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पाप और पुण्य

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राधे राधे, आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ भगवन नाम का कीर्तन करें..

 

"राधे-राधे गोविंद-हरि, मदन-गोपाल ,मदन गोपाल प्यारो मदन गोपाल” ....

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “पाप और पुण्य”  एक छोटा सा बच्चा भी है तो उसको भी पता है कि ये बुरा है और ये बुरा है , फिर हम तो बडे है हम सबको मालूम है कि पाप और पुण्य क्या है । जो व्यक्ति के अच्छे कर्म है उनका फल पुण्य है और जो व्यक्ति के बुरे कर्म है उनका फल पाप है । पर पाप और पुण्य को साधारण दृष्टि से देखें तो अलग चीज है और आध्यात्मिक दृष्टि से उसका मतलब अलग है । हमनें अगर कोई भी चीज की है । तो वो हमारे ही आगें आएगी, अब कब ये नहीं कह सकते है । इस जन्म में आये अगले जन्म में आये ,व्यक्ति कभी बीमार पड सकते है । या किसी भी तरीके से व्यक्ति जो कुछ भी गलत करता है । उसका फल उसी को मिलता है । कोई दूसरा शामिल नहीं होता है .

 

और भगवान इसमें बहुत ही दूर है ,उसमें भगवान तो साक्षात आनंद स्वरूप है । जैसे मान लो कोई व्यक्ति है वह अगर मिठाई की दूकान पर शराब मागे तो क्या उसे मिलेगा ?नहीं क्योकि गलत जगह से माँग रहा है . तो परमात्मा के पास आनंद ही मिलेगा, जब व्यक्ति उनके पास जाएगा तो उसे आनंद ही मिलेगा और उनके पास एक ऐसी चीज है जिसको पाने के बाद कुछ भी पाने की जरूरत नहीं. क्योंकि वो आनंद ही सब कुछ है । जिसके जीवन मे वो आनंद प्रकट हो गया समझो बाँके बिहारी उसके जीवन में आ गए. लोग कुछ भी हुआ अच्छा-बुरा उसको भगवान से जोड देते है ।उनके पास तो कुछ बुरा है ही नहीं, तो वो हमे कहाँ से देंगे.

 

ये पाप पुण्य का लेख जोखा केाई और करता है । ये क्षेत्र किसी और देवता है. पर हम दोष भगवान को देते है । वो जो भी हमें दे रहा है वो अपने मन से नहीं दे रहा है जो हमनें किया है वो ही दे रहा है ।

 

प्रसंग १. - एक व्यक्ति ने अपने गुरूदेव से कहा - कि जो व्यक्ति कर्म करता है उसको तो वो मिलता नहीं है ।

 

तो गुरूजी ने कहा - कि मै समझा नही?

तो वो शिष्य बोला - कि एक व्यक्ति रास्ते से जा रहा था, तो उसको एक बगीचा दिखा, उसमें आम के पेड थे, उसका मन किया कि आम खाना है. तो उसने आम तोडा और खाने लगा. तभी माली आ गया जब उसने देखा कि ये व्यक्ति आम खा रहा है तो उस माली नें डंडा उठाया और उसकी पीठ पर दे मारा, कि तुमने आम कैसे खाया. उस व्यक्ति को बहुत दर्द हुआ तो अब

 

वह शिष्य बोला कि – गुरूदेव! कर्म तो आँख ने किया, चलकर पैर गए, तोडा हाथ ने, और मुहॅ ने खाया, इतना सब हुआ पर डंडे पीठ को पडे.किया आँख ने और सजा पीठ को क्यों मिली ?

 

तो गुरूजी ने कहा – बेटा अभी थोड़े आगें जाओं, डंडा पडने से आँखों से ही आसूँ आए, गुरुदेव कहते है. तो ये प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करते है उसको वैसा ही फल मिलता है । तो उस व्यक्ति को वो बात समझ में आ गई.

 

अब हमें ये समझना है कि इसमें पाप और पुण्य कहाँ है । तो पाप आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो संतो ने कहा कि भगवान की प्राप्ति के अलावा व्यक्ति जो भी करे, वो सभी पाप है । क्योंकि सभी चीजें व्यर्थ है सभी का नाश होना है । सब परिवर्तनशील है. तो सतं तो यहीं कहेगे कि भगवन प्राप्ति के अलावा सब व्यर्थ है । क्यों? वो किसके लिए करेगा. अपने लिए या संसार के लिए तो अपना भी नाश  हेाना है और संसार का भी, एक दिन, तो ऐसी चीज के लिए करने से क्या फायदा जिसका नाश होना है.  

