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संतोष

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राधे-राधे, आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गए.

भानू की किशोरी, श्यामा प्यारी राधे,राधे-राधे गोविंद राधे ....

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “संतोष” संतोष क्या है? जीवन में हर व्यक्ति को अपने कर्मों के हिसाब से कम और ज्यादा मिलता है । किसी को इतना कम मिलता है कि दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता और किसी को इतना कि उसके रखने की जगह नहीं होती है । ये अपने कर्मों के हिसाब से है पर संतोष का मतलब है कि हमें जो मिला है जितना मिला है, उसी में संतोष रखें ये एक वृत्तिी का नाम है ।ये एक अंदर का भाव है जो हमारें अदंर ही इच्छा है और संतोष है.

जो व्यक्ति जितना भी धनी होगा और यदि उसकी इच्छाएँ भी उतनी ही बडी है जीवन में जितना मिला उसके उतने में संतोष नहीं है । और बहुत से लोग कहते है कि संतोष वृत्तिी आलस का नाम है। कि जो मिल गया उससे आगे नहीं ज्यादा. संतोष एक सतो गुण की वृत्तिी का नाम है । कर्म का निषेध नहीं है कर्म तो व्यक्ति हमेषा करता है और करता रहेगा. हमें बस जो मिला है जितना मिला है उसमें सुख रहने का नाम संतोष है ।

प्रसंग १- सुकरात के जीवन का एक प्रसंग है वो एक दार्षनिक है । बहुत ही सादगी भरा उनका जीवन था पर जब वो बाजार के लिए निकलते थे तो हर दुकान पर खडे होकर वस्तुओं को देखते थे तो एक व्यक्ति ने पूछा - कि आप हर दुकान पर जाकर वस्तुओं को देखते हो आपके मन में क्या इनको खरीदने की इच्छा है?


तो सुकरात जी ने कहा - कि मै देखता हॅू कि दुनिया में ऐसी कितनी वस्तुएँ है । इनके बिना भी मै कितना खुष हूँ, जी रहा हूँ कहने का मतलब वस्तुओं के ना होने पर भी खुषी है उसी का नाम संतोष है संतोष को सभी सुखों का दाता कहा गया है.  मनुष्य की हर समय कुछ ना कुछ पाने की चाहत रहती है


प्रसंग २- एक राजा थे वो बहुत दानी थे सबको कुछ ना कुछ देते थे पर उनके मन में कहीं ना कहीं ये भाव अंहकार था कि ये सब वस्तुएँ मै देता हूँ । अब एक दिन एक सन्यासी राजा के पास आकर बोले कि मै आपसे कुछ माँगना चाहता हूँ. मेरा ये पात्र है . आप इसमें कुछ देदो.


तो राजा ने कहा - कि ये तो बुहत छोटा पात्र है,इसे मै अभी भर दूँगा.  तो उसने सैनिकों से कहा - कि इससे सोने के सिक्कें से भर दो जैसे ही सेवक ने उसमें पैसे डाले तो वो सारे गायब हो गए. तो उसने फिर डाला तो फिर वो गायब हो गए.


ऐसा करते-करते सारा खजाना राजा का खत्म हो गया तो राजा समझ गया.

और सन्यासी से बोला कि मेरा अंहकार खत्म हो गया आप मुझे इस पात्र का रहस्य बताइए.


तो सन्यासी बोला - कि ये पात्र मानव के हद्रय से बना है । और इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है तो मानव के मन को भर सकें किसी के पास कितना भी धन, ऐष्वर्य, कीर्ति, हो पर वो और माँगता रहता है उसकी चाहत कभी खत्म नहीं होती. इसको सिर्फ परमात्मा का प्रेम ही भर सकता है. तभी मनुष्य की चाहत खत्म होंगी जब परमात्मा का प्रेम वो मन में भर लेगा क्योंकि ये चाहत कभी खत्म नहीं होगी ये ही परमात्मा और जीव में बाधा है.


कहते है “कि चाहत चुहरि सब नीचन की नीच, तू तो पूरन बह्रम था, अगर चाह ना होती बीच .”



मतलब ये व्यक्ति को नीचे की ओर ले जाती है । जब तक ये चाह रहेगी तब तक संतोष नहीं आएगा और संतोष नहीं आएगा तो शांति नहीं आएगी क्योंकि जिसके पास ये संतोष रूपी धन है उसको पानी की एक बूँद भी समुद्र की तरह लगेगी और जिसके पास संतोष नहीं है उसको समुद्र भी एक बूँद की तरह लगेगा । सब कुछ होने के बाद भी कम लगेगा.


“चींटी चावल ले चली बीच में मिल गई दाल, कहता कबीरा दो ना मिले, एक खिले दूजी डाल”

एक चींटी रहती है । जब वो खाने की खोज के लिए निकलती है तो उसे एक चावल का दाना मिल जाता है तो वो खुष हो जाती है । पर वो उतने में संतोष नहीं करती और वो दाना लेकर चलती है तो उसे दाल का दाना भी मिल जाता है पर उसके मुहॅ में तो चावल का दाना है तो वो कैसे ले जाए.उसे चावल भी चाहिये और चावल भी.  


