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यज्ञ

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवान नाम का कीर्तन करेंगे ।

राधे गोपाला, गिरधर गोपाला,गोपी गोपाला प्यारो नन्द लाला .....

श्री राधा रानी बाँके बिहारी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है  “यज्ञ”, यज्ञ क्या है , जब हम हवन कुंड के माध्यम से जो भी हम देवताओं के लिए हवी पहुचाते है वो यज्ञ है उसमें हम जो भी तत्व डालते है वो अग्नि और वायु से सारे संसार का कल्याण करता है । और सबके कल्याण के लिए ही यज्ञ किया जाता है जो भी हम अग्नि में डालते है वो तुरंत अपने में समाहित कर लेती है । और उसके धुएँ के द्वारा वो सारे वायुमंडल में फैल जाता है और जो अंदर रहता है । वो देवताओं को अर्पण करते है वो इतना पवित्र हो जाता है कि सबको शुद्व कर देता है । वायु का शोधन करता है । जहाँ पर यज्ञ होता है वहाँ पर आरोग्य सांस व्यक्ति को मिलती है. और वेद मंत्रो से जो ध्वनि होती है और वो आकाश में व्याप्त हो जाती है. और लोगों के अंत:करण को सात्विक और शुद्व बनाती है । और जो उसका धुआं रहता है वो आकाश में जाकर मिलता है और बादल बनकर फिर वहीं बरसता है । पृथ्वी में जाकर मिल जाता है और उससे फिर पौधे वनस्पति उगॅती है जो हम खाते है ।

तो कहने का अभिप्राय है कि यज्ञ और हवन जनकल्याण के लिए होता है, करने वाले को तो पुण्य मिलता ही है । साथ में ऐसा भी कहा कि जितना पुण्य यज्ञ में हवन करने वाले को मिलता है उससे ज्यादा पुण्य यज्ञ में सहयोग करने वाले को मिलता है । अगर व्यक्ति के पास धन नहीं है, तो कोई बात नहीं वो यज्ञ में शारीरिक सहयोग ही कर दे तो वो यज्ञ करने के बराबर है । जैसे मान लो कोई भी काम दूसरों की भलाई में किया गया कोई भी कार्य यज्ञ ही कहलाता है हम वो कैसे भी कर सकते हैं, शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से, आर्थिक रूप से, तीनों तरह से कर सकते है अगर हमारे पास धन है तो धन को लगाकार हम प्याउ खुदवा सकते है. 

ऐसा कहते है कि कोई वुक्ष लगवाने से,एक तालाब खुदवाता है अगर कोई संत उसकी छाया में एक पल के लिए भी बैठ जाए तो करोडों यज्ञ का फल उसमें मिलता है जिसने वो लगाया है. और यहीं तो यज्ञ है मान लो कहीं कुआँ खुद रहा है और हम पैसे नहीं लगा सकते है पर मदद तो कर सकते है उस कुएँ का पुण्य हर उस व्यक्ति को मिलेगा जिसने उसमें सहयोग किया यहीं तो रूज्ञ है. और तो दूसरों के कल्याण की भावना से किया जाए वो ही यज्ञ है । और धन नहीं है तो हम यज्ञ में अपना श्रमदान कर सकते है भगवान ने कहा है कि जो भी यज्ञ के बाद बचता है जो भविष्य अन्न कहलाता है । बचे हुए अन्न वस्तु को जो व्यक्ति गुहण करता है सच्चे अर्थों में वहीं धर्म का पालन करता है । सबने खा लिया सबको हो गया और बचा हुआ जो मिल गया. वहीं सबसे बडा है. यज्ञ में देवताओं को ब्राहमणों का भाग निकल गया, सबका भाग निकल गया और उसके बाद जो बचा वो ही हाविष्य अन्न है उसी से व्यक्ति का अंत: करण पवित्र होता है । अभी तो व्यक्ति स्वंय के लिए ही कमाता है और स्वंय ही कमा रहा है । तो वो पाप ही कमा रहा है, उसके घर में पाप ही बन रहा है , पाप ही खा रहा है । क्योंकि उसमें से किसी का हिस्सा नहीं निकला. ना गाय का, ना संत का, उसमें से हमने दूसरों की भलाई के लिए कुछ भी नहीं किया तो जो स्वयं के लिए किया जाता है वो पाप है ओर जो दूसरों के लिए किया जाता है वो यज्ञ है । प्रेम से कहिए श्री राधे