 

तो तीनों के कर्म लिखे जा रहे है जो हम ‘मन’ से कर रहे है, ‘वाणी’ से कर रहे है, और जो ‘क्रियात्मक रूप’ से कर रहे है । अब वो तीनों ही कोई लिख रहा है ।हमारे ही भीतर.

 

प्रसंग २.-  कोई व्यक्ति कहीं काम करता है । उसको दस हजार रूपए मिलते है । वो भी कट कर मिलते है . उससे पूछा किसी ने, कि तुम्हें कितनी सेलरी मिलती है । तो उसने बताया वैसे तो बारह हजार है पर हाथ में दस आते है और उसमे से भी घर खर्च में पूरे पैसे चले जाते है । तो उस व्यक्ति की सेविंग क्या हुई । तो एक छोटा सा बच्चा भी बता देगे कि उसकी सेंविग जीरो हुई, उसने जितना भी कमाया वो पूरा खर्च कर दिया. तो जितना कमाया उससे ज्यादा उसने खर्च कर दिया.

 

बस ऐसे ही हम है , जितना हमनें अच्छे कामों द्वारा पुण्य कमाया उसे बुरा कर्म करके खर्च कर दिया उससे भी ज्यादा पुण्य हमारें संचित हुए तो जितना हमनें कमाया वो एक पाप में सारा कट गया, कमा तो हर कोई रहा है दुनिया में, हर व्यक्ति कोई न कोई अच्छा काम तो कर रहा है । तो हर व्यक्ति के पुण्य तो संचित है । लेकिन कट रहे है धीरे-धीरे, क्यों? क्योंकि वो साथ में बुरे काम भी कर रहे है । अब ये कौन से बुरे काम है । हमने किसी को मारा, बुरा कहा, उसे गाली दी कट गए, मन में एक बुरा विचार आया, कट गई, तो हमने क्या किया कर्म तो हमारा हर पल हो रहा है, पर उस हिसाब से हम अच्छा काम तो कर ही नहीं रहे है । तो उस व्यक्ति की ही तरह हम पैसे तो कमा रहे है । पर १०००० कमाकर १२००० खर्च कर रहे है , पर हमें  कुछ भी बच नहीं रहा है । हमनें अच्छे काम तो किए पर उसे कटवाते रहे है कभी बुरे काम करके किसी के साथ कुछ गलत करे प्रेम से कहिए श्री राधे

 

जैसे चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई ये दोनों ही महापुरूष इस दुनिया से सशरीर गए है, चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ स्वामी में और मीराबाई भगवान कृष्ण में समाहित हो गई थी. हर व्यक्ति जब मरता है तो शरीर यहीं छोड जाता है । और आत्मा चली जाती है पर मीरा बाई तो बाके बिहारी में साक्षात जाकर समाहित हो गई तो ये क्यों समा गए.क्येांकि इन्हेांनें अपने जीवन मे एक भी बुरा कर्म नहीं किया जो पाप और पुण्य है वो शरीर से ही बाहर निकलते है । तो इन देानेां व्यक्तियों का शरीर इतना निर्मल और पावन रहा कि वो ही भगवान में समा गया, हम अपने कर्म इतने कटवाते है कि शरीर तो छूट ही जाता है और आत्मा भी खीचं खीचकर यमराज निकलते है ।

 

कर्म इतने बुरे किए है व्यक्ति के जीवन में जब अच्छा हो तो कोई भी बात नहीं पर जब बुरा हुआ तो भगवान ने किया भगवान तुमे मेरे साथ ऐसा क्यों किया तो जीवन में अगर हम दुखी है तो ये मान के चलना कि हमारे पाप ज्यादा है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३. - जैसे एक बच्चा है । वो खेल के आता है । तो माँ उसके कपडे बदलती है । उसको नहलाती है क्येंकि उसको बुरा लग रहा है कि उसका बच्चा गंदा है । वो उसका अपना है. पर बच्चे को बुरा लगता है रोता है और माँ अपने बच्चे को साफ कर देती है । तो भगवान हमोर अपने है मेले तो हम खुद ही हुए थे, हमें किसी ने मैला नहीं किया है अपने कर्मों द्वारा हुए, तो उस माँ से देखा नहीं जाता कि बच्चा मैला है । भगवान भी हमें पकडते है । और हमारा मैल साफ करते है । क्योंकि हम उसके अपने है । तो वो खुद ही साफ करता है ।