ऐसी ही हमारी एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है तो हमें अगर एक पूरी करनी है तो दूसरी को भूलना होगा. हम क्या करते है उस चींटी की तरह चावल का दाना छोडकर दाल का दाना लेने लगते है एक चीज को छोडकर दूसरी और दूसरी से फिर तीसरी इच्छाएँ बदलती रहती है । यहीं चलता रहता है स्वाद एक भी नहीं ले पाते संतोष एक में भी नहीं करते । इसलिए जीवन में ना तो सुख और शांति आती है ये मन बहुत चंचल है और ये जो संतोष जीवन मे जो सुख लाएगा. क्या पता उससे कितना गुना ज्यादा हमें वापिस मिले ।



प्रसंग ३-
जैसे कि एक बार एक राजा थे उनके दरबार में एक फकीर आया और राजा का गुणगान करने लगा कि जो राजा दे सकता है वो कोई और नहीं दे सकता. और राजा ने एक तरबुज दिया तो फकीर उदास हो गया. कि राजा तो मुझे सोना पैसे कुछ भी दे सकता था पर उसने क्या दिया उसके मन में संतोष नहीं हुआ. और वो चला गया. खुष नहीं हुआ.


उसके बाद एक दूसरा फकीर आया उसने कहा - कि परमात्मा ही सबकुछ दे सकता है उससे बढकर कुछ नही तो राजा ने उसे भी दो आने पैसे दिए. और वो खुष होकर चला गया. तो जब वो बाहर गया तो वो फकीर उसको मिला जिसे तरबुज मिला था.

तो वो बोला - कि आप मुझे ये दो आने दे दो, और ये तरबुज ले लो मुझे पैसों की जरूरत है । तो

फकीर बोला - कि ठीक है अगर तुम्हें इससे संतुष्टिी मिलती है तो ले लो मुझे जो भी मिल जाए मै तो उसी में खुष हूँ मुझे पैसे की चाह नहीं है । तो उसने तरबुज ले लिया और दो आने दे दिया तो कुछ दिनों के बाद वो फकीर जिसे तरबूज दिया था वह फिर से राजा के पास गया. और बोला कि मुझे कुछ दो तो आपे तो मुझे तरबूज दिया था पर मुझे तो पैंसो की जरूरत थी. 

तो राजा ने कहा - कि जो तरबूज मैने दिया था उसके अंदर हीरे जवाहरात तो थे. तो वो फकीर बडा दुखी हुआ कि काश मैने उसे काटकर तो देखा होता पर मैने उसमें संतोष नहीं किया और पाने की चाह में सबकुछ चला गया. प्रेम से कहिए श्री राधे


तो जिस दिन ये चाह मिटती है उसी दिन सबकुछ मिल जाता है । पर ये इतना आसान नहीं है व्यक्ति की चाह मिटती नहीं है चाह को मारना नहीं है उसका रूख परमात्मा की ओर मोड देना है । जिस दिन में संसार की चाह को परमात्मा की चाह में बदला उसी दिन संतोषरूपी धन मिल जाएगा । फिर तो वहीं बात हुई-  “कि चाह गई, चिंता गई, मनवा बेपरवाह,, जिन्हें कुछ ना चाहिए वो शाहों के शाह”



वहीं शाह है जिन्हें कुछ पाने की चाह नहीं है । और जिसके पास संतोष है उसे दुनिया की कोई और चीज सुख नहीं दे सकती है केाई चीज मिल जाए क्योंकि उसे चाह नहीं है वो तो अपने आप में मस्त हो जाता परमात्मा की मस्ती में.



प्रसंग ४ -
एक बार एक राजा ने बगीचें मै सारी चीजें रखी खाने पाने की, सोना-चादी, सबकुछ राजा देखना चाहता था कि व्यक्तिी की क्या चाह है तो सबके लिए वो बगीचा खोला तो लोग अंदर गए जिसको जो चीज जरूरी थी उसने वो उठा ली. जिसके पास रोटी नहीं थी तो उसने खाना उठाया. जिसके पास पैसा नही था तो उसने सोना उठाया.  जिसके पास सबकुछ था पर संतोष नहीं उसने दौलत ही उठाई और सब बाहर आ गए.



तो राज ने देखा - कि एक व्यक्ति था वो खाली हाथ आ गया. तो राजा ने कहा - कि सारी चीजें खत्म हो गई थी या आपके काम की नहीं थी तो वो व्यक्ति कहता है - कि राजा अंदर की एक भी चीज मेरे काम की नहीं थी क्योंकि मै एक भी उठाता तो मेंरे अंदर दूसरी की इच्छा आ जाती कि मुझे दूसरी चाहिए और जब दूसरी मिल जाती तो तीसरी पर मुझे लगता कि मेरे काम की कोई चीज नहीं है क्योकि मेरे पास सबसे बडी चीज है वो है “संतोष रूपी अनमोल हीरा” इसलिए अब मुझे कुछ भी पाने की जरूरत नहीं है । तो राजा ने कहा - कि अब मेरा परीक्ष्ण पूरा हुआ मै यहीं जानना चाहता था कि दुनिया मं वो कौन है जिसके पास सब कुछ है और वो है संतोष रूपी हीरा तो तुम्हारे पास है ।



तो हमें भी अपने जीवन मै इसी संतोष को लाना है ये सारे सुखों का दाता है और जिसके जीवन में संतोषरूपी धन नहीं है उसके पास जब कितना भी धन हो पर उसकी चाह और की है तो वो दरिद्र है । और जो फकीर है । उसके पास कुछ नहीं है । वो अपने में ही मस्त रहता है उसके पास सबकुछ है । हमें अपनी इच्छाओं को परमात्मा के चरणों में अर्पण कर देना है क्येांकि उसके बाद जब वो सारी चीजें उसकी हो जाती है तो वो बदले में हमें सुख शांति और संतोष ही देता है ।जब हमारे जीवन में सुख शांति और संतोष आ जाता है त फिर कुछ पाने कि जरुरत नहीं होती.


                                   
                                                           “जय जय श्री राधे”

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