तो दान का मतलब केवल भगवान की प्रसन्नता होनी चाहिए और दान केवल व्यक्ति ही कर सकता है । दानव कौन है? जिसने कभी किसी को कुछ न दिया हो, जिसने कभी दान ही नहीं किया जिसने देना त्याग दिया हो, यहा कोई दानव देवता अलग नहीं है । राक्षस कौन है ? जो अपने सामानों की रक्षा करने में लगा है जिसने अपना सामान कभी किसी को दिया ही नहीं है । जो सिर्फ अपनी ही रक्षा करने में लगा है । वहीं राक्षस है । यहा दैव और दानव अलग नहीं है । दान अगर व्यक्ति करता है । तो वो उसके ही काम में आता है । और अगर वो निष्काम भाव से करे तो और भी अच्छा है । इसलिए हर व्यक्ति को दान करना चाहिए वस्त्र का दान, अन्न का दान जो भी आपसे बनें वो करें बस सुपात्र को देना है । सोच समझ कर देना है यहीं दान की महिमा है । 

 

“राधे राधे “

 

 

Comments
2011-12-22 18:20:36 By SANTOSH KUMAR RAJAK

AAJ JO KUCH BHI KARNA HAI BO SAB KARM HE KARNA THESE DAYS KARM EVERYTHING

2011-12-22 18:14:31 By SANTOSH

V

2011-12-03 13:59:13 By ravinder

very very good ati sunder

2011-08-12 18:25:45 By BABU RAM SHARMA

EXELENT COLLECTION

2011-08-05 14:32:22 By Manish kumar

Ati sunder.dan ki mahima ko bahut aachhi tarah se samjhaya gaya hai.Radhe Radhe.

2011-07-18 20:35:33 By Rajender Kumar Mehra

bahut sunder......radhe radhe

2011-07-12 23:58:20 By Krishna Chaitanya

Jai Sri KRISHNA

2011-07-10 17:15:20 By Devendra Singh Chauhan

shyama pyaari kunj bihari jai jai shree haridas dulari.......

2011-06-01 16:41:05 By Supriya Sachin Shinde

hare krishna radhe radhe..........

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