तो कहने का तात्पर्य ये है कि व्यक्ति यज्ञ करता है पर उसमें मन में उदारता नहीं होती है यज्ञ की भावना नहीं होती जिस दिन उसके मन में उदारता आ जाएगी उसी दिन हमारे मन में शांति आ जाएगी यज्ञ तो बहुत से लोग करवाते है पर उसमें व्यक्ति का स्वार्थ छिपा रहता है और वो स्वार्थ ही नहीं होना चाहिए. यज्ञ का मतलब है “त्याग और बलिदान” और शुभ कर्म, व्यक्ति की उन्नति और प्रगति का आधार ही त्याग है. त्याग पर ही निर्भर है. जैसे एक माँ है उसके अंदर उससे ही शिशु का जन्म होता हे उससे ही उसका निर्माण होता हैं और जब वो पैदा होता है तो प्रसव पीडा होती है और उसमें पैदा होनें के बाद उसे लालन-पालन में कितना कष्ट उठाती है । और अगर माँ अपने अंदर उसका निमाण ना करें वो प्रसव का वेदन ना सहे, उसका लालन-पालन ना करें, तो शायद व्यक्ति के जीवन की सारी संभावनाएँ ही खत्म हो जाएगी. जब वो त्याग करेगी तक जाकर नया जीवन आ पाएगा.

तो व्यक्ति का जीवन त्याग और बलिदान से भरा होना चाहिए हम अगर प्रकृति को देखें तो ये त्यागमय ही है परोपकारी है । जैसे मान लो समुद्र है बादलों को उदारता पूर्वक जल देता है, वाष्प के द्वारा और बादल एक जगह से दूसरी जगह जाकर वर्षा करते है. तो समुद्र ने अपना जल दे दिया, बादल उसको एक जगह से दूसरी जगह ले जाते है अगर वो त्याग और परोपकार ना करें तो हम तो शायद भूखे ही मर जाएगें, हमें अन्न कहाँ से मिलेगा.

अगर हम वृक्ष को देखें तो वो अपने लिए कुछ नहीं करते हमारे शरीर का प्रत्येक अवयव अपने लिए कुछ नहीं करता पूरे शरीर के लाभ के लिए गति करता रहता है और संसार में जितनी स्थिर व्यवस्थाएँ है वो परोपकार पर ही टिकी है और अगर इन परोपकार को हटा दिया जाए तो जिदंगी में पृकृति में जितनी सुदरता है वो कुरूपता में बदल जाएगी है और प्रगति, विनाश में बदल जाएगी इसलिए प्रकृति परोपकार मयी है. और हमें भी ऐसा बनना है और अगर हम ऐसे नहीं है तो हम पाप में ही जी रहे है. और पाप ही ढो रहे है, हमनें दूसरों के कल्याण के लिए क्या किया? तो यज्ञ और हमारे जीवन में बहुत समानता है दोनों ही परोपकार के लिए है और आध्यात्म में ये भी एक यज्ञ है जिसमें आप अपने दुगुर्णों की आहूति देते है । सारे दुगुर्ण इसमें हमारे जल जाते है औेर जैसे सोना आग में जलकर पवित्र हो जाता है ऐसे ही हम भी उस आध्यात्म में अपनें दुगुर्णों को जलाकर निखर जाते है । सोने की तरह. तो हमें आध्यात्म में और जीवन में संतुलन बनाना बहुत जरूरी है ।