 

कहनें का मतलब ये है कि बुरी चीज सबको पता है । हम दुनिया में फसे है इतने जल्दी नहीं छोड सकते हैं  पर उसके लिए एक चीज है । “अभ्यास” ये दुनिया की एक ऐसी चीज है जो हर अंसभव को संभव कर देती है । हम करेंगे तो क्यों नहीं होगा. व्यक्ति कर्म तो करता है पर उसको समझ नहीं आता कि हमने क्या किया. उसको लगता है कि सब अच्छा ही किया है । पर वो सुबह से शाम तब विचार करेगा तो उसको पता चलेगा कि कितना अच्छा और बुरा है भले ही वो उनको कार्यों को करे या ना । तो ये अभ्यास हमें कौन कराएगा ? सतसंग, भगवान के चरण, संतो का साथ, जो खुद ही पावन है जो उनके चरणों में जाएगा वो उसको पावन बना देंगे. सतसंग में दुनिया की नहीं, भगवान की, अच्छाई की, ही चर्चा करते है । उतनी देर हम दुनिया से दूर रहते है । अगर हम मंदिर मं जाते है तो हमें शांति मिलती हैं ।

क्यों? हमें वहाँ पर विचार भी वैसे आएगें हम करेंगे भी वैसा चिंतन भी वैसा होगा और हमें इसमें  अपनी बुद्धि नहीं लगानी है 

 

प्रसंग ४. - एक मकान है वो हमारा खुद का नहीं है किसी का किराए है तो हमारे मन में शांति नहीं रहेगी, सोचेगें कि हमारा होता व्यक्ति कितना भी कुछ करे उसके मन में ये बात तो आएगी कि ये उसका नहीं है किसी और का है । बस ऐसे ही भगवान है । तो हमारा मन एक घर है, इस पर पाप और बुराई का कब्जा है । मैलो और गंदे विचारों का, तो भगवान क्या इस मन में आएगे? कभी नही, तो भगवान खुद हर एक व्यक्ति के मन को ढूढते रहते है । उनको बैकुण्ठ में बैठना अच्छा नहीं लगता उनने ये संसार बनाया है तो उनको यहाँ अपने ही लोगों के बीच में रहना है । तो वो उनको कहाँ मिल जाता है । तो वो संतो का हद्रय है. क्योंकि संतो के पास भगवान के अलावा कोई चीज है ही नहीं, भगवत चर्चा ही उनके पास है.

 

व्यक्ति अगर संत के चरणों की धूल अपने माथे से लगा ले तो वो उतने ही में तर जाएगा तो भगवान निर्मल है जिसके मन में कपट होगा वो वहाँ नहीं रह सकते है । “निर्मल मन जन सोही मोहे भावा मोहे कपट छल छिद्र न भावा”

 

तो हमें आध्यात्म में तो जाना है पर साथ में क्या चीज कम कर सकते है । हम सब एक ही उसके है  हमें तो संतो के पास जाना है क्योंकि उनका मन साफ है उसमें कपट नहीं है । उन्ही के मन में भगवान रहते है.वो ही हमें बता सकते है कि हमें कैसे चलना है आगें.

 

व्यक्ति अगर अच्छा काम करेगा तो लिखवाएगा मंदिर में एक पखा भी लगवाएगा तो उस पर भी अपना नाम लिखवाएगा, तो हम पुण्य कर्म करते है तो सबको बताते है, जब बुरे कर्म करते है तो किसी को नहीं बताते नहीं हम छिपाते है.

 

जब सतसंग हेाता है कथा होती है जो भी करते है वो कहते है कि सब मेरे साथ कीर्तन करो और हाथ उठाकर ताली बजाओ और जरा झूम के कीर्तन करो, वो कहते कि हम अपने सिर पर पाप की गठरी हम अपने सिर पर रखे है तो जैसे हम सामान्य रूप से कोई गठरी रखते है सिर पर और झूमते हूए चलते है तो सामान गिर जाता है ऐसे ही कीर्तन में हमारे मन की गंदगी और बुरे विचार कम हो जाएगें । पापों की गठरी कम होगी और हाथ उपर करने से जैसे हम कुछ दबा लेते है और हाथ ऊपर उठाने से हाथ के नीचे छिपी चीज नीचे गिर जाती है उसी प्रकार ही पाप भी नीचे गिरेंगे कब जब हम कीर्तन मे जाकर भगवान का नाम लेगें, बुराई से बचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है । वो आध्यात्म का ही रास्ता है सतसंग और आध्यात्म किसी को भागना नहीं सिखाते कि वो अपने काम छोड दे और संसार को छोड दे अलग हो जाओं हमें अपने कर्तव्यों को पूरा करना वैराग्य हमें लाना है पर हमें दोनों चीजें साथ मे लेकर चलना है ।