यज्ञ की बहुत विशेषता है यज्ञ में जो अग्नि होती है वो क्या करती है हम जो भी उसमें डालते है वो उसको समा लेती है । अपने में जलाकर वायु में बिखेर देती है । हमने कुछ भी यज्ञ में हवन में डाला तो वो अपने पास कुछ भी नहीं रखती है. तो वो हमें सिखा रही है कि हमें जो भी जीवन में जो भी कला मिली उसे दूसरों के कल्याण मे लगा देना है. अपने पास नहीं रखना और अगर हमनें अपने पास ही रखी तो प्रतिभा कोई काम की नहीं. अग्नि बताती है कि जो भी चीज उसमें डाली जाती है यज्ञ में गीली लकडियाँ भी डालते है, घी डालते है । पर अग्नि सब को बिना किसी भेद के सबको अपने में समाती जाती है. इसी तरह हमें अपने जीवन में छोटे-बडे का भेद भुलाकर सबकेा अपनें में मिला लेना है । किसी को भी दोष नहीं देखना सबके मिला लेना है.

हम देखते है कि अग्नि की लौ कभी नीचे की ओर नहीं दबती है वो हमेषा उपर की ओर ही जलती है । वो तो  बढती जाती है ऐसे ही हमें भी उस अग्नि की तरह ही करना है किसी भी प्रलोभन मे आकर अधोगति में नीचें की ओर नहीं जाना है । हमें बुरे कर्मों से  अधोंगति में नहीं जाना है. विषय परिस्थ्तियों में हमारा संकल्प मनोबल है जितनी भी हमारे जीवन में विषम स्थ्तियाँ आती है उनमें हमारा मनोबल उपर की ओर बढना है  अग्नि की तरह ना कि नीचे की ओर,

यज्ञ की अग्नि हमें सिखा रहीं है । और अग्नि जब तक जलती है उसमें उष्णता और प्रकाश रहता है । जब तक वो जलती रहती है । वो इसे नहीं छोडती है. तो हमें भी अपनी गंतिषीलता और धर्मपरायण की रोषनी को घटने नहीं देना है । धर्मरूपी प्रकाश जब तक हम जीवित रहें उस अग्नि की तरह वो जलता रहे प्रकाश बना रहे धर्म केा हम कभी ना छोडे. और हम अपनी गतिषीलता की गर्मी को ना छोडे, धम्र क्या है ये दूसरों के कल्याण का काम करना ही तो धर्म है, यज्ञ है, तो हमें अपने धर्म को नहीं छोडना है

यज्ञ की अग्नि जब शांत हो जाती है तो हम उसे सिर पर लगाते है और उसे खा लेते है. तो वो बता रही है कि मावन जीवन का अंत एक भस्म की तरह है व्यक्ति मरने के बाद एक भस्म ही तो रह जाता है । अग्नि बता रही है कि हमें अपने अंत को ध्यान में रखकर अपने जीवन के हर एक पल को सदुपयोगी बनाना है . वो बता रहीं है कि कि सबका अंत ये भस्म है जब तक जीवित है अपनी लौ को दबने मत दो अपने अंदर समानता का भाव रखो, सबका कल्याण करो सबकेा अपने समाहित करो । ये सारी चीजें वो हमें बता रहीं है. हवन की अग्नि जैसे यज्ञ में सब जड चेतन में वायु शुद्व होकर पहुच जाती है । उसी तरह हमें भी अपनी थोडी सी वस्तु केा बिना किसी अपने-पराए, शुत्र-मित्र के बिना किसी भेद के सबको खिला देना है कि खाने वाले को पता ही ना चले कि हमें किसी ने पौष्टिक चीज खिला दी है । हम कल्याण करें धर्म करें, दान करें, लेकिन दाये हाथ सें करें, तो बायेां हाथ को पता ना चले. इतनी तत्परता से हमें करें डिडोंरा नहीं पीटना है । तो यज्ञ की अग्नि और हमारे जीवन में समानता है संत का जीवन सदा परोपकार के लिए होता है दूसरें के लिए इसलिए संत अपने आप में यज्ञ है और हमें अपने जीवन को इसी तरह यज्ञ बनाना है .

 

“राधे-राधे”

 

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