 

जो व्यक्ति अपने पाप का बखान दूसरे के सामने करता है उसके आधे पाप उसी वक्त खत्म हो जाते है हम अपने गुणगानों का ही बखान करते है । पर भगवान सब देखते है । तो संतो ने कहा कि व्यक्ति अपने पापों का बखान दूसरे के सामने करे तो उसके ‘आधे पाप’ कम हो जाते है तो उसने पश्चाताप किया उसके मन में आया कि हमनें ये गलत किया हमें ये नहीं करना तो ‘एक चौथाई पाप’ कम हो जाते है अब बचा एक चौथाई पाप और, कोई दूसरा हमारे पाप का बखान कर रहा है तो जो ये कह रहा है बाकि के 'चौथाई पाप' उसको मिल जाएगा,और वह पाप करने वाला व्यक्ति एकदम निर्मल हो जाता है .इसलिए यदि हम किसी के पाप कर्मो का बखान कर रहे है तो ये याद रखो कि उसके पाप हममें आ जाते है.

 

तो व्यक्ति को खुद सारी चीजें मालूम है भागवत में सब लिखा है बस हमें करना है । जब व्यक्ति मर जाता है तो मरघट में मटकी फोडते है क्यों? क्योंकि व्यक्ति ने जीते जी कभी पाप की मटकी फोडी नहीं है । तो कोई दूसरा फोडता है और उसकी कोई तो एक दूसरे से फुडवाते रहते है तो अपने जीतेजी स्वयं फोडकर जाना है.  

 

व्यक्ति तौबा तो कर लेगा पाप से पर कुछ दिनों बाद फिर शुरू कर देता है क्योकि मन में वैसी आदत बन जाती है कहते है कि व्रत करने से पाप नष्ट हो जाते है ,तो भागवत में लिखा है शुकदेव जी से राजा परीक्षित ने पूछा - कि गुरूदेव ऐसे तो पाप करते जाओ और व्रत करते जाओ, तो पाप कम होते जाएगें ये तो वैसे ही हुआ जैसे एक हाथी को स्नान किया और फिर अपने धूल डालेगा, तो ऐसे स्नान का क्या फायदा ?

 

लोग कहते है कि हम मंदिर में जाकर दान कर देगें तो हमारे पाप कम हो जाएगें, पर खत्म कैसे होगा वो वासना कामना हमारे मन में बनी रहेगी. वो इच्छा वासना जाती है भक्तिी से,  जब व्यक्ति के अंदर भक्तिी आ जाती है । तो वो अपने आप पाप कर्म की वासना दूर हो जाती है । पुण्य वो है जो व्यक्ति अच्छा कर्म करें, पाप और पुण्य का फल क्या है? व्यक्ति पाप करेगा तो नरक में जाएगा और पुण्य करेगा तो स्वर्ग जैसे लोको की प्राप्ति होगी पर जब वो पुण्य खत्म हो जाएगें तो वो वापिस पृथ्वी पर आ जाएगा, तो पाप का फल है नरक और पुण्य का फल है स्वर्ग, पर ये दोनों ही अच्छे नहीं है क्यांकि जब तक पुण्य है तब तक वो रहेगा स्वर्ग में,  उसके बाद वहाँ के देवता उसको ढकेल देंगें कि अब तुम जाओ पृथ्वी पर तो इन दोनों से उपर है “आध्यात्म” , एक शब्द है “भागवत धर्म” “भागवत कर्म” करना चाहिए ये क्या है भगवान को सुनना, उनका गुण गान करना, कथा सुनना, जब व्यक्ति आगें इसमें बढेगा तो उसको शांति मिलेगी उसकी सारी चीजें छूट जाएगीं तो हमें उपर उठकर भगवत भक्तिी मे लगना है । बस यहीं जीवन का सार है ।

 

“राधे-राधे”


 

Comments
2011-11-17 17:32:47 By Meenakshi Goyal

radhe radhe

2011-11-04 15:05:14 By anita abindu

bol radhe rani ki jai jai

2011-07-18 20:33:04 By Rajender Kumar Mehra

bahut khoob......radhe radhe